मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

९ ज्ञान विज्ञान






अब सूंघने वाला इंसुलिन







मधुमेह (डायबीटीज) के रोगियों को अब इंसुलिन की सूई लगवाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि अफ्रेजा नामक एक ऐसी दवा तैयार की गई है, जिसके केवल सूंघने से ही बात बन जाएगी । इस दवा को तैयार करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खून में शुगर का स्तर सामान्य कि करीब रखता है और इसमें मौजूदा इंजेक्शन की तुलना में निम्न शुगर स्तर होने का जोखिम भी काफी कम है। इस नई दवा को अभी अमेरिकी खाद्य एवं मादक पदार्थ विभाग (एफडीए) से अनुमति का इंतजार है । मैनकाइंड कॉर्पोरेशन कंपनी में इस दवा को बनाने वाली टीम के प्रमुख आंड्रिया लियोन बे ने कहा कि यह दवा सूखे पाउडर के रूप में है और उसे सूंघा जाता है । दवा के कण फेफड़े से होते हुए खून में पहुंच जाते हैं ओर तुरंत अपना असर दिखाने लगते हैं । दवा लेने के १२-१५ मिनट में ही उसका असर दिखने लगता है । लियोन बे का कहना है कि यह दवा इंजेक्शन की तुलना में काफी पहले ही अपना असर दिखाती है । २००६ में सूंघने वाली दवा तैयार हुई थी । लेकिन अक्टूबर २००७ में दवा निर्माता कंपनी फाइजर ने उसे कुछ चिंताआें को लेकर बाजार से हटा लिया । एक स्टडी में यह बात सामने आई थी कि एक्यूबेरा से फेफड़े के काम करने की गति घट जाती है और दूसरी एवं अधिक चिंताजनक बात यह थी कि इससे फेफड़े का कैंसर होने का जोखिम बढ़ जाता है । लियोन बे ने कहा कि अफ्रेज्जा पर कैंसर संबंधी अध्ययन किया गया है । चूहे को मानव की तुलना में ज्यादा अफ्रेजा संुघाया गया और शोधकर्ताआें को उसके फेफड़े के कैंसर का खतरा बढ़ने का कोई जोखिम नजर नहीं आया । दरअसल पिछली दवा पर कैंसर संबंधी अध्ययन किए ही नहीं गए थे। विशेषज्ञों ने इस नई दवा का स्वागत तो जरूर किया है, लेकिन थोड़ा सावधान भी किया है । जूवेनाइल डायबीटीज रिसर्च फाउंडेशन के इंसुलिन विभाग के डयरेक्टर संजय दत्त कहते है कि नई दवा का केवल ६ महीने के लिए टेस्ट किया गया है । अभी लंबी अवधि के लिए इसका असर जानना बाकी है ।





ब्रह्माण्ड का हो रहा है विस्तार





खगोल विज्ञानियों ने हबल अंतरिक्ष दूरबीन से यह पता लगाने के लिए चार लाख ४६ हजार मंदाकिनियों का अध्ययन किया कि ब्रह्मांड में पदार्थ (मैटर) किस तरह फैला हुआ है और वह कितनी तेजी से फैला हुआ है और वह कितनी तेजी से फैल रहा है । हबल दूरबीन से किया गया यह अब तक का सबसे बड़ा सर्वेक्षण है । वैज्ञानिकों का कहना है कि ब्रह्मांड तीन विभिन्न घटकों से बना है । इनमें एक सामान्य पदार्थ है - जो ब्रह्मांड में भौतिक वस्तु है, जेसे कि ग्रह । दूसरा - डार्क मैटर है, जो अदृश्य पदार्थ है, जिससे गुरूत्व शक्ति का निर्माण होता है और जिसकी वजह से आकाशगंगाएँ बनती हें । तीसरा- डार्क एनर्जी है, जिसके बारे में अभी तक पता नहीं लगा है । यही वह शक्ति है जिससे ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है । आइंस्टाइन के सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत में दावा किया गया था कि अंतरिक्ष और समय एक ज्यामितीय संरचना हैं । जो इनके भीतर पदार्थ के व्यवहार से परिवर्तित हो सकती हैं । ब्रह्माण्ड का तेजी से विस्तार होने के इस सबूत से पता चलता है कि उसके (डार्क एनर्जी) जैसे घटक उसे बढ़ रहे हैंे जिससे उसकी संरचना प्रभावित हो रही है । हालैंड के लीदन विश्वविद्यालय में भौतिकी और खगोलविज्ञान विभाग के प्रोफेसर लुदोविच वान वाएरबेक कहते हैं- हमारे नतीजों से पुष्टि होती है कि ब्रह्मांड मेंे ऊर्जा का कोई अज्ञात स्त्रोत है जो डार्क मैटर को फैलाते हुए ब्रह्माण्डीय विस्तार को तीव्र कर रहा है, जैसी आइंस्टाइन ने अपने सिद्धांत में भविष्यवाणी की थी । हमारे अध्ययन से प्राप्त् आँकड़े इन भविष्यवाणियों के अनुकूल हैं और आइंस्टाइन के सिद्धांतों के साथ व्यतिक्रम प्रदर्शित नहीं करते हैं । प्रोफेसर वाएरबेक ने डार्क मैटर के अदृश्य जाल को मापने के लिए एक तकनीक की शुरूआत की, जिसका इस्तेमाल किया गया । वीक ग्रैविटेशनल लेंसिंग नाम की यह तकनीक शरीर का एक्सरे लेने की तकनीक जैसी थी । इसके जरिए खगोलविज्ञानियों ने यह पता लगाया कि पृथ्वी की तरफ यात्रा करता हुआ प्रकाश सुदूर आकाशगंगाआें से आते समय किस तरह झुक जाता है और डार्क मैटर से विकृत कर दिया जाता है । इसके बाद खगोल विज्ञानी डार्क मैटर की संरचना का नक्शा बना सकते थे जो ८०प्रतिशत ब्रह्माण्ड का निर्माण करता है। इस अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता टिम स्राबैक कहते हैं - हमने इस बात का परीक्षण किया कि ब्रह्माण्ड की संरचना समय के साथ किस तरह विकसित होती है । यदि ब्रह्माण्ड फैलता है तो ग्रेविटेशनल बीच दूरी बदल जाती है । इस परिप्रेक्ष्य में यह बेहद उत्साहजनक है क्योंकि पहली बार केवल वीक ग्रेविटेशनल लेंसिंग से यह मापन किया गया है । इससे पहले यह हमेशा दूसरे मापनोंे से किया गया क्योंकि लेंसिंग प्रभावी नहीं थी । खगोल विज्ञानियों ने इस तकनीक के साथ ही अध्ययन के लिए कास्मिक इवोल्यूशन सर्वे (कास्मास) का इस्तेमाल किया । यह यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और नासा की संयुक्त परियोजना थी । जिसमें बारह देशों के १०० से अधिक वैज्ञानिकों ने भाग लिया था ।





लेक एटलस ऑफ मध्यप्रदेश





पिछले दिनों मध्यप्रदेश झील संरक्षण प्राधिकरण द्वारा राज्य जल संरचनाआें पर आधारित एक संग्रह का प्रकाशन किया है, जिसे लेक एटलस ऑफ मध्यप्रदेश कहा गया है । इसके आंकड़े बताते हैं कि राज्य में लगभग २४०० झीलें हैं जिनमें शामिल, वे जिनका क्षेत्रफल १ से ५ वर्ग कि.मी. है उनकी संख्या लगभग १५० है, वे जिनका क्षेत्रफल ५ से २० वर्ग कि.मी. उनकी संख्या २२ और वे जल संरचनाएं जिनका क्षेत्रफल २० वर्ग कि.मी. से अधिक है, उनकी संख्या ७ है । इसी ग्रामीण स्तर पर मौजूद तालाबों की संख्या २९५८ है। राज्यभर के छोटे-छोटे गांवों में भी मौजूद जल संरचनाआें की संख्या लगभग ३५३९२ है । म.प्र. झील विकास प्राधिकरण पर प्रदेश में मौजूद जल भंडारों और नम भूमि के संरक्षण, संवर्धन और नियोजन के दायित्व है । म.प्र. राज्य नर्मदा, चम्बल, बेतवा, केन, सोन, ताप्ती, पेंच, बैनगंगा एवं माही नदियों का उद्गम स्थल है । प्रदेश की नदियां सभी दिशाआें में प्रवाहित होती हैं । माही एवं ताप्ती नदी पश्चिम में, सोन नदी पश्चिम की ओर मध्य में एवं बैनगंगा नदी दक्षिण की ओर प्रवाहिक होती है । प्रदेश का औसत सतही जल प्रवाह ८-१५ लाख हेक्टेयर मीटर अंतराज्यीय समझौते के अंतर्गत पड़ौसी राज्यों को आवंटित है । प्रदेश में भूगर्भीत जल की मात्रा ३४-५ लाख हेक्टेयर मीटर अंकलित है । लेक एटलस ऑफ मध्यप्रदेश मेंे अंग्रेजी वर्णमाला के पहले अक्षर के मान से प्रदेश के जिलों को चिन्हित कर वहां मौजूद सभी महत्वपूर्ण, ऐतिहासिक, धार्मिक, पुरातात्विक और प्राकृतिक या मानव निर्मित जल संरचनाआें की विस्तृत व्याख्या की गई है । जैसे अनूपपुर में झीलों की संख्या ४ और अशोक नगर में २ फिर बालाघाट में ६, भिण्ड में १ जबकि बुरहानपुर में १ और छतरपुर मेंे ११ झीलें हैं । सर्वाधिक जीलों की संख्या जबलपुर में २२, शहडोल और भोपाल में १८, पन्ना-उज्जैन में १४-१४ और रीवा-दमोह में में ग्यारह-ग्यारह के साथ कटनी में ९-९ झीलें हैं । सबसे कम अर्थात एक ही झील होने का गौरव होशंगाबाद, बुरहानपुर, खंडवा, राजगढ़, शाजापुर के साथ नीमच को प्राप्त् है । ये सभी २९० झीलें प्रदेश के जिला मुख्यालयों या उनके आसपास विद्यमान हैं । इस एटलस की विशेषता यह है कि इसमें झीलों की भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक जानकारी तो दी गई है प्रत्येेक जिले में मौजूद जल संरचना की पुरातात्विक और धार्मिक के साथ ऐतिहासिक जानकारी भी विस्तार और व्यवस्थित ढंग से दी गई है । प्रदेश के सभी तालाबों, झीलों और अन्य जल संरचनाआें की जानकारी अत्यधिक सुन्दर और आकर्षक छाया चित्र सहित प्रस्तुत की गई है और वहां की प्रत्येक जल संरचना में मौजूद पानी के विश्लेषण का रासायनिक अध्ययन भी दिया गया है । ***