शनिवार, 21 जुलाई 2007

९ जनजीवन

छलावा है जीन युक्त चावल
ची योग हेओग
एक अमेरिकी कंपनी को मानव जीन युक्त जैविक रूप से संशोधित धान की खेती करने की स्वीकृति मिल गई है। इस बारे में दावा किया जा रहा है कि इससे लाखों बच्चें की जान बचाई जा सकती है । लेकिन कुछ विशेषज्ञों ने इसकी जरूरत पर सवाल उठाते हुए कहा है कि जान बचाने का दावा सिर्फ अपना माल बेचने की तरकीब नजर आता है । वेन्ट्रिया बायोसाइंस नामक कंपनी द्वारा बनाया गया यह चावल इस प्रकार से बनाया गया है कि इससे दूध व प्रोटीन निर्मित होंगे जिसे दस्त में दिये जाने वाले ओ.आर.एस. समेत अन्य पेय तथा खाद्य पदार्थों में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। इस औषधीय चावल को अमेरिका के केंसेस में व्यापक रूप से खेतों में बोने की मंजूरी कृषि विभाग से मिल चुकी है । वहीं दूसरी ओर अमेरिका के खाद्य और औषधि प्रशासन से इसके सुरक्षित होने की स्वीकृति देने से इंकार कर दिया है । केंसस लगभग ३२०० एकड़ क्षेत्र में इसकी बुआई की जायेगी और अगर अमेरिका का कृषि विभाग वेन्ट्रिया के आवेदन को पूरी तरह स्वीकार कर लेता है तो यह अमेरिका में दवा उत्पन्न करने वाले खाद्यान्न की सर्वाधिक मात्रा में बुआई होगी। साथ ही यह विश्व का पहला मानव जीवन युक्त खाद्यान्न होगा । कंपनी की योजना है कि इस धान के माध्यम से प्रोटीन की खेती करे और इसका इस्तेमाल दस्त और निर्जलन की बीमारी से जुझ रहे लाखों बच्चें को बचाने के लिए उन्हें दी जा सकने वाले पेय और खाद्य पदार्थों में करें । दस्त से हर साल करीब २० लाख बच्चें दम तोड़ देते हैं और इनमें से अधिकांश विकासशील देशों में होते हैं । पांच वर्ष से कम उम्र के अधिकांश बच्चें की मौत इसी बीमारी की वजह से होती है । हालांकि अफ्रीका के एक संगठन 'फ्रेण्ड्स ऑफ द अर्थ' ने इसकी आलोचना करते हुए कहा है कि जीन संशोधित धान गैर-जरूरी है, क्योंकि अतिसार के कारण सबको पता है और उसके इलाज में इस महंगे उपाय की कोई जरूरत नहीं है । उन्होंने ध्यान दिलाया कि वेन्ट्रिना द्वारा उपजाया जाने वाला धान, इस बीमारी से लाखों बच्चें की जिंदगी बचाने के लिए शुद्ध पेयजल, मल निकासी के साफ और सुरक्षित तरीके जैसे इस बीमारी के अन्य मौजूदा उपायो से लोगों का ध्यान हटा लेगा । गौरतलब है कि दस्त से पीड़ित बच्चें के शरीर में बड़ी मात्रा में पानी बाहर निकल जाता है, और उन्हें सर्वाधिक जरूरत पुर्नजलीकरण की होती है । इस बीमारी से निपटने के लिए ओ.आर.एस. जैसे सस्ते और सर्वसुलभ उपाय मौजूद हैं। इन उपायों के अपनाने से ही दस्त से पीड़ित बच्चें की मृत्युदर में कमी आई है । इस बीमारी से सन् १९८० में ४६ लाख बच्चें ने अपनी जान गंवाई थी, जो वर्तमान में घटकर १५ से २५ लाख हो गई है । इसे २० वीं सदी की एक बड़ी चिकित्सकीय उपलब्धि के रूप में भी स्वीकार किया गया है । भारत में सदियों से इस बीमारी के इलाज के लिए उबले चावल से बना एक पतला पेय, नारियल पानी, छाछ और सौंफ जैसे सस्ते और स्थानीय स्तर पर सरलता से उपलब्ध उपाय मौजूद हैं । अंतर्राष्ट्रीय जन स्वास्थ्य समिति की डॉ. मीरा शिवा और 'नवधान्य' की वंदना शिवा के अनुसार दूध पीते बच्चें के पुनर्जलीकरण का सर्वोत्तम उपाय मां का दूध है । वैन्ट्रिना बहुजीन युक्त चावल में माँ के दूध में पाये जाने वाले तत्व 'लेक्टोफेरीन' का इस्तेमाल कर रहा है । जबकि दूध पीते बच्चें अपनी मां के दूध से ही वह तत्व प्राप्त् करते हैं, उन्हें जीन संशोधित चावल की कोई आवश्यकता नहीं है । एक विश्लेषण के अनुसार वैन्ट्रिना के चावल जैसी औषधीय फसलें, मानव खाद्य आपूर्ति एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा हैं । क्योंकि उनमें मौजूद प्रोटीन मनुष्य में जैविक रूप से क्रियाशील रहता है । इस विषय में अब तक पर्याप्त् परीक्षण नहीं हुए हैं और न ही उसे एफ.डी.ए. से दवा के रूप में स्वीकृति मिली है । इसलिए अचानक इसका सेवन कर लेने पर खतरा हो सकता है । `फ्रेण्ड्स ऑफ द अर्थ' के अनुसार पेरू के अस्पताल में सर्वाधिक गरीब तबके के ५ से ३३ महीने के १४० शिशुआे पर इस तकनीक का इस्तेमाल करके प्रयोग पहले ही किया जा चुका है। रपट कहती है कि इस परीक्षण के खतरे के बारे में उन बच्चें के अभिभावकों को पहले समुचित जानकारी नहीं दी गई थी और कम से कम दो माताओ ने अपने बच्चें को एलर्जी होने की शिकायत की जिसके परिणामस्वरूप पेरू सरकार ने इस परीक्षण की जांच का आदेश दिया है । औषधीय चावल से खेतों में उगने वाले अन्य जीन संशोधित चावल की प्रजाति पर होने वाली बीमारियों की जोखिम के विषय में भी चिंता व्यक्त की गई है । इसमें कई प्रकार के विकार पैदा हो जाने की संभावना है, जैसे कि व्यावसायिक पैदावार एवं बीज उत्पादन के दौरान संकरपरागण और बीजों का मिल जाना । अमेरिका में हाल ही में ऐसे विकार के कुछ मामले सामने आए हैं जिससे सिद्ध होता है कि यह आशंका निर्मूल नहीं है । अमेरिका में विकार की ताजा घटना लंबे दाने वाले लोकप्रिय चावल की गैर जीन संशोधित प्रजाति - 'क्लिअरफील्ड सी.एल. १३१' का विकार या संदूषण बायर क्रॉप साइंस द्वारा विकसित अस्वीकृत जीन संशोधित प्रजाति 'एल.एल.आर.आय.सी.ई. ६०४' के साथ हुआ था । इस श्रेणी के अंतर्गत ६०० श्रेणी के बीज द्वारा पिछले वर्ष फैलाए गये संदूषण (विकार) से अमेरिका के चावल उद्योग में खलबली मच गई थी। इस विकार के कारण बहुजीन युक्त धान विकसित करने वाली कंपनी बायर क्रॉप साइंस के खिलाफ लोगों ने क्रोध व्यक्त किया है । प्रमुख खुदरा दुकानदारों ने अपने यहां से अमेरिकी चावल के उत्पाद हटा लिये हैं और कुछ देशों ने अमेरिकी चावल का आयात रोक दिया है । जिससे अमेरिका के किसानों को नुकसान उठाना पड़ा और उन्हें बायर के खिलाफ मुकदमा दायर किया है । इस प्रजाति के अन्य देशों की खाद्य आपूर्ति को भी प्रभावित किया है । इसीलिए जीन संशोधित उत्पादों के अंतर्राष्ट्रीय नियमन की तत्काल आवश्यकता है । अपने लाखों बच्चें की सुरक्षा और भलाई सुनिश्चित करने के चुनौतीपूर्ण लक्ष्य तक पहुचने के लिए विकासशील देशों को जोखिम भरी अत्याधुनिक तकनीक वाले जीन संशोधित चावल के माध्यम से दस्त की बीमारी का सामना करने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि उनके पास देशज सस्ते सहज और आजमाए हुए उपाय मौजूद हैं । जीन संशोधित चावल को विकसित कर प्रस्तुत करने के लिए कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और जिंदगी बचाने के नाम पर यह बाजारू छलावा मात्र है ।

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