मंगलवार, 24 जुलाई, 2007

आवरण



दिल्ली के पेड़ों की व्यथा-कथा
श्री रेशमा भारती
हम दिल्ली के पेड़ मूक, बेजुबान जीव आज आपसे कुछ कहना चाहते हैं। क्या आप हमें सुन सकते हैं ? क्या आपने कभी हवा के झौंको से होती हमारे पत्तों की सरसराहट, हमपर बैठे तरह-तरह के पक्षियों की चहचहाहट, हमपर फुदकती गिलहरियों की चिक-पिक या हम पर गिरती बारिश की बूंदों की टपटपाहट को सुना है ? क्या आपने कभी पानी को छूकर हमारी मिट्टी से उठती सौंधी महक, हमपर लदे फल-फूलों की खुशबू को महसूस किया है ? क्या आप हमारी धड़कती सांसों को महसूस कर सकते हैं? और कुछ नहीं तो हमारे तने को छूकर देखिए .... हमारे अस्तित्व का अहसास हैं यहाँ । पर शायद आप ज्यादा जरूरी कामों में व्यस्त हैं । अपने-अपने जीवन-संघर्षो में उलझे हैं । तरक्की का दौर है । रूकने, सोचने या महसूस करने का समय ही कहाँ है ? पर हमें मनुष्य का ख्याल बराबर रहता है । जिस भगवान ने मनुष्य को रचा है, उसी ने पेड़ों को भी रचा है। इसलिए हम तो आपको अपना भाई-बहन और मित्र समझते हैं । आपके सुख की हम कामना करते है । आपको सुख पहुँचाने का प्रयास करते हैं। आपके दुख का अहसास भी है और आपके भविष्य की चिंता भी हम करते हैं । चूंकि मनुष्य हमारा बंधु है, मित्र ह़ै; इसलिए हम उसके हितैषी हैं । अपने हित की बात तो सुनेंगे न आप ? सड़कों पर दौड़ते तरह-तरह के वाहनों को हम रोजाना देखते हैं । उनसे होते प्रदूषण को झेलते भी हैं । चमचमाती मेट्रो गाड़ी भी हमने देखी है । ये सब आपकी सुविधाएँ है, आपका आराम हैं । हमें भी आपके आराम का ख्याल है । अपनी छाया और हरियाली से हम भी आपको सुकून पहुंॅचाना चाहते हैं । हम आपके मित्र जो हैं । क्या आप जानते हैं कि दिल्ली मेट्रो रेल प्रोजेक्ट के पहले चरण के लिए कई हजार पेड़ों को मौत के घाट उतारा जा चुका है । क्या आपको पता है कि हाई कैपेसिटी बस सर्विस (एच.सी.बी.एस.) कॉरिडोर के पहले चरण के लिए दो हजार से भी अधिक पेड़ काटे जाने की योजना है । इन परियोजनाआे के आगे और भी चरण है, यह कल्पना ही हममें सिहरन पैदा कर रही हैं । क्या आप जानते हैं कि कुल मिलाकर मेट्रो रेल प्रोजेक्ट के प्रथम चरण, राष्ट्रीय राजमार्ग प्रोजेक्ट, एच.सी.बी.एस कॉरिडोर, फ्लाई ओवर, सब वे, भूमिगत पैदल पथ अथवा सामान्यत: सड़क चौड़ी करने के लिए दिल्ली में लगभग तीस हजार पेड़ों को मौत के घाट उतारा जा चुका है और हजारों अन्य काटे जाने के लिए चिह्न्त किए जा चुके हैं ! यह कैसी इंसानियत है दोस्त ! यह कैसी सुविधा, कैसी तरक्की है आपकी; जो हमारी मौत पर फल रही है! हमें यह समझ नहीं आता कि एक ओर आप सार्वजनिक वाहनों के रास्ते निकालने के नाम पर हमारी बलि तक देने को तैयार हो जाते हैं; दूसरी ओर आपकी सड़कों पर निजी वाहन निरन्तर बढ़ते जाते है ! हम नहीं जान पाते कि प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने वाले हम हरे भरे जीवंत पेड़; कैसे सड़कों पर दौड़ते लोहे के डिब्बों से कम महत्वपूर्ण हो जाते हैं ? कैसे आपको हमारा सौन्दर्य नहीं दिखता; निर्जीव लोहे के चमचमाते डिब्बे आकर्षक लगते हैं ! आपकी सड़कों पर ग्रीन हाऊस गैसे छोड़ते मोटर वाहन बढ़ते जाते हैं कि पैदल चलने वाले, रिक्शे और साईकिल वाले उपेक्षित व सहमे नजर आते हैं । हम समझ नहीं पाते कि आप बढ़ते प्रदूषण, बढ़ते ट्रैफिक, बढ़ते तापमान का सामना आखिर किस प्रकार करेंगे ? हमें आपकी चिंता होती है ! हम आपके मित्र हैं । पर आप जाने-अनजाने हमारे जीवन को कैसे उपेक्षित कर देते हैं ? हम रोज-रोज कई कष्ट झेलते हैं । आपके कंक्रीट-सीमेंट के मार्ग और सड़कें हमारे ऊपर तक चली आती हैं और हमारे आधार जड़ों तक को ढक देती हैं । हमारे ईद-गिर्द मिट्टी ही नहीं बचती कि हम सांस ले पाएं । हम पानी तक ठीक से नहीं पी पाते ! ईद-गिर्द जगह ही नहीं छूटती कि पानी अंदर रिसे । अरे, यह पानी सोखकर हम आप लोगों के लिए ही तो धरती माँ की कोख में पहुँचाते हैं । हम जानते हैं कि यह शहर जल की कमी झेलता है । हम नहीं समझ पाते कि भूमिगत जल को बढ़ा्न्ने में आप हमें अपनी मदद क्यों नहीं करने देते ? सीमेंट-कंक्रीट से ढक जाने पर हमारा सांस घुटती है ! जब कभी हमारी जड़ों के पास आप कूड़ा फैंक देते हैं; तब हमें बहुत कष्ट पहुँचता है । कूड़े में मौजूद खतरनाक रसायन हमें दर्द पहुँचाते हैं ! कूड़ा सड़ता जाता हैं और हम सूखते जाते हैं ! कुछ लोग हमारे तने को पेंट कर देते हैं । पता नहीं कृत्रिम रंगों को हमपर पोतकर उन्हें कैसासौन्दर्य नज़र आता है? इस पेंट से हमारी त्वचा हर पल जलती है! आपका शहर तारों के जाल से घिरा है । कई तारें हमसे होकर गुजरती हैं । उनके करंट से हमारी टहनियां दर्द से सिहर उठती हैं ! जब आपके यहां कोई शादी- ब्याह होता है या कोई उत्सव तो आपकी खुशी में हम भी खुश हो लेते हैं । आप यदि मधुर संगीत बजाए तो उसमें हमारी टहनियां भी नाच उठती हैं, हमारे पत्ते भी थिरकने लगते हैं । पर जब कभी इन अवसरों पर आप हमपर ढेरों बल्ब लाद देते हैं; तो उनके करंट और गर्मी से हम झुलस जाते हैं ! कुछ लोग हम पर कुछ न कुछ ठोंकते भी रहते हैं । जब कील हमें चुभती हैं तो हम दर्द से कराहते है ! आपको शायद हमारी ये दर्द भरी आहें सुनायी न देती हों । आपकी नजर में तो हम बेजुबान है न ! अपने बच्चें की तो चिंता करते हैं न आप ? सच, चहकते हुए स्वस्थ बच्च्े कितने प्यारे लगते हैं । हम भी उनकी चिंता करते हैं, उनके भविष्य का ख्याल करते हैं । उनके लिए हम ऑक्सीजन, पानी, फल-फूल, हरियाली, औषधियां सब जुटाते हैं । हम वह जीती-जागती प्राकृतिक विरासत है, जिन्हें आपको नई पीढ़ी को सौंपना है । हमें मार देंगे, तो अपने बच्चें के लिए क्या छोड़कर जाएंगे आप ? हममें से कई बुजुर्ग पेड़ों ने कई वर्षो से आपके समाजों को बनते-बिगड़ते देखा है । कई सत्ताएं पलटती देखी हैं । आपके अतीत के साक्षी रहे हैं हम । वर्षो से आपकी सेवा करते आए हैं । अपनी इस ऐतिहासिक विरासत को कैसे भुला सकते हैं आप ? क्या आप जानते हैं कि एच.सी.बी.एस कॉरिडोर के लिए काटे जाने वाले कुछ पेड़ ७० साल से भी अधिक पुराने हैं ? क्या आपका समाज बुजुर्गो को यँू मरने देगा ? गर्मी, प्रदूषण, ट्रैफिक और शोर- शराबे से भरे इस शहर में जहाँ-जहाँ बहुत-से घने पेड़ हैं; वहाँ-वहाँ आप ठंडक, शांति, सुकून, पा सकते हैंं। पार्को में भी तो स्वास्थ्य लाभ करने जाते हैं न आप । वहां आपको ताजी ऑक्सीजन देने के लिए हम मौजूद रहते हैं । पर कई पार्को में भी हमारी उपेक्षा हो रही है, हमें मारा जा रहा है ! आपका शहर बहुत से गरीब-बेसहारा लोगों को छत नहीं देता, भरपेट भोजन नहीं देता, खड़े होने की ठीक जगह नहीं देता । उन्हें भी हम अपनी छाया तले आश्रय देते हैं । खाने को फल भी देते हैं। हमारी जिंदगी को महसूस किया आपने ? यह जिंदगी केवलहमारी नहीं है। प्रकृति के कई अवयवों का समावेश है इसमें । मिट्टी, पानी, हवा, धूप ने हमें वर्षोंा तक सींचा है । धरती माँ ने अपनी कोख में हमारी जड़ों को समेटा है । धीरे-धीरे हमारी टहनियां पनपी हैं । अंकुर फूटे हैं, नन्हीं कोपलें पनपी हैं । धीरे-धीरे हर पत्ता बड़ा हुआ है । फिर सूखकर, झरा भी है। पत्तों का यह आना-जाना लगा रहता है । उम्र के बोझ से दबे कई बुजुर्ग पेड़ों को धरती की कोख से बाहर आकर उनकी जड़ों ने सहारा दिया है; ठीक वैसे ही जैसे बुढ़ापे में कई मनुष्य भी अपनी जड़ों-बचपन की ओर लौटते हैं । इस पूरे जीवन चक्र, इस समूची प्रकृति जिसमें हम पले-बढ़े हैं... इसको भला आप हमसे कैसे छीन सकते हैं ? क्या आप मिट्टी, हवा, धूप, पानी, हरियाली सब कुछ खत्म कर देंगे...! जरा सोचिए, इसके बाद आप खुद कैसे जिएंगे? हमारे नहीं तो अपने अस्तित्व की खातिर ही सोचिए । अपने नहीं तो अपने बच्चें के भविष्य की खातिर ही सोचिए । जब हवा, पानी मिट्टी में जहर मिलें हो; जब पेड़ पर्याप्त् न बचे हों, जब धूप भी शरीर को झुलसा देने वाली हो ... जब पक्षी नहीं चहकते हों, जब फूल नहीं महकते हों ... तो सोचिए यह जिंदगी भला कैसी जिन्दगी है ! यह तो जिंदगी का अंत और मौत की आहट हैं ! जनता के प्रतिनिधि शहर को बहुत हरा-भरा बनाने का दावा करते हैं । `क्लीन सिटी और ग्रीन सिटी' के दावे कई जगह लिखे देखे हैं हमने । हम समझ नहीं पाते कि हजारों की तादाद में हम हरे-भरे पेड़ों को काटकर आप कैसी `ग्रीन सिटी' बनाएंगे ? जनता के प्रतिनिधि शहर को सजाने, संुदर बनाने को प्रतिबद्ध हैं । सड़कों-फ्लाइओवरों के किनारे और चंद पार्कों के समतल-मुलायम घास लगायी जाती है, तरह-तरह के फूल लगाए जाते हैं । विदेशी पौधे लगाए जाते हैं । बोनसाई पौधे सजाए जाते हैं । इनकी देखरेख का समूचा प्रबंध होता है । लोग अपने घरों में गमलों में कई पौधे सजाते हैं । ऐसा लगता हैं यह शहर `नेचर लवर' है, पौधों से प्यार करता है पर बरसों से प्रकृति जिन्हें सहज रूप से पालती-पोसती आयी है, उन मित्र पेड़ों में क्या सहज सौन्दर्य नहीं दिखता ? हमारे सौन्दर्य में प्रकृति का सहज अहसास है । इसमें कृत्रिमता नहीं है, दिखावट नहीं है । सहज ताजगी है । सरकार दावा करती है कि अगर एक पेड़ काटा जाएगा तो उसके स्थान पर दस पौधे लगाए जाएंगे । अजीब दावा है यह ! बच्चें के आगमन का तो सब स्वागत करते हैं । पर क्या बच्चें के आने के साथ ही बड़ों को मार डाला जाता है? क्या आपके समाज में एक बड़े व्यक्ति की हत्या को यह कहकर जायज ठहरा दिया जाता है कि दस नए बच्चें भी तो जन्म ले रहे हैं । बच्चें तो धीरे-धीरे ही बड़े होंगे न । तब तक आपकी धरती न जाने कितना प्राकृतिक विनाश झेल चुकी होगी ! इतने समय तक पर्याप्त् ऑक्सीजन, पानी, हरियाली - यह सब कहां से लाएंगे आप ? सच, आपके भविष्य का सोचकर दुख होता है हमें ! कुछ सजग-संवेदनशील लोग हमें बचाने की दौड़-धूप करते रहे हैं । हमें उनसे उम्मीद है । हमें तो, सच मानिए, आप सभी से उम्मीद है । उम्मीद के बल पर ही तो मित्रता टिकी है । आशा और उम्मीद पर ही तो रिश्ते फलते हैं। मरते दम तक हम यह उम्मीद रखेंगे कि आप हमें बचा लें । हम आपके मित्र हैं, आपके बंधु हैं, आपके जीवन का अहम आधार हैं, आपके बच्चेंका भविष्य हैं । क्या आपको हमारी दर्द भरी आहें, हमारी चीखें, हम पर दिन-रात मंडराती मौत की आहटें सुनायी दे रही हैं? क्या आप हमें बचाएंगे ? आप हमारे मित्र हैं। जिस भगवान ने हमें रचा है, उसी ने आपको भी रचा है । आप हमारे अपने हैं । हम तो अपकी अंतिम सांस तक आपकी सलामती की दुआएं मांगते रहेंगे ।


आपके व्यथित मित्र
पेड़

सोमवार, 23 जुलाई, 2007

इस अंक में

पर्यावरण डाइजेस्ट के इस अंक में वर्षा एवं वनों पर विशेष सामग्री दी गयी है। पहले लेख वनों से बेदखल होते वन गुज्जर में अर्ची रस्तोगी ने वन गुज्जरों के सामने खड़े आजीविका के संकट की चर्चा की है । म.प्र. के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ. रामप्रताप गुप्त् के लेख असफल औषधि नीति और बढ़ती कीमतें में कहा गया है कि सरकार की औषधी मूल्य नियंत्रण नीति का लाभ दवा कंपनियों को मिल रहा है, इसकी कमियों के कारण ही दवाऔ की कीमते बढ़ती जा रही हैं । विभा वार्ष्णेय और सौरव मिश्रा के लेख पारंपरिक खाद्य तेल और सेहत में पारंपरिक खाद्य तेलों की महत्ता और आयातित तेलों से पड़ने वाले दुष्प्रभावों पर प्रकाश डाला गया है । दिल्ली स्थित वरिष्ठ लेखक / पत्रकार सुश्री रेशमा भारती के लेख दिल्ली के पेड़ों की व्यथा-कथा में दिल्ली में विकास योजनाऔ के नाम पर शहीद हो रहे पेड़ों की व्यथा कथा उन्ही के शब्दों में दी गयी है ।
इसके साथ ही मौसम के अनुकूल विमल श्रीवास्तव के लेख बादलों की दुनिया में लेख में बादलों और वर्षा के बारे में सभी तकनीकी पक्षों का विवरण देते हुए विस्तार से बताया गया है । थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क से जुड़े ची योग हेआेंग के लेख छलावा है जीन युक्त चावल में एक अमेरिकी कम्पनी को मानव जीन युक्त चावल की खेती करने की स्वीकृति के बाद के परिणामों की विवेचना की गई है । सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक लेखक डॉ. वाय.पी. गुप्त के लेख पेट्रोलियम का उपयोग वरदान या अभिशाप में तेल परिवहन के दौरान होने वाले सागरीय प्रदूषण की गहराई से जांच पड़ताल की गई है । कविता में इस बार लखनऊ के सुप्रसिद्ध साहित्यकार कुंवर कुसुमेश की कविता जल दी गई है जो आपको रूचिकर लगेगी ।
पत्रिका स्थायी स्तंभ पर्यावरण परिक्रमा, ज्ञान विज्ञान एवं पर्यावरण समाचार में आप देश दुनिया में पर्यावरण और विज्ञान के क्षेत्र में चल रही हलचलों से अवगत होते है। पत्रिका के बारे में आपकी राय से अवगत करायें।
- कुमार सिद्धार्थ

सम्पादकीय ....

तारे गिनना पुरानी आदत है
अमेरिका के एक खगोल शास्त्री ने आधुनिक तकनीकों का उपयोग करके दर्शाया कि आकाश में तारों की गति को रिकॉर्ड करने का काम आज से कम से कम ३३०० वर्ष पूर्व शुरू हो चुका था । यह निष्कर्ष उन्होंने खुदाई में मिली मिट्टी की एक प्राचीन शिला की मदद से निकाला है । मिट्टी की ये शिलाएं ६८७ ईसा पूर्व की हैं । इन पर तारों-नक्षत्रों के लगभग २०० अवलोकन खुदे हुए हैं इसकी लिखाई शंकु लिपि में है जो मध्य पूर्व की लिपि थी । ये शिलाएं बेबीलोन में बनी थीं और इन्हें मुलापिन नाम से जाना जाता है । हालांकि ये शिलाएं करीब ७०० ईसा पूर्व की हैं मगर अधिकांश पुरातत्ववेत्ता मानते हैं कि इन पर जो खगोलीय तथ्य अंकित हैं वे कहीं अधिक प्राचीन हैं । लुइसियाना विश्वविद्यालय के खगोलशास्त्री ब्रैड शेफर यह जानना चाहते थे कि आखिर ये अवलोकन कितने पुराने हैं और अध्ययन के आधार पर उनका निष्कर्ष है कि ये अवलोकन १३७० ईसा पूर्व यानी आज से करीब सवा तीन हजार वर्ष पूर्व के आकाश से मेल खाते हैं । जैसे इनमें यह अवलोकन है कि कोई तारामंडल किस दिन पूर्व से उदय होता दिखता है । ये तारीखें बदलती रहती हैं क्योंकि पृथ्वी अपनी अक्ष पर थोड़ी डोलती है । विभिन्न तारामण्डलों के लिए इन तारीखों की गणना के आधार पर शेफर ने यह पता लगाया कि ये अवलोकन किस समय के हो सकते हैं । दूसरा काम उन्होंने यह किया कि यह भी पक्का कर लिया कि ये अवलोकन किस स्थान से लिये गए होंगे । १०० किमी. की घट-बढ़ के अंदर यह स्थान ३५.१ डिग्री उत्तरी अक्षांश पर स्थित रहा होगा । इस अक्षांश पर निनोवा और असुर जैसे असीरियाई शहर पड़ते हैं । अपने परिणाम अमेरिकन एस्ट्रॉनॉमिकल सोसायटी के समक्ष प्रस्तुत करते हुए शेफर ने बताया कि इससे स्पष्ट होता है कि ये अवलोकन बेबीलोन के हैं । शेफर के इस अध्ययन से काफी समय से चली आ रही बहस को विराम मिलेगा। अब तक इतिहासकार उक्त शिला के एक-एक तारे या तारामण्डल को लेकर गणनाएं व तर्क करते रहे हैं, लेकिन शेफर के इस काम को काफी प्रभावशाली माना जा रहा है ।

प्रसंगवश

जलवायु को थामना आसान नहीं
जलवायु परिवर्तन संबंधी अंतर्सरकारी पैनल यानी आई. पी. सी. सी. की ताजा रिपोर्ट के अनुसार ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन को सीमित करना जरूरी है और यह काफी कम लागत में संभव भी है । यू.एस.ए. जैसे कुछ देशों का कहना है कि इन गैसों, खासकर कार्बन डाईऑक्साइड के उत्सर्जन पर बहुत कठोर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की गई, तो विश्व में आर्थिक मंदी आएगी । आई. पी. सी. सी. के कार्यकारी समूह की रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक तापमान वृद्धि के भयंकरतम प्रभावों से बचने के लिए ग्रीन हाऊस गैसों को जिस सीमा तक कम करना होगा उसमें वर्ष २०३० तक विश्व के कु ल आर्थिक उत्पादन का ३ प्रतिशत खर्च होगा - यानी प्रति वर्ष करीब ०.१२ प्रतिशत । पहले जो अनुमान लगाए गए थे, उनकी तुलना में यह बहुत सस्ता है । मगर इसमें कई अगर-मगर हैं । जैसे यू.एस. अधिकारियों का मत है कि इतने से भी दुनिया में आर्थिक मंदी आएगी । इसलिए ग्रीन हाऊस गैसों की सीमा थोड़ी बढ़ाकर तय करना बेहतर होगा । आई. पी. सी. सी. की उपरोक्त रिपोर्ट में मानकर चला गया है कि यदि हम वैश्विक तापमान में वृद्धि को २ डिग्री सेल्सियस से कम रख सकें तो इसके असर बहुत खतरनाक नहीं होंगे । इसके लिए वायुमण्डल में ग्रीनहाऊस गैसों की मात्रा को ४५०-५०० पी. पी. एम. के बीच स्थिर करना होगा । फिलहाल वायुमण्डल में इन गैसों की मात्रा ४३० पी. पी. एम. के तुल्य है और इसमें प्रतिवर्ष २ पी. पी. एम. की वृद्धि हो रही है । यदि हम ५३५ पी. पी. एम. पर टिकना चाहते हैं, तो इस सदी के मध्य तक ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन में ५०-८५ प्रतिशत की कटौती करनी होगी । इसके लिए ऊर्जा का अधिक कार्यकुशल उपयोग और वैकल्पिक ऊर्जा स्त्रोतों का उपयोग करना ही पर्याप्त् होगा। अलबत्ता यदि हम थोड़ी ढील दें और कोशिश करें कि ग्रीनहाऊस गैसों की मात्रा को ५३५-५९० के बीच स्थिर हो तो खर्च और भी कम होगा । तब हमें २०३० तक विश्व के आर्थिक उत्पादन का मात्र ०.२-२.५ प्रतिशत खर्च करना होगा । यदि ग्रीनहाऊस गैसों और तापमान को थोड़ा और ऊपर जाने दें तो ऊर्जा के कार्यक्षम उपयोग से दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद के ०.६ प्रतिशत के बराबर लाभ भी संभव है ।

लघुकथा

लघुकथा
आत्मव्यथा
दिलीप भाटिया
मैं एक नन्हा पौधा हँू । पर्यावरण दिवस पर एक बहुत बड़े साहब ने मुझे लगाया था । उनके नाम की तख्ती भी लगी हुई है । फोटो भी खिंचे थे । अगले दिन समाचार पत्र में साहब के साथ मेरी भी फोटो प्रकाशति हुई थी पर अब मैं सूख रहा हँू । उस दिन के बाद मुझे किसी ने पानी के लिए भी नहीं पूछा। मैं मुरझा रहा हँू, सूख रहा हँू, मेरी सुध लेने वाला कोई नहीं । कुछ दिनों में सम्पूर्णतया नष्ट हो जाऊँगा । अगले वर्ष मेरे जैसे किसी और पौधे के साथ भी यही होगा । फिर किसी और पौधे के साथ । यह सिलसिला चलता रहेगा । पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता रहेगा । फोटो खिंचती रहेंगी । मैं एवं मेरे भाई इन उद्घाटन एवं जलसों के लिए अपना बलिदान देते रहेंगे । शहीद होते रहेंगे ।

1 सामयिक

वनों से बेदखत होते वन गुज्जर
अर्ची रस्तोगी
मई के प्रथम सप्तह में जब वन गुज्जर उत्तरांचल के उत्तरकाशी जिले में अपने ग्रीष्मकालीन घरों की ओर जाने लगे तब देहरादून के निकट विकासनगर के नजदीक पहँुचकर उन्हें पता चला कि अगले साल वे अपने ग्रीष्मकालीन घरों में नहीं जा सकेंगे । सूचना के अधिकार के तहत दिए गए एक आवेदन के जवाब में यह जानकारी मिली कि वन विभाग ने अपने निर्णय से पलटते हुए गुज्जरों को राज्य में उनके ग्रीष्मकालीन घरों में जाने की अनुमति इस वर्ष के लिए तो दे दी है, मगर अगले वर्ष वे उत्तरांचल के जंगल में प्रवेश नहीं कर सकेंगे । वन गुज्जर पारंपरिक खानाबदोश हैं जो गर्मियों का मौसम आते ही अपनी भेड़ बकरियों और अन्य पशुआें के साथ हिमालय के ऊँचे पर्वतों पर चले जाते हैं और शीत ऋतु में उत्तरप्रदेश की निचली शिवालिक पर्वत श्रेणियों में उतर आते हैं। उनका ग्रीष्मकालीन निवास उत्तराकाशी जिले में गोविन्द राष्ट्रीय उद्यान में होता है और उससे लगे हुए गोविन्द वन्य जीव अभ्यारण्य में जाने की उन्हें अस्थाई अनुमति भी मिल जाती थी । राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के निदेशक जो गोविन्द वन्यजीव उद्यान के प्रभारी हैं के अनुसार - ''उत्तरप्रदेश से आने वाले परिवारों को हम इस वर्ष तो अनुमति दे रहें हैं, मगर अगले वर्ष उन्हें अनुमति नहीं दी जायेगी ।'' वन गुज्जरों के साथ काम करने वाले देहरादून स्थित एक स्वयंसेवी संगठन ''सोसायटी फॉर प्रमोशन ऑफ हिमालयन इंडिजिनस एक्टीविटीस'' ने ही सूचना के अधिकार के तहत आवेदन दिया था । सोसायटी के निदेशक प्रवीण कौशल मण्टो ने बताया कि अनुमति पत्र २५ अप्रैल २००७ को जारी किया गया है । किन्तु प्रवीण कौशल को वन विभाग से अपने पत्र का जवाब मिलने अर्थात ३० अप्रैल तक वन गुज्जरों को इसकी कोई जानकारी नहीं थी । वन गुज्जरों का इतिहास बताते हुए कौशल कहते हैं, ''शिवालिक में वे छंटाई कर (भेड़ों के चारे के लिए पेड़ की टहनियों की छंटाई के एवज मेंदिया जाने वाला शुल्क) और गोविन्द वन्य जीव अभ्यारण्य में चराई कर चुकाते हैं । इनका भुगतान करने के बाद ही उन्हें अनुमति - (प्रवेश का कानूनी दस्तावेज) - प्रदान की जाती है । सन् १९३७ से इनके पास परमिट है।'' सन् १९३७ में १२ वन गुज्जर परिवारांे को परमिट दिया गया था और अब इनकी संख्या बढ़कर १०० एकल परिवारों जितनी हो गई है, जबकि परमिटों की संख्या १२ ही बनी हुई है । इस वर्ष अप्रैल में जब १२ परमिट धारक (कुल १०० से अधिक एकल परिवार) वन विभाग से हर वर्ष की तरह अनुमति लेने गये तो उन्हें मना कर दिया गया । उल्फा नामक एक वन गुज्जर का प्रश्न है ''इस साल जब हम शिवालिक के पहाड़ों से लौट रहे थे तो अधिकारियों ने हमें यह लिखकर देने को कहा था कि अगली बार हम वापस नहीं आएं । मगर जब तक हमारी वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होती तब तक हम कहाँ जाएँ ? इस प्रकार की अफवाहों के परिणाम स्वरूप गोविन्द वन्यजीव अभ्यारण्य की ओर जा रहे लगभग १०० परिवार भी रास्ते में रूक गए । एक अन्य वन गुज्जर, रोशन ने बताया ''अपने मवेशियों के साथ पहाड़ों में रूके रहना आसान नहीं है ।'' अनुमति मिलने में हो रही देरी के कारण वे अपने साथ जो चारा लेकर चले थे वह खत्म होने लगा है । उल्फा ने बताया ''हमें पास के गांवों से चारा खरीदना पड़ रहा है। जब चारे की मांग बढ़ गई तो गांव के दुकानदारों ने उसके दाम भी बढ़ा दिए । दुकानदारों ने चारे के चार बोरे लगभग १००० रूपये में दिए । भैसों को गर्भपात हो रहा है । बछड़े और हमारे बच्च्े बीमार हो रहे हैं । आदतन ठंडे स्थानों पर रहने से उनको गर्मी सहन नहीं हो पा रही है ।'' अन्य गुज्जरों ने भी इसका समर्थन किया। इसके पूर्व जून २००३ में उत्तरांचल (अब उत्तराखंड) के प्रधान वन संरक्षक द्वारा जारी एक स्थाई आदेश में कहा गया था कि अनुमति प्राप्त् करने के लिए वन गुज्जरों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, इसलिए प्रक्रिया को सरल बनाना चाहिए । मगर सितम्बर २००६ में एक नया आदेश जारी हुआ । इसमें कहा गया कि वन गुज्जरों ने गोविन्द राष्ट्रीय वन उद्यान में वापस न लौटने के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए हैं । उद्यान के अधिकारियों का कहना था कि १२ परमिट धारकों की संख्या बढ़कर १०० से ज्यादा एकल परिवार तक पहँुच जाने के कारण जंगल पर दबाव बहुत बढ़ गया है । उनका कहना है कि वर्तमान में राज्य सरकार के पास गुज्जरों के पुनर्वास की कोई योजना नहीं है। इस पर गुज्जरों का कहना है कि, ''उनके पास कोई विशेषज्ञता अथवा कौशल नहीं है, वो मजदूर भी नहीं है, इसलिए उन्हें धीरे-धीरे बसाना होगा ।'' किन्तु प्रमुख वन्यजीव संरक्षक ने स्पष्ट कहा है कि वन गुज्जरों ने लिखकर दिया है कि अगले साल वह नहीं लौटेंगे । लेकिन इसके बाद प्रदेश के मुख्य प्रमुख वन्यजीव संरक्षक टिप्पणी के लिए उपलब्ध नहीं हुए । निक्का कासना नाम का वन गुज्जर वर्तमान स्थिति पर अपनी दृष्टि स्पष्ट करते हुए कहता है, `टकराव टल गया है, लेकिन सिर्फ हमारे दोबारा लौटने तक ।'

२ तेल प्रदूषण

तेल प्रदूषण पेट्रोलियम का उपयोग वरदान या अभिशाप ?
डॉ. वाई.पी.गुप्त
यह बात आजकल बहुत गंभीरता से विचारणीय है कि जिस पेट्रोलियम को अधुनिक सभ्यता का अग्रदूत कहा जाता है, वह वरदान है अथवा अभिशाप है, क्योंकि इसके उपयोग से भारी प्रदूषण हो रहा है जिससे इस धरती पर जीवन चुनौतीपूर्ण हो गया । आज पेट्रोलियम और औद्योगिक कचरा समुद्रों का प्रदूषण बढ़ा रहा है, तेल के रिसाव-फैलाव नई मुसीबतें हैं । इस तेल फैलाव और तेल टैंक टूटने ने समुद्री इकोसिस्टम्स को बुरी तरह हानि पहुंचाई हैं । इससे सागर तटों पर सुविधाआें को क्षतिग्रस्त किया है और पानी की गुणवत्ता को प्रभावित किया हैं। वर्ष में शायद ही कोई ऐसा सप्तह निकलता हो, जब विश्व के किसी न किसी भाग से २००० मीट्रिक टन से अधिक तेल समुद्र में फैलने की घटना का समाचार न आता हो । ऐसा दुर्घटना के कारण भी होता है या बड़े टैंकरों को धोने से अथवा बंदरगाहों पर तेल को भरते समय भी होता रहता हे । भारत सरकार ने हाल में भारतीय समुद्र क्षेत्र में व्यापार परिवहन में लगे जहाजों पर गहरी चिंता जताई है, जो देश के तटीय जल में तेल का कचरा फैलाते हैं, अन्य तरह का प्रदूषण फैलाते हैं, पर्यावरण की क्षति करते हैं और जीवन तथा सम्पत्ति दोनों को खतरे में डालते हैं। राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार भारत के केरल के तटीय क्षेत्रों में प्रदूषण के कारण झींगा, चिंगट और मछली उत्पादन २५ प्रतिशत घट गया है । सर्वोच्च् न्यायालय ने पहले आदेश दिया था कि प्रदूषण फैलाने वाले जल कृषि (एक्वाकल्चर) फार्म्स को तटीय राज्यों में बंद कर देना चाहिए, क्योंकि ये पर्यावरण संदूषण के साथ भूमि क्षरण भी करते हैं । अदालत ने यह भी आदेश दिया था कि पूरे देश में तटीय क्षेत्रों से ५०० मीटर तक कोई भी निर्माण न किया जाए, क्योंकि औद्योगिकरण और शहरीकरण ने इन क्षेत्रों के पारिस्थिकीय संतुलन को खतरे में डाल दिया है । हाल ही में लगभग १९०० टन तेल के फैलाव से डेनमार्क के बाल्टिक तट पर प्रदूषण की चुनौती उपस्थित हुई थी । इक्वाडोर के गैलापेगोस द्वीपसमूह के पास समुद्र के पानी में लगभग ६,५५,००० लीटर डीज़ल और भारी तेल के रिसाव ने वहां की भूमि, दुर्लभ समुद्री जीवों और पक्षियों को जोखिम में डाल दिया । भूकम्प के बाद गुजरात में कांडला बंदरगाह पर भंडारण टैंक से लगभग २००० मीट्रिक टन हानिकारक रसायन एकोनाइट्रिल (एसीएन) रिस जाने से उस क्षेत्र के आसपास के निवासियों का जीवन जोखिम से घिर गया है । इससे पहले कांडला बंदरगाह पर समुद्र में फैलेलगभग तीन लाख लीटर तेल से जामनगर तट रेखा से परे कच्छ की खाड़ी के उथले पानी में समुद्री नेशनल पार्क (जामनगर) के नज़दीक अनेक समुद्री जीव जोखिम में आ गए थे । टोकियो के पश्चिम में ३१७ कि.मी. दूरी पर तेल फैलाव ने जापान के तटवर्ती शहरों को हानि पहुंचाई थी । बेलाय नदी के किनारे डले एक तेल पाइप से लगभग १५० मीट्रिक टन तेल फैलाव ने भी रूस में यूराल पर्वत में दऱ्जनों गांवों के पीने के पानी को संदूषित किया है । एक आमोद-प्रमोद जहाज़ के सैनज़ुआन (पोर्टोरीको) की कोरल रीफ में घुस जाने के कारण अटलांटिक तट पर रिसे २८.५ लाख लीटर तेल से रिसोर्ट बीच संदूषित हुआ । बम्बई हाई से लगभग १६०० मीट्रिक टन तेल फैलाव (जो शहरी तेल पाइप लाइन खराब होने से हुआ था) ने मछलियों, पक्षी जीवन और जनजीवन की गुणवत्ता को हानि पहुंचाई । ठीक इसी प्रकार बंगाल की खाड़ी में क्षतिग्रस्त तेल टेंकर से रिसे तेल ने निकोबार द्वीप समूह और अन्य क्षेत्रों में मानव और समुद्री जीवन को नुकसान पहुंचाया । लाइबेरिया आधारित एक टेंकर से रिसे ८५,००० मीट्रिक टन कच्च् तेल ने स्कॉटलैण्ड को गंभीर रूप से प्रदूषित किया और द्वीप समूह के पक्षी जीवन को घातक हानि पहुंचाई। सबसे बुरा तेल फैलाव यू.एस.ए. के अलास्का में प्रिंसबिलियम साउण्ड में एक्सन वाल्डेज टेंकर से हुआ था । अनुमान है कि एक्सन वाल्डेज तेल फैलाव के बाद प्रथम ६ महीनों की अवधि में ३५,००० पक्षी, १०,००० औटर और १५ व्हेल मर गई थीं । मगर यह इराक द्वारा खाड़ी युद्ध में पम्प किए गए तेल और अमरीका द्वारा तेल टेंकरों पर की गई बमबारी से फैले तेल की मात्रा के सामने बौना है । एक आकलन के अनुसार ११० लाख बैरल कच्च तेल फारस की खाड़ी में प्रवेश कर गया है और कई पक्षी किस्में विलुप्त् हो गई हैं । प्रदूषणसे मानव पर भी प्रभाव पड़ता है । विश्व में ६३ करोड़ से अधिक वाहनों में पेट्रोलियम का उपयोग प्रदूषण का मुख्य कारण है । विकसित देशों में प्रदूषण रोकने के नियम होने के बावजूद १५० लाख टन कार्बन मोनोऑक्साइड, १० लाख टन नाइट्रोजन ऑक्साइड और १५ लाख टन हाइड्रोकार्बन्स प्रति वर्ष वायुमंडल में बढ़ जाते हैं । जीवाश्म इंर्धन के जलने से वायुमंडल प्रति वर्ष करोड़ों टन कार्बन डाइऑक्साइड आती है । विकसित देश वायुमंडल प्रदूषण के लिए ७० प्रतिशत ज़िम्मेदार हैं । भारत प्रति वर्ष कुछ लाख टन सल्फर डाइड्रोकार्बन्स, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन्स वायुमंडल में पहुंचाता है । इन प्रदूषकों से अनेक बीमारियां, जैसे फेफड़े का कैंसर, दमा, ब्रोंकाइटिस, टी.बी. आदि हो जाती हैं । वायुमंडल में विषैले रसायनों के कारण कैंसर के ८० प्रतिशत मामले होते हैं । मुम्बई में अनेक लोग इन बीमारियों से पीड़ित हैं । दिल्ली में फेफड़ों के मरीज़ों की संख्या देश में सर्वाधिक है । इसकी ३० प्रतिशत आबादी इसका शिकार है । दिल्ली में सांस और गले की बीमारियां १२ गुना अधिक हैं । इराक के विरूद्ब २००३ के युद्ध ने इराक और उसके आसपास के क्षेत्र को बुरी तरह विषैला कर दिया है जिससे पानी, हवा और मिट्टी बहुत प्रदूषित हुए और लोगों का जीवन खतरे में पड़ गया । इससे पहले १९९१ के खाड़ी युद्ध ने संसार में पर्यावरण संतुलन को विनाश में धकेल दिया। वहां जो मानव और पर्यावरण की हानि हुई, वह संसार में हुए हिरोशिमा, भोपाल और चेरनोबिल से मिलकर हुई बरबादी से कम नहीं है । कुवैत के तेल कुआं, पेट्रोल रिफाइनरी के जलने तथा तेल के फैलने से कुवैत के आसपास का विशाल क्षेत्र धूल, गैसों और अन्य विषैले पदार्थो से प्रदूषित हुआ है । इराक ज़हरीला रेगिस्तान बन गया है, जहां एक बड़े क्षेत्र में महामारी फैली है । पेट्रोलियम अपशिष्ट ने समुद्री खाद्य पदार्थो को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। प्रदूषित पानी से ओस्टर (शेल फिश) कैंसरकारी हो जाती है । समुद्री खाद्य पदार्थो का मनुष्य द्वारा उपयोग करने पर उनमें होठों, ठोड़ी, गालों, उंगलियों के सिरों में सुन्नता, सुस्ती, चक्कर आना, बोलने में असंगति और जठर आंत्रीय विकार होने लगते हैं । विश्व के सामने अपने वायुमंडल को बचाने की कड़ी चुनौती खड़ी है । सबक है कि पेट्रोलियम की भयंकर तबाही के परिणामों के मद्दे नज़र कम विकसित देशों को अपनी औद्योगिक प्रगति के लिए अन्य सुरक्षित ऊर्जा स्त्रोत विकसित करने चाहिए ।

३ जीवन शैली

पारंपरिक खाद्य तेल और सेहत
विभा वार्ष्णेय/सौरव मिश्रा
यंत्रीकृत खाद्य तेल उद्योग घी, मक्खन और सरसों के तेल जैसे पारंपरिक खाद्य तेलों पर श्रेष्ठता दर्शाने के लिए विभिन्न तकनीकी शब्दावलियों का इस्तेमाल किया जाता है । जैसे - सेचुरेटेड फैट्स (संतृप्त् वसीय अम्ल), अनसेचुरेटेड फैट्स (असंतृप्त् वसीय अम्ल), ट्रांसफेटी ऐस्डि्स आदि । हमें यह बताया जाता है कि वनस्पति तेल कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम कर दिल की सुरक्षा करते हैं लेकिन वैज्ञानिक सर्वसम्मति से इस निष्कर्ष पर पहुँच रहे हैं कि ये दावे अत्यंत ही भ्रामक हैं । उनकी राय है कि भोजन में केवल पौष्टिक तेलों का उपयोग किया जाना चाहिए । खाद्य तेल मुख्यत: तीन प्रकार के वसीय अम्लों से निर्मित होते हैं - सेचुरेटेड फैटी एसिड्स (एसएफए), मोनोअनसेचुरेटेड फैटी एसिड्स (एमयूएफए) और पॉलीअनसेचुरेटेड फैटी एसिड्स । इन वसाआं और तेलों की यह विशेषता श्रृंखलाबद्ब अनिश्चित कार्बन परमाणुआ के बीच बनने वाले बंध के कारण होती हैं। सेचुरेटेड फैटी एसिड्स में निकटतम कार्बन परमाणुआ के बीच एकल बंध होता है । एमयूएफए में एकल दोहरा बंध होता है । जबकि पीयूएफए के कार्बन परमाणुआ के बीच एकल बंध होता है । कुछ अम्लीय श्रृंखलाआं जैसे पार्निटिक अम्ल एलडीएल (एक प्रकार का हानिकारक कोलेस्ट्रॉल) के स्तर को बढ़ाता है । ओमेगा ३ और ओमेगा ६ जैसे अम्ल ह्रदय के लिए अच्छे और प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने वाले होते हैं । पारंपरिक भारतीय खाद्य तेल जैसे सरसों और नारियल के तेल में यह गुण भरपूर है । खाद्य तेल उद्योग द्वारा किए जा रहे आक्रामक विज्ञापन के कारण पारंपरिक तेलों का भविष्य खतरे में हैं । १९७० के आरंभ में एसएफए से भरपूर पाम ऑइल को पारंपरिक तेलों के सस्ते विकल्प के रूप में प्रोत्साहित किया गया था और फिर ८० के दशक में असंतृप्त् वसा युक्त कुछ तेलों के प्रति उद्योगों का रूझान बढ़ा । इस बात का जबरदस्त प्रचार किया गया कि केनोला तेल ह्रदय के लिए लाभदायक है इसके पक्ष में यह दलील दी गई कि यह तेल जैतून केतेल के समान है । इन दोनों में एमयूएफए अत्यधिक मात्रा में होता है । जैतून तेल में ह्रदय के लिए मौजूद स्वास्थ्यवर्धक गुणों की जानकारी रखने वाले लोगों को इस पक्ष ने काफी आकर्षित किया । इसके बाद पीयूएफए से भरपूर सूरजमुखी और सोयाबीन तेलों को ह्रदय के लिए सेहतमंद बताया गया । लेकिन वैज्ञानिक समुदाय इन तर्कोंा की तह तक पहुँच चुका है । उदाहरण के लिए, अमेरिकन जर्नल ऑफ न्यूट्रिशियन के १९९७ के अंक में प्रकाशित लेख में, अमेरिकी शोधकर्ता हेनड्रिक, व्हाइट और कुक ने यह दर्शाया कि सोयाबीन तेल का सेवन मानव शरीर के अच्छे कोलेस्ट्राल के उच्च् घनत्व वाले लिपोप्रोटिन (एचडीएल) स्तर को घटता है । यह भी प्रतिपादित किया गया कि सोयाबीन तेल में मौजूद कार्बन गंध पीयूएफए युक्त तेलों को सेचुरेटेड तेलों की तुलना में अधिक क्रियाशील बनाती है । अत: य&#