रविवार, 10 अगस्त 2014

कविता
जल पर कुछ दोहे
कृपाशंकर शर्मा अचूक

हरियाली जल ग्रहण कर चहुंदिस करे सुवास,
जन, मन, तन हो हरा, रचे नया इतिहास ।
    धरती सूखी हरित हो, रहे सभी सानन्द
    नमी बरसें जल ग्रहण से, मिटे सकल सब द्वन्द ।
सब सागर खारा दिखे, रहते जीव अनेक,
भाप करे जल ग्रहण जब, बादल रखते टेक ।
    कौन शत्रु दीखे यहाँ, कौन यहाँ पर मीत
    प्यास बुझे जलग्रहण कर, मन के जीते जीत ।
कोयल करे पुकार जब, आती नई बहार
वर्षा ऋतु जलग्रहण कर, नित प्रति करे विहार ।
    साधक साधन साध के, मन निज करे विचार,
    तन साधन जलग्रहण है जिससे हो उपकार ।
सर, तरू, सूखे बावड़ी, सूखी औषधि मूल
सरिता तट जल ग्रहण बिन, भूले सभी उसूल ।
    बाहर भीतर का जिसे, नहीं तनिक भी भान
    जला, जलगहण के बिना, जीवन ना आसान ।
सूख के साथ हैं सभी, दुख से कोसों दूर
यह जीवन जल ग्रहण कर, होता फिर भरपूर
    सागर की शोभा बढ़े, जब हो नीर अथाह,
    निश दिन करता जलग्रहण, छोड़ सभी परवाह ।
सुमिरन से सुख उपजे, कहते साधु सुजान,
तन पावन जल ग्रहण से, जो प्राणों का प्राण ।
    संास अचूक मिली तुझे पाया धन अनमोल
    निर्भय कर जल ग्रहण तू उलझी गुत्थी खोल ।
पेड़ कभी नहिं फल भखे, नदी न संचय नीर,
करें सदा जल ग्रहण जो, हों बलवान शरीर ।
    रितु वसन्त को देखके, डाल दिए द्रुम पात
    जल ग्रहण के हेतु ही, पंछी आबत-जात ।

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