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गुरुवार, 22 मार्च 2012

विश्व वानिकी दिवस पर विशेष

वन घायल हैं डरी सी नदियाँ
डॉ. सुनील कुमार अग्रवाल

जंगलों को पनपने में सदियाँ लग जाती हैं किन्तु जंगल काटने वाले उसे चंद दिनों में ही काट डालते हैं । जंगल चुपचाप कट जाता है । पहले जंगलों के प्रति आदमी के मन मेंआस्था रहती थी । वह जंगल के बीच जंगली बने रहकर भी जंगल का अमंगल करने की सोचता तक नहींथा । वह सदियों से इस तथ्य को जानता है कि जंगल भी जलचक्र के नियंता हैं । पादप अपने पादो से पानी पीते है और सूर्य ताप उन्हें पनपाता है । जंगलों से आदमी क्या कुछ नहीं पाता है । जंगल ही जल को सहेजते हैं । जंगल ही तो शिव जटारूप होते है जिनमें जल संचय की क्षमता है ।
जंगली परिस्थितियां ही पर्वतों की थाती हैं । छोटे-बड़े पर्वत इन जंगलों को अपने कंधोंपर उठाये रहते हैं। पर्वतों से ही नि:सृत होती हैं नदियाँ । हिमाच्छादित पर्वतों के पेड़ों की जड़ों से बूंद-बूंद रिसता है जल, और यही धारा के रूप में पेड़-पौधों के पद प्रक्षालित करता हुआ प्रवाहित होता है । भारत का किरीट हिमालय वॉटर टावर यूँ ही नही कहलाता है । हिमालय ही तो सदानीरा नदियों का पिता धर्म निभाता है । पर्वतों से फूटतेहुए झरने-जल प्रपात ही तो नदियों का गात (शरीर) बनाते हैं । कल-कल करते झरने गीत प्यार के गाते है । वन घायल हो तो सहम जाते है प्रपात, सरिताएं और सलिलाएं ।
सृष्टि में कोई भी रचना अकारण नहीं है । हर वनस्पति का अपना हरित आधार है । हर वन्य जन्तु का अपना रूप रंग आकार है । हर जीव परितंत्र में अपना योगदान करता है और अभय रहता है । किन्तु जंगलों में मानुषी हस्तक्षेप ने सारे संतुलन को बिगाड़ा है । आदमी ने स्वार्थ में पेड़ों को काट डाला है । जंगल साफ हुए तो मिट गई सभ्यताएं । पर्यावरण में भर गई कल्मषाएं । हमें यह याद रखना होगा कि यदि कहीं एक पेड़ भी कटता है तो सम्पूर्ण परितंत्र आहत होता है और अपना धैर्य खोता है ।
अगर सृष्टि शरीर है तो नदियाँ सरस नाड़ियाँ हैं । जंगल फेफड़े हैं । हरियाला आवरण त्वचा है और पेड़ पौधे रोम हैं । हर अंग का एक दूसरे से तालमेल है । प्रकृति में पंचतत्वों का ही तो खेल है । हर तत्व का भव-भूमि से बंधन है । किसी एक के भी आहत होने पर दूसरा भी रूठता है । नेह बंधन टूटता है । इसी टूटन को हमें रोकना है । वनों को घायल करने वालों को टोकना है ताकि हमारे जल स्त्रोत सूखने न पायें । नदियाँ डरे नहीं वरन् उल्लसित रहें और हम सरसता पायें । आज हमारी प्रकृति को आत्मीय संवेदना की दरकार है । हमें समझना होगा कि प्रकृति की भी एक सम्मुन्नत संसद है, सरकार है । अत: हमें प्रकृतिके प्रति विधायक भाव रखना होगा । नदियों के प्रति संवेदना को उकेरती प्रसिद्ध साहित्यकार अज़हर हाशमी की कविता में कहा गया है :-
वन घायल हैं डरी सी नदियाँ
बैचेनी से भरी सी नदियाँ
लहरें थी जिनकी मुस्काने
कहाँ गई वे परी सी नदियाँ
भारी भरकम उधर है गायब
इधर लुप्त् छरहरी सी नदियाँ
प्राणी जिनसे जल पीते थे
कहाँ गई तश्तरी सी नदियाँ
सभ्य कहे जाने वालों ने
खोटी कर दी खरी सी नदियाँ
जख्मी जंगल पुकारते हैं
मरहम से फिटकरी सी नदियाँ
अब भी कोशिश करें अगर हम
जी उठेंगी मरी सी नदियाँ ।
पर्वत शिवम् हैं तो नदियाँ पूर्णा हैं । और सरसता को पाकर ही धरती अन्नपूर्णा है । पर्वतों से नि:सृत नदियों में नित नूतन जल गतिमान रहता है जो दौड़कर सागर तक जाता है । नदियों का पथ रेख बनाता है । इठलाती -बलखाती नदियॉ ही तो जल-परमीता हैं । नदियाँ ही रामायण हैं और नदियाँ ही तो गीता है । नदियाँ संस्कृति प्रणीता हैं । नदी सरीखे व्रल द्रव्य का भाव त्रिवेणी बहती है । किन्तु इनकी दुर्दशा आज यहाँ कुछ कहती है । जंगलों के अमंगल के कारण ही नदियाँ अनमनी होकर बह रही है । जहरीले प्रदूषण के रूप में पाप हमारा सह रही है । प्रदूषण से नदियाँ ही नहीं समुद्र भी आहत हैं । धरती में भी कहीं नहीं राहत है । हर बादल, पर्जन्य (जल पूर्ण) नहीं होता है । कहीं अतिवृष्टि कहीं अनावृष्टि के रूप में कहर बरपाता है । जंगल भी वर्षा के विरह गीत गाता है । अब तो नदियों के तट भी सूने ही रह जाते हैं । थके हुए परिंदे-पंछी भी तरू छाँव नहीं पाते हैं । हमें जंगलों को मुदमंगलकारी बनाना ही होगा । मरूस्थलों में फिर से हमें अरण्य सजाना ही होगा ।
हिमालय वनों का सरंक्षक है । और वन जल के संरक्षक है वन ही मेघोंको आकर्षित करते हैं । ऊँची पर्वत श्रृंखलाआें के शीर्ष ही हिमवान हैं जहाँ हिम नदियाँ (ग्लेशियर) हैं । यही हिमनद ही तो नदियों के पोषक हैं । आज हिमालय तेजी से क्षर रहा है क्योंकि अस्थिर पर्वतों पर बड़े-बड़े बाँध बनाने से जहाँ नदियों का दम घुटा हे, वही पहाड़ों के ऊपर बोझ बढ़ा है । हमें हिमालय के क्षरण को रोकना होगा । परिक्षेत्र के राज्यों जम्मू कश्मीर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड के जनमानस को हिमालय नीति अभियान से जोड़ना होगा । बेहतर होगा कि समन्वय प्राधिकरण गठित किया जाये । पहाड़ों पर जल संरक्षण वन रोपण की समवेत नीति बनाई जाये ताकि पहाड़ों का जज्बा और नदियों का प्रवाह बना रह सके औरहिमालय हिमवान रहे ।
यूँ तो हम चिंता कर रहे हैं कि ग्लोबल वॉर्मिग तथा हरित गृह प्रभाव के कारण हिमालय हिम से रीत न जाये किन्तु मीडिया द्वारा आंकड़ों के सब्जबाग दिखलाए जा रहे है । यह विरोधाभाष क्यों । आंकड़ों के अनुसार वर्ष १९९७ से वर्ष २००७ तक सघन वनों का क्षेत्रफल ३३.१ लाख हेक्टेयर बढ़ा है । जानकारों के अनुसार यह मामूली बात नहीं है । यानि पिछले दस वर्षो में देश के वन क्षेत्र प्रतिवर्ष तीन लाख हेक्टेयर की दर से बढ़े है । ध्यान देने योग्य यह भी है कि इस समयावधि में ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे देशों में प्रतिवर्ष २५ मिलियन हेक्टेयर जंगल काटे गए है । हमारी सरकार बढ़ी हुई हरियाली को जन जागरूकता का परिणाम बतला कर अपनी पीठ थपथपा रही है । किन्तु दूसरी और वन की परिभाषा को ही बता नहीं पा रही है । अत: आंकड़ों की बाजीगरी छोड़कर सही वन नीति एवं जल नीति के प्रति गंभीर होना चाहिए ।
केन्द्र सरकार ने गंगा नदी को राष्ट्रीय नदी घोषित करके उसके रखरखाव के लिए प्राधिकरण का गठन किया है । आशा है गंगा प्रवाह पथ पुन: स्वच्छ हो सकेगा । प्राधिकरण को कार्य करने में कहीं अड़चनों का सामना भी करना पड़ेगा क्योंकि अनेक पक्षकार होगें अनेक विचार होंगे किन्तु विभिन्न मंत्रालयों को तालमेल से काम करना होगा । राष्ट्रीय नदी घोषित करने का उद्देश्य मूलतत्व तथा कार्यक्रम को विस्तार देना प्रतीक्षित है । सम्बन्धित राज्यों का उत्तरदायित्व व्यय तथा प्रबंधन की रूपरेखा बननी है ताकि प्राधिकरण सक्षमता के साथ कार्य कर सके । जरूरत है कि कानून के साथ-साथ जन चेतना को भी जाग्रत किया जाये । आस्था एवं विश्वास को बनाये रखा जाए । नदियों के रक्षक जंगल होते हैं । अत: जंगलों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए क्योंकि जंगल बचेगें तो बहेगी नदियाँ ।
यदि हम चाहते हैं कि हमारी कुदरत-कायनात में जिन्दगानी बनी रहे तो हमें उगाना होगा हरा भरा जंगल अपने अंदर । एक जीवंत एहसास के साथ ताकि बहती रहे सरस भाव धारा हमारे अर्न्तमन में । मन में विचार और विचार से संकल्प बनेगा । तभी हम अपने वन और नदियों की रक्षा कर सकेंगे । जब तक जंगल है तभी तक है प्राणवायु, जिससे हम सप्राण है । जन-जन तक यह संदेश भी पहुंचा सकेगे कि जल ही जीवन है और जीवन क्या है, जीव और वन का मिला जुला रूप इसलिये इनकी सुरक्षा जरूरी है ।

गुरुवार, 24 मार्च 2011

विश्व वानिकी दिवस पर विशेष


वृक्ष : जीवंत परंपरा के संवाहक
डॉ.खुशालसिंह पुरोहित

पर्यावरण के प्रति सामाजिक सजगता और पौधारोपण के प्रति सतर्कता हमारे ऋषियों ने निर्मित की थी, पौधारोपण कब, कहां और कैसे किया जाये उसका लाभ और वृक्ष काटे जाने से होने वाली हानि का विस्तारपूर्वक वर्णन हमारे सभी धर्मोंा के ग्रथों में है ।
वृक्षों की पूजा प्रकृति के प्रति आदर प्रकट करने का माध्यम है, जिसकी वजह से आज तक प्रकृतिका संतुलन बना हुआ है । आज समाज सिर्फ भविष्य की ओर देख रहा है, परन्तु वह यह भूल रहा है कि अंतत: यह प्रकृति ही है जो उसे जिंदा रखेगी ।
मानव जीवन के तीन बुनियादी आधार शुद्ध हवा, ताजा पानी ओर उपजाऊ मिट्टी मुख्य रूप से वनों पर आधारित है । इसके साथ ही वनों से कई अप्रत्यक्ष लाभ भी हैं जिनमें खाद्य पदार्थ, औषधियां, फल-फ ूल, इंर्धन, पश्ुा आहार, इमारती लकड़ी, वर्षा संतुलन, भूजल संरक्षण और मिट्टी की उर्वरता आदि प्रमुख है ।
पर्यावरण चेतना आदिकाल से भारतीय मनीषा का मूल आधार रही है । भारतीय संस्कृति वृक्ष पूजक संस्कृति रही है । हमारे देश में वृक्षों में देवत्व की अवधारणा और उसकी पूजा की परम्परा प्राचीनकाल से रही है । वनस्पतियों के महत्व से भारतीय प्राचीन ग्रंथ भरे पड़े हैं । वृक्षों के प्रति ऐसा प्रेम शायद ही किसी देश की संस्कृति में हो, जहां वृक्ष को मनुष्य से भी ऊंचा स्थान दिया जाता है, उनकी पूजा कर सुख और समृद्धि की कामना की जाती है । वैदिक संस्कृति में पौधारोपण व वृक्ष पूजन की सुदीर्घ परम्परा रही है । प्रयाग का अक्षयवट, अवंतिका का सिद्धवट, नासिक का पंचवट (पंचवटी), गया का बोधिवृक्ष और वृंदावन का वंशीवट जैसे वृक्ष केन्द्रित श्रद्धा केन्द्रों की परम्परा अनेक शताब्दियों पुरानी है ।
वैदिक काल में प्रकृति के आराधक भारतीय मनीषी अपने अनुष्ठानोंमें वनस्पतियों को विशेष महत्व देते थे । वेदों और आरण्यक ग्रंथों में प्रकृतिकी महिमा का सर्वाधिक गुणगान है, उस काल में वृक्षों को लोकदेवता की मान्यता दी गयी थी । वृक्षों में देवत्व की अवधारणा का उल्लेख वेदों के अतिरिक्त प्रमुख रूप से मत्स्यपुराण, अग्निपुराण, भविष्यपुराण, मद्मपुराण, नारदपुराण, रामायण, भगवद्गीता और शतपथब्राह्मण आदि ग्रंथों में मिलता है । मोटे रूप में देखे तो वेद, पुराण, संस्कृत और सूफी साहित्य, आगम, पंचतंत्र, जातक कथाएं, कुरान, बाईबिल, गुरूग्रंथ साहब हो या अन्य कोई ग्रंथ हो सभी मंे प्रकृति के लोकमंगलकारी स्वरूप का वर्णन है ।
दुनिया में सभी प्राचीन सभ्यताआें का आधार मनुष्य का प्रकृति के प्रति प्रेम और आदर का रिश्ता है । इसी कारण पेड़, पहाड़ और नदी का अवतार के रूप में मनुष्यांे,प्राणियांे की पूजा की परम्परा का प्रचलन हुआ । मोहनजोदड़ों और हड़प्पा की खुदाई से मिले अवशेषों से पता चलता है कि उस समय समाज में मूर्ति पूजा के साथ पेड़-पौधों एवं जीव-जन्तुआें की पूजा की परम्परा भी विद्यमान थी । भारतीय साहित्य, चित्रकला और वास्तुकला में वृक्ष पूजा के अनेक प्रसंग मिलते हैं । अजंता के गुफाचित्रों और सांची के तोरण स्तंभोंकी आकृतियों में वृक्ष पूजा के दृश्य हैं । जैन और बौद्ध साहित्य में वृक्ष पूजा का विशेष स्थान रहा है । पालि साहित्य में विवरण आता है कि बोधिसत्व ने रूक्ख देवता बनकर जन्म लिया था ।
हमारे सबसे प्राचीन ग्रंथ वेदों में प्रकृति की परमात्मा स्वरूप में स्तुति है । इसके साथ ही वाल्मिकी रामायण, महाभारत और मनुस्मृति में वृक्ष पूजा की विविध विधियों का विस्तार से वर्णन है । नारद संहिता में २७ नक्षत्रों की नक्षत्र वनस्पति की जानकारी दी गयी है । हर व्यक्ति के जन्म नक्षत्र का वृक्ष उसका कुल वृक्ष है, यही उसके लिये कल्पवृक्ष है, जिसकी आराधना कर मनोवांछित फल प्राप्त् किया जा सकता है । सभी धार्मिक आयोजनों एवं पूजापाठ में पीपल, गुलर, पलाश, आम और वट वृक्ष के पत्ते (पंच पल्लव) की उपस्थिति अनिवार्य होती है । नवग्रह पूजा अर्चना के लिये नवग्रह वनस्पतियों की सूची है जिसके अनुसार उन वृक्षोंकी पूजा-प्रार्थना से ग्रह शांति का लाभ मिल सकता है ।
हमारे प्राचीन साहित्य में जिन पवित्र और अलौकिक वृक्षों का उल्लेख है उनमें कल्पवृक्ष प्रमुख है । कल्पवृक्ष को देवताआें का वृक्ष कहा गया है, इसे मनोवांछित फल देने वाला नंदन वृक्ष भी माना जाता है । भारत में बंबोकेसी कुल के अडनसोनिया डिजिटेटा को कल्पवृक्ष कहा जाता है । इसको फ्रांसीसी वैज्ञानिक माइकल अडनसन ने १७५४ में अफ्रीका में सेनेगल में सर्वप्रथम देखा था, इसी आधार पर इसका नाम अडनसोनिया डिजिटेटा रखा गया । नश्वर जगत का कोई भी वृक्ष इसकी विशालता, दीर्घजीविता और आराध्यता में बराबरी नहीं कर सकता है । यह धीरे-धीरे बढ़ता है और सैकड़ों वर्षोंा तक जिंदा रहता है । भारत में समुद्रीतटीय प्रदेशों गुजरात, महाराष्ट्र ओर केरल में कल्पवृक्ष बहुतायत में मिलते हैं ।
पौराणिक ग्रंथ स्कंदपुराण के हेमाद्रि खंड के अनुसार पांच पवित्र छायादार वृक्षों के समूह को पंचवटी कहा गया है, सिमें पीपल, बेल, बरगद, आंवला व अशोक शामिल है । पुराणों में इन पांच प्रजातियों की स्थापना विधि, एक नियत दिशा, क्रम व अंतर के स्पष्ट निर्देश हैं ।
भगवान बुद्ध के जीवन की सभी घटनाये वृक्षों की छाया में घटी थी । आपका जन्म सालवन में एक वृक्ष की छाया में
हुआ । इसके बाद प्रथम समाधि जामुन वृक्ष की छाया में, बोधि प्रािप्त् पीपल की छाया में और निर्वाण साल वृक्ष की छाया में
हुआ । भगवान बुद्ध ने भ्रमणकाल में अनेेकों वनों एवं बागो में प्रवास किया था । इनमें वैशाली की आम्रपाली का ताम्रवन, पिपिला का सखादेव आम्रवन, नालंदा का पुरवारीक आम्रवन के नाम उल्लेखनीय है । उसके अतिरिक्त राजाग्रह निम्बिला और कंजगल के वेणु वनों का संबंध भी भगवान बुद्ध से आया है । जैन धर्म में जैन शब्द जिन से बना है, इसका अर्थ है समस्त मानवीय वासनाआें पर विजय प्राप्त् करने वाला । तीर्थ का शाब्दिक अर्थ है नदी पार करने कराने का स्थान अर्थात् घाट । धर्मरूपी तीर्थ का जो प्रवर्तन करते हैं वे तीर्थंकर कहलाते हैं । तपस्या के रूप में सभी तीर्थंकरों को विशुद्ध ज्ञान (कैवल्य ज्ञान) की प्रािप्त् किसी न किसी वृक्ष की छाया में हुई थी, इन वृक्षों को कैवली वृक्ष कहा जाता है ।
सिख धर्म में वृक्षों का अत्यधिक महत्व है । वृक्ष को देवता रूप में देखा गया है गुरूकार्य के उपयोग आने वाले धर्मस्थल के पास स्थित वृक्ष समूह को गुरू के बाग कहा जाता है । इनमें गुरू से जुड़े कुछ वृक्ष निम्न हैं - नानकमता का पीपल वृक्ष, रीठा साहब का रीठा वृक्ष, टाली साहब का शीशम और बेर साहब का बेर का वृक्ष प्रमुख हैं । इसके साथ ही कुछ और वृक्ष भी पूजनीय हैं । इनमें दुखभंजनी बेरी, बाबा की बेरी और मेहताबसिंह की बेरी के वृक्ष शामिल हैं ।
पृथ्वी पर पाये जाने वाले जिन पेड़-पौधों का नाम कुरान-मजीद में आया है, उन पेड़ों को पूजनीय माना जाता है । इन पवित्र पेड़ों में खजूर, बेरी, पीलू, मेहंदी, जैतून, अनार, अंजीर, बबूल, अंगुर और तुलसी मुख्य हैं । इनमें कुछ पैड़-पौधों का वर्णन मोहम्मद साहब (रहमतुल्लाह अलैहे) ने कुरान मजीद में किया है इस कारण इन पेड़-पौधों का महत्व और भी बढ़ जाता है । हम सभी धर्मग्रंथ पेड़-पौधों के प्रति प्रेम और आदर का पाठ पढ़ाते हैं । इसी प्रेम और आदरभाव से वृक्षों की सुरक्षा कर हम अपने जीवन में सुख और समृद्धि प्राप्त् कर सकते हैं ।
आज की सबसे बड़ी समस्या वनों के अस्तित्व की है । भोगवादी सभ्यता की पक्षधर दुनिया में कोई हिस्सा ऐसा नहीं बचा है जहां वृक्ष हत्या का दौर नहीं चल रहा हो । हमारे देश में सुखद बात यह है कि भारतीय संस्कृति की परंपरा वृक्षों के साथ सहजीवन की रही है पेड़ संस्कृति के वाहक हैं, प्रकृति की सुरक्षा से ही संस्कृति की सुरक्षा हो सकती है । इस लिये जंभोजी महाराज की सीख मेंकहा गया है कि सिर साटे रूख रहे तो सस्तो जाण, इसी क्रम मेंधराड़ी और ओरण जैसी परम्पराआें ने जातीय चेतना को प्रकृतिचेतना से आत्मसात कर वृक्ष पूजा और वृक्ष रक्षा से जीवन में सुख-समृद्धि की कामना की है । आज इसी भावना को विस्तारित कर हम अपने भविष्य को सुरक्षित रख सकते हैं ।

वनस्पति तालिका
क्र. नक्षत्र का नाम पौराणिक नाम वैज्ञानिक नाम सामान्य लाभ
१. अश्विनी कारस्कर डींीूलहििी ार्िीर्ु-ींिाळलर कुचिला
२. भरणी धात्री झहूश्रश्ररिर्हींीी शालश्रळलर आँवला
३. कृत्तिका उदुम्बर ऋळर्लीी ीरलशािरी गूलर
४. रोहिणी जम्बू डूूूसर्ळीा र्लीाळळिळ जामुन
५. मृगशिरा खादिर अलरलळर लरींशलर्ही खैर
६. आद्रा कृष्ण ऊरश्रलशीसळर ीळीीिि शीशम
७. पुनर्वसु वंश इरालिि बांस
८. पुष्य अश्वत्थ ऋळर्लीी ीशश्रळसळिरी पीपल
९. आश्लेषा नाग चर्शीीर रिसरीीरीर्ळीा नागसेकर
१०. मघा वट ऋळर्लीी इशसिहरश्रशिळी बरगद
११. पू. फाल्गुनी पलाश र्इीींशर ािििीशिीार ढाक
१२. उ. फाल्गुनी प्लक्ष ऋळर्लीी लशसिहरश्रशिळी पाकड़
१३. हस्त अरिष्ट डरळिर्विीी र्ाीज्ञिीीिीळी सरशीींि रीठा
१४. चित्रा बिल्व अशसश्रश ारीाशश्रिीी बेर
१५. स्वाती अर्जुन ढशीाळरिश्रळर रीर्क्षीि अर्जुन
१६. विशाखा विकंकत ऋश्ररलिीर्ीळींर ळविळलर कटाई १७. अनुराधा बकुल चर्ळाीीििी शश्रशसिळ मौल श्री
१८. ज्येष्ठा सरल झळिीर्ी ीुर्लिीीसहळळ ीरीस चीड़
१९. मूला सर्ज डहिशीर ीर्लिीीींर सील
२०. पूर्ष्वाषाढ़ा वंजुल डरश्रळु ींीींीरीशिीार जलवेतस
२१. उत्तराषाढ़ा पनस आीींलिरीिीर्ी हशींशीिहिूश्रर्श्रीी कटहल
२२. श्रवण अर्क उरश्रिींीिळिी िीलिशीर मंदार
२३. घनिष्ठा शमी झीिीिळिी लळशिीरीळर खेजड़ी
२४. शतभिषक कदम्ब आिहींलिशहिरर्श्रीी लहळशििळीी कदम्ब
२५. पू. भाद्रपद आम्र चरसिळषशीर खविळलर आम
२६. उ. भाद्रपद निम्ब अूरवळीरलहींर-खविळलर नीम
२७. रेवती मधूक चरवर्हीलर खविळलर महुआ

नवग्रह वनस्पति
यज्ञ द्वारा ग्रह शांति के लिये हर ग्रह के लिये अलग-अलग विशिष्ट वनस्पति की समिधा प्रयोग की जाती है । गरूड़ पुराण में कहा गया है
अर्क:, पलाश:, खदिरन चापामार्गोडथ पिप्पल: ।
औडम्बर: शमी दूर्व्वा कुशश्च समिध कमात ।।
अर्थ :- अर्क (मदार), पलाश, खदिर (खैर), अपामार्ग (लटजीरा) पीपल, ओडम्बर (गुलर) शमी, दूव और कश नवग्रहों की समिधायें हैं । जो क्रमश: सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहू और केतु की वनस्पतियां हैं। इस प्रकार हम वृक्षों की पूजा - प्रार्थना से हमारे जीवन में सुख-समृद्धि प्राप्त् कर सक ते हैं । ***

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

२ विश्व वानिकी दिवस पर विशेष

वन, मानव जीवन के आधार
डॉ. खुशालसिंह पुरोहित
प्रति वर्ष २१ मार्च को विश्व वानिकी दिवस मनाया जाता है । यह परम्परा सन् १८७२ में नेबरास्का (अमेरिका) में शुरू हुई, इसका श्रेय जे-र्स्टीलंग मार्टिन को जाता है, जिन्होंने पेड़ों की खूबसूरती से वंचित नेबरास्का में अपने घर के आस-पास बड़ी संख्या में पौधे लगाए थे । एक समाचार पत्र के संपादक बनने के बाद उन्होंने अन्य नगर वासियों को भूमि संरक्षण ईधन, इमारती लकड़ी, फल-फूल, छाया और खुबसूरती हेतु पौधे लगाने की सलाह दी । उन्होंने राष्ट्रीय कृषि बोर्ड को भी पौधे लगाने के लिए एक अलग दिन रखने को मना लिया । इस प्रकार विश्व वानिकी दिवस की शुरूआत हुई । प्रथम वानिकी दिवस पर एक लाख से ज्यादा पौधे लगाये गए, धीरे-धीरे पुरी दुनिया में यह दिवस एक पर्व के रूप में मनाया जाने लगा । मानव जीवन के तीन बुनियादी आधार शुद्ध हवा, ताजा पानी और उपजाऊ मिट्टी मुख्य रूप से वनों पर ही आधारित है । इसके साथ ही वनों से कई अप्रत्यक्ष लाभ भी है । जिनमें खाद्य पदार्थ, औषधियां, फल-फूल, ईधन, पशुआहार, इमारती लकड़ी, वर्षा संतुलन, भू-जल संरक्षण और मिट्टी की उर्वरता आदि प्रमुख है । प्रसिद्ध वन विशेषज्ञ प्रो. तारक मोहनदास ने अपने शोध अध्ययन में बताया है कि एक ५० साल के जीवन में पैदा की गई एक ५० टन वजनी मध्यम आकार के वृक्ष से चीजोंएवं अन्य प्रदत्त सुविधाआें की कीमत लगभग १५.७० लाख रूपये होती है । वन विनाश आज समूचे विश्व की प्रमुख समस्या है, सभ्यता के विकास और तीव्र औद्योगिकरण के फलस्वरूप आज दुनिया वन विनाश के कगार पर खड़ी है । वनों के विनाश का सवाल इस सदी का सर्वाधिक चिंता का विषय बन गया है । पिछले दो-तीन दशकों से इस पर बहस छिड़ी हुई है और वनों का विनाश रोकने के प्रयास भी तेज हुए हैं । देश में पर्यावरण और वनों के प्रति जागरूकता आयी है, लेकिन हरित पट्टी में अपेक्षित विस्तार नहीं हो पा रहा है । पश्चिमी देशों की तुलना में भारत में औद्योगिक विकास की गति काफी धीमी रही, किन्तु स्वतंत्रता के बाद तीन गुना बढ़ी जनसंख्या का दबाव वन एवं वन्य प्राणियों पर पड़ना स्वाभाविक ही था । यही कारण था कि हमारे समृद्ध वन क्षेत्र सिकुड़ते गये और वन्य प्राणियों की अनेक जातियां धीरे-धीरे समािप्त् की ओर कदम बढ़ाने लगी । हमारे देश के संबंध में यह सुखद बात है कि प्रकृति के प्रति प्रेम का संदेश हमारे धर्मग्रंथों और नीतिशतको में प्राचीनकाल से ही रहा है। सभी पूजा पाठ में तुलसी पत्र और वृक्ष पूजा के विभिन्न पर्वो की हमारी समृद्ध परंपरा रही है । यह लोक मान्यता रही है कि सांझ हो जाने पर पेड़ पौधों से छेड़-छाड़ नहीं करना चाहिए क्यों कि पौधों में प्राण है और वे संवेदनशील होते हैं । हमारे देश में एक तरफ तो वनों के प्रति श्रृद्धा और आस्था का यह दौर चलता रहा और दूसरी ओर बड़ी बेरहमी से वनों को उजाड़ा जाता रहा है । यह सिलसिला अभी भी धमा नहीं है । अनुमान है कि प्रति वर्ष १५ लाख हेक्टेयर वन कटते है । हमारी राष्ट्रीय वन नीति में कहा गया था कि देश एक-तिहाई हिस्से को हरा भरा रखेंगे, लेकिन पिछले वर्षोंा में भू-उपग्रह के छाया चित्रों से स्पष्ट है कि देश में ३३ प्रतिशत के बजाय १३ प्रतिशत ही वन क्षेत्र रह गया है । भारत में जैव-विविधता की समृद्ध परंपरा रही है वर्तमान में भारत की जैव-विविधता दुनिया के ६.४ प्रतिशत प्राणियों एवं ७ प्रतिशत वनस्पतियों का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि हमारा वन क्षेत्र विश्व के २ प्रतिशत से भी कम हैं और इसे विश्व की १५ प्रतिशत से अधिक जनसंख्या का दबाव झेलना पड़ता है । भारत में कुल ८१ हजार प्राणी-प्रजातियां एवं ४५ हजार वनस्पति प्रजातियां पायी जाती है । प्राणियों में सर्वाधिक ५७ हजार प्रजातियां तो कीट पतंगो की है, इसमें सबसे कम ३७२ प्रजातियों स्तनधारी प्राणियों की है । वनस्पति प्रजातियों का एक तिहाई १५ हजार प्रजातियां उच्च् वर्गीय पौधों की है, शेष प्रजातियों में २३ हजार फफूंद, १२ हजार कवक और ३ हजार ब्रायोफाहट शामिल हैं । जैव विविधता की स्मृद्धि की प्रसन्नता के साथ ही यह कम दुखद नहीं है कि हमारे देश में १५०० वनस्पति प्रजातियां ८१ स्तनधारी प्राणी प्रजातियां, १५ सरिसृप, ४७ चिड़िया, ३ अभयचर और अनेक कीट पतंगो की प्रजातियां विलुप्त्ता की कगार पर है । वन महत्वपूर्ण प्राकृतिक संपदा है, जो न केवल देश की समृध्दि को बढ़ाते हैं वरन देश के पर्यावरण संतुलन को भी बनाये रखते है । आज विश्व की जलवायु में आश्चर्यजनक परिवर्तन हो रहे है । इसमें वन कटाई प्रमुख कारण है । इस विषय पर अब तक उनके राष्ट्रीय-अन्तराष्ट्रीय मंचों पर बहस हो चुकी है । जलवायु परिवर्तन सर्वाधिक महत्व का मुद्दा है । जलवायु परिवर्तन और स्थायी विकास के मुद्दों में गहरा संबंध है । हमारे देश में जलवायु परिवर्तन से सामाजिक संकट आने की संभावना बनी रहती है, क्योंकि भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था जलवायु संतुलन से ही संतुलित रहती है । भारतीय संस्कृति मूलत: अरण्य संस्कृति रही है । हमारे मनीषियों ने वनों के सुरम्य, शांत और स्वच्छ परिवेश में चिंतन मनन कर अनेक महान ग्रंथों की रचना की थी आज भी विश्व मानवता का मार्गदर्शन कर रहे हैं । सन् १९७६ में ४२ वें संविधान संशोधन के जरिये संविधान मेें पर्यावरण संबंधी मुद्दे शामिल किए गये । राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में अनुच्छेद ४८ `अ' जोड़ा गया जिसमें कहा गया है कि राज्य देश के प्राकृतिक पर्यावरण वनों एवं वन्य जीवों की सुरक्षा तथा विकास के लिए उपाय करेगा । मौलिक कर्तव्यों से संबंधित अनुच्देद ५१ `अ' में कहा गया है कि वनों, झीलों, नदियों और वन्य जीवन की सुरक्षा व विकास तथा सभी जीवों के प्रति सहानुभूति हरेक नागरिक का कर्तव्य होगा । इसके साथ ही वन एवं वन्य जीवन से जुड़े सवालों को राज्य सूची से समवर्ती सूची में शामिल कर दिया गया। भारत में विश्व वानिकी दिवस का विशेष महत्व है । खेजड़ली के शहीदों से लेकर चिपको आंदोलन तक पेड़ और प्रकृति रक्षा की महान विरासत हमारी राष्ट्रीय धरोहर है । हमने संसार को संदेश दिया है कि पेड़ों से हमारे पारिवारिक रिश्ते हैं, हम उसे अपना भाई मानते है, उसकी रक्षा में प्राणों की बलि देने में हम संकोच नहीं करते हैं । क्योंकि हम जानतें है कि पर्यावरण की रक्षा अपने होने की रक्षा है। आज के विश्व में इसी संदेश की आवश्यकता है ।***
पिछले ३ साल में गिर वन में मरे ११६ शेर
पिछले दिनों गुजरात सरकार ने विधानसभा में बताया कि तीन सालों में ११६ शेरों की मौत हो चुकी है । गुजरात में एशियाई शेरों की आखिरी प्रजाति बची है । कांग्रेस नेता अजरून मोढवाड़िया के प्रश्न के लिखित उत्तर में वन और पर्यावरण मंत्री मांगूभाई पटेल ने यह जानकारी दी । मंत्री ने बताया कि २००५ में हुई पिछली गणना के अनुसार गिर वन में २९१ शेर थे । उन्होंने बताया कि २००७ में ४० शेर थे । उन्होंने बताया कि २००७ में ४० शेरों की मौत हो गई, जबकि २००८ में ४२ शेरों की मौत हुई ।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

११ विश्व वानिकी दिवस पर विशेष

वन है मानव जीवन के आधार
डॉ. खुशालसिंह पुरोहित
प्रतिवर्ष २१ मार्च को विश्व वानिकी दिवस मनाया जाता है । यह परंपरा सन् १८७२ में नेबरास्का (अमेरिका) में शुरू हुई । इसका श्रेय जे-स्टर्लिंग मार्टिन को जाता है, जिन्होेंने पेड़ों की खूबसूरती से वंचित नेबरास्का में अपने घर के आस-पास बड़ी संख्या में पौधें लगाए थे । एक समाचार पत्र के संपादक बनने के बाद उन्होंने अन्य नगरवासियों को भूमि संरक्षण, इंर्धन, इमारती लकड़ी, फल-फूल, छाया और खूबसूरती हेतु पौधे लगाने की सलाह दी । उन्होंने राष्ट्रीय कृषि बोर्ड को भी पौधें लगाने के लिए एक अलग दिन रखने को मना लिया । इस प्रकार विश्व वानिकी दिवस की शुरूआत हुई । प्रथम वानिकी दिवस पर एक लाख से ज्यादा पौधे लगाए गए । धीरे-धीरे पूरी दुनिया में यह दिवस मनाया जाने लगा । मानव जीवन के ३ बुनियादी आधार शुद्ध हवा, ताजा पानी और उपजाऊ मिट्टी मुख्य रूप से वनों पर ही आधारित हैं । इसके साथ ही वनों से कई प्रत्यक्ष लाभ भी हैं। इनमें खाद्य पदार्थ, औषधीयाँ, फल-फूल, ईधन, पशु आहार, इमारती लकड़ी, वर्षा संतुलन, भू-जल संरक्षण और मिट्टी की उर्वरता आदि प्रमुख हैं । प्रसिद्ध वन विशेषज्ञ प्रो.तारक मोहनदास ने अपने शोध अध्ययन में बताया है कि ५० साल के जीवन में पैदा की गई एक ५० टन वजनी मध्यम आकार के वृक्ष से प्राप्त् वस्तुआें एवं अन्य प्रदत्त सुविधाआें की कीमत लगभग १५.७० लाख रूपये होती है । वन विनाश आज समूचे विश्व की प्रमुख समस्या है । सभ्यता के विकास और तीव्र औद्योगिकीकरण के फलस्वरूप आज दुनिया वन विनाश के कगार पर खड़ी है । वनों के विनाश का सवाल इस सदी का सर्वाधिक चिंता का विषय बन गया है । पिछले २-३ दशकों से इस पर बहस छिड़ी हुई है और वनों का विनाश रोकने के प्रयास भी तेज हुए हैं । देश में पर्यावरण और वनों के प्रति जागरूकता आई है, लेकिन हरित पट्टी में किसी तरह का विस्तार कम ही हुआ है । पश्चिमी देशों की तुलना में भारत में औद्योगिक विकास की गति काफी धीमी रही, किंतु स्वतंत्रता के बाद तीन गुना बढ़ी जनसंख्या का दबाव वन एवं वन्य प्राणियों पर पड़ना स्वाभाविक ही था । यही कारण है कि हमारे समृद्ध वन क्षेत्र सिकुड़ते गए और वन्य प्राणियोंं की अनेक जातियाँ धीरे-धीरे समात्ति की और कदम बढ़ाने लगीं । हमारे देश के संबंध में यह सुखद बात है कि प्रकृति के प्रति प्रेम का संदेश हमारे धर्मग्रंथों और नीतिशतकों में प्राचीनकाल से ही रहा है । पूजा-पाठ में तुलसी पत्र और वृक्ष पूजा के विभिन्न पर्व की हमारी समृद्ध परंपरा रही है । यह लोक मान्यता रही है कि साँझ हो जाने पर पेड़ पौधों से छेड़-छाड़ नहीं करना चाहिए, क्योंकि पौधों में प्राण हैं और वे संवेदनशील होते हैं । हमारे देश में एक तरफ तो वनों के प्रति श्रद्धा और आस्था का यह दौर चलता रहा और दूसरी ओर बड़ी बेरहमी से वनों को उजाड़ा जाता रहा ह्ै । यह सिलसिला अभी भी थमा नहीं है । अनुमान है कि प्रति वर्ष १५ लाख हेक्टेयर वन कटते हैं । हमारी राष्ट्रीय वन नीति में कहा गया था कि देश के एक तिहाई हिस्से को हरा-भरा रखेंगे लेकिन पिछले वर्षो में भू-उपग्रह के छाया चित्रों से स्पष्ट है कि देश में ३३ प्रतिशत के बजाए १३ प्रतिशत ही वन क्षेत्र रह गया है । भारत में जैव-विविधता की समृद्ध परंपरा रही है । वर्तमान में भारत की जैव-विविधता दुनिया के ३.४ प्रतिशत प्राणियों एवं ७ प्रतिशत वनस्पतियों का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि हमारा वन क्षेत्र विश्व के २ प्रतिशत से भी कम है और इसे विश्व की १५ प्रतिशत से अधिक जनसंख्या का दबाव झेलना पड़ता है । भारत में कुल ८१ हजार प्राणी-प्रजातियाँ एवं ४५ हजार वनस्पति प्रजातियाँ पाई जाती हैं । प्राणियों में सर्वाधिक ५६ हजार प्रजातियाँ कीट पतंगों की हैं । इनमें सबसे कम ३७२ प्रजातियाँ स्तनधारी प्राणियों की हैं । वनस्पतियाँ प्रजातियों का एक तिहाई यानी १५ हजार प्रजातियाँ उच्च् वर्गीय पौधों की हैं । शेष प्रजातियों में २३ हजार फफूंद, १२ हजार कवक और ३ हजार ब्रायोफाइट शामिल हैं । जैव विविधता की समृद्धि की प्रसन्नता के साथ ही यह कम दुखद नहीं है कि हमारे देश में १५०० वनस्पति प्रजातियाँ, ८९ स्तनधारी प्राणी प्रजातियाँ, १५ सरीस्त्रप, ४७ पक्षी, ३ उभयचर और अनेक कीट-पतंगों की प्रजातियाँ विलुिप्त् की कगार पर हैं । वन महत्वपूर्ण प्राकृतिक संपदा है, जो न केवल देश की समृद्धि को बढ़ाते है, वरन देश के पर्यावरण संतुलन को भी बनाए रखते हैं। आज विश्व की जलवायु में आश्चर्य परिवर्तन हो रहे हैं । इसमें वन कटाई प्रमुख कारण है । इस विषय पर अब तक अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बहस हो चुकी है । जलवायु परिवर्तन वर्तमान में महत्वपूर्ण मुद्दा है । जलवायु परिवर्तन और स्थायी विकास के मुद्दों में गहरा संबंध है । हमारे देश में जलवायु परिवर्तन से सामाजिक संकट आने की संभावना बनी रहती है, क्योंकि भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था जलवायु संतुलन से ही संतुलित रहती है। भारतीय संस्कृति मूलत: अरण्य संस्कृति रही है । हमारे मनीषियों ने वनों के सुरम्य, शांत और स्वच्छ परिवेश में चिंतन-मनन कर अनेक महान ग्रंथों की रचना की, जो आज भी विश्व मानवता का मार्गदर्शन कर रहे है । भारत में पर्यावरण संरक्षण से संबंधित २०० से ज्यादा कानून हैं । सन् १९७३ में ४२ वें संविधान संशोधन के जरिए संविधान में पर्यावरण संबंधी मुद्दे शामिल किए गए । राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में अनुच्छेद ४८ `अ' जोड़ा गया, जिसमें कहा गया है कि राज्य देश के प्राकृतिक पर्यावरण वनों एवं वन्य जीवों की सुरक्षा तथा विकास के लिए उपाय करेगा । मौलिक कर्तव्यों से संबंधित अनुच्छेद ५१ `अ' में कहा गया है कि वनों, झीलों, नदियों और वन्य जीवन की सुरक्षा व विकास तथा सभी जीवों के प्रति सहानुभूति हरेक नागरिक का कर्तव्य होगा। इसके साथ ही वन एवं वन्य जीवन से जुड़े सवालों को राज्य सूची से समवर्ती सूची में शामिल कर दिया गया लेकिन इतना होने के बाद भी देश को हरा भरा करने के लिए एक जन- आंदोलन की आवश्यकता अभी शेष है । ***अंटार्कटिका में है दफन पहाड़ों की श्रृंखला अंटार्कटिका को लेकर हुए हालिया खुलासे से ग्लोबल वार्मिंग और उससे बर्फ पिघलने की प्रक्रिया से बढ़ने वाले समुद्र जल स्तर के प्रति दुनिया भर के विशेषज्ञों के बीच चिंता का दौर शुरू हो गया है । इसका सबब बनी है एक नई खोज जो बताती है कि अंटार्कटिका में सैकड़ों साल पुरानी पर्वत श्रृंखला बर्फ में धंसी पड़ी है । बर्फ में दबे पहाड़ों के बारे में जानने के लिए विशेषज्ञों को रडार और ग्रेविटी सेंसर्स का इस्तेमाल करना पड़ा । अचंभित करने वाली बात यह है कि ढूंढे गए पहाड़ एल्प्स पर्वत श्रृंखला के आकार के हैं, जिसमें बड़ी - बड़ी चोटियां भी हैं। बर्फ के नीचे मिले पहाड़ सहत से करीबन दो मील अंदर दफन हैं । वैज्ञानिक यह भी बताते हैं कि बर्फ धीरे - धीरे जमने की स्थिति में दफन पहाड़ों की चोटियां टूटकर समतल हो सकती थीं, लेकिन बहुत जल्दी जमने से चोटियां यथावत रहीं ।

सोमवार, 14 अप्रैल 2008

५ विश्व वानिकी दिवस पर विशेष

वन और जलवायु परिवर्तन
डॉ. राम प्रताप गुप्त
वर्तमान में जलवायु विशेषज्ञ पृथ्वी के बढ़ते तापक्रम और उसके कारण संभावित जलवायु परिवर्तनों को लेकर काफी चिंतित हैं । इस वर्ष का शांति का नोबल पुरस्कार भी जलवायु विशेषज्ञ डॉ. आर.के. पचौरी एवं जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को बताने वाली लोकप्रिय फिल्म के निर्माता एवं पूर्व अमरीकी उपराष्ट्रपति अलगोर को दिया जाना विश्व की इस दिशा में बढ़ती चिंता का प्रतीक ही माना जा रहा है । जलवायु विशेषज्ञों की गणना के अनुसार पिछली शताब्दी में विश्व के तापक्रम में ०.१ डिग्री सेल्सियस प्रति २० वर्ष की दर से वृद्धि हुई है । अब इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में यह वृद्धि०.२ डिग्री प्रति दशक की दर से होगी । पूरी शताब्दी में यह वृद्धि २ से ४ डिग्री तक हो सकती है । इस वृद्धि के लिए मुख्य जिम्मेदार घटक वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड की बढ़ती मात्रा है । कार्बन डाईकॉक्साइड और अन्य ग्रीन हाऊस गैसें एक बार वायुमण्डल में उत्सर्जित हो जाने पर अनेक दशकों तक वहीं बनी रहती है और तापक्रम को प्रभावित करती रहती है । ग्रीन हाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन और उसके फलस्वरूप तापक्रम में वृद्धि और जलवायु में होने वाले परिवर्तनों से निपटनने के लिए हमें ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के प्रयास करने होंगें । क्योटो सम्मेलन के निर्णय इसी दिशा में प्रयास थे । दूसरी ओर बढ़ते तापक्रम और जलवायु परिवर्तन के साथ तालमेल स्थापित करने की दिशा में भी प्रयास करने होंगें । समायोजन के इन प्रयासों की सफलता के लिए जलवायु के विभिन्न पहलुआें पर तापक्रम वृद्धि के संभावित प्रभावों की ठीक- ठीक समझ आवश्यक है । यह एक जटिल एवं निरंतर जारी रहने वाली प्रक्रिया है । राष्ट्रीय आय में योगदान की दृष्टि से तो वन बहुत महत्व के प्रतीत नहीं होते हैं, परंतु जब हम सामाजिक, सांस्कृतिक एवं पर्यावरण के क्षैत्र में इनके योगदान पर नज़र डालते हैं, तो हर दृष्टि से वन महत्वपूर्ण प्रतीत होते हैं । देश की अनेक नदियों का उद्गम तो वन क्षेत्रांे से ही है, ये हमारी जलवायु को संतुलित रखते हैं, वर्षा के कारण मिट्टी के कटाव को रोककर उसे बंजर बनने से रोकते हैं और देश की जैव विविधता के भण्डार भी ये ही हैं । देश के २ लाख गांव तो वनों के अंदर या उनके किनारे बसे हुए हैं और २० करोड़ लोग अपनी आजीविका के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इन्हीं पर निर्भर है । ६ करोड़ आदिवासियों की वनों पर निर्भरता तो और भी अधिक है और वे अपनी आय का बड़ा भाग वनों से गैर इमारती उत्पाद एकत्रित करके ही प्राप्त् करते हें । कहने का आशय यह है कि राष्ट्रीय वन में वनों का योगदान भले ही कम हो, वन हमारे राष्ट्रीय जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं । ऐसे में इस प्रश्न पर भी विचार करना आवश्यक है कि तापक्रम वृद्धि तथा उससे उत्पन्न होने वाले जलवायु परिवर्तन का हमारे वनों पर संभावित प्रभाव क्या होने वाला है ? जलवायु परिवर्तन पर अंतर्राष्ट्रीय पैनल का कथन है कि हमारे वनों पर तापक्रम वृद्धि के गंभीर प्रभाव पड़ने वाले हैं । सर्वप्रथम तो वनों की संरचना में व्यापक परिवर्तन होने वाले हैं जिनमें हमारी इकॉलॉजी भी प्रभावित होगी। वनस्पतियों की अनेक किस्में, जिनका अस्तित्व पूर्व से ही खतरे में है, तापक्रम में वृद्धि के कारण तो उनका अस्तित्व ही मिट जाने वाला है । इस तरह वनों में जैव विविधता के विनाश की वर्तमान प्रक्रिया और गहरी होगी । वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि के कारण पौधों के प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में वृद्धि के चलते प्रारंभ में तो उनकी उत्पादकता में वृद्धि होगी परंतु विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह स्थाई नहीं होगी । पौधों की उत्पादकता में वृद्धि मिट्टी में उपलब्ध नाइट्रोजन की मात्रा से सीमित ही रहने वाली है । वन विशेषज्ञों का अनुमान है कि तापक्रम वृद्धि और उससे उत्पन्न होने वाले जलवायु परिवर्तनों के कारण देश के ६६-७७ प्रतिशत वनों की संरचना प्रभावित होगी और वे भिन्न जलवायु वाले वनों में परिवर्तित हो जाएंगे । ये परिवर्तन एकरूप नहीं होंगे । वनों के सभी पौधे तापक्रम परिवर्तन के साथ समायोजन करने की समान क्षमता नहीं रखते हैं । अत: कुछ वनस्पतियां तो बढ़े हुए तापक्रम से समायोजित होकर अपनी उपस्थिति सतत बनाए रखेंगी, वहीं अन्य, जिनमें इस तरह की क्षमता का अभाव होगा, नष्ट हो जाएंगी और उनका स्थान अन्य प्रजातियां लेंगी । उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में वर्षा में वृद्धि होने के साथ-साथ वहां के वनों की संरचना भी अधिक नमी वाले वनों की सी हो जाएगी। इसी तरह उत्तर-पश्चिमी भारत के वन अल्प वर्षा वाले वनों की तरह ही हो जाएंगे । बिना तापक्रम वृद्धि के भी वनों की जैव विविधता खतरे में है । वनभूमि को खेती, आवासीय भूमि, औद्योगिक क्षेत्र आदि में परिवर्तित किए जाने के कारण जैव विविधता प्रतिकूल प्रभावित हुई है । ऐसे में तापक्रम वृद्धि के कारण पेड़-पौधों की कुछ किस्मों के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लग जाने के कारण यह और अधिक प्रतिकूल प्रभावित होगी । चूंकि अब हमारे वन क्षेत्र छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो गए हैं, अत: अब एक वन क्षेत्र से दूसरे वन क्षेत्र में पौधों की किस्मों के स्वयं स्थानांतरण की प्रक्रिया भी बाधित हो गई है । अत: जैव विविधता को बनाए रखना भी उतना ही कठिन हो गया है । पूर्व में तो विशाल वन क्षेत्रों में पौधों की किस्मों का एक स्थान से दूसरे स्थान तक प्राकृतिक तौर पर स्थानांतरण चलता रहता था । तापक्रम वृद्धि के कारण बर्फ पिघलते जाने से अनेक वनस्पति और प्राणी ऊपर की ओर स्थानांतरित होंगे और पूर्व में वहां पाई जाने वाली वनस्पतियों और प्राणियों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा । वर्षा की अधिकता के कारण नदियों में आने वाली बाढ़ें पूर्व की तुलना में बढ़ ही गई हैं, भविष्य में और बढ़ेंगी और इनके कारण अनेक वन क्षेत्रों का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा । ब्रह्मपुत्र नदी में आने वाली बाढ़ के कारण प्रचुर जैव विविधता वाले काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान का अस्तित्व संकट में पड़ गया है । हमारे देश की आबादी का बड़ा हिस्सा आजीविका के लिए वनों पर निर्भर है । वन क्षेत्रों के नष्ट होने और विशेषकर उनकी जैव विविधता में कमी आने से उनकी जीविका प्रभावित होगी । अनेक पौधों के नष्ट होने, उनसे मिलने वाले फलों, फूलों आदि की अनुपलब्धता के कारण उनकी जीविका के स्त्रोत समाप्त् हो जाएंगे । आजीविका को बनाए रखने के प्रयासों में लोग स्वयं भी इनका अतिदोहन कर अनेक किस्म के विनाश की प्रक्रिया को जन्म देंगे । इस तरह की प्रक्रिया अनेक वनों में देखी गई है और देखी जा रही है । तापक्रम वृद्धि के कारण पौधों की उत्पादकता में वृद्धि से प्रारंभ में वन आधारित लोगो की आजीविका पर अनुकूल प्रभाव दिखाई देगा । मध्य अवधि में इनकी बाजार में आपूर्ति बढ़ सकती है और कीमतें गिर सकती हैं । वन क्षेत्र के सीमित होते जाने से आपूर्ति की कमी की कुछ क्षतिपूर्ति इससे संभव हो सकेगी । परंतु तापक्रम वृद्धि ज्यादा होने पर उत्पादकता में कमी आ जाएगी और यह प्रक्रिया बाधित हो जाएगी । अभी समय है कि हम तापक्रम वृद्धि से वनों की संरचना, उनकी उत्पादकता तथा अन्य प्रभावों का अनुमान लगाकर उनसे समायोजन के प्रयास कर उनके दुष्प्रभावों की सीमित कर सकते हैं तथा अनुकूल प्रभावों को यथेष्ट लाभ लेने की योजना बना सकते हैं । अब हमें वनों के नियोजन और प्रबंधक के कार्यक्रम बनाते हुए भावी परिवर्तनों को सतत ध्यान में रखना होगा । वर्तमान में ही जैव विविधता के केन्द्र हमारे वन अनेक सामाजिक आर्थिक दबावों में हैं । तापक्रम वृद्धि के कारण उत्पन्न दबाव इनके अतिरिक्त होंगे । इन सबसे निपटने की समुचित योजनाएं विकसित करनी ही होंगी । ***