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रविवार, 16 अक्टूबर 2011

हमारा देश

दुनिया का कूड़ाघर बनता भारत
नरेन्द्र देवांगन

गुजरात के अलंग तट पर विश्व का सबसे बड़ा कबाड़खाना है । फ्रांस के विमानवाही पोत क्लिमेंचू को यहां पहियों पर चढ़ाकर गोदी तक लाया जाना था । जहां गैस कटर से लैस सैकड़ो मजदूर इसके टुकड़े-टुकड़े करते । लेकिन पर्यावरण समूह ग्रीनपीस ने यह चेतावनी दी थी कि इस युद्धक विमानवाही पोत में सैकड़ों टन एस्बेस्टस भरा पड़ा है, जो पर्यावरण के लिए घातक है ।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया और इस जहाज को तट पर ही रोक दिया गया । बाद में फ्रांस के राष्ट्रपति ने जहाज को वापस आपने देश भेजने का आदेश दिया । इसी तरह एक अन्य विषैले निर्यात से भरे नार्वे के यात्री जहाज लेडी २००६ की तुड़ाई पर भी सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी ।
१५ नवम्बर २००९ को कोटा (राजस्थान) के कबाड़ में एक भीषण विस्फोट हुआ जिसमें तीन व्यक्ति मारे गए व अनेक घायल हुए । आसपास की इमारतें भी क्षतिग्रस्त हुई । यह विस्फोट कबाड़ में से धातु निकालने के प्रयास के दौरान हुआ । यह हादसा इकलौता हादसा नहीं था । कबाड़ में विस्फोट की अनेक वारदातें हाल में हो चुकी हैं ।
पश्चिम के औघोगिक देशों के सामने अपने औघोगिक कचरे के निपटान की समस्या बहुत भयानक है। इसलिए पहले वे अपना कचरा जमा करते है । फिर उस कचरे को किसी कल्याणकारी योजना के साथ जोड़कर रीसाइक्लिंग प्रौद्योगिकी सहित किसी गरीब या विकासशील देश को बतौर मदद पेश कर देते हैं या बेहद सस्ते दामों पर उसे बेच देते हैं । गरीब या विकासशील देशों की सरकारें या वहां की जनता यह सोचती है कि उन्हें सस्ते में काम चलाने की एक प्रौघोगिकी मिल गई । लेकिन लम्बे समय में यह रीसाइक्लिंग एक ऐसे खतरनाक प्रदूषण को जन्म देता है, जिसका अंदाजा हम नहीं लगा सकते ।
इराक युद्ध के समय यहां अमरीकी सेना ने बहुत भीषण बमबारी की थी जिसमें बहुत विनाश हुआ था ।

उसके बाद की घरेलू हिंसा और हमलों ं से भी बहुत विनाश हुआ । इस विनाश का मलबा बहुत सस्ती कीमत पर उपलब्ध होने लगा और व्यापारी इसे भारत जैसे देशों में पहुंचाने लगे क्योंकि यहां इसकी प्रोसेसिंग लुहार या छोटी इकाइयां सस्ते में कर देती हैं । पर उन्हें यह नहीं बताया जाता है कि युद्ध के समय के ऐसे विस्फोटक भी इस मलबे में छिपे हो सकते है और कभी भी फट सकते है । इन विस्फोटकों की उपस्थिति के कारण ही हाल के कुछ वर्षो में कबाड़ के कार्य व विशेषकर लोहे के कबाड़ को गलाने के काम में बहुत सी दुर्घटनाएं हो रही है ।
अब तो कबाड़ के नाम पर रॉकेट और मिसाइलें भी देश में आने लगी हैं । इससे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक नया खतरा पैदा हो गया है । यह हैरत की बात है कि ईरान से लोड होने के बाद भारत के कई राज्यों से गुजरने, दिल्ली पहुंचने और फिर साहिबाबाद स्थित भूषण स्टील फैक्टरी में विस्फोट होने तक किसी ने ट्रकों में भरे कबाड़ की जांच करने की जहमत नहीं उठाई । दिल्ली में तुगलकाबाद स्थित जिस कंटेनर डिपो में ये ट्रक पहुंचे थे, वह खुद १९९१, १९९३ और २००२ के कबाड़ में आई ऐसी विस्फोटक सामग्री की मार झेल चुका है । तब भी यह सामग्री पश्चिम एशिया से आई थी और हर बार वहीं से माल लाया जा रहा है ।
कस्टम विभाग द्वारा बिना जांच के आयातित सामग्री को स्वीकार करने का चलन इसमें सहायक की भूमिका निभा रहा है । कुछ समय पहले उत्तरप्रदेश के साहिबाबाद स्थित भूषण स्टील कारखाने में विस्फोट की घटना ने देश की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है । इसका सीधा मतलब यह है कि देश में सक्रिय आतंकवादी संगठन यदि चाहें तो विदेशों से मनमाफिक ढंग से हथियार और आयुध ला सकते है । जब गैर इरादतन यहां विस्फोटक सामग्री पहुंच सकती है, तो इरादतन और पूरी तैयारी करके यहां कुछ भी मंगवाया जा सकता है ।
भारत दुनिया का सबसे पसंदीदा डंपिंग ग्राउंड (कबाड़गाह) है । हम सस्ते मलबे के सबसे बड़े आयातक हैं । प्लास्टिक, लोहा या अन्य धातुआें का कबाड़, ल्यूब्रिकेंट के तौर पर अनेक रासायनिक द्रव और अनेक जहरीलें रसायन, पुरानी बैटरियां और मशीनें हमारी चालू पसंदीदा खरीददारी सूची में है । जब इन्हें इस्तेमाल के लिए दोबारा गलाया जाता है तो इससे निकलने वाला प्रदूषण न केवल यहां की हवा बल्कि मिट्टी और पानी तक में जहर घोल देता है । उस मिट्टी में उपजा हुआ अनाज दूसरी तीसरी पीढ़ी में आनुवंशिक समस्याएं पैदा कर सकता है । लेकिन इतनी दूर तक जांच-परख करने की सतर्कता हमारी सरकार में नहीं है ।
बढ़ते ई-कचरे ने पर्यावरणविदों के कान खड़े कर दिए है । यह कबाड़ लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए एक बड़ा खतरा है । देश में अनुपयोगी और चलन से बाहर हो रहे खराब कम्प्यूटर व अन्य उपकरणों के कबाड़ से पर्यावरण पर बुरा असर पड़ रहा है । कबाड़ी इस कचरे को खरीदकर बड़े कबाड़ियों को बेच देते है । वे इसे बडे-बड़े गोदामों में भर देते हे । इस प्रकार जगह-जगह से एकत्र किए गए आउटडेटेड कम्प्यूटर आदि कबाड़ बड़ी संख्या में गोदामों जमा हो जाते हैं । इसके अलावा विदेशों से भी भारत में भारी मात्रा में कभी दान के रूप में तो कभी कबाड़ के रूप में बेकार कम्प्यूटर आयात किए जा रहे है । यह ई-कचरा प्राय: गैर कानूनी ढंग से मंगाया जाता है । आसानी से धन कमाने के फेर में ऐसा किया जाता है । कम्प्यूटर व्यवसाय से जुड़े लोगों का मानना है कि हमें अपने देश में बेकार हो रहे कम्प्यूटर की अपेक्षा विदेशों से आ रहे ढेरों कम्प्यूटरों से अधिक खतरा है । भारत में कमाई के लालच में भारी मात्रा में वैध-अवैध तरीकों से बेकार कम्प्यूटर और अन्य उपकरणों का कबाड़ के रूप में आयात हो रहा है ।
भारत की राजधानी दिल्ली में ही ऐसे कबाड़ को कई स्थानों पर जलाया जाता है और इससे सोना, प्लेटिनम जैसी काफी मूल्यावन धातुएं प्राप्त् की जाती है हालांकि सोने और प्लेटिनम का इस्तेमाल कम्प्यूटर निर्माण में काफी कम मात्रा में किया जाता है । इस ई-कचरे को जलाने के दौरान मर्करी, लेड, कैडमियम, ब्रोमीन, क्रोमियम आदि अनेक कैंसरकारी रासायनिक अवयव वातावरण में मुक्त होते हैं । ये पदार्थ स्वास्थ्य के लिए अनेक दृष्टियों से घातक होते हैं । साथ ही पर्यावरण के लिए खतरनाक होते है । कम्प्यूटर व अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में प्रयुक्त होने वाले प्लास्टिक अपनी उच्च् गुणवत्ता के चलते जमीन में वर्षोंा यूं ही पड़ा रहता है और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचाता है । बड़े कबाड़ी अकुशल कर्मियों से यह कार्य सम्पन्न कराते है । उनको स्वयं नहीं मालूम कि वे कितना खतरनाक और नुकसानदेह कार्य कर रहे है । हानिकारक गैसों व अन्य रासायनिक अवयवों से युक्त धुंआ चारों और फैलकर वातावरण को प्रदूषित करता है जो मनुष्यों, वनस्पतियों और जीव-जंतुआें को प्रभावित करता है । वहां काम करने वाले कामगार ही सर्वप्रथम इस प्रदूषण की चपेट में आते है ।
आयातित कचरे के प्रबंधन के बारे में गठित उच्चधिकार प्राप्त् प्रो. मेनन समिति ने ऐसे जहरीले कचरे के आयात पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की थी । इस समिति का गठन भी सरकार ने अपने आप नहीं किया था बल्कि एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने १९९७ में अंतर्राष्ट्रीय बेसल कन्वेंशन में सूचीबद्ध कचरों का भारत में प्रवेश प्रतिबंधित किया था । इसके बाद सरकार ने खतरनाक कचरे के प्रबंधन के अलग-अलग पहलुआं की जांच करने के लिए मेनन समिति का गठन किया था । मेनन समिति ने न सिर्फ कई कचरों के आयात पर रोक लगाने की सिफारिश की थी बल्कि जो औद्योगिक कचरा देश में है उसके भण्डारण और निपटान के बारे में भी कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए । लेकिन सरकार ने मात्र ११ वस्तुआें का आयात ही प्रतिबंधित किया, बाकी १९ वस्तुआें को विचारार्थ छोड़ दिया गया । यह उदासनीता तो आयातित कचरे से निकलने वाले जहर से भी खतरनाक है ।
इराक युद्ध में अमरीका ने जो बमबारी की थी, उसमें क्षरित युरेनियम का भी उपयोग हुआ था । इस बात को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अब सामान्यत: स्वीकार किया जाता है कि पूरे विश्व में क्षरित युरेनियम युक्त हथियारों का सबसे अधिक उपयोग अभी तक इराक में ही हुआ है । क्षरित युरेनियम से हथियारों की मारक क्षमता बढ़ जाती है तथा वे बहुत मजबूत धातु को भी भेद सकते हैं और भूमिगत बंकरों को भी नष्ट कर सकते हैं । इनके दीर्घकालिक परिणाम भी बहुत खतरनाक होते हैं जो लोग क्षरित युरेनियम की चपेट में आते हैं वे कैंसर सहित कई दीर्घकालिक बीमारियों व गंभीर स्वास्थ्य समस्याआें से ग्रस्त सकते हैं । क्षरित युरेनियम वाले बमों से क्षतिग्रस्त टैंक के मलबे में भी क्षरित युरेनियम के अवशेष होते हैं । यदि हमारे देश में बड़े पैमाने पर इस मलबे का आयात होगा तो क्षरित युरेनियम से युक्त धातु हमारे देश में दूर-दूर तक इसके खतरे से अनभिज्ञ लोगों के पास पहुंच जाएगी और वे कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हो सकते हैं ।
जाहिर है विकसित देश भारत को जिस तरह अपना कूड़ाघर बनाने का प्रयास कर रहे हैं उससे इसकी छवि दुनिया में सबसे बड़े कबाड़ी के रूप में भी उभर रही है । इसे रोकने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है, तो इसकी वजह यह है कि इस समस्या के प्रति सरकारें उदासीन रही हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह कोई बड़ी समस्या नहीं हैं । सरकारें यह मानकर चलती हैं कि विकासशील देशों को इतना नुकसान तो भुगतना ही है । आयातित कचरे के प्रति ऐसी सोच इसलिए बनती है, क्योंकि उसे हम सिर्फ घटिया और सस्ता माल मान लेने की भूल करते हैं। इसके प्रति ज्यादा सतर्क लोग इसे एक प्रदूषणकारी कच्च माल तो मानते हैं, मगर कहते है कि कोई बेहतर विकल्प नहीं है । यह सरकारी नजरिया है, जो आयातित कचरे के खतरे को बहुत मामूली करके आंकता है ।




शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

१० हमारा देश


क्या सचमुच मुक्त व्यापार है
डॉ. बनवारी लाल शर्मा

कम से कम पिछले तीस सालों से मुक्त व्यापार अन्तराष्ट्रीय व्यापार के एक उसूल के तौर पर स्वीकार कर लिया गया है । विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) का गठन १९९४ में इस उद्देश्य से किया गया था कि तमाम देशों के बीच व्यापार में आने वाली रूकावटों को दूर किया जा सके और उन्मुक्त प्रवाह के साथ व्यापार हो सके । अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में बड़ी शक्तियों ने घोषित किया था कि दुनिया का विकास व्यापार के जरिये ही संभव है । विकासशील देशों ने अपने घरेलू उत्पादों के विकास और कर लगा कर सस्ते विदेशी आयातों से उनकी रक्षा करने के लिए संरक्षणवाद का जो रास्ता अपनाया था, उसे गलत तरीका करार दिया गया । इस अन्तर्राष्ट्रीय नीति के परिणामस्वरूप भारत जैसे देशों को अपने दरवाजे खोलने पड़े । विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) का इस्तेमाल निर्यातों के लिए बाजार हासिल करने के लिए किया
गया । उदाहरण के लिए १९९२ में विश्व व्यापार संगठन के विवाद निस्तारण बोर्ड ने अमेरिका की शिकायत पर एक फैसला दिया था जिसके तहत भारत को १४२९ विदेशी वस्तुआेंके लिए अपना बाजार मजबूरन खोलना पड़ा था । इनमें ऐसे उत्पाद भी शामिल थे जिनका भारत निर्माण करता आ रहा था ।
भारत और अन्य देशों को खास करके सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आउटसोर्सिंग के लिए प्रतिबंधित करने वाले जिस नये कानून पर हाल में राष्ट्रपति ओबामा ने हस्ताक्षर किये हैं वह मुक्त व्यापार बड़ा आघात है । बहुत अमरीकी कम्पनियां-एयरलाइन्स, बैंक आदि अपने सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी काम भारत जैसे देशों के सस्ते श्रमिकों द्वारा करवा लेते थे । पिछले कई सालों से भारत में बंगलोर, पुणे, मुम्बई, दिल्ली जैसे नगरों में तमाम कॉल सेन्टर चल रहे थे जिनमें सूचना प्रौद्योगिकी में प्रशिक्षित युवक-युवतियां अमरीकी फर्मोंा के लिए रात मेंे काम करते थे (क्योंकि अमरीका में यह दिन का वक्त होगा) अनेक भारतीय आई.टी. कम्पनियां अच्छा बिजिनेस कर रही थीं ।
लेकिन अमरीका बिना किसी रूकावट के होने वाले इस व्यापार में जहां भारत के सस्ते श्रम का बखूबी इस्तेमाल कर रहा था, वहीं नौकरियां अमरीका से भारत को स्थानांतरित भी तो हो रही थीं । यही स्थिति अमेरीका और यूरोप से कृषि उत्पादों के निर्यात के मामले में भी थी । इन देशों की सरकारों द्वारा किसानों को भारी आर्थिक सहायता (सब्सीडी) दी जाती है । यह भारी आर्थिक सहायता डब्लूटीओ के प्रावधानों के विरूद्ध हैं, लेकिन मुक्त व्यापार के नाम पर जारी है । अमरीकी राष्ट्रपति द्वारा उठाया गया यह नया कदम अमरीका में मंदी से उत्पन्न बेरोजगारी को नियंत्रित करने के लिए है । कोई भी देश बेरोजगारी पर काबू करने के लिए ऐसे कदम उठा सकती है, लेकिन अमरीका को मुक्त व्यापार पर उपदेश देना बन्द कर देना चाहिए ।
पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर
वर्चस्व रखने वाले विकसित देशों द्वारा अपनाये गये दोहरे मानदंड का यह पहला उदाहरण नहीं है । भारत से इस्पात का निर्यात होता था जो कि अमरीका के इस्पात से बेहतर था और सस्ता भी था । तत्कालीन राष्ट्रपति जार्जबुश ने भारतीय इस्पात पर १५ फीसदी एण्टीडम्पिग ड्यूटी थोप दी थी । नतीजतन भारतीय इस्पात के व्यापार में बड़ा घाटा
हुआ ।
सूती वस्त्र का मामला सबसे ज्वलंत उदाहरण है दोहरे मानदंड का । १९९५ में डब्लूटीओ की स्थापना के साथ सूती वस्त्र के बड़े निर्यातक थे हम । सूती वस्त्र का व्यापार एमएफए (मल्टी फाइबर एग्रीमेंट) द्वारा नियंत्रित होता था और अन्तराष्ट्रीय व्यापार में इसे शामिल करने के लिए दस साल की अवधि निर्धारित की गयी थी । भारत को कई काफी नुकसान उठाना पड़ा क्योंकि यूरोप द्वारा भारतीय सूती वस्त्र की खेपें लौटा दी जाती थीं ।
दरअसल तथ्य यह है कि कहीं से भी मुक्त व्यापार नहीं है तो यह बन्द हो जाता है । मुक्त व्यापार प्रतिस्पर्धा पर आधारित है, परन्तु जो हम देख रहे हैं यह प्रतिस्पर्धा नहीं है, बल्कि विलयन और अधिग्रहण है ।
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६ हमारा देश

भूमि अधिनियम में वंचितों की अनदेखी
सुश्री अरित्रा भट्टाचार्य

भारत में भूमि रिकार्ड्स को लेकर लापरवाही एक सोची समझी साजिश है । प्रस्तावित भूमि स्तत्वाधिकार अधिनियम भी इसी की अगली कड़ी बन कर न रह जाए इसलिए आवश्यक है कि इस पर व्यापक विचार- विमर्श हो । वैसे इस अधिनियम को ३१ अगस्त तक सार्वजनिक विमर्श में रखा गया था । इस मौके का फायदा उठाकर अधिक से अधिक सुझाव प्रेषित किए गये ।
वर्तमान में लाग भूमि पर अपनी मिल्कियत सिद्ध करने के लिए पट्टों (अनुबंधों) पर निर्भर है । यह प्रणाली अपने आप में समस्याआें की खान है । उदाहरण के लिए एक व्यक्ति जिसने अपनी भूमि बेच दी है, वह पट्टा अपने पास रख सकता है और मिल्कियत का दावा भी कर सकता है । इस विवाद को कानूनी रूप से सुलझने में वर्षोंा लग सकते हैं । ग्रामीण विकास मंत्रालय के भूमि संसाधन विभाग द्वारा प्रस्तावित इस अधिनियम के मसौदे में कहा गया है कि भूमि के प्रत्येक सौदे को एक केन्द्रीय प्राधिकरण द्वारा दर्ज एवं संभाला जाएगा और वह प्रत्येक संपत्ति को एक विशिष्ट पहचान संख्या (यू.आई.डी.) आबंटित करेगी । विवाद की सिथति में संख्या (नंबर) का इस्तेमाल कर भूमि की स्थिति का पता लगाया जाता है । मंत्रालय के सूत्र का कहना है कि इस तरह के कानून से भूमि का बाजार मुक्त होना और भूस्वामियों के लिए बैंक ऋण तक पहुंच एवं संपत्ति को गिरवी रखने में आसानी होगी, क्योंकि उनके पास भूमि का स्पष्ट स्वत्वाधिकार होगा । परन्तु क्या यह अधिनियम भूमि सुधार का अग्रदूत बन सकता है ?
भोपाल स्थित एकता परिषद, जिसने सन् २००७ में २५,००० भूमिहीन किसानों को दिल्ली की ओर कूच करवाकर भूमि सुधार की ओर केन्द्र का ध्यान आकर्षित किया था के रमेश सिंह का कहना है कि प्रस्तावित अधिनियम सीमांत किसानों के लिए मददगार नहीं होगा । उनका कहना है कि भूमि अधिकारों की बन्दोबस्ती और उन्हें दर्ज किए जाने का अधिकांश कार्य सन् १९३० और १९४० के दशक में हुआ था । आजादी के बाद सभी राजनीतिक दलों ने भूमि अधिकारों के व्यवस्थापन या निपटारे की अनदेखी की है । इसके परिणामस्वरूप पीढ़ियों से भूमि पर खेती करते आए अधिया बटाई वाले किसानों की बेदखली बदस्तुर जारी है क्योंकि उनकी अधिया-बटाई कहीं दर्ज ही नहीं की गई है । यह अधिनियम इस बारे में मूक है । यह अधिनियम समुदाय की मिल्कियत वाली भूमि के संबंध में भी मौन है, जो कि आदिवासियों के बचे रहने के लिए बहुत जरूरी है ।
महाराष्ट्र के गैर सरकारी काश्तकारी संगठन के कार्यकर्ता ब्राएन लोबो का कहना है कि, उनका अनुभव बताता है कि वन अधिकार कानून के अन्तर्गत भी कभी कभार ही किसी के भूमि अधिकार को दर्ज किया जाता है । जबकि इसके अन्तर्गत इस हेतु प्रक्रिया तक बताई गई है । इस प्रकार हम अभी भी देख सकते हैं कि भविष्य में भूस्वत्वाधिकार का क्या होगा । आदिवासी क्षेत्रों में बिना दर्ज हुई काश्तकारी को कोई मान्यता ही नहीं
मिलेगी ?
श्री लोबो का कहना है कि भूमि स्वत्वाधिकार प्राधिकरण के संपत्ति मूल्य निर्धारण विभाग के सुझावों का अर्थ है विशाल भूमि बैंक का बड़े भू-माफियाआें को उपलब्ध होना । उनका कहना है, अंतत: अधिनियम के उद्देश्यों में ही बताया गया है कि यह अधिनियम पूंजी तक आसान पहुंच एवं भूमि संबंधी लेनदेन में कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए ही बताया जा रहा है । महाराष्ट्र में ही आदिवासियों के अधिकारों के लिए कार्य कर रहे सर्वहारा जनआन्दोलन की सुश्री उल्का महाजन का कहना है, भूमि रिकार्ड्स का केन्द्रीयकरण उच्च्वर्ग कारपोरेट और डेवलपर्स को ही फायदा पहुंचाएगा ।
इस क्षेत्र में कार्य कर रहे कार्यकर्ताआें ने भूमि स्वत्वधिकार प्राधिकरण के स्वरूप पर ही शंका जाहिर की है । रमेश सिंह का कहना है, इसके अंतर्गत सिविल सोसाइटी की कोई भूमिका ही नहीं हैै । साथ ही इस पर किसी भी तरह का अंकुश भी नहीं रखा जा सकता । उनका विश्वास है कि यह अधिनियम राष्ट्रीय भूमि सुधार समिति एवं राष्ट्रीय भूमि सुधार परिषद की अनुश्ंासा के विरूद्ध है । २००७ में गठित समिति ने अनुशंसा की थी की विशेष आर्थिक क्षेत्र नीति को रद्द कर दिया जाए एवं भूमि सीलिंग कानून को पुन: प्रचलन में लाया जाए ।
श्री सिंह का कहना है कि अधिनियम के सकारात्मक पक्षों को लेकर की कोई स्पष्टता नहीं है । उदाहरण के लिए अधिनियम का कथन है कि स्वत्वाधिकार प्राधिकरण अस्थायी स्वत्वाधिकार के मामले में स्वमेव निर्णय ले सकता है । यह प्रावधान तभी प्रभावकारी हो सकता है यदि अधिया-बटाई वाले किसानों एवं आदिवासियों के अधिकारों का ठीक से दस्तावेजीकरण किया गया हो । साथ ही यह भी निश्चित नहीं है कि राज्य अलग से अपने भूमि स्वत्वाधिकार कानून लागु करेंगे। चूंकि भूमि राज्य का विषय है अतएव राज्यों से यह उम्मीद की जाती है कि वे केन्द्रीय कानून के आधार पर अपने कानून बनाएगे ।
मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि अधिनियम में अभी भी कुछ कमियां है । उनका कहना है कि संसद में अंतिम मसौदा प्रस्तुत करने से पहले वे संभवत: इस क्षेत्र में सक्रिय कार्यकर्ताआें और अकादमिक क्षेत्र में लोगों से सलाह मशविरा करेंगे ।
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गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

५ हमारा देश

प्रकृति और अर्थव्यवस्था
डॉ. रामप्रताप गुप्त
विकास के नाम पर प्रकृति और पर्यावरण के विनाश को अर्थव्यवस्था की अनिवार्यता मान लिया गया है । इस विभीषिका के मूल्यांकन की आवश्यकता है । विश्व के अनेक देश अपने सकल घरेलू उत्पाद में इसकी गणना करते हैं । भारत इस तरह की गणना न कर अपनी अर्थव्यवस्था को अत्यंत मजबूत बताकर सकल घरेलू वृद्धि दर में उछाल की कहानी कह रहा है । राष्ट्रीय आज गणना की वर्तमान पद्धति में वर्ष भर में वस्तुआें और सेवाआें के शुद्ध उत्पादन को शामिल किया जाता है, परंतु इस बात का कोई लेखा जोखा नहीं लिया जाता है कि इनके उत्पादन की प्रक्रिया में कितनी पर्यावरणीय क्षति हुई है । वर्तमान में हमारी राष्ट्रीय आय गणना की प्रणाली तो ऐसी है कि उत्पादन की प्रक्रिया में अगर सारे वन काट दिए जाएं, उपजाऊ मिट्टी को नष्ट कर भूमि को बंजर बना दिया जाए, नदियों, झीलों के पानी को प्रदूषित कर दिया जाए, वह पीने के काबिल भी न रहे, तटीय समुद्र की सभी मछलियां नष्ट कर दी जाएं, वायुमण्डल को प्रदूषित कर उसमें सांस लेना भी कठिन बना दिया जाए तो भी हमारी राष्ट्रीय आय के अनुमानोंमें इन प्रतिकुल प्रभावों का कोई विपरीत असर नहीं होगा तथा उसमें कोई कमी नहीं आएगी। इन सब कमियों के फलस्वरूप हमारी राष्ट्रीय आय और उसकी वृद्धि दर राष्ट्रीय कल्याण को ठीक-ठीक प्रदर्शित नहीं करती है । राष्ट्रीय आय की अवधारणा में इन कमियों को देखते हुए अब हरित राष्ट्रीय आय की अवधारणा विकसित की गई है। `हरित राष्ट्रीय आय' की गणना में वर्ष में वस्तुआें एवं सेवाआें के शुद्ध उत्पादन के योग में से उत्पादन की प्रक्रिया में देश के पर्यावरण और पारिस्थतिकी को जो क्षति पहंुचाती है, उसके मौद्रिक मूल्य को कम कर दिया जाता है । ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान द्वारा सीमित गणना के आधार पर तैयार एक रिपोर्ट ``हरित राष्ट्रीय आय सन् २०४७'' प्रकाशित की है । इसमें बताया गया है कि वर्तमान में देश में अशुद्ध पेयजल एवं प्रदूषित वायु के कारण प्रतिवर्ष ६ लाख लोग मृत्यु या रूग्णता के शिकार होते हैं, जिसकी कुल लागत राष्ट्रीय आय के ३.६ प्रतिशत के बराबर आती है । इसी संस्थान द्वारा सन् १९९७ के लिए अनुमान लगाया था कि वन क्षेत्र और वनों की सघनता में कमी के फलस्वरूप इमारती लकड़ी एवं अन्य उत्पादों में आई कमी, जलस्त्रोतों में आई गिरावट, कृषि उत्पादन में कमी, वायुमण्डल के प्रदूषण में वृद्धि आदि के रूप में होने वाली क्षति राष्ट्रीय आय के १० प्रतिशत के बराबर थी । संस्थान ने यह भी अनुमान लगाया था कि जलवायु परिवर्तन के कारण सन् २१०० तक भारत को होने वाली क्षति उसकी राष्ट्रीय आय से ९ से १३ प्रतिशत के बराबर रहेगी । इन सब क्षतियों को शामिल करने के लिए राष्ट्रीय आय की वर्तमान गणना प्रणाली में कोई व्यवस्था नहीं है । बल्कि कई बार तो इस क्षति के कुछ अंशोंको राष्ट्रीय आय में घनात्मक योगदान के रूप में शामिल कर लिया जाता है । उदाहरण के लिए वनों को नष्ट करने की प्रक्रिया में जो इमारती लकड़ी या अन्य प्रकार की लकड़ियां प्राप्त् होती है, उसके मुल्य में बराबर की राशि उस वर्ष की राष्ट्रीय आय में शामिल कर ली जाती है । यह सब इसलिए होता है क्योंकि राष्ट्रीय आय की गणना में पर्यावरण को पहुंचाने वाली क्षति का कोई लेखा जोखा नहीं रखा जाता है, बल्कि उस क्षति के प्रतिकूल प्रभावों का सामना करने के लिए जो कदम उठाए जाते हैं उन्हें सकारात्मक योगदान के रूप में राष्ट्रीय आय में शामिल कर लिया जाता है । इसे इस उदाहरण सेे समझिए, मान लीजिए किसी सीमेंट कारखाने से निकलने वाले धूल के कणों के कारण आसपास के गांवों के निवासी, श्वास संबंधी रोगोंे के शिकार होते हैं तो उनकी चिकित्सा हेतु उत्पादित दवाआें का मूल्य, डॉक्टर की फीस आदि के राष्ट्रीय आय में शामिल किए जाने से उसमें वृद्धि होगी । स्पष्ट है कि हमारी राष्ट्रीय आय की गणना में पर्यावरण को पहुंच रही क्षति को शामिल नहीं किए जाने से वह गलत निष्कर्षोंा की ओर ले जाती है । हमारे अर्थशास्त्री एवं सांख्यिकीविद् राष्ट्रीय आय की गणना की इन कमियों से लंबें समय से परिचित रहे हैं । राष्ट्रीय आय की गणना में पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभावों को सर्वप्रथम १९३० की मंदी के पश्चात अमेरिकी राष्ट्रीय आय की गणना में शामिल किया गया था । हाल ही में आर्थिक निष्पादन एवं सामाजिक प्रगति रिपोर्ट जिसे प्रमुख अर्थशास्त्रियों जोसेफ स्टिग्लिट्स,अर्मत्य सेन, ज्यां यॉ फिटोसी के नाम पर स्टिग्लिट्स-सेन-फिटोसी रिपोर्ट कहा जाता है, में राष्ट्रीय आय की गणना की वर्तमान विधि की कमियों की विस्तार से व्याख्या की गई है । इस रिपोर्ट में कहा गया है कि राष्ट्रीय आय के आंकड़ों का उपयोग करने वाले हमारे नीति निर्धारक, व्यवसायी आदि उनकी इन कमियों से अवगत नहीं होते हैं । इसी वजह से हरित राष्ट्रीय आय की गणना आवश्यक हो गई है ताकि ये आंकड़े स्थिति की वास्तविकता को बेहतर ढंग से प्रदर्शित कर सकें । हाल ही में भारत के वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि सरकार की सन् २०१५ तक भारत की हरित राष्ट्रीय आय की गणना संयुक्त राष्ट्र के सांख्यिकी विभाग द्वारा विकसित तरीकों पर आधारित होगी, यह तरीका विश्व के सभी राष्ट्रों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। हरित राष्ट्रीय आय की गणना में चार प्रकार के पर्यावरणीय प्रभावों को शामिल किया जाएगा । पर्यावरणीय एवं आर्थिक लेखा में उन सभी घटकों को शामिल किया जाएगा जिनकी अब तक उपेक्षा की जाती है । परंतु अभी तक समंको के स्त्रोत और अध्ययन प्रणाली का विस्तृत विवरण ज्ञात नहीं हो सका है । हरित राष्ट्रीय आय के समंक या आंकड़े राष्ट्रीय आय के पूरक के रूप में प्रयुक्त किए जा सकेंगें । राष्ट्रीय आय के उत्पादन की प्रक्रिया में पर्यावरण में हो रही क्षति का विवरण राज्यों से प्राप्त् सूचनाआें पर आधारित होगा । यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि राज्यों से मंगाए गए विवरण में पर्यावरण की कौन-कौन सी क्षतियां शामिल की जाएंगीं । केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन ने भारत में होने वाली पर्यावरणीय क्षति का अनुमान लगाना प्रारंभ कर दिया है । कुछ राज्यों में जैसे गोआ, कर्नाटक, तमिलनाडु और मेघालय ने कुछ मार्गदर्शी अध्ययन शुरू कर दिए हैं । इन अध्ययनों में जनसेवकों, समाजकर्मियों व मीडिया से संबंधित लोगों को भी शामिल किया गया है । भारत को इस दिशा में चीन से सबक लेना होगा । चीन में राष्ट्रीय आय के उत्पादन की प्रक्रिया में पर्यावरणीय क्षति के बारे में अंतर्राष्ट्रीय अनुमान राष्ट्रीय आय के ८.१२ प्रतिशत के बराबर थे, परंतु चीन ने अपनी आर्थिक प्रगति की ऊंची दर के दावे पर इस अनुमान के प्रतिकूल प्रभाव को देखते हुए इस क्षति के अनुमान को कम करके अर्थात ३.०५ प्रतिशत के बराबर ही बताया है । हमें तो व्यापक दीर्घकालीन हितों की दृष्टिगत रखकर पर्यावरणीय क्षति के जो भी आंकड़े सामने आए हैं उन्हें स्वीकार कर पर्यावरणीय क्षति को कम करने तथा न्यूनतम बनाने की दिशा में कदम उठाने चाहिए । चीन ने तो हरित राष्ट्रीय आय की गणना में भू-जल भण्डारों को क्षति तथा मिट्टी के प्रदूषण की हानि को शामिल ही नहीं किया था । इस तरह की हेराफेरी कर अगर पर्यावरणीय क्षति के बारे में भ्रम बनाए रखना है तो हरित राष्ट्रीय आय की गणना का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा ।***

सोमवार, 14 दिसंबर 2009

१२ हमारा देश

बाढ़-सूखे की चपेट में मानव जीवन
- नरेन्द्र देवांगन
आज देश का अधिकांश भाग-सूखा-अकाल की चपेट में है । देश का बड़ा भाग जहां एक ओर सूखाग्रस्त है, वहीं दूसरी ओर कुछ भाग में बाढ़ एवं तूफान ने तबाही मचाई हुई है । विशेषज्ञों का मत है कि किसी भी भू-भाग का पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए कम से कम एक तिहाई भू-भाग पर वन होने चाहिए । पहाड़ी क्षेत्र में तो ६० प्रतिशत भू-भाग पर ही जंगल हैं । वैज्ञानिकों का मत है कि जिस क्षेत्र का वन क्षेत्र १० प्रतिशत से कम हो जाता है वहां का पर्यावरण विनाश की कगार पर पहुंच जाता है । विकास के नाम पर वृक्षों की अंधाधुंध कटाई से देश में प्रति वर्ष १५ लाख हैक्टर क्षेत्र में वनों का विनाश हो रहा है जिसमें प्रति मिनट एक हैक्टर भूमि बंजर हो रही है । आशंका है कि यदि पर्यावरण संतुलन पर ध्यान नहीं दिया गया तो पृथ्वी का तापमान बढ़ जाने से प्रलय की स्थिति पैदा हो सकती है और कई समुद्र तटीय क्षेत्र जलमग्न हो सकते हैं । बढ़ते तापमान का सबसे बड़ा असर यह होगा कि हिम शिखर व ग्लेशियर पिघलकर समुद्र में गिरने लगेंगे । इससे समुद्र का जल स्तर बढ़ेगा व की भूभाग उसमें डूब जाएगा । आज सबसे बड़ी चुनौती जनसंख्या विस्फोट, तीव्र औद्योगिकरण तथा प्रदूषण की है । वैज्ञानिक उपलब्धियों की जगमगाहट में हम आज पृथ्वी की जीवनदायी व्यवस्था में व्यवधान उपस्थित करने पर इतने उजारू हैं कि स्वयं अपनी मौत को निमंत्रण दे रहे हैं । अपनी सुख-सुविधा के लिए उन्हीं प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट कर रहे हैं, जो प्रकृति ने एक स्वचालित व्यवस्था के रूप में हमें दिए थे। मनुष्य ने इस स्वचालित व्यवस्था के रूप में इतनी गड़बड़ी फैला दी है कि पूरी जीवनदायी व्यवस्था डगमगा रही है । जीवन चक्र कहीं से भी टूटे, पुरी श्रृंखला बिखर जाएगी और प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ने के लिए सर्वाधिक ज़िम्मेदार मानव स्वयं भी इसका शिकार होगा । औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप विषैली गैसों और अवशिष्ट पदार्थ के कारण जन स्वास्थ्य प्रभावित हुआ है । कैडमियम, मरकरी, आर्सेनिक, सल्फ्यूरिक अम्ल, लेड आदि विषैले पदार्थ निरंतर वातावरण और जल स्त्रोतों में छोड़े जा रहे हैं । एक अध्ययन के अनुसार लेड से कैंसर तथा लकवे की शिकायत और निरंतर धुएं युक्त वातावरण में सांस लेने से फेफड़ों के विभिन्न रोग होते हैं । ८० प्रतिशत पारा-वाष्प सांस द्वारा शरीर के अंदर जाकर स्नायु मंडल के रोग उत्पन्न करती है । १९७१ मेंइराक में पारा युक्त कीटनाशक मिश्रण से साफ किए गए अनाज की रोटी खाने के बाद ६ हजार व्यक्ति बीमार हो गए तथा ५०० से अधिक मौत के शिकार हुए । मैंगनीज़ डाईऑक्साइड से पार्किंसन रोग तथा मनोविकार देखे गए हैं । इस्पात उद्योगों में उपयोग में लाए जाने वाले निकल मिश्रण से निकल कार्बेनल के द्वारा ज़िगर, नाक तथा कैंसर की बीमारियां बढ़ गई हैं । वेनेडियम, जो इस्पात निर्माण में महत्वपूर्ण है, के सांस द्वारा शरीर मेंे जाने से अत्यधिक सूखी खांसी, आंख व गले में जलन तथा दमा जैसे रोग होते हैं । मथुरा के पास तेल शोधक कारखाने के दुष्प्रभाव भरतपुर के पक्षी अभयारण्य की वीरानी एवं विश्व प्रसिद्ध ताजमहल पर धब्बों के रूप में देखने को मिलते हैं । प्रकृति में वनस्पति, जंतु, जल स्त्रोत एवं वायुमंडल एक स्वस्थ पर्यावरण का निर्माण करते हैं । यदि इनमें से किसी एक इकाई में असंतुलन पैदा हो तो इसका प्रभाव पूरी श्रृंखला पर पड़ता है । आज भू क्षरण इतनी तीव्र गति से हो रहा है कि यदि क्षरित मिट्टी को मालगाड़ी के डिब्बों में भर दिया जाए तो वह दिल्ली से लेकर कन्याकुमारी तक लंबी होगी । एक अनुमान के अनुसार प्रति वर्ष ६० अरब टन उपजाऊ मिट्टी भू क्षरण से प्रभावित होती है । फसलों के मूल्य के रूप में यह हानि ३०० करोड़ तथा उर्वरक के रूप में यह हानि १२०० करोड़ रूपए प्रति वर्ष आंकी गई है । कुल मिलाकर वार्षिक हानि १५०० करोड़ रूपए प्रति वर्ष होती है । भूमि उर्वरता घटने के साथ नदियों, तालाबों में मिट्टी भर जाने से बाढ़े आती हैं, वहीं कंकरीली मिट्टी उपजाऊ क्षेत्रों में फैलकर उसे कृषि के लिए अनुउजाऊ भी बनाती है । वन क्षेत्रों में तेज़ी से कमी आती जा रही है । इंर्धन, घर बनाने एवं कृषि यंत्रों के लिए, वनोपज पर आधारित उद्योग धंधे जैसे कागज़, प्लाईवुड आदि शहरी आवास व्यवस्था, विस्थापितों को बसाने तथा कृषि क्षेत्र की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए वन निरंतर काटे जा रहे हैं। वन क्षेत्रों पर जनसंख्या विस्फोट एवं पशु संख्या में बढ़ोतरी के कारण दबाव निरंतर बढ़ रहा है । भारत में प्रतिवर्ष १३ करोड़ टन लकड़ी काटी जा रही हैं । वायुमंडल में विभिन्न प्रकार के परिवर्तन दिखाई पड़ने लगे हैं, खास तौर से नगरीय एवं औद्योगिक क्षेत्रों में । वर्तमान वायुमंडल में कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा ३५० पीपीएम है जो कि औद्योगीकरण से पूर्व के समय से १४ प्रतिशत अधिक है । जीवाश्म इंर्धन की वर्तमान खपत की दर से सन् २०२० तक वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड का स्तर दुगना हो जाएगा, जिससे विश्व तापमान तीन डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा, जिसके कारण ध्रुवीय बर्फ पिघलेगी तथा तटवर्ती क्षेत्र डूब जाएंगे । चावल की खेती कम हो जाएगी । थल क्षेत्रों में कमी के कारण जनसंख्या का दबाव और अधिक बढ़ जाएगा और खाद्यान्न की कमी होगी। भूमिगत कोयले के जलने तथा सीमेंट उत्पादन हेतु चूना पत्थर के गत १५० वर्षोंा के उपयोग के कारण वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा १५० अरब टन बढ़ी है । एक हज़ार मेगावॉट वाला बिजली केंद्र प्रति मिनट १६ टन कार्बन डाईऑक्साइड गैस उगलता है । ऊर्जा केन्द्रों में कोयले के दहन से वायुमंडल मं १० पाउंड प्रति सेकंड की दर से सल्फर डाईऑक्साइड छोड़ी जाती हैं । कोयले के ज़हरीले धुएं से अनगिनत लोग सांस की बीमारियों से पीड़ित हैं, मौत के शिकार हो रहे हैं । कोयले के महीन कण सांस नली में जम जाते हैं । परमाणु बिजली घरों से निकले अवशिष्ट रेडियोधर्मी पदार्थ के कारण गंभीर स्थिति उत्पन्न हो रही है । भूमिगत अथवा वायुमंडलीय परमाणु विस्फोट से उपजी ऊष्मा वायुमंडल में नाइट्रोजन ऑक्साइड का निर्माण करती है, जिससे पृथ्वी के वातावरण को सुरक्षित रखने वाली ओज़ोन गैस की परत नष्ट होती जा रही है । वायुयान भी ओज़ोन परत को नष्ट करने में सहायक हो रहे हैं । ओज़ोन परत के पतन का मतलब है तापक्रम में वृद्धि तथा जीव समूहों पर कैंसर का प्रकोप तथा फसलों का विनाश । अवशिष्ट पदार्थोंा को पानी में बेखटके छोड़ने से जल स्त्रोत प्रदूषित हो रहे हैं । जलीय जीव नष्ट हो रहे हैं । समुद्र तटों पर लगे तेल शोधक कारखानों के अवशिष्अ समुद्र में छोड़े जाने से एक तैलीय परत जल सतह पर फैली जाती है जिसके कारण सामान्य वाष्पीकरण न होने से वर्षा में कमी एवं सूखे की स्थिति पैदा होती है । वन सौर ऊर्जा को संग्रह करने के सबसे बड़े साधन हैं । पहाड़ी क्षेत्रों में आधुनिक तकनीक के द्वारा शीध्र उगने वाले वृक्षों को लगाकर प्रति हैक्टर सर्वाधिक आय प्राप्त् की जा सकती है, जिससे न केवल लोगों को रोज़गार मिलेगा बल्कि बढ़ती हुई जनसंख्या की आवश्यकता की पूर्ति भी होगी । अत: आवश्यक है कि प्रत्येक आबादी के पास नए-नए उपवन, बाग-बगीचे लगाए जाएं जो शुद्ध वायु प्रदान कर सकें । औद्योगिक प्रतिष्ठानों एवं मुख्य मार्गोंा के निकट तो वृक्ष लगाना बहुत आवश्यक है । भारत में स्तनपायी जीवों की पांच सौ, चिड़ियों की ३ हज़ार एवं कीट आदि की ३० हज़ार प्रजातियां पाई जाती हैं । तरह-तरह की मछलियां, सरिसृप तथा उभयचर भी पाए जाते हैं । पर्याप्त् वन क्षेत्र न रहने से या वायु एवं जल प्रदूषण के कारण ये मृत्यु के शिकार हो रहे हैं । चिड़िया नहीं होगी तो विभिन्न कीड़ों से फसलों की रक्षा कौन करेगा ? सर्प चूहों को खाकर बचाता है । मांसाहारी जीव शाकाहारी जीवों को खाकर कृषि की रक्षा करते हैं । विकास के नाम पर हो रहे हृास के कारण भावी पीढ़ी के लिए छोड़ रहे हैं ज़हरीली वायु, दूषित जल, बंजर ज़मीन, नंगे पहाड़, मौसम में घातक परिवर्तन, तेजाबी वर्षा एव बिगड़ता पर्यावरण ।**
मध्यप्रदेश में वन आवरण १६८७ वर्ग किमी बढ़ा
मध्यप्रदेश के वन आवरण क्षेत्र में पिछले चार साल में १६८७ वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है । प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक ए.के. दुबे ने भारतीय वन सर्वेक्षण संस्थान देहरादून के वर्ष २००९ के प्रतिवेदन के हवाले से यह जानकारी देते हुए बताया कि वर्ष २००५ में जारी प्रतिवेदन में मध्यप्रदेश का वनावरण ७६०१३ वर्ग कि.मी. बताया गया था जो बढ़कर ७७,७०० वर्ग कि.मी. हो गया है । प्रदेश में वनों के बाहर वृक्ष आवरण क्षेत्र में भी वर्ष २००५ की तुलना में वर्ष २००९ तक ६०४ वर्ग कि.मी. की बढ़ोतरी हुई है । प्रतिवेदन में पूरे देश के लिए यह आंकड़ा ११०३ वर्ग कि.मी. बताया गया है । इसमें अकेले मध्यप्रदेश की ५० प्रतिशत से ज्यादा भागीदारी रही है । श्री दुबे ने बताया कि इसी प्रकार देश में झाड़ी वन क्षेत्र में ३०५० वर्ग कि.मी. की शुद्ध वृद्धि प्रतिवेदन में बताई गई है । इसमें भी प्रतिवेदन अवधि में मध्यप्रदेश के झाड़ी वन क्षेत्र में ४२२९ वर्ग कि.मी. वृद्धि हुई है । उन्होंने बताया कि झाड़ी वन को वन आवरण अथवा वन के बाहर वृक्ष आवरण क्षेत्र में शामिल नहीं किया गया है । प्रदेश में वन आवरण वृद्धि का कारण वन विभाग द्वारा किए गए वन संवर्द्धन और वन सुरक्षा के उपायों के साथ ही विभाग तथा वन विकास निगम द्वारा किया गया वृक्षा रोपण शामिल है ।

सोमवार, 20 अगस्त 2007

८ हमारा देश

दिल्ली : यमुना तट पर उभरते पर्यावरणीय नासूर
मनोज कुमार मिश्र
दिल्ली की जान ! यमुना, इस कदर मैली हो चुकी है कि राज्य सरकार १९९३ से ही 'यमुना एक्शन प्लान' जैसी कई योजनाआे द्वारा सफाई अभियान चल रहा है, जिस पर करोड़ों-अरबों रूपए लगाए जा चुके हैं । उच्च् न्यायालय और सर्वोच्च् न्यायालय एक दशक से भी ज्यादा समय से राज्यों को उनकी लापरवाही पर चेतावनी दे रहे हैं । यहां तक कि माननीय उच्च् न्यायालय, दिल्ली ने तो नदी के ३०० मीटर के दायरे से प्रदूषण फैलाने वाले कारकों और कब्जों को हटाने के लिए 'ऊषा मेहरा समिति' नियुक्त कर दी, नतीजा एक साल के अन्दर ही २००६ में नदी तट पर बनी झुग्गियों को जोर-जबरदस्ती से हटा दिया गया । राष्ट्रीय संसद ने भी इस कार्यवाही पर अफसोस जाहिर करते हुए राज्य प्रशासन को तुरन्त आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिये । लेकिन शायद किसी को भी बेघर-उजड़े लोगों की परवाह ही नहीं थी । किसी भी नदी को जिंदा रखने के लिए 'इको सिस्टम' की सुरक्षा उतनी ही जरूरी है जितनी उसमें बहते पानी की गुणवत्ता । हालांकि नदी से मैला साफ करने के लिए महंगी-महंगी तकनीकें मौजूद हैं लेकिन अगर वजीराबाद बैराज से ओखला बैराज तक २२ किलोमीटर के दायरे में फैली यमुना के 'रिवर बैड' या 'नदियों का तट' पर किसी भी तरह का कोई ढांचा खड़ा किया गया तो आने वाले खतरों से बचने का कोई रास्ता नहीं होगा। १९६२ और २००१ के मास्टर प्लान में 'जोन-ओ' नाम से अंकित क्षेत्र को पर्यावरणीय कारणों और रिवर बैड पर ग्राउण्ड वाटर को सालाना रिचार्ज करने की क्षमता के कारण ही अलंघनीय घोषित किया गया था । दिल्ली में पानी की बढ़ती हुई जरूरत का अधिकतम् हिस्सा 'ग्राउण्ड वाटर' ही पूरा करता रहा है और आज भी कर रहा है । नदियों का लंबा-चौड़ा तट न केवल ग्राउण्ड वाटर रिचार्ज के लिए जरूरी है, बल्कि विध्वंसक बाढ़ के खतरों से बचाने के लिए भी जरूरी है । दिल्ली १९७७, १९७८, १९८८ और १९९५ में बाढ़ की विनाश लीला देखी जा चुकी है । इसके अलावा, जरूरी तथ्य यह है कि भूकम्पीय खतरों से प्रभावित होने वाले क्षेत्रों के ('जोन-४' यहां भूकम्प का सबसे ज्यादा खतरा है) राष्ट्रीय नक्शे में दिल्ली को भी अंकित किया गया है। क्योंकि यमुना का तट भी जोन-४ का हिस्सा है, इस दृष्टि से सर्वाधिक संवेदनशील क्षेत्र है और इसी वजह से, विशेषज्ञों का भी मनाना है कि इस क्षेत्र में कुछ भी निर्माण कार्य करना संकट को दावत देना है । यदि इस संबंध में पहले से कोई सावधानी न रखी गई तो विशेषज्ञों की राय मे निकट भविष्य में जल्दी ही भूकम्प के कारण भीषण विनाश होगा, क्योंकि भूकम्प नहीं मारते बल्कि इमारतें मारती हैं, संवेदनशील क्षेत्र में बनी इमारतें नरसंहार करती हैं । इसलिए नदियों के तट पर कुछ भी बनाना, मौत को दावत देना है । दिल्ली में यमुना तट को पहले ही ३० स्थानों से लगभग खत्म कर दिया गया है । अनधिकृत रिहायशी कॉलोनियां, पॉवरप्लांट, १९८२ में एशियाड के लिए बनाया गया स्पोर्टिंग कॉम्प्लेक्स, दिल्ली सचिवालय (जो मूल रूप में १९८२ में खिलाड़ियों का छात्रावास था) जैसे प्रशासकीय इमारतें और दिल्ली स्टॉक एस्जचेंज पर्यावरणीय नासूर इन स्थानों पर उभर आए हैं । इनमें से कई तो राज्य द्वारा बनवाए गए हैं जो नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है और पूर्वी तट, शास्त्री पार्क, मेट्रो डिपो और यमुना मैट्रो डिपो के लिए कब्जा जमाया जा रहा है । इतना ही नहंी इस क्षैत्र को व्यापारिक रूप से प्रयोग करने के लिए डीएनडी फ्लाईवे का इस्तेमाल किया जा रहा है । प्रमाण के तौर पर यहां आयोजित किया जा चुका टाईम्स ग्लोबल विलेज में तटों का व्यावसायीकरण साफ दिखाई देता है । पूर्व के अनेक प्रशासनिक और गैर- प्रशासनिक विरोंधों के बावजूद भी राजनीतिक संरक्षण में , यमुना तट के १०० एकड़ के दायरे में राष्ट्रीय सम्मान की आड़ लेकर डीडीए (दिल्ली डिवलपमेंट ऑथोरिटी) द्वारा यमुना तट पर कब्जा किया जा रहा है, वह भी मात्र १० दिन के लिए । अक्टूबर २०१० में होने वाले अन्तर्राष्ट्रीय कॉमनवेल्थ खेलों के लिए । दिल्ली के लोगों को यह कह कर बहकाया जा रहा है कि २०१० के कॉनवेल्थ खेल एक राष्ट्रीय गौरव की घटना है। जबकि सच्चई तो बिल्कुल उलट है - इसमें सरकार के खेल मंत्रालय का कोई योगदान नही है । कॉमनवेल्थ खेलों का प्रबन्धन और प्रशासन गैर- सरकारी निकाय द्वारा किया जाता है, इसके लिए लंदन स्थित कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन और दिल्ली स्थित इण्डियन ओलम्पिक एसोसिएशन है । भारत सरकार को नहीं बल्कि आईओए को सीजी (कॉमनवेल्थ गेम्स) २०१० के आयोजन की जिम्मेदारी मिली है जबकि भारत सरकार ने डीडीए के माध्यम से और दिल्ली सरकार ने, आईओए को रदरकिनार करते हुए, खुद ही खेलों के प्रबंधन का जिम्मा ओढ़ लिया है । नदियों के तट के विकास के नाम पर तो कभी देश की इज्जत का सवाल बनाकर अन्तराष्ट्रीय खेलों के लिए अपने तुच्छ स्वार्थोंा की पूर्ति के लिए पूरे शहर को खतरे की बाढ़ में झोंका जा रहा है । खेल गांव के लिए नदी तट पर स्थाई रूप से रिहायशी और व्यावसायिक इमारतें बनाए जाने की योजनाएं चल रही है, इन इमारतों के लिए यमुना की १०० एकड़ जमीन कब्जाई जाएगी । शायद ही आम आदमी इस बात को जानता है कि ये कॉलोनियां प्राइवेट बिल्डर्स द्वारा बनाई जाएंगी और १० दिन के खेलों का समापन होते ही, उसे बेच दी जाएंगी । बिल्डर-डेवलपर्स की यमुना तट को कब्जाने की नीयत का इस तथ्य से खुलासा होता है कि खेल गांव बनाने की योजना बनाते समय डीडीए ने इस बात पर विचार तक नहीं किया कि क्या यदि कसी अन्य स्थान पर बनाया जा सकता है ` समय का अभाव और देश की इज्जत के नाम पर डीडीए ने पर्यावरण और वन मंत्रालय पर दबाव डालकर आवश्यक पर्यावरणीय स्वीकृति भी प्राप्त् कर ली, जबकि पर्यावरण और वन मंत्रालय ने केवल अस्थायी निर्माण के लिए ही स्वीकृति दी थी । तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति के लिए, सुरक्षित जीवन के अधिकार, यहां तक कि पीने के पानी को छीना जाता हुए देखकर, देश का आम आदमी कब तक चुप रह सकता है ? बिल्डर-डेवलपर्स के लिए इससे ज्यादा शर्म की बात और क्या हो सकती है कि केन्द्रीय खेल मंत्री अकेले ही इस सारे षड़यंत्र का विरोध कर रहे हैं क्योंकि अन्तर्राष्ट्रीय खेलों के लिये यमुना तट पर होने वाले निर्माण की कीमत, देश की जनता को चुकानी होगी ।

मंगलवार, 26 जून 2007

७ हमारा देश

७ हमारा देश

इंदिरा गाँधी नहर से क्या सबक ले ?
अशोक माथुर
इंदिरा गांधी नहर परियोजना देश की बडी सिंचाई परियोजना में से एक हैं। चीन के तिब्बत प्रांत की मानसरोवर झील का पानी लेकर यह नहर थार के रेगिस्तान की प्यास बुझाती है ।
हिमालय का यह पानी राजस्थान के रेगिस्तान के लिए अमूल्य अमृत है । गंगा, भाखडा तथा इंदिरा गांधी नहर ने पूरे देश में आशाआें के सपने जगाए थे । सतजल नदी के पानी पर मनुष्य द्वारा निर्मित यह नहर गंगानगर, हनुमानगढ, बीकानेर, चुरू, जैसलमेर क्षेत्र में सिंचाई तथ बीकानेर, जोधपुर जैस रेगिस्तानी बडे शहरों के लिए पेयजल का स्त्रोत बनी है । नहर का निर्माण तथा तकनीकी मामलों पर प्राय: अनेक प्रश्न उठते रहे हैं । लेकिन यहां हम तकनीकी और प्रशसनियक दोषों को नहीं गिना रहे है क्योंकि उन अपराधों का दण्ड तो हमें भोगना पड रहा है । सन् १९९२ में कई तकनीकी विशेषज्ञ, कृषि वैज्ञानिकों, समाजशास्त्री तथा किसान संगठनों के साथ लेकन ने तलवाडा झील से जैसलमेर तक नहर यात्रा की थी । यह यात्रा पर्यटन के दृष्टिकोण से नहीं थी । यात्रा के दौरान पाया कि तकनीकी दोषों ने हजारों बीघा जमीन को वाटर लोगिंग (सेम) के कारण बंजर व बेकार कर दिया।
नहरी क्षेत्रों में जो विकास का मॉडल अपनाया गया उसने धन व सम्पत्ति की अंधी दौड आरंभ कर दी । नहर के साथ-साथ शराब का दरिया भी बह चला सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों पर ध्यान देने की कोई जरूरत नहीं समझी गई । शिक्षा के नाम पर हिंदी अंग्रेजी में शब्द ज्ञान तो बहुत हुआ । लेकिन सामाजिक गठबंधन व लोक चेतना लुप्त् हो गई । सरकारी आंदोलन कागजों में दौडा लेकिन संयुक्त परिवार प्रथा चकनाचूर हो गई । व्यवहार रूप में ग्राम समुदाय पारस्परिक सहयोग व सरकार को भूल गए । पैसे की अंधी दौड व वैभव प्रदर्शन ने पूरे इलाके में ट्रेक्टर, जीप, कार, मोटर साईकलों की भीड बढा दी ।
इस सारी तरक्की के पीछे झांकने की कोशिश राजनीतिज्ञों की कभी नहीं थी । वोट के गोरखध्ंाधे में नहर व नहरी पानी एक सुनहरा चैक है । लेकिन एक बडी सच्चई जो इस प्रकार के विकास के मॉडल के रूप में उभर कर आई वो यह थी कि पूरे इलाके में किसान कर्जदार बन गया । बैंको, निजी ऋण-संस्थाआें और आडतियाँ का बंधुआ मजदूर बना किसान शराब के नशे में मुस्कुराता हुआ दिखता तो है लेकिन अंदर से वो खोखला हो गया है । जिस खेती व किसान के नाम पर पानी रेगिस्तान में लाया गया, वे आज दुखी व परेशान हैं । पूरे क्षेत्र में पशु पालन समाप्त् हो गया । साथ ही पशु पालन व कृषि का संतुलन भी बिगड गया है । इस संतुलन के बिगडने का सीधा असर पर्यावरणीय संकट का पैदा होना है। जो चारागाह थ्ेा, वे कृषि भूमि के रूप में सरकार द्वारा बेच दिए गए ।
ओरण, जोहड, ताल-तलैया व बावडिया तक बिक गयीं । यह एक जबरदस्त सच्चई है कि सरकार ने नहरी सिंचाई का प्रलोभन देकर रेगिस्तान के अकृषि योग्य भूमि को बेचकर अरबों रूपया कमाया । नहर से सबसे ज्यादा लाभ विश्व बैंक जैसी विदेशी संस्थाआें को हुआ। ऋण और ब्याज उनकी कमाई का अच्छा जरिया है । पानी के स्त्रोत कैसे हैं ? हिमालय में पानी कितना है ? क्या भविष्य में भी चीन मानसरोवर का पानी सतलज और इंदिरा गांधी नहर तक पहुंचने देगा ? इसका कोई जवाब अभी हमारे पास नहीं हैं ।
भारत सरकार और चीन के बीच में आज की त्तारीख तक इस पानी को लेकर कोई समझौता नहीं है । जबकि चीन ने सतलज तथा ब्रह्मपुत्र का पानी नील नदी और गोबी के रेगिस्तान में ले जाने की पूरी तैयारी कर ली है । यदि ऐसा होता है तो पूरा इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र एक बार फिर उजड जायेगा । विकास का यह मॉडल आम आवाम के हक में नहीं जा रहा । नहर के निर्माण और रखरखाव के कारोबार से चंद नौकरशाह व ठेकेदार जरूर मालामाल बन रहे हैं । भूमि के असमान वितरण व सीलिग एक्ट की अवहेलना के परिणाम स्वरूप छोटा, मंझला व सीमांत किसान अपनी जमीन से उखड गया है । पोंग बांध के विस्थापित भी अपनी जमीन पर खेती नहीं कर पाये । दलितों की जमीन भी दलित जातियों में उभरे नव धनिक व नव सामंतों के कब्जे में चली गई है । कमोवेश पाकिस्तान से आने वाले विस्थापितों के भी यही हालात हैं । अनेक क्षेत्रों में जायज-नाजायज तरीकों से जमीन पर कब्जा जमाए भू-पतियों का वर्चस्व अब स्पष्ट दिखाई दे रहा है । जो पूरे क्षेत्र में वर्गीय विभाजन की रेखा बन गया है । खनिज पदार्थो का क्षरण भी इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र की एक समस्या है । जिप्सम के विशाल मैदान के ऊपर पूरे क्षेत्र में जो सिंचाई क्षेत्र बिछाया गया है वो सेम की समस्या का मुख्य कारण है । इससे जिप्सम भी खराब हुआ और खेत भी खराब हुए ।
इस बर्बादी के लिए करोडों रूपये सरकारी तंत्र ने खर्च किए लेकिन आज इसकी जिम्मेदारी कोई नहीं ले रहा । इंदिरा गांधी नहर के निर्माण, सिंचाई प्रबंधन, कृषि चक्र और बाजार तंत्र के जो परिणाम हमारे सामने आए है उनकी वकालत तो नहीं की जा सकती परंतु उनसे सबक लेकर हमें आगे बढना होगा । अब राज्य में यमुना और गंगा का पानी हडपने की तैयारी चल रही है । झुंझूनू, चुरू, नागौर, बीकानेर, जैसलमेर, जोधपुर व बाडमेर इस नई सिंचाई परियोजना के क्षेत्र में हैं । जबकि नर्मदा नदी का पानी भी जालौर, सिरोही व बाडमेर में आने वाला है । इंदिरा गांधी नहर हमारे लिए एक अच्छा सबक है । यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि नहरी परियोजनाआें को उनकी क्षमता व डिजाईन के मुताबिक नदियों व जल स्त्रोतों से पानी मिलें ।
अगर पानी की आवक नहीं है तो राजनैतिक वाही-वाही के लिए और भू-राजस्व और भूमि की कीमत वसूलने के लिए अनावश्यक सिंचाई क्षेत्र घोषित किया जाए । भूमि की संरचना को भली प्रकार जांचा जाए कठोर चट्टानों और जिप्सम क्षेत्रों को सिंचित क्षेत्रों में बदलने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए । पशु पालन व कृषि में बराबर का संतुलन होना चाहिए । चारागाह तथा पुराने जोहड, ताल-तलैया व झीलों को यथास्वरूप सुरक्षित कर उन्हें नहरी पानी से भरा जाना चाहिए ताकि जल का पुर्नभरण होता रहे। विशेष वन क्षेत्र ग्राम समुदाय के सहयोग से विकसित किये जाने चाहिए । कृषि भूमि का वितरण, सीलिंग प्रबंधन, कृषि विशेषज्ञों व किसानों के वास्तविक प्रतिनिधियों द्वारा किया जाना चाहिए ।
पुराने अनुभव के आधार पर उपरोक्त सुझाव हो सकते है । जो नए खतरे पैदा हो गए हैं उन पर भी चर्चा बहुत आवश्यक है । विश्व बैंक ने केन्द्र व राज्यों की सरकारों को पानी के कारोबार से मुनाफा कमाने की सलाह दी हैं । विश्व बैंक तथा एशियाई विकास बैंक की मानसिकता सूदखोर महाजन की है । प्राकृतिक संसाधन किसी राज्य, सरकार, व्यक्ति या कंपनी की बपौती नही हो सकते। पानी हमारे जिंदा रहने की पहली शर्त है और अगर पानी पर पहरे बैठें अथवा नदियों व नहरों पर कंपनी व सरकारों का कब्जा होकर पानी बेचने का गोरखधंधा आरंभ हो गया तो इस धरती पर कोहराम मच जाएगा । इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र में एशियाई विकास बैंक के दबाव से पेयजल योजनाआें का निजीकरण हो रहा हैं ।
चुरू समेत अनेक स्थानों पर पेयजल योजनाआें पर सीधी दखल प्रारंभ भी हो गई है जिससे पानी का निजीकरण होगा । यह दुर्भाग्य की बात है कि जनता से वोट लेने वाली तमाम राजनैतिक पार्टियां इस अहम मुद्दे पर पूरी तरह खामोश हैं । जाहिर है पानी के निजीकरण व व्यापारीकरण के कायदे बनाने वाली विधानसभा के सदस्य अगर इस मुद्दे पर खामोश रहते हैं तो वे अपने मतदाता के साथ गद्दारी करते हैं। पानी बेचने के कारोबार के साथ एक ऐसा नेटवर्क तैयार है जो शहरों में पेयजल योजनाआें के नाम पर तथा उद्योग व व्यवसाय के नाम पर ज्यादा पानी व ज्यादा मुनाफा और आसान वसूली के इंतजार में हैं । इसलिए राज्य की समस्त सिंचाई परियोजनाआें का लक्ष्य अब शहर व उद्योग हो गए हैं ।
ऐसी रणनीति कृषि व सिंचाई के लिए पानी की मात्र को कम कर देगी और धडसाना, सोहल व राजसमंद जैसे अनेक संघर्षो को आमंत्रण देगी । आदमी से आदमी को लडाया जा रहा है । इंदिरा गाधी नहर क्षेत्र में प्रथम चरण व द्वितीय चरण के किसानों में टकराहट है । पानी का गोरखधंधा हमें नहर के मूल उद्देश्य से भटका देगा । समय रहते भ्रष्टाचार के इस अंधकूप से नहरी तंत्र को बाहर आना पडेगा । इंदिरा गांधी नहर से सबक लेकर हमें राजस्थान एवं पूरे देश के लिए सिंचाई तंत्र को सुदृढ करना चाहिए ।
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