मंगलवार, 6 अप्रैल 2010
५ वातावरण
गुरुवार, 9 जुलाई 2009
११ वातावरण
शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009
७ वातावरण
गुरुवार, 27 नवंबर 2008
८ वातावरण
कोयले से होने वाले उत्सर्जन और कोयले के अधिकाधिक इस्तेमाल स ेबचाव का एक रास्ता तो यह हो सकता है कि हम रीन्यूवेबल (नवीकरणीय) तकनीकों पर अपनी निर्भरता बढ़ाएँ । हमारे पास अपने ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव की क्षमता भी है क्योंकि अभी हम निर्माण क्षेत्र में निवेश कर ही रहे हैं । यानी हमारे पास विकल्प मौजूद हैं। नि:संदेह, उत्सर्जन में कमी लाने का एक बड़ा विकल्प बायोमास है । जलवायु में परिवर्तन अपरिहार्य है । लेकिन इधर जो परिवर्तन देखने में आ रहे हैं उनसे समूचे परिस्थितिकी तंत्र पर कहर टूट पड़ा है । यही नहीं इस परिवर्तन ने हमारी जीवन शैली, समाज और समुदायों के अस्तित्व को ही चुनौती दे डाली है । इस के मद्देनजर इस आधी सदी तक वैश्विक तापमान में ४ से ५ डिग्री तक की बढ़ोतरी से जुड़ी चेतावनी खतरे की घंटी है । इस मायने में कि इस तरह की चेतावनियाँ पहले भी आती रही है लेकिन उन्हें ध्यान में रखकर कहीं भी संजीदगी से कोई काम नहीं हुआ । बातें बहुत हुइंर्, तापमान को कम करने के उपायों पर चर्चाएँ हुई, लेकिन उन पर ईमानदारी से अमल शुरू नहीं हो सका। हाल ही में लंदन से आई चेतावनी हमें सचेत करती है कि तापमान को स्थिर बनाए रखने या आशंका के मुताबिक उसमें बढ़ोतरी को एक सीमा तक रोके रखने की दिशा में हमारे प्रयास अभी जमीनी स्तर पर शुरू ही नहीं हो सके हैं। आईपीसीसी (इंटर-गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाईमेट चेंज) ने अपनी एक रिपोर्ट में पिछले साल ही आगाह किया था कि जलवायु में गर्मी पर अब कोई संदेह नहीं रह गया है । विश्व की औसत हवा, महासागरों के बढ़ते तापमान, बड़े पैमाने पर बर्फ पिघलने और समुद्र - स्तर में बढ़ोतरी से अब यह साफ हो गया है कि धरती का तापमान बढ़ रहा है । वर्ष २००३ में भारत में मानसून से पहले चली गर्म हवाआें ने १४०० जानें ले ली । इसी साल अमेरिका पर ५६२ चक्रवातों का कहर टूटा जबकि इससे पहले १९९२ में वहाँ करीब ४०० चक्रवात आए थे । वर्ष २००७ में उत्तर ध्रुवीय सागर में सबसे ज्यादा बर्फ पिघलना भी इस बात की गवाही देता है कि तापमान में बढ़ोतरी हो रही है । एशिया में ग्लेशियरों के पिघलने से भारत, पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश में पानीकी उपलब्धता पर गहरा असर पड़ा है । मसूलाधार बरसात और तूफानों से पाकिस्तान में भारी तबाही हुई । जलवायु के इस कदर परिवर्तन से यह बात तो सिद्ध हो चुकी है कि ये बदलाव मानवीय गतिविधियों का ही नतीजा है । अगर तापमान में यह वृद्धि जारी रही तो वर्ष २१०० तक वैश्विक तापमान में ५ से ७ डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी हो सकती है । उस हालत में तूफानों की भयावहता बढ़ जाएगी, बर्फ तेजी से पिघलने लगेगी, गर्म हवाएँ अक्सर चलेंगी, समुद्र का जलस्तर भी तेजी से बढ़ेगा, विश्व की २५० मिलियन आबादी के लिए पानी मिलना दूभर हो जाएगा और ३० प्रतिशत प्रजातियों के विनाश का खतरा पैदा हो जाएगा । अगर कार्बन डाईआक्साइड कंसंट्रेशन की रेंज ३५०-४०० पीपीएम तक सीमित किया जा सका तो विश्व के औसत तापमान में बढ़त को २ से २.४ डिग्री सेल्सियस तक रोके रखा जा सकता है। हालाकि इसके बाद भी विश्व डेंजर जोन में तो पहुँच ही जाएगा । तापमान के लगातार बढ़ते साक्ष्यों और इस सचाई से विवादों की परतें हट जाने के बावजूद विश्व के अमीर देश जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं । ये देश जितनी मात्रा में ग्रीन हाउस उत्सर्जन कर रहे हैं उससे उभरते संसार के लिए कोई जगह ही नहीं बची है । यह उत्सर्जन लगातार बढ़ता चला जा रहा है । ईधन जलने से अमेरिका में मोटे तौर पर २० टन कार्बन डायऑक्साइड का उत्सर्जन होता है । प्रति व्यक्ति तुलना करने पर भारत में यह आँकड़ा १.१ और चीन में ४ टन ही बैठता है। इसमें संदेह नहीं है कि विकासशील मुल्क जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से जूझ रहे हैं। दूसरी तरफ अमेरिका और आस्ट्रेलिया जैसे अमीर देश उत्सर्जन के लिए भारत और चीन को ही ज्यादा जिम्मेदार मान रहे हैं । इनका कहना है कि जब तक भारत और चीन क्योटो प्रोटोकॉल पर दस्तखत नहीं करेंगे वे भी नहीं करने वाले । क्योटो प्रोटोकॉल को कमोबेश भुला ही दिया गया है । बहरहाल, जहाँ तक जलवायु परिवर्तन का ताल्लुक है विश्व के पास समय और विकल्पों की लगातार कमी हो रही है । तापमान को २डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने से रोकना वाकई एक बड़ी चुनौति होगी । इसके लिए उत्सर्जन में ५० से ८५ प्रतिशत तक की कमी लानी होगी । और वह भी २०५० तक। इसके लिए इंर्धन के इस्तेमाल की नीतियाँ बदलनी होंगी । इन चिंताजनक चुनौतियों से नरम विकल्पों के जरिए नहीं निपटा जा सकता। जहाँ तक ऊर्जा की बात है हमारे पास समय तो कम बचा ही है बजट भी पर्याप्त् नहीं रह गया है । इंटरनेशनल इनर्जी एजेंसी ने अपनी २००७ की एक रिपोर्ट में कहा है कि जिस दर से अभी उत्सर्जन हो रहा है उसमें भारी कटौती करनी पड़ेगी । लेकिन विकासशील विश्व के लिए इस चेतावनी के मायने क्या हैं ? खासकर तब जबकि ये देश ऊर्जा का इस्तेमाल अपनी जरूरत से कहीं कम कर रहे हैं । भारत में ऊर्जा क्षेत्र जटिल है । थार्मल पॉवर हमारे यहाँ उर्त्सजन के लिए मूल रूप से जिम्मेदार है । हालाँकि हमारे यहाँ बिजली पैदा करने के तमाम विकल्पों की तलाश की जा रही है लेकिन इसके लिए कोयले की खपत बढ़ना तय है । कोयले से होने वाले उत्सर्जन और कोयले के अधिकाधिक इस्तेमाल से बचाव का एक रास्ता तो यह हो सकता है कि हम रीन्यूवेबल (नवीकरणीय) तकनीकों पर बदलाव की क्षमता भी है क्योंकि अभी हम निर्माण क्षेत्र में निवेश कर ही रहे हैं । यानी हमारे पास विकल्प मौजूद हैं । निसंदेह, उत्सर्जन में कमी लाने काएक बड़ा विकल्प बायोमास है । लेकिन इसके लिए हरियाली बढ़ाने वाले रास्तों पर ईमानदारी से चलना पड़ेगा । ***
रतनजोत का तेल पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए घातक रतनजोत के उत्पादन व उपयोग को लेकर उठने वाले सवाल भी कम नहीं है । आस्ट्रेलिया समेत कई देशों ने इस पौधे को अवंाछित घोषित कर रखा है । शोधकर्ता बताते हैं कि थाईलैंड और अफ्रीकी देशों में पहले ही इस पौधे को बायोडीजल के बतौर इस्तेमाल करने का काम शुरू किया गया था लेकिन विभिन्न शोधों से पता चला कि रतनजोत का तेल पर्यावरण के लिए तो घातक है ही, मानव स्वास्थ्य के लिए भी यह लगभग जानलेवा हे । ऐसे निष्कर्षो के बाद इन देशोंमें रतनजोत के बीज से बायोडिजल की योजना ने दम तोड़ दिया । छ.ग. के युवा औषधि वैज्ञानिक व पर्यावरणविद पंकज अवधिया का कहना है कि बायोडिजल बनाने के लिए जिन सात पौधों का इस्तेमाल दुनियाभर में हो रहा है । उसमें रतनजोत अंतिम विकल्प माना जाता है । इसके पीछे रतनजोत के विषैले होने को मुख्य कारण बताते हुए वे कहते है, रतनजोत बेहद नुकसानदेह है । इसमें पाये जाने वाले करसिन की मारक क्षमता इस हद तक है कि इसका इस्तेमाल जैविक हथियार बनाने में किया जा सकता है । इसके तेल में १२ डी आक्सी, १६ हाईड्राक्सी और फोरबेल जैसे रसायन पाए जाते हैं, जिन्हें कैंसर व दूसरे त्वचा रोगों के लिए जिम्मेदार माना जाता है इसके अलावा रतनजोत से बनने वाला बायोडीजल फेंफड़ो को भी नुकसान पहुंचाता है ।
बुधवार, 2 जुलाई 2008
५ वातावरण
शनिवार, 12 जनवरी 2008
१० वातावरण
मंगलवार, 26 जून 2007
४ वातावरण
गुरुवार, 31 मई 2007
गंदगी से फैलता जहर
४ वातावरण
गंदगी से फैलता जहर
कुशलपाल सिंह यादव
नागरीय निकाय अपना इलाका साफ रखने के लिए अभी तक तो अपने आस-पड़ौस को ही प्रदूषित कर रहे थे। अब तो वे दूसरे राज्यों में जंगलों इत्यादि में कचरा फेंककर पर्यावरण को जबरदस्त नुकसान पहुंचा रहे हैं। वहीं इस कचरे से बिजली उत्पादन करने वाले संयंत्र भी बड़े स्तर पर प्रदूषण फैला रहे हैं।
दिसम्बर २००६ में कोची नगर निगम ने अपशिष्ट निपटान का एक अद्भुत तरीका इजाद किया। इसके अंतर्गत उन्होंने कचरे से भरे ट्रकों को न केवल नजदीकी जिलों के गांवों में, बल्कि नजदीक के राज्यों में भी खाली करने को भेज दिया। इस कचरे को ले जाने हेतु एक ठेकेदार से १३६५ रुपये प्रति टन का भाव तय हुआ था। विचारणीय तथ्य यह है कि नगर निगम ने ठेकेदार से यह पूछने का कष्ट भी नहीं उठाया कि वह यह कचरा कहां फेंकेगा और यह कि क्या उसमें उन गांवों से अनापत्ति प्रमाण-पत्र ले लिया है जहां पर कि यह कचरा फंेका जाना है।
कुछ ही दिन पश्चात् कचरे से लगे १९ ट्रकों का काफिला पड़ौसी कर्नाटक राज्य के बंदिपुर राष्ट्रीय पार्क के मुलाहल्ला वन नाके पर पहँुचा। ये ट्रक केरल के पाँच जिलों को पार करके उस नाके से करीब २० किमी. दूर गुंडुल्पेट नामक छोटे से गांव में कचरा फेंकने जा रहे थे। वन रक्षक ने इस हेतु आवश्यक कागजों की मांग करने पर ट्रक ड्राईवरों ने कोची नगर निगम और ठेकेदारों के बीच हुआ अनुबंध उसे दिखाया। ड्राईवरों को उस रात नाके पर ही रोक लिया गया। अगले दिन मामला निपटा दिया गया और उस कचरे को वहीं पास की किसी निजी भूमि पर डाल दिया गया।
स्थानीय निवासियों ने नगर निगम को लज्जित करते हुए इसका भरपूर नैतिक विरोध किया। केरल और तमिलनाडू के सीमावर्ती क्षेत्रों जैसे कम्बामेट्टू आदि जगह तो ट्रक ड्राईवरों से झूमा-झटकी भी की गई। इस कारण ये वाहन कचरा फेंकने का स्थान ढूंढने के लिये इधर-उधर मारे-मारे फिरते रहे। इसी क्रम में ४ जनवरी २००७ को आठ ट्रकों द्वारा पालक्कड़ जिले के नेल्लीप्पेली के नजदीक स्थित वीरान्दोट्टा में कचरा फंेंकने को लेकर पुलिस में रिपोर्ट करने गये व्यक्तियों ने इतना उग्र प्रदर्शन किया कि पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा। इस सबके चलते नगर निगम ने एक अन्य ठेकेदार को यह ठेका दे दिया जिसके बारे में कहा जा रहा है कि उसके पास इस अपशिष्ट के निपटान हेतु गुड्डालोटे में जमीन व आवश्यक संसाधन उपलब्ध है।
कोची नगर निगम द्वारा हड़बड़ी में लिये जा रहे कदमों पर विचार करना आवश्यक है। ७ लाख जनसंख्या के इस शहर में अपशिष्ट निपटान का कोई ठीक-ठाक प्रबंध नहीं था। पूर्व में जो भूमि इस हेतु ली गई थी वह उस पानी के स्त्रोत के मुहाने पर भी जिससे कि पानी नदी में पहँुचता है। इसके अतिरिक्त चार गांवों के निवासी न केवल पीने के पानी हेतु इस पर निर्भर हैं बल्कि ३०० मछुआरों के परिवारों की जीविका भी इसी पर निर्भर है। इसके विरोध में ग्रामवासियों ने आंदोलन किया और अंतत: वह स्थान बदल गया।
इन सब विवादों के चलते कोची नगर निगम ने कोचीन पोर्ट ट्रस्ट के नजदीक की अपने स्वामित्व की जमीन जो कि वेलिंगटन द्वीप पर स्थित भारतीय नौ सेना के दक्षिणी कमान के पास स्थित थी पर कचरा निपटान का कार्य प्रारंभ किया। नौसेना ने थोड़े समय के लिये कि जब तक निपटान का यथोचित तंत्र खड़ा न हो जाए अनुमति भी दे दी। पर जब इससे समस्या खड़ी होने लग गई तो नौसेना ने नगर निगम से चर्चा की। क्योंकि कचरे की वजह से वहाँ आ रहे पक्षियों के कारण विमान वाही पोत गरुड़ के विमानों को खतरा पैदा होने लगा था।
इसी दौरान केरल उच्च न्यायालय ने नगर निगम को निर्देशित किया कि वह ब्रह्मापुरम में अपशिष्ट निपटान का कार्य करे। साथ ही न्यायालय ने पुलिस को आदेश दिया कि गांववासियों के विरोध के चलते वे अधिकारियों को संरक्षण प्रदान करें।
दूसरी ओर न्यायालय इस बात पर भी विचार कर रहा है कि क्या निगम ने ठोस अपशिष्ट निपटान की विस्तृत योजना उसके सम्मुख प्रस्तुत न कर उसकी अवमानना की है? इसी दौरान निगम ने पुन: अपशिष्ट निपटान के स्थल में परिवर्तन का मन बना लिया है।
अनुमान है कि केरल में प्रतिदिन ३००० टन कचरा पैदा होता है। इसमें से आधे से भी कम इकट्ठा होता है और उसमें से भी बहुत ही थोड़ी मात्रा को पुर्न:चक्रण (रिसायकल) किया जाता है एवं बाकी का या तो पानी के स्थानीय स्त्रोतों या बहुत ही नजदीक के क्षेत्रों में भराव के काम में ले लिया जाता है।
शहरी भारत में अनेक स्थानों पर कचरे से निपटने की तथाकथित कार्यवाहियाँ चल रही हैं। गुजरात के सूरत नगर निगम ने शहर के पश्चिम में करीब १५ किमी. की दूरी पर ३.६ हेक्टेयर खारे पानी वाली भूमि को कचरे से भरने हेतु नियत किया है। तीन वर्ष पूर्व निर्मित यह स्थान अभी भी प्रयोग में नहीं आ रहा है। इसकी वजह यह है कि गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने वहां पर कचरे के भराव की अनुमति नहीं दी है। इस संदर्भ में बोर्ड ने ठोस अपशिष्ट निवारण नियम २००० का कड़ाई से पालन करवाने का निश्चय किया है। जिसके अंतर्गत सिर्फ वो ही कचरा भरा जा सकता है जिसका पुर्न:चक्रण नहीं किया जा सकता हो। चंूकि निगम के पास दोनों तरह के अपशिष्टों को अलग-अलग करने की व्यवस्था नहीं है अतएव वह इसका उपयोग नहीं कर पा रहा है।
जहां सूरत और कोची के माध्यम से कचरे के भराव में आने वाली मुश्किलों पर प्रकाश पड़ा है वहीं इस दौरान कचरे से उर्जा जैसे संयंत्रों के प्रति भी अतिरेक भरा उत्साह भी पैदा हो गया है। इसकी खास वजह है कि इस पर सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी।
केन्द्रीय वैकल्पिक उर्जा मंत्रालय (न्यू एवं रिन्यूवेबल एनर्जी) इस हेतु ब्याज पर २ करोड़ रुपये तक की छूट उपलब्ध करवाता है। इतना ही नहीं इसमें अनेक अन्य सुविधाआें के साथ ही साथ ३० वर्षोंा तक मुफ्त कचरा उपलब्ध कराने का आश्वासन भी शामिल है। यह नीति व्यापारियों को इस तरह प्रोत्साहित करती है, जिससे सरकार और व्यापारियों की बंदरबाट चलती रहती है। इसके बावजूद इस तरह के मात्र चार संयंत्र अभी तक भारत में सामने आए हैंं। ये हैं आंध्रप्रदेश के हैदराबाद व विजयवाड़ा, उत्तरप्रदेश में लखनऊ और दिल्ली। इसमें से दिल्ली का संयंत्र सन् १९९० में प्रारंभ हुआ और मात्र २१ दिन चलकर अभी तक बंद है। लखनऊ के संयंत्र की नींव सन् १९९८ में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने रखी थी, परंतु वह अब तक प्रारंभ नहीं हो पाया है।
वहीं हैदराबाद के नजदीक सेल्को इण्डस्ट्रीज द्वारा सन् १९९० में प्रारंभ हुए संयंत्र में हैदराबाद के कचरे के निपटान के कारण समीपस्थ भू-जल पूरी तरह से दूषित हो गया है। यहां स्थित घरों में लोगों को बोतलबंद पानी खरीदकर पीना पड़ रहा है। परंतु बोतलबंद पानी से खेती संभव तो नहीं हो सकती, अतएव वहां पर खेती पूर्णतया समाप्त हो गई है। इसी के साथ खुले में पड़े कबाड़ जिसमें प्लास्टिक और अन्य जहरीले पदार्थ जैसे बैटरी, टूटे थर्मामीटर, रयासन रखने के डिब्बे आदि के जलने से आसपास का पूरा वातावरण दूषित हो गया है। सन् २००१ में आसपास की तीन छोटी बस्तियों के बाशिंदे १५ दिनों तक संयंत्र के दरवाजे पर धरने पर बैठे रहे। इसी दौरान आंध्रप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पानी की जांच में पाया कि भू-जल पूरी तरह से प्रदूषित हो चुका है। इसमें तेजाब, क्लोराईड, सल्फेट और नाईट्रेट की मात्रा अत्यधिक हो गई है जिससे कि कैंसर जैसी बीमारियां भी हो सकती हैं। जिसके पश्चात् संयंत्र पर रोक लगा दी गई। परंतु संयंत्र के मालिक ताकतवर लोग थे अतएव एक महीने में ही उक्त आदेश वापस ले लिया गया।
इसी दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने इस तरह के संयंत्रों की जांच हेतु कमेटी गठन करने का आदेश दिया। परंतु जो कमेटी गठित हुई उनमें से अधिकांश सदस्यों का इन संयंत्रों के विकास में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहयोग रहा था। अतएव इसके सदस्यों ने अलग-अलग मन्तव्य की रिपोर्ट प्रस्तुत की। वहीं विशेषज्ञों का साफतौर पर मानना है कि अपशिष्ट उर्जा संयंत्र गर्म देशों में सफल हो ही नहीं सकते। दूसरी ओर आर्थिक रुप से भी ये लाभप्रद नहीं है। क्योंकि इनमें हमारे जैसे देश में यदि १०० इकाई कचरा डाला जाए तो २५ इकाई ऊर्जा मिलती है वहीं ठंडे व यूरोपीय देशों में ३४ यूनिट तक ऊर्जा प्राप्त होती है।
इसके बावजूद मंत्रालय ने सितंबर २००६ में फरमान निकाला कि बड़े शहरों के आसपास ऐसे १००० संयंत्र लगाये जाएं। दूसरी ओर योजना आयोग का कहना है कि कम्पोस्ट संयंत्रों में निर्मित जैविक खाद पर सब्सिडी देने का प्रावधान हो, क्योंकि भारत मात्र रासायनिक खादों पर ही १४००० करोड़ की सब्सिडी दे रहा है।
आज आवश्यकता है कि अपशिष्ट प्रबंधन को संस्थागत किया जाए। अभी तक अपशिष्ट प्रबंधन नगर निगम के स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत किया जाता है। जो कि किसी स्वास्थ्य चिकित्सक के अधीन होता है एवं वह इस विषय का विशेषज्ञ भी नहीं होता। दूसरी ओर इस निजी क्षेत्र के कई संस्थान व व्यक्ति कम्पोस्ट खाद का संयंत्र डालने को तैयार हैं, जिन्हें कि प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
***शनिवार, 31 मार्च 2007
पड़ती भूमि पर पुनर्विचार की ज़रुरत
2 हमारा आसपास
पड़ती भूमि पर पुनर्विचार की ज़रुरत
जयश्री वेंकटेशन
पिछले दिनों पड़ती भूमि कई कारणों से खबरों में रही। तमिलनाडु सरकार ने यह कदम उठाया कि राज्य के भूमिहीनों को ढाई-ढाई एकड़ जमीन दी जाएगी। इस निर्णय के चलते यह बहस छिड़ गई कि जमीन आएगीकहां से?
इसी प्रकार से चेन्नै जैसे महानगरों के आसपास सेटेलाइट टाउन निर्मित करने के प्रस्ताव के बाद भी इसी तरह की शंकाएं व्यक्त की गई। इन शंकाओं का समाधान करते हुए तमिलनाडु सरकार ने स्पष्ट किया कि इस काम के लिए भी मात्र पड़ती भूमि या सूखी भूमि का ही अधिग्रहण किया जाएगा। यह भी कहा गया था कि पानी के स्त्रोतों, रिहायशी इलाकों और जंगलों को इस कार्यक्रम के दायरें में नहीं लाया जाएगा।
तमिलनाडु में कुल 17,303.29 वर्ग कि.मी. भूमि को पड़ती भूमि के रुप में चिन्हित किया गया है। यह राज्य के भौगोलिक क्षेत्रफल का 13.3 प्रतिशत है। तर्क यह दिया जा रहा है कि यह जमीन सरकारी जरुरत को आसानी से पूरा कर सकती है। इस तरह के सुझाव भी आए हैं कि पड़ती भूमि का उपयोग प्लांटेशन, खास तौर से रतनजोत के प्लांटेशन हेतु किया जए ताकि जैव ईंधन उद्योग को बढ़ावा मिल सके। यह सही है कि जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल, डीजल वगैरह) से हटकर जैव ईंधन की ओर कदम बढ़ाना एक अच्छा कदम होग, मगर पड़ती भूमि को जैव ईंधन प्लांटेशन में तब्दील करने के विचार की छानबीन करने की जरुरत है।
मसलन, यह सुझाया जा रहा है कि पालनी पर्वत की पड़ती भूमि पर रतनजोत उगाया जाए जबकि यह इलाका कुछ ऐसे पौधों का प्राकृत वास है जो सिर्फ यहीं पाए जाते हैं। इसके लिए प्रस्ताव यह है कि रेल्वे के साथ वापिस खरीद की व्यवस्था कर ली जाए।
इसी प्रकार से, हाल के दिनों में तटवर्ती क्षेत्रों को प्रोसोपिस जुलीफेरा उगने के लिए छोड़ दिया गया है, यहां तक कि मैन्ग्रोव वनों के पट्टों को भी। यह प्रजाति ईंधन की जरुरत की पूर्ति करती है। इन जमीनों को भी पड़ती भूमि के रुप में वर्गीकृत किया गया है।
दक्षिण चेन्नै में एक दलदल है जो इकॉलॉजी की दृष्टि के काफी महत्वपूर्ण है। इसके संरक्षण के लिए पांच वर्षो से किए जा रहे प्रयासों में अवरोध पैदा हो गया क्योंकि यह पड़ती भूमि है।
यह चिंता व्यक्त की गई है कि पड़ती भूमि कहीं एक मोहक शब्द में न बदल जाए जो दानदाता संस्थाओं को उसी तरह रिझाने लगे जैसे स्थानीय लोगों व संस्थाओं की भागीदारी और जेंडर जैसे जुमलें रिझाते हैं। मगर इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि हम भूमि बंदोबस्त व प्रशासन की औपनिवेशिक विरासत को सीने से चिपकाए बैठे हैं और अभी भी उसका पालन कर रहे हैं।
पड़ती भूमि दरअसल प्राकृतिक संसाधनों को लेकर औपनिवेशिक धारणा की अवशेष है। यह धारणा मूलतः राज्य द्वारा प्राकृतिक संसाधनों पर एकछत्र नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से निर्मित की गई थी। इन संसाधनों में भूमि प्रमुख थी। कोशिश यह थी कि दुविधा वाले क्षेत्र कम से कम रहें। नजूल बंदोबस्त प्रणाली के जरिए जंगल व कृषि भूमि के बीच काल्पनिक मगर कारगर विभेद पैदा किया गया। शुध्दतः प्रबंधन के मकसद से ब्रिटिश शासन ने इस तरह के वर्गीकरण किए और जमीनों को वन भूमि व कृषि भूमि में बांट दिया। कृषि भूमि को उत्पादक भूमि व पड़ती भूमि (वेस्टलैण्ड्स) में बांटा गया। इस तरह के वर्गीकरण के उदाहरण हमें कई और मामलों में भी देखने को मिलते हैं। जैसे प्रायद्वीपीय भारत के घाट को पश्चिमी व पूर्वी घाट में बांटना, जंगलों को नम व शुष्क जंगलों में बांटना या यह कहना कि लोग या तो जातियों में शामिल होंगे या जनजातियों में।
मद्रास प्रेसिडेंसी में अपनाई गई भूमि बंदोबस्त प्रक्रिया इसका उम्दा उदाहरण है। ब्रिटिश आगमन से पहले दक्षिण भारत के ग्रामीण समाज विकेंद्रीकृत इकाइयों में संगठित था जिन्हें नाडु कहते थे। अलबत्ता ब्रिटिश शासकों ने दावा किया कि लोगों की हालत अत्यंत शोचनीय है और पूर्ववर्ती सरकारों, और खासकर टीपू सुल्तान के राज, ने गांवों को ऐसी हालत में पहुचा दिया है कि सम्पन्न किसान ढूंढे नहीं मिलेगा। यह भी कहा गया कि किसान ईमानदारी से लगान नहीं चुकाते हैं। इन मान्यताओं के आधार पर ब्रिटिश शासन ने व्यवस्थित ढंग से नियंत्रण की स्थानीय प्रणालियों को कमजोर किया और राजस्व व्यवस्था लागू करके पूरा नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया। इन व्यवस्थाओं में रैयतवाड़ी और स्थायी बंदोबस्त प्रमुख थीं। जंगल के बंदोबस्त की प्रक्रिया को मद्रास फॉरेस्ट एक्ट, 1882 पारित करके संभव बनाया गया। इस कानून के जरिए जंगल के एक बड़े हिस्से को आरक्षित जंगल घोषित कर दिया गया था।
मद्रास प्रेसिडेंसी के राजस्व इतिहास को उजागर करते हुए बेडन पॉवेल ने दो अवधियां चिन्हित की हैं - प्रारंभिक व आधुनिक बंदोबस्त। जहां प्रारंभिक बंदोबस्त कमोबेश पूर्व के आकलन पर आधारित थे, और क्षेत्रीय स्वायत्तता को प्रोत्साहित करते थे, वहीं 1858 में बंदोबस्त महकमे की स्थापना के बाद जो दौर शुरु हुआ उसमें कठोर मापदण्ड लागू किए गए और इस काम में बंदोबस्त व सर्वेक्षण अफसरों की मदद ली गई जो जमीनों के नक्शे बनाया करते थे। इस दूसरे दौर में प्रशासन के मकसद से जमीन को आक्यूपाइड और अन-ऑक्यूपाइड भूमियों में बांट दिया गया।
इन्हें इस तरह परिभाषित किया गया कि जिस जमीन पर खेती होती है वह आक्यूपाइड है और जिस जमीन पर खेती नहीं होती वह पड़ती भूमि है। वैसे दिखता तो यह है कि इससे ज्यादा से ज्यादा जमीन को कृषि भूमि में तब्दील करके निजी स्वामित्व में देने को बढ़ावा मिलेगा जगर दरअसल सर्वे की पूरी प्रक्रिया पड़ती भूमि को चिंहित करके राज्य के नियंत्रण में लाने की प्रक्रिया थी।
आरक्षित जंगलों के अलावा जो जमीन थी उसमें निम्नलिखित बारीक वर्गीकरण किए गए ः पट्टा भूमि, आकलित सूखी व नम पड़ती भूमि, अनाकलित पड़ती भूमि और पोरोम्बोके (राजस्व और वन)। आकलित सूखी व नम पड़ती भूमि वह थी जो उस समय तक खेती विहीन रहती थी जब तक कि राजस्व विभाग उसका आवंटन न कर दे। इस श्रेणी में कई किस्म के प्राकृतवास शामिल थे, जैसे दलदल, मौसमी नम भूमियां, पथरीली ढलवां भूमि, परित्यक्त चारागाह, और झूम खेती के अंतर्गत आने वाली जमीनें। पोरोम्बोके जमीनें सामुदायिक उपयोग के लिए निर्धारित थीं।
वास्तविक परिस्थिति में पड़ती भूमि की बेवकूफी स्पष्ट नजर आती है। मसलन तमिलनाडु में अधिकांश अनाकलित नम पड़ती भूमि के रुप में वर्गीकृत नम भूमियां वास्तव में कृषि तंत्र का अभिन्न अंग हैं और यहां मौसमी तौर पर धान की खेती होती है। इसके अलावा स्थानीय लोग इन नम भूमियों से कई लाभ प्राप्त करते है। जैसे चारा, मछली तथा चटाई, टोकरियां वगैरह बनाने के लिए कच्चा माल आदि। इस तरह की नम भूमियां शहरी क्षेत्र में हों, तो उन्हें कचरा व मलबा फेंकने का स्थान बना दिया जाता है। पहाड़ी इलाकों की नमभूमियों का उपयोग मोटा अनाज और फलियां वगैरह उगाने के लिए किया जाता है और कहीं-कहीं तो इनमें व्यापारिक फलोद्यान (बाड़ियां) भी लगाए जाते हैं। ऐसे क्षेत्रों में खेती-बाड़ी के जो तौर-तरीके अपनाए जाते हैं वे जांच-परखे हैं और इनमें बाहरी इनपुट्स की जरुरत बहुत कम होती है। यह भी जानी-मानी बात है कि कई पड़ती जमीनें पशु पालक समुदायों के लिए चारागाह हैं।
इस तरह के अवलोकनों से सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह सामने आता है कि पारंपरिक रुप से जमीन को मात्र सेवा प्रदाता के रुप में नहीं देखा जाता था। काफी प्राचीन समय में ही समझ लिया गया था कि ये जमीनें कई सारी इकॉलॉजिकल भूमिकाएं अदा करती हैं।
भूमि का जो प्रारंभिक वर्गीकरण चरक, कौटिल्स और कश्यप ने किया था वह मिट्टी की गुणवत्ता और उर्वरता, स्थानीय जलवायु की परिस्थितियों, और अनोखेपन जैसी कसौटियों पर आधारित था। भूमि वर्गीकरण की एक राजस्व प्रणाली भी अस्तित्व में थीं जो मिट्टी की गुणवत्ता पर आधारित थी। इसका विवरण हमें अर्थशास्त्र और अग्निपुराण में मिलता है। इसी प्रकार से संगम साहित्य (300ई.पू. से 300 ई.) के एक ग्रंथ तोल्काप्पियम में भूमि ह्रास और मरुस्थलीकरण को वर्गीकरण का एक आधार जरुर बताया गया है मगर किसी भी प्राकृतिक संसाधन के बारे में उपयोगहीनता की बात बिलकुल नहीं कही गई है। इस बात को सहजता से स्वीकार किया गया था कि प्राकृतिक संसाधन एकाधिक सेवाएं प्रदान करते हैं। वनवासी समुदाय जिस ढंग से भूमि का वर्गीकरण करते हैं उसमें यह मान्यता स्पष्ट झलकती है। मसलन नीलगिरी के कुरुम्ब समुदाय में जमीन का परिसीमन परिपाटियों के अनुसार किया जाता है और अपने दायरे में आने वाली जमीन का विवरण उसके कार्य के आधार पर होता है। इसी प्रकार का वर्गीकरण कोली पर्वत के मलई अली में भी मिलता है। ये लोग जमीन का वर्गीकरण वहां पाए जाने वाले पानी की गुणवत्ता और गहराई के आधार पर करते हैं।
इन वैकल्पिक प्रणालियों के उल्लेख का आशय प्राचीन व पारंपरिक ज्ञान को महिमामंडित करना नहीं है बल्कि यह रेखांकित करना है कि हमें जमीन के उपयोग व बंदोबस्त की वर्तमान नीतियों में आधुनिक समझ को जगह देनी चाहिए। ***
मंगलवार, 27 फ़रवरी 2007
जहरीली हवाओं से बचने के रास्ते
वातावरण
विवेक चट्टोपाध्याय
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अक्टूबर 2006 में विश्वभर की सरकारों को चेतावनी देते हुए उनके शहरों में शुध्द वायु उपलब्ध करवाने हेतु नए पैमाने स्थापित करते हुए दिशा निर्देशक सिध्दांत जारी किये हैं। इसकी अनुशंसाओं के अंतर्गत पी.एम. 10, ओजोन
और सल्फर डाईआक्साईड की मात्रा को नियंत्रित करने की सलाह दी गई है। प्रस्तावित मानक विश्व के विभिन्न हिस्सों में वर्तमान प्रचलित मानकों की तुलना में कहीं अधिक कठोर हैं। साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठन का यह भी मानना है कि इससे जन स्वास्थ्य संगठन का यह भी मानना है कि इससे जन स्वास्थ्य के स्तर में काफी सुधार होगा। इन मानकों के संबंध में एक अन्य गौरतलब तथ्य है कि पूर्व में जहां यह मानक मात्र यूरोप के लिये बनाये गये अब इन दिशा निर्देशों को विश्वव्यापी स्तर पर लागू किया जाएगा।
कुछ शहरों को इन दिशा निर्देशों को लागू करने हेतु अपने यहां व्याप्त प्रदूषण को तीन गुना तक कम करना होगा। कुछ शहरों में पीएम 10 प्रदूषण प्रति क्यूबिक मीटर 70 माईक्रोग्राम से भी ज्यादा हो गया हैजबकि नए दिशा निर्देशों के अनुसार इसे घटाकर 20 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर के स्तर तक लाना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि इस स्तर तक अगर प्रदूषण घटा लिया गया तो प्रदूषण के कारण होने वाली मौतों में 15 प्रतिशत कमी आ जाएगी। दिशा निर्देशों में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि वायु प्रदूषण घटाने से विश्वभर में श्वास, हृदय रोग व फेफड़ों के कैन्सर से होने वाली मौतों में भी कमी आएगी।
विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि 80 वैज्ञानिक से सलाह मशविरे एवं विश्वभर में इस विषय पर छपे हजारों शोधपत्रों की समीक्षा करने के बाद ही उसने इन दिशा निर्देशों को बनाया हैं। संगठन का अनुमान है कि वायु प्रदूषण के परिणाम स्वरुप प्रतिवर्ष 20 लाख से ज्यादा असामयिक मौतें विश्वभर में हो जाती हैं। साथ ही यह भी अनुमान लगाया गया है कि इनमें से आधे से अधिक का भार विकासशील देशों पर पड़ता है।
नवीन दिशा निर्देशों की अन्य मुख्य प्रावधान हैं ः-
1. ओजोन की सीमा प्रतिदिन 120 माइक्रोग्राम प्रतिमीटर प्रतिदिन से घटाकर 100 माइक्रोग्राम प्रतिदिन तक लाना।
2. सल्फर डाई आक्साईड के संबंध में इसमें दिशा निर्देश है कि इसे 125 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से घटाकर 20 माइक्रोग्राम के स्तर पर लाया जाये।
3. नाइट्रोजन डाईआक्साइड की सीमा के संबंध में दिशा निदर्ेशों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है।
4. दिशा निर्देशों का मुख्य उद्देश्य प्रगतिशील तात्कालिक लक्ष्यों को प्राप्त करना एवं बेहतर वायु प्रदान करने के संबंध में मील का पत्थर सिध्द होना है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन अब सभी देशों के साथ इस तरह से सहयोग करने का इच्छुक है जिससे कि इस संबंध में प्रत्येक राष्ट्र के स्वयं से राष्ट्रीय कानून बन सकें। वैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन इस बात को भी स्वीकार करता है कि यह बात राष्ट्रों की सरकारों के विवेक पर छोड़ देना चाहिये कि वे स्वविवेक से परिस्थितिजन्य राष्ट्रीय मानक स्थापित कर सकें। परंतु इस संबंध में उन्हें यह तो ध्यान रखना ही चाहिये कि स्वास्थ्य पर न्यूनतम प्रतिकूल प्रभाव पड़े।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के यूरोप स्थित आंचलिक कार्यालय के क्षेत्रीय सलाहकार माइकल क्रजीजेनोवस्की ने वायु की गुणवत्ता की ओर इशारा करते हुए कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जो नए लक्ष्य स्थापित किए हैं उस हेतु सदस्य देश अपनी नीति बनाने में इन दिशा निर्देशों का सहारा ले सकते हैं। देशों को स्वयं ही तय करना होगा कि वे इन उद्देश्यों से कितने दूर हैं। प्रदूषण के वर्तमान स्तर से उनके नागरिकों के स्वास्थ्य को कितनी हानि पहुंच रही है एवं इससे होने वाली बीमारियों को किस प्रकार कम किया जा सकता है।
इन दिशा निर्देशों को लागू करने हेतु भारत एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है। भारत ने वायु प्रदूषण हेतु तो पैमाना बना दिया है परंतु ओजोन, पीएम-5 और अन्य जहरीली गैसों के लिये कोई पैमाना तय नहीं किया है। अगर हम विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित दिशा निर्देशों से तुलना करें तो पाएंगे कि सल्फर डाई आक्साईड, नाईट्रोजन डाई आक्साईड और पीएम 1010 के मामलों में यह स्तर तय किये गये मानकों से 1.5 से 4 गुना तक अधिक है।
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