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मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

५ वातावरण

गंदगी को नष्ट करते कीड़े
भरतलाल सेठ
शहरों से निकलने वाली अनुपचारित गंदगी पूरे वातावरण को प्रदूषित कर रही है । परंतु इसका सर्वाधिक खामियाजा हमारे जलस्त्रोतों को उठाना पड़ रहा है । सूक्ष्म जीवाणुआें के माध्यम से इसे उपचारित करने की नई तकनीक सामने आ रही है । परंतु भारत के शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों की नालियों में जिस स्तर के जहरीले रासायनिक पदार्थ मिलते हैं, क्या ये सूक्ष्म जीवाणु उनका सामना कर पाएंगें ? वैसे अब स्थिति भूल करके सीखने से आगे पहंुच चुकी है । अतएव आवश्यकता है कि जहरीले रासायनिक पदार्थोंा के प्रयोग को ही प्रतिबंधित किया जाए । उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री ने हाल ही में इस बात की मौखिक शिकायत की कि दिल्ली में कौटिल्य मार्ग स्थित उनके निवास के सामने खुले ड्रेनेज से घर में बदबू आ रही है । इतने पर ही नई दिल्ली नगर पालिका हरकत में आ गई और उसने ८.५ लाख प्रतिवर्ष के खर्च पर सीवेज का उपचार सूक्ष्म जीवाणुआें के माध्यम से करने के आदेश निकाल दिए इस प्रक्रिया के अंतर्गत एक टंकी में जीवाणुआें के एक भाग में ४० गुना अनुपचारित भूजल को डालकर इस सम्मिश्रण को ड्रेनेज में छोड़ दिया जाता है । इससे नाली का गंदा पानी साफ दिखाई देने लगता है और इसकी बदबू भी समाप्त् हो जाती है । इस नाली की खुराक करीब २.५ लीटर प्रतिदिन है और इसका मूल्य है ६०० रू. प्रति लीटर । अपशिष्ट के उपचार की यह सूक्ष्मजीवाणु निर्देशित तकनीक जैव पुन:उपचार या बायोरिमेडिकेशन कहलाती है । इस प्रक्रिया के अंतर्गत सूक्ष्म जीवाणु जैविक पदार्थोंा के नष्ट होने की प्रक्रिया को तीव्र कर देते हैं । प्रकृति जिस प्रक्रिया को वर्षोंा में करती है ये कीटाणु इस कार्य को हफ्तों में कर देते हैं । विश्व वन्य, जीव कोष भारत के द्वारा संचालित जीवंत गंगा कार्यक्रम के प्रधान सुरेश रोहिल्ला के अनुसार जिन नगर पालिकाआें और कंपनियों ने इस प्रक्रिया का इस्तेमाल किया है वे इसे वर्तमान में प्रचलित उपचार संयंत्र वाली विधि से बेहतर बता रहे हैं । इन संयंत्रों हेतु धन, बिजली एवं भूमि की आवश्यकता कम पड़ती है । इस लघु जीवाणु इकाई की स्थापना में बहुत कम समय लगता है तथा इस हेतु सामान्यतया निर्माण कार्य की भी आवश्यकता नहीं पड़ती और न ही कुशल मजदूरों की आवश्यकता नहीं पड़ती और न ही कुशल मजदूरों की आवश्यकता हैं। इस तरह के १०० प्रारंभिक संयंत्र भारत में तैयार हो चुके है अतएव अब इस तकनीक का मानकीकरण हो जानाचाहिए । इसके अलावा सीवेज उपचार विधि का गंगा की सफाई मेें भी महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है जिस पर केंद्र सरकार अब तक ३००० करोड़ रू. खर्च कर चुकी है। देश मेें पिछले ५ वर्षोंा में इस विधि की ५० प्रारंभिक परियोजनाआें को पूर्ण करने वाली कंपनी जे.एम. इनवायरनो की निदेशक ममता तोमर का कहना है कि गंगा बेसिन में प्रतिदिन जितना सीवेज या या गंदगी जाती है उसे बजाए पारम्परिक संयंत्रों से शोधन करने के यदि सूक्ष्म जीवाणुआें से यह कार्य किया जाता है तो प्रतिवर्ष १०० करोड़ रू. की बचत हो सकती है । वैसे प्रदूषण रोकने की इस पद्धति को लेकर सरकार अभी असमंजस में है । केन्द्रीय प्रदूषण बोर्ड के भूतपूर्व उपनिदेशक आर.सी. त्रिवेदी का कहना है कि चूंकि भूमि लगातार महंगी होती जा रही है अतएव इन लघु जीवाणुआें की भविष्य में निश्चित ही महत्वपूर्ण भूमिका होगी । इसलिए आवश्यक है कि केन्द्र सरकार इसकी अनुमति दे । वहीं केन्द्र द्वारा भारतीय शहरों में १०० प्रतिशत पानी की आपूर्ति एवं सेनिटेशन उपलबध कराने के लिए बनाई गई संस्था केंद्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं पर्यावरण अभियांत्रिकी संगठन के सलाहकार शंकर नारायणन का कहना है कि गंदगी को उपचारित करना विद्यमान नीतियों के विरूद्ध है । इसी के साथ भारतीय संघीय व्यवस्था भी एक मसला हैं। चूंकि जल आपूर्ति और सेनिटेशन राज्य का मसला है और नगरपालिकाएं इसे नियंत्रित करती हैं, अतएव इसमें केन्द्र की भूमिका महज सलाहकार की रह जातीहै । उनका मानना है कि यह एक अस्थायी हल ही है । वे अकेलेनहीं है जो कि इस तकनीक के प्रति शंकालु हैं । ब्रिटेन की एक जल कंपनी के महाप्रबंधक डेविड जॉन स्टोन का कहना है कि हमने इस तरह के दावे १९७० के दशक के अंत में सुने थे तथा हमने टेम्स नदी के पानी पर इसके कुछ प्रयोग भी किए थे । इन प्रयोगों का नतीजा यह निकला कि इससे बहुत कम या कोई सुधार नहीं हुआ तथा यह पैसे को नाली में बहाने का अच्छा माध्यम था। पिछले दिनों आईआईटी, कानपुर में इस संंबंध में वैज्ञानिकों से विमर्श करने हेतु एक गोष्ठी का आयोजन हुआ । संस्थान के प्रोफेसर विनोद तारे का कहना है कि हमारा उद्देश्य था कि इस तकनीक पर अकादमिक बहस कर इसके इस्तेमाल हेतु मानक तय करें, प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करें एवं इसकी लागत को पारदर्शी बनाएं। परंतु ऐसा नहीं हो पाया क्योंकि कंपनियां अपने संकीर्ण व्यावसायिक हितों के परे देख ही नहीं पा रही थीं । इतना ही नहीं संस्थान द्वारा किए गए प्रयोगों में भी इस तकनीक को बहुत विश्वसनीय नहीं माना गया । क्योंकि इस तकनीक में बहुत कुछ तापमान, पीएच, अपशिष्ट को रोके रखने के समय, बहाव की दर और कच्च्े सीवेज के चरित्र पर निर्भर करता है । नागपुर स्थित राष्ट्रीय पर्यावरणीय अभियांत्रिक एवं शोध संस्थान के उपनिदेशक एस.आर. वाते का कहना है प्रदूषण नियंत्रण और उसमें कमी करने में मत उलझिए । वर्तमान तकनीक तालाब और झील जैसे नियंत्रित प्रणालियों को शुद्ध कर सकती है नदियोंे को नहीं । परंतु कुछ इससे असहमत हैं । वे कहते है हम प्रतिदिन नई खुराक डालते हैं । नए प्रदूषण के साथ नए जीवाणु डाले जाते हैं। जहां बहाव की गति अधिक है वहां हम लोग बाध बनाकर गंदगी के रूकने के समय को बढ़ा सकते है । जे.एम. एनवायरों ने दिल्ली के बंद पड़े अपशिष्ट उपचार संयंत्र मेंे ६ महीनों तक प्रतिदिन ५ करोड़ लिटर सीवेज को उपचारित किया । इसके नतीजों से संतुष्ट होकर दिल्ली जल बोर्ड ने कंपनी के अनुबंध को आगे बढ़ा दिया था । इस दौरान सिर्फ बिजली पर ही ६३ लाख रूपए की बचत हुई है । इसी क्षेत्र में कार्य कर रही कनाड़ा की एक कंपनी के अधिकारी आदित्य सिंघल का कहना है कि उपचार करने वाली इकाई में सर्वाधिक ऊर्जा, हवा पैदा करने वाले संयंत्र हेतु लगती है । क्योंकि जीवाणु की वृद्धि और उन्हें बचाए रखने के लिए ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाना आवश्यक होता है । अतएव ऊर्जा की आवश्यकता ५० प्रतिशत तक घट जाती है । पारम्पारिक अपशिष्ट उपचार संयंत्रों में गंदे पानी के आने और शुद्धिकरण के बाद बाहर निकलने हेतु २४ घंटे का समय लगता है । जीवित जीवाणु इस कार्य को आठ घंटे में कर देते हैं अतएव ड्रेनेज को राके रहने का समय कम हो जाता है । इसके परिणाम स्वरूप ऊर्जा बचत होती है। इस तकनीक की मांग बढ़ने से भविष्य में इसकी लागत में कमी आ सकती है । अभी तक इसके निर्माण इकाईयां विदेशों में स्थित हैं और उत्पाद पर आयात कर एवं अन्य शुल्क भी लग रहे हैं । वैसे जे.एम. इनवायरो सन् २०१० में भारत में संयंत्र स्थापित कर देने के प्रति आशान्वित है । इससे लागत में ५० प्रतिशत की कमी आने की संभावना है । कंपनियां यह तर्क भी दे रही हैं कि जब तक उन्हें सीवेज के उपचार हेतु प्रदर्शन का पर्याप्त् मौका नहीं दिया जाएगा तब तक वे इस तकनीक की क्षमता भी ठीक से प्रदर्शित नहीं कर पाएंगी । ***

गुरुवार, 9 जुलाई 2009

११ वातावरण

तेज़ाबी बारिश के आसार
- नरेन्द्र देवांगन
आज जो बरसात हमें आनंदित करती है, वही निकट भविष्य में एक खतरनाक संकट बन कर बरस सकती है । वैज्ञानिक अध्ययन से पता लगा है कि भारत के आकाश से बरसने वाले स्वच्छ जल के बजाए तेज़ाबी बारिश के नाम से जगप्रसिद्ध पर्यावरणीय विपदा भारतवासियों को भी झेलनी पड़ सकती है । नईदिल्ली स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई.आई.टी.) के वायुमंडल विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन द्वारा बताया है कि भारत के कई हिस्सों में वर्षा जल की रासायनिक प्रवृत्ति धीरे- धीरे अम्लीयता की ओर बढ़ रही है । इस रिपोर्ट मेंे बताया गया है कि राजधानी दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र मध्यप्रदेश , तमिलनाडु और अंडमान द्वीपो में वर्षा जल की अम्लीयता लगातार बढत़ी जा रही है । फिलहाल यहां होने वाली वर्षा को अम्लीय नहंी कहा जा सकता , लेकिन यदि इस संभावित संकट पर रोक कहा जा सकता ,लेकिन यदि इस संभावित संकट पर रोक लगाने के लिए जल्द ही आवश्यक कदम नही उठाए गए तो हमारे देश मे अम्लीय वर्ष को रहकीकत बनने मे ज्ज़्यादा देर नही लगेगी। अम्लीय वर्षा की मुख्य वजह तेज़ी से बढ़ता वायु प्रदूषण है । कोयला और डीज़ल जैसे जीवाश्म इंर्धनों की लगातार बढ़ती खपत के कारण हवा में सल्फर ऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड्स गैसों की मात्रा में तेजी से वृद्धि हो रही है । इसके लिए मोटर वाहनों के अलावा ताप बिजलीघर और इस्पात उद्योग को सबसे बड़ा दोषी माना जा रहा है । सूर्य की तीखी किरणें जब धरती पर मौजूद पानी को भप बनाकर आकाश की ओर खींचती है तो हवा में तैरती ये गैसें भाप ें घुल-मिल जाती हैं । इससे भाप में सलफ्यूरिक और नाइट्रिक अम्ल बन जाते हैं । यही अम्लीय भाप जब बादल बनकर बरसती है तो वर्षा की बूंदें तेज़ाब बरसाने लगती है । वर्षा जल में घुले - मिले रासायनिक प्रदूषक धरती की जीवनदायी मिट्टी, वनस्पतियों, ताल-तलैयों, नदियों आदि पर कहर बरसाने लगते हैं । भारत में जैसे - जैसे औद्योगिकरण और विकास की रफ्तार ज़ोर पकड़ती जा रही है, वैसे - वैसे हवा में वायु प्रदूषकों की मात्रा भी बढ़ती जा रही है । एक अनुमान के अनुसार १९९० में हमारा देश ४४०० किलो टन गंधक (सल्फर) हवा में छोड़ता था, जबकि आज इसकी मात्रा बढ़कर ८५०० किलो टन के आसपास है । हिसाब लगाया गया है कि २०२० में यह मात्रा बढ़कर १९५०० किलोटन हो जाएगी । इस गंभीर स्थिति के पीछे डीज़ल के बढ़ते उपयोग के अलावा इसकी खराब क्वालिटी का भी हाथ है । हमारे यहां इस्तेमाल किए जा रहे डीज़ल में सल्फर की मात्रा ०.५ फीसदी (भार के हिसाब से) है । आजकल भारत में कई राज्यों/ शहरों में कम सल्फर वाले डीज़ल की आपूर्ति की जा रही है , फिर भी पश्चिमी देशों की तुलना में भारतीय डीज़ल कहीं अधिक सल्फरयुक्त है । उदाहरण के तौर पर स्वीडन का डीजल भारतीय डीज़ल की तुलना में कोई ढाई सौगुना अधिक स्वच्छ है । कुछ वर्ष पहले यह मामला उठा तो भारतीय उद्योग महासंघ (सीआईआई) के पर्यावरण विभाग के अध्यक्ष का कहना था कि यदि सरकार डीज़ल के उपयोग को इसी तरह बढ़ावा देती रही तो आई.आई.टी. द्वारा व्यक्त की गई संभावना जल्द ही हकीकत बन जाएगी । आई.आई.टी. के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन में बताया गया है कि तेज़ाबी बारिश के कहर से कोई भी जीव बच नहीं सकता । भले ही वह जीवाणु जैसा सूक्ष्मजीव हो या फिर हमारे जैसा समझदार प्राणी । तेज़ाबी बारिश मिट्टी में मौजूद जीवाणुआें को नष्ट करती है, जिससे पौधों की उत्पादकता पर बुरा असर पड़ता है । दरअसल मिट्टी में अम्ल घुलने की वजह से पेड़- पौधे पोटेशियम, कैल्शियम और मैग्निशियम जैसे पोषक तत्वों को भली प्रकार सोख नहीं पाते । इसके अलावा तेजाबी बारिश के कारण हरी पत्तियों की चिकनी मोटी परत नष्ट हो जाती है, जिससे वे धूप में भोजन बनाने का काम (प्रकाश संश्लषण) ठीक से नहंी कर पाती । तेज़ाबी बारिश वाले पानी में एल्यूमिनियम मौजूद हेाता है , जो मछलियों समेत अनेक जलीय जीवों के लिए ज़हर का काम करता है । यही एल्यूमिनियम जब पक्षियों की खुराक में शामिल हो जाता है तो उनमें अंडे बनने की प्रक्रिया गड़बड़ा जाती है । तेज़ाबी बारिश में मौजूद रसायनों के प्रभाव से मिट्टी से बेहतर खतरनाक पारा (मरकरी) निकलने लगता है, जो अंतत: नदियो, झीलों आदि में इकट्ठा हो जाता है ।जब इन प्रदूषित नदियों - झीलों में पल रही मछलियों को मनुष्य उदरस्थ करता है तो यही पारा देह में इकठ्ठा होकर बेहद खतरनाक प्रभाव डाता है । तेज़ाबी बारिश के कारण उत्पन्न होने वाला केडमियम हमारे गुर्दोंा में कई प्रकार के विकार उत्पन्न करने के अलावा घाव भी पनपा सकता है । इसी तरह एल्युमिनियम की मौजूदगी से हडि्डयों और दिमाग को क्षति पहुंचती सकती है । विशेषज्ञों का विश्वास है कि जैसे - जैसे भारत का आर्थिक विकास ज़ोर पकड़ेगा, वैसे - वैसे कोयले की खपत भी बढ़ती जाएगी । सन् २०२० तक यह तीन गुना हो सकती है । इससे उत्तर-पूर्वी क्षेत्र, बिहार, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल के हिस्सों तथा दक्षिण के तटीय क्षेत्रों में तेज़ाबी बारिश के बादल गहरा सकते हैं । इन क्षेत्रों की मिट्टी पहले ही अम्लीयता की ओर कदम बढ़ा चुकी है । ऐसे में यदि तेज़ाबी बारिश भी शुरू हो गई तो यहंा की भूमि बंजर होकर कृषि के लिए बेकार हो जाएगी । वैज्ञानिकों ने ताप बिजलीघरों के आसपास के क्षेत्रों में २६ फसलों की उत्पादकता पर अध्ययन करके बताया है कि हवा में अधिक सल्फर डाइऑक्साइड के कारण इनकी उपज गिर रही है ।उन्होंने फसलों में अनाज के अलावा फलों, सब्जियों को भी शामिल किया था । एक अध्ययन में सिंगरौली, कोराडी, दादरी, भुसावल और सिक्का के बिजलीघरों के दस किलोमीटर के दायरे के भीतर फसलों की औसत उपज में १३-५९ फीसदी गिरावट दर्ज की गई । इससे सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि यदि देश भर में सल्फर डाइ ऑक्साईड की मात्रा बढ़ती है, तो कृषि उत्पादन पर कितना बुरा असर पड़ेगा ? विडंबना यह है कि ऐसी विकट संभावना उस दौर में बन रही है जब हमें बढ़ती आबादी के भरण - पोषण के लिए खाद्यान्न का उत्पादन प्रति वर्ष ४० से ५० लाख टन बढ़ाना है । तेज़ाबी बारिश पर रोक लगाने के उपाय अजमाने के साथ ही यह जरूरी है कि समस्या को समझने के लिए देश को क्षेत्रवार बांटकर वहां तेज़ाबी बारिश की संभावना को दर्शाया जाए । आम जनता और उद्योगों को बताया जाए कि यदि उनके क्षेत्र में तेज़ाबी बारिश होती है तेा कौन - कौन सी विपदाएं टूट सकती हैं ?यह एक जाना - माना तथ्य है कि प्रदूषण पर रोक लगाने से जनता स्वस्थ रहती है , कृषि उत्पादन बढ़ता है और वनस्पतियों की तादाद में वृद्धि होती है । किसी भी देश को खुशहाल बनाने के लिये ये तीनों चीज़ें आवश्यक हैं । यह सच है कि तेज़ाबी बारिश एक अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण समस्या है, परंतु इस पर रोक लगाने का काम राष्ट्रीय स्तर पर ही करना होगा। ***
सबसे छोटा समुदाय लड़ रहा है, अस्तित्व की लड़ाई
विश्व के सबसे छोटे संगठित धार्मिक समुदाय समैरिटन अपनी जनसंख्या के सिमटते जाने के खतरे के मद्देनजर अब अपने अस्तित्व बचाने की हरचंद कोशिश में जुट गया है । और इसके लिए उसे इंटरनेट, जेनेटिक परीक्षण जैसी आधुनिकतम तकनीकोंके इस्तेमाल से कोई परहेज नहीं है । खुद को मूल इजरायली कहने वाले और खाने, यौन एवं विश्राम के खास तरीकों एवं नियमों को बिना किसी बदलाव अब तक चलाने वाले इस समैरिटन समुदाय की जनसंख्या केवल १४५ सदस्यों तक सिमट गई है । इससे इस समुदाय के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो गया है । सामुदायिक जीवन की इस जद्दोजहद में इस समुदाय ने अब नई तकनीकों और जीवन संगिनी ढूंढने के आधुनिक तरीकों एवं विवाह से पहले आनुवांशिक रोगों की पहचान जैसे तरीकों का प्रयोग शुरू कर दिया है । समैरिटन समुदाय का जिक्र ईसाइयों की पवित्र किताब बाईबिल में मिलता है । फिलहाल ये लोग इजरायल अधिकृत पश्चिम किनारे वाले इलाके के गिरीजिम पर्वत पर बसे आधुनिक गांव किरयातलुजा में रह रहे है । धार्मिक किताबों में इस पर्वत की बहुत मान्यता है । इनकी आबादी का शेष आधा हिस्सा राजधानी तेल अबीब मेंे रह रहा है । इस समुदाय के १२ आनुवंशिक धर्मगुरूआें में से एक हुसीने कोहेन (६५) भर्राई हुई आवाज में बताते हैं कि इतिहास के पन्नों में दर्ज रोमन साम्राज्य के दौर में उनके समुदाय की आबादी एक लाख से अधिक थी लेकिन आज यह विश्व का सबसे छोटा समुदाय भर रह गया है ।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

७ वातावरण

कार्बन ट्रेडिंग एवं वैश्विक तापमान
डॉ. राम प्रताप गुप्त
इस समय विश्व के सभी राष्ट्रों में समय के साथ वैश्विक तापमान में वृद्धि की प्रवृत्ति तथा तद्जनित जलवायुपरिवर्तन केदुष्परिणामों पर नियंत्रण की आवश्यकता के बारे में व्यापक सहमति है । इसी सहमति के परिणाम स्वरूप सन् १९९७ में तापमान वृद्धि पर रोक लगाने संबंधी क्योटो समझौता भी हुआ था । चूंकि तापमान वृद्धि के लिए वायुमण्डल में ग्रीन हाउस गैसों (कार्बन डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, मीथेन आदि) का उत्सर्जन प्रकृति की शोधन क्षमता से कहीं अधिक मात्रा में किया जाना जिम्मेदार है, अत: यह तय किया गया कि विकसित राष्ट्र अपने ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन मे ंवर्ष १९९० के उत्सर्जन स्तर की तुलना में २०२० तक २०-३०प्रतिशत की कमी करेंगें तथा सन् २०५० तक ८० प्रतिशत की कमी लाएंगें । चूंकि विश्व के वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों के अधिकांश उत्सर्जन के लिए विकसित राष्ट्र ही ज़िम्मेदार हैं अत: उनमें कमी लाने का दायित्व भी उन्हींं पर डाला गया है । जहां तक विकासशील राष्ट्रों का प्रश्न है, सन् २०२० तकउनके लिए किसी प्रकार की कमी का कोई लक्ष्य निर्धारित नहंी किया गया था ताकि उनके विकास पर किसी प्रकरका प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। परन्तु सन् २०२० से २०५० की अवधि मेंउन पर भी अपने ग्रीन हाउस गैसउत्सर्जन में ३० प्रतिशत की कमी का दायित्व डाला गया है । अपेक्षा यह की गई थी कि इन प्रावधानों के माध्यम से विश्व की तपमान वृदि्घ और जलवायु परिवर्तन की समस्या से काफी हद तक मुक्ति मिल सकेगी । यहां एक और तथ्य उल्लेखनीय है कि विश्व के वायुमण्डल में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन तो मुख्यत: विकसित राष्ट्रों द्वारा किया जाता है परन्तु उसके दुष्परिणाम के मुख्य शिकार विकासशील राष्ट्र ही होते हैं । उदाहरण के लिए वैश्विक तापमान में वृद्धि से उत्पन्न जलवायु परिवर्तन के कारण भारत के कुछ भागों में जहां अतिवर्षा होगी, वहीं अन्य में सूखे की प्रवृत्ति बढ़ जाएगी । इस तरह भारत दोनों तरह के दुष्परिणामों का शिकार होगा । जब क्योटो समझौते पर चर्चा चल रही थी , तो विकसित राष्ट्रों की बहुराष्ट्रीय कंपनियेां में खलबली मची हुई थी, क्योंकि अगर विकसित राष्ट्रों पर ग्रीन हाउस गैसो के उत्सर्जन में कमी की शर्त लागू हो जाती है तो उनके लिए कठिनाई पैदा हो जाएगी । पिछली एक शताब्दी से तेल , गैस और कोयले यानी जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त् सस्ती ऊर्जा पर आधारित उद्याोगों के माध्यम से ही तो वे भारी मात्रा में लाभ अर्जित कर रहे थे । अगर जीवाश्म ऊर्जा के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया तो उनके मुनाफे का स्रोत ही समाप्त् हो जाएगा । ऐसे मे इन कंपनियों ने विकसित राष्ट्रों विशेषकर अमरीकी सरकार के माध्यम से क्योटो समझौते में यह प्रावधान डलवा दिया कि वे चाहें तो ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में स्वयं कमी करे या उनके हिस्से की कमी विकासशील राष्ट्रों की किसी कंपनी से करवा लें । चूंकि विकसित राष्ट्रों की कंपनियों के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी की लागत अधिक आती थी, अत: उन्होंने इसमें कमी हेतु स्वयं प्रयास करने के स्थान पर कुछ पैसा देकर विकासशील राष्ट्रों की कंपनियों से उनके हिस्से की कमी करवा लेना अधिक लाभदायक समझा । इस व्यवस्था को उचित ठहराने के पीछे तर्क यह दिया गया था कि ग्रीन हाउस गैसो के उत्सर्जन में कमी चाहे विकसित राष्ट्रों द्वारा की जाए या विकासशील राष्ट्रों द्वारा , वायुमंडल में उत्सजर्जित होनेे वाली ग्रीन हाउस गैसों के उत्जर्सन की कुल मात्रा में तो कमी आएगी ही और वैश्विक तापमान वृद्धि और जलवायु परिवर्तन की समस्या को हल करने में मदद मिलेगी । जब विकसित राष्ट्रों की कंपनियां पैसा देकर विकासशील राष्ट्रों से ग्रीन हाउस गैसों के उनके हिस्से मे ंकमी करवाती हैं तो इसे कार्बन का व्यापार यानी कार्बन ट्रेडिंग कहते हैं । प्रश्न है कि क्या कार्बन ट्रेडिंग की यह व्यवस्था क्योटो समझौतो की मूल भावना के अनुरूप है और क्या यह विकसित और विकासशील राष्ट्र,दोनो के लिए समान रूप से लाभदायक है ? चूंकि विकसित राष्ट्रों की कंपनियों की तुलना में विकासशील राष्ट्रों की कंपनियों के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाना अपेक्षाकृत सस्ता हेाता है , अत: उन्होंने विकसित राष्ट्रों के दायत्व को अपने ऊपर लेकर व्याार तथ विदेशी मुद्रा कमाने के एक नए अवसर के रूप में इसका स्वागत किया है । कार्बन ट्रेडिंग का यह स्वागत इस व्यापार की बढ़ती मात्रा से भीप्रकट होता है । कार्बन ट्रेडिंग की मात्रा वर्ष २००५ में १० अरब डॉलर के बराबर थी और वर्ष २००६ में ३० अरब डालर हो गई थी ।अनमुान है इस वर्ष यह व्यापार लगभग १०० अरब डालर तक पहुंच जाागा । भारत भी इस व्यापार में अग्रणी रहा है । १६ जुलाई २००८ के टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार भारत के पास बेचने के लिए उस समय ४.६० करोड़ प्रमाणित उत्सर्जन इकाइयां उपलब्ध थी जो विश्व मेंउपलब्ध कुल प्रमाणित उत्सर्जन इकाइयों के ४०प्रतिशत के बराबर है । प्रमाणित उत्सर्जन इकाई से आशय वर्ष १९९० के स्तर की तुलना में कार्बन डाई आक्साइड के उत्सर्जन में १ टन की कमी से है । इस समय विश्व बाजार में १ प्रमाणित उत्सर्जन इकाई की कीमत २० यूरो के बराबर है । विकासशील राष्ट्र कार्बन ट्रेडिंग को विदेशी मुद्रा अर्जित करने के माध्यम के रूप में उसका स्वागत कर रहे हैं । विश्व बैंक ने भी कार्बन ट्रेडिंग योजना को काफी सराहा है । उसने स्वयं भी वन कार्बन भागीदारी सुविधा (ऋिशीीीं उरीलिि झरीींशिीीहळि ऋरलळश्रळींू) के नाम से एक योजना शुरू की है इस योजना के अंतर्गत विश्व बैंक वनों के विनाश तथा उनकी सघनता में कमी के कारण वायुण्डल की कार्बन डाईऑक्साइड की शोधन क्षमता में जो कमी आ जाती है , उस पर रोक लगाने की दिशा में ंप्रयासरत है । इसके अंतर्गत जो राष्ट्र वन लगाने तथा वनों की सघनता में वृद्धि की दिशा में प्रयास करते हैं, उन्हें विश्व बैंक की अतिरिक्त सुविधाएं प्रदान करता है । इस योजना में अभी तक १४ राष्ट्र शामिल हुए हैं । यह योजना कार्बन डाईऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी लाने के अन्य प्रयासों के साथ वायुमंडल द्वारा कार्बन डाईऑक्साइड के शोधन की क्षमता में वृद्धि की है । लक्ष्य दोनेां का एक ही है वायुमण्डल में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा में कमी करके तापमान वृद्धि की प्रक्रिया को धीमा करना । ऊपरी तौर पर चाहे विकासशील राष्ट्र कार्बन ट्रेडिंग की प्रक्रिया को अपने हित में समझे, परंतु जब हम इस बात का विश्लेषण करते हैं कि इस प्रक्रिया का इन देशों पर क्या प्रभाव पड़ेगा , तो हम पाते हैं कि इस योजना के माध्यम से विकसित राष्ट्र वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड के ्रपमुख उत्सर्जक होते हुए भी उसमें कमी लाने के सारे दायित्वों से मुक्ति पा गए हैं तथा दूसरी ओर विकासशील राष्ट्रों के द्वारा बहुत कम उत्सर्जन होते हुए भी उन पर कमी करने का दायित्व आ गया है । जहां क्योटो समझौते के अंतर्गत विकासशील राष्ट्रों को कार्बन डाईऑक्साइड के उत्सर्जन मेंवृद्धि की अनुमति दी गई है, वहीं दूसरी ओर कार्बन ट्रेडिंग के माध्यम जो व्यवस्था बनी है उसके चलते उत्सर्जन में कमी का दायित्व भी उन्हीं पर आ गया है । यह तो मुल्जिम को ही निर्णायक भूमिका निभाने जैसी स्थिति हो गई है । जिस तरह विश्व की मौद्रिक स्थिरता को वित्तिय संस्थाआें के भरोसे छोड़ देने से हम इस समय तीस के दशक के बाद की सबसे गंभीर मंदी के दौर से गुजर रहे हैं , उसी तरह वैश्विक तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को मुनाफाखोर बहुराष्ट्रीय कंपनियों तथा कार्बन ट्रेडिंग से विदेशी मुद्रा कमाने को लालायित विकासशील राष्ट्रों के भरोसे छोड़ दिए जाने से आने वाले समय में विश्व निश्चित रूप से व्यापक जलवायु संकट में फंस जाने वाला है । वर्तमान समय में विश्व ग्रीन हाउस गैसों के भारी मात्रा में उत्सर्जन के कारण तापमान वृद्धि और जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है । इस गंभीर खतरे से सीधे- सीधे निपटना आवश्यक हो गया है । जिन राष्ट्रों की कंपनियंा भारी मात्रा में ग्रीन हाउस गैसें का उत्सर्जन कर रही है,ं उन्हें कार्बन ट्रेडिंग जैसी सुविधा देने के स्थान पर उन पर इन गैसो के उत्सर्जन मेंएक निश्चित मात्रा में कमी करने का दायित्व डाला जाना चाहिए। कार्बन ट्रेडिंग के चलते तो ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की वर्तमान गैर - बराबर व्यवस्था ही सुदृढ़ हुई है । यह क्योटो समझौते की मूल भावना के साथ खिलवाड़ है । अगर विकसित राष्ट्रों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर ही कार्बन डाइ ऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी लाने का लक्ष्य निर्धारित कर दिया जाता तो निश्चित ही वे अपनी उन्नत शोध क्षमताआें का उपयोग साफ सुथरी टेक्नॉलोजी के विकास में करती और पूरा विश्व उससे लाभान्वित होता । जहां तक विश्व बैंक की `वन कार्बन भागीदारी सुविधा' का प्रश्न है , इसका लाभ लेने के लिए अनेक राष्ट्रों ने अपने यहां वनारोपण योजनाएं शुरू की हैं, वनों की सघनता में वृद्धि के प्रयास किए हें । ये योजनाएं व्यापक दृष्टि से तो विकासशील राष्ट्रों सहित पूरे विश्व के हित में हैं , परंतु इन योजनाआें के क्रियान्वयन में अनेक बार मानव अधिकारों के उल्लंघन के मामले सामने आये हैं और युगों से जंगलों में रह रहे वनवासियों को उजाड़ा जा रहा है । इस संदर्भ में एक मत यह भी है कि अगर विकासशील राष्ट्र समता और न्याय के आधार पर वायुमंडल में समान मात्रा में ग्रीन हाउस गैसों के अधिकर की मांग करते हैं तो उन्हें अपने अंदर सभी नागरिकों को भी समान मात्रा में इन गैसों के उत्सर्जन का अधिकार देना चाहिए । इन राष्ट्रों की वास्तविकता तो यह है कि इनमें राष्ट्रीय आय का वितरण विकसित राष्ट्रों की तुलना में अधिक विषम है । इस स्थिति पर भी रोक लगाई जानी चाहिए । निष्कर्ष यही निकलता है कि कार्बन ट्रेडिंग की व्यवस्था क्योटो समझौते की मूल भावना के विरूद्ध है । इस व्यवस्था से तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों को विश्व के वायुमंडल, समुद्र और वनस्पति जगत को प्रदूषित करने का लायसेंस मिल गया है । क्योटो समझौते को संपन्न हुए ११ वर्ष गुजर चुके हैं और सन् २०२० तक निर्धारित लक्ष्य की प्रािप्त् के लिए इतने ही वर्ष और शेष बचे हैं । आधी अवधि गुजर जाने के बावजूद विश्व में तापमा वृदि्घ में रोक लगता तो दूर, उसमें वृद्धि की प्रवृत्ति यथावत बनी हुई है । पिछले २०० वर्षोंा मे ंसर्वाधिक गरम वर्ष भी इन्हीं वर्षोंा में केन्द्रित रहे हैं । अगर हम विश्व तापमान में वृद्धि पर रोक तथा जलवायु परिवर्तन की समस्या का हल चाहते हैं तो विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनियों को कार्बन ट्रेडिंग की सुविधा समाप्त् करके उनके ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की सीमा निर्धारित करना होगी । तभी जाकर हम इस दिशा में कुछ प्रगति की अपेक्षा कर सकेंगें । ***ब्लड बैंक से रक्त खरीदना खतरनाक हो सकता है देश के कई ब्लड बैकों में `एलिजा' और `वेस्टर्न ब्लॉट टेस्ट'की सुविधा न होने के कारण यहां से खरीदा गया रक्त जानलेवा भी साबित हो सकता है । जांच सुविधा के अभाव में ऐसे खून में ह्यूमन एम्युनो डिफिशिंएसी वायरस हो सकते हैं । इन दोनों बातों की जांच एचआईवी स्क्रीनिंग के सिलसिले में की जाती है ं लेकिन इससे तीन हफ्ते से पहले इस वायरस का का पता लगाना असंभव होता है , क्योकि इस अवधि (विंडो पिरियड)के बाद ही ये खून में दिखाई पड़ते हैं ।

गुरुवार, 27 नवंबर 2008

८ वातावरण

बढ़ते तापमान की चुनौतियाँ
सुश्री सुनीता नारायण

कोयले से होने वाले उत्सर्जन और कोयले के अधिकाधिक इस्तेमाल स ेबचाव का एक रास्ता तो यह हो सकता है कि हम रीन्यूवेबल (नवीकरणीय) तकनीकों पर अपनी निर्भरता बढ़ाएँ । हमारे पास अपने ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव की क्षमता भी है क्योंकि अभी हम निर्माण क्षेत्र में निवेश कर ही रहे हैं । यानी हमारे पास विकल्प मौजूद हैं। नि:संदेह, उत्सर्जन में कमी लाने का एक बड़ा विकल्प बायोमास है । जलवायु में परिवर्तन अपरिहार्य है । लेकिन इधर जो परिवर्तन देखने में आ रहे हैं उनसे समूचे परिस्थितिकी तंत्र पर कहर टूट पड़ा है । यही नहीं इस परिवर्तन ने हमारी जीवन शैली, समाज और समुदायों के अस्तित्व को ही चुनौती दे डाली है । इस के मद्देनजर इस आधी सदी तक वैश्विक तापमान में ४ से ५ डिग्री तक की बढ़ोतरी से जुड़ी चेतावनी खतरे की घंटी है । इस मायने में कि इस तरह की चेतावनियाँ पहले भी आती रही है लेकिन उन्हें ध्यान में रखकर कहीं भी संजीदगी से कोई काम नहीं हुआ । बातें बहुत हुइंर्, तापमान को कम करने के उपायों पर चर्चाएँ हुई, लेकिन उन पर ईमानदारी से अमल शुरू नहीं हो सका। हाल ही में लंदन से आई चेतावनी हमें सचेत करती है कि तापमान को स्थिर बनाए रखने या आशंका के मुताबिक उसमें बढ़ोतरी को एक सीमा तक रोके रखने की दिशा में हमारे प्रयास अभी जमीनी स्तर पर शुरू ही नहीं हो सके हैं। आईपीसीसी (इंटर-गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाईमेट चेंज) ने अपनी एक रिपोर्ट में पिछले साल ही आगाह किया था कि जलवायु में गर्मी पर अब कोई संदेह नहीं रह गया है । विश्व की औसत हवा, महासागरों के बढ़ते तापमान, बड़े पैमाने पर बर्फ पिघलने और समुद्र - स्तर में बढ़ोतरी से अब यह साफ हो गया है कि धरती का तापमान बढ़ रहा है । वर्ष २००३ में भारत में मानसून से पहले चली गर्म हवाआें ने १४०० जानें ले ली । इसी साल अमेरिका पर ५६२ चक्रवातों का कहर टूटा जबकि इससे पहले १९९२ में वहाँ करीब ४०० चक्रवात आए थे । वर्ष २००७ में उत्तर ध्रुवीय सागर में सबसे ज्यादा बर्फ पिघलना भी इस बात की गवाही देता है कि तापमान में बढ़ोतरी हो रही है । एशिया में ग्लेशियरों के पिघलने से भारत, पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश में पानीकी उपलब्धता पर गहरा असर पड़ा है । मसूलाधार बरसात और तूफानों से पाकिस्तान में भारी तबाही हुई । जलवायु के इस कदर परिवर्तन से यह बात तो सिद्ध हो चुकी है कि ये बदलाव मानवीय गतिविधियों का ही नतीजा है । अगर तापमान में यह वृद्धि जारी रही तो वर्ष २१०० तक वैश्विक तापमान में ५ से ७ डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी हो सकती है । उस हालत में तूफानों की भयावहता बढ़ जाएगी, बर्फ तेजी से पिघलने लगेगी, गर्म हवाएँ अक्सर चलेंगी, समुद्र का जलस्तर भी तेजी से बढ़ेगा, विश्व की २५० मिलियन आबादी के लिए पानी मिलना दूभर हो जाएगा और ३० प्रतिशत प्रजातियों के विनाश का खतरा पैदा हो जाएगा । अगर कार्बन डाईआक्साइड कंसंट्रेशन की रेंज ३५०-४०० पीपीएम तक सीमित किया जा सका तो विश्व के औसत तापमान में बढ़त को २ से २.४ डिग्री सेल्सियस तक रोके रखा जा सकता है। हालाकि इसके बाद भी विश्व डेंजर जोन में तो पहुँच ही जाएगा । तापमान के लगातार बढ़ते साक्ष्यों और इस सचाई से विवादों की परतें हट जाने के बावजूद विश्व के अमीर देश जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं । ये देश जितनी मात्रा में ग्रीन हाउस उत्सर्जन कर रहे हैं उससे उभरते संसार के लिए कोई जगह ही नहीं बची है । यह उत्सर्जन लगातार बढ़ता चला जा रहा है । ईधन जलने से अमेरिका में मोटे तौर पर २० टन कार्बन डायऑक्साइड का उत्सर्जन होता है । प्रति व्यक्ति तुलना करने पर भारत में यह आँकड़ा १.१ और चीन में ४ टन ही बैठता है। इसमें संदेह नहीं है कि विकासशील मुल्क जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से जूझ रहे हैं। दूसरी तरफ अमेरिका और आस्ट्रेलिया जैसे अमीर देश उत्सर्जन के लिए भारत और चीन को ही ज्यादा जिम्मेदार मान रहे हैं । इनका कहना है कि जब तक भारत और चीन क्योटो प्रोटोकॉल पर दस्तखत नहीं करेंगे वे भी नहीं करने वाले । क्योटो प्रोटोकॉल को कमोबेश भुला ही दिया गया है । बहरहाल, जहाँ तक जलवायु परिवर्तन का ताल्लुक है विश्व के पास समय और विकल्पों की लगातार कमी हो रही है । तापमान को २डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने से रोकना वाकई एक बड़ी चुनौति होगी । इसके लिए उत्सर्जन में ५० से ८५ प्रतिशत तक की कमी लानी होगी । और वह भी २०५० तक। इसके लिए इंर्धन के इस्तेमाल की नीतियाँ बदलनी होंगी । इन चिंताजनक चुनौतियों से नरम विकल्पों के जरिए नहीं निपटा जा सकता। जहाँ तक ऊर्जा की बात है हमारे पास समय तो कम बचा ही है बजट भी पर्याप्त् नहीं रह गया है । इंटरनेशनल इनर्जी एजेंसी ने अपनी २००७ की एक रिपोर्ट में कहा है कि जिस दर से अभी उत्सर्जन हो रहा है उसमें भारी कटौती करनी पड़ेगी । लेकिन विकासशील विश्व के लिए इस चेतावनी के मायने क्या हैं ? खासकर तब जबकि ये देश ऊर्जा का इस्तेमाल अपनी जरूरत से कहीं कम कर रहे हैं । भारत में ऊर्जा क्षेत्र जटिल है । थार्मल पॉवर हमारे यहाँ उर्त्सजन के लिए मूल रूप से जिम्मेदार है । हालाँकि हमारे यहाँ बिजली पैदा करने के तमाम विकल्पों की तलाश की जा रही है लेकिन इसके लिए कोयले की खपत बढ़ना तय है । कोयले से होने वाले उत्सर्जन और कोयले के अधिकाधिक इस्तेमाल से बचाव का एक रास्ता तो यह हो सकता है कि हम रीन्यूवेबल (नवीकरणीय) तकनीकों पर बदलाव की क्षमता भी है क्योंकि अभी हम निर्माण क्षेत्र में निवेश कर ही रहे हैं । यानी हमारे पास विकल्प मौजूद हैं । निसंदेह, उत्सर्जन में कमी लाने काएक बड़ा विकल्प बायोमास है । लेकिन इसके लिए हरियाली बढ़ाने वाले रास्तों पर ईमानदारी से चलना पड़ेगा । ***
रतनजोत का तेल पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए घातक रतनजोत के उत्पादन व उपयोग को लेकर उठने वाले सवाल भी कम नहीं है । आस्ट्रेलिया समेत कई देशों ने इस पौधे को अवंाछित घोषित कर रखा है । शोधकर्ता बताते हैं कि थाईलैंड और अफ्रीकी देशों में पहले ही इस पौधे को बायोडीजल के बतौर इस्तेमाल करने का काम शुरू किया गया था लेकिन विभिन्न शोधों से पता चला कि रतनजोत का तेल पर्यावरण के लिए तो घातक है ही, मानव स्वास्थ्य के लिए भी यह लगभग जानलेवा हे । ऐसे निष्कर्षो के बाद इन देशोंमें रतनजोत के बीज से बायोडिजल की योजना ने दम तोड़ दिया । छ.ग. के युवा औषधि वैज्ञानिक व पर्यावरणविद पंकज अवधिया का कहना है कि बायोडिजल बनाने के लिए जिन सात पौधों का इस्तेमाल दुनियाभर में हो रहा है । उसमें रतनजोत अंतिम विकल्प माना जाता है । इसके पीछे रतनजोत के विषैले होने को मुख्य कारण बताते हुए वे कहते है, रतनजोत बेहद नुकसानदेह है । इसमें पाये जाने वाले करसिन की मारक क्षमता इस हद तक है कि इसका इस्तेमाल जैविक हथियार बनाने में किया जा सकता है । इसके तेल में १२ डी आक्सी, १६ हाईड्राक्सी और फोरबेल जैसे रसायन पाए जाते हैं, जिन्हें कैंसर व दूसरे त्वचा रोगों के लिए जिम्मेदार माना जाता है इसके अलावा रतनजोत से बनने वाला बायोडीजल फेंफड़ो को भी नुकसान पहुंचाता है ।

बुधवार, 2 जुलाई 2008

५ वातावरण

और कितने भोपाल ?
सुश्री रावलीन कौर
सुप्रसिद्ध साहित्यकार स्व. कमलेश्वर के उपन्यास का शीर्षक `और कितने पाकिस्तान' उस मानसिकता को उधेड़ता था जिसने पाकिस्तान का निर्माण किया है । भोपाल गैस त्रासदी भी एक ऐसी मानसिकता की द्योतक है जिसका एकमात्र लक्ष्य लाभ अर्जित करना है । विशेषज्ञों द्वारा यह माना जा रहा है कि हाल ही में गुजरात के भरूच में रासायनिक अपशिष्ट भंडार में लगी आग भोपाल गैस त्रासदी से भयावह रूप ले सकती थी । भरूच एन्वायरो इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (बी.इ.आय.एल.), अंकलेश्वर (गुजरात) जिसमें कीटनाशक क्षेत्र के महाकाय यूनाइटेड फास्फोरस की बड़ी हिस्सेदारी है, में गत ३ अप्रैल को लगी आग ने सिद्ध कर दिया है कि खतरनाक रासायनिक अपशिष्ट प्रबंधन के मामले में हमारा रवैया भोपाल गैस त्रासदी से भी सबक नहीं ले पाया है । भस्मक की प्रतिदिन उपचार क्षमता के विरूद्ध उस दिन यहां कुल १२,८०० टन खतरनाक रासायनिक तरल और अपशिष्ट तेल का भंडारण था जिसमें से २५० टन अपशिष्ट खतरनाक जहरीले कीटनाशकों का था । वह तो किस्मत अच्छी थी कि आग लगने के दस मिनट में ही हवा ने रूख बदल लिया वर्ना आग का फैलाव वहां स्थित अन्य कारखानों और गांवों में भी हो जाता और इसके फलस्वरूप होने वाले हादसे का आकार भोपाल त्रासदी से काफी बड़ा होता । आग पर भले ही २४ घंटे में काबू पा लिया गया हो लेकिन `डाउन टू अर्थ' की पड़ताल ने गया कि आसपास के गांवो के निवासियों में जहरीली गैस का असर आँखों और नाक की जलन, सांस की तकलीफ और कुछ मामलों में तो त्वचा पर चकत्ते और ज्वर के रूप में अब भी मौजूद है । आग के कारणोंका ठीक से खुलासा तो नहीं हुआ है किंतु गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और स्थानीय प्रशासन के प्रारंभिक आकलन के अनुसार यहां उपचार, भंडारण और अपशिष्ट प्रबंध सेवा (टीएसडीएफ) के कार्य में पर्यावरण और सुरक्षा नियमों की गंभीर अनदेखी की गई थी । टीएसडीएफ यूनियन कार्बाइड, भोपाल के अपशिष्ट उपचार का दस लाख डॉलर का ठेका भी हासिल करने का प्रयास कर रही है । औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा विभाग ने गुजरात कारखाना अधिनियम १९४८ के अंतर्गत बीइआयएल के विरूद्ध खतरनाक अपशिष्ट भंडारण के लिए दो शेडस की अनुमति के विरूद्ध सात शेडस बनाने का प्रकरण दर्ज किया है । प्रसंगवश यही वह सातवां शेड था जहां दुर्घटना हुई । मामले में और छानबीन जारी है । दुर्घटनास्थल, जहां पीपो में अपशिष्ट भंडारण किया जाता है से पहली बार शाम ५.३० बजे काला धुंआ उठता देखा गया था जिसकी सूचना प्रबंधन को तुरंत दी गई थी फिर भी महज दो किलोमीटर दूर स्थित आपदा सुरक्षा और प्रबंधन केन्द्र को इसकी सूचना ६ बजे मिल पाई । बीइआयएल से एक किलोमीटर दूर स्थित जिताली गांव के निवासियों ने पीपे हवा में उड़ते देखे लेकिन पंचायत भवन में कंपनी द्वारा स्थापित खतरे की सूचना देने वाला अलार्म नहीं बजा । बाद में जांच में पता लगा कि मूल प्रणाली को तार द्वारा जोड़ा ही नहीं गया था । अपने मोबाईल पर खींची दुर्घटना की तस्वीरें दिखाते हुए जिताली के रहवासी निलेश पटेल ने डाउन टू अर्थ को बताया कि जल्द ही अंधेरा छाने लगा एवं हवा इतनी कसैली हो गई थी कि सांस लेना मुश्किल हो रहा था । जिताली के पास के दो गांव सारंगपुर और ढढाल इनाम को भी खाली करने के आदेश दे दिए गए थे । चारों तरफ राख ही दिखाई दे रही थी । लोगों के घर की छत पर पत्थरों जैसी भारी वस्तुएं आ गिरी थीं वे सुबह तक जल रही थीं और उनमें से दुर्गन्ध निकल रही थी । हवा के रूख की ओर होने की वजह से जिताली सर्वाधिक प्रभावित रहा। अंकलेश्वर स्थित आपदा सुरक्षा एवं प्रबंधन केन्द्र के अग्नि एवं सुरक्षा प्रबंधक मनोज कोटड़िया का कहना था कि बीस किलोमीटर की गति से चलती हवा की वजह से धुंआ ठहर नहीं पाया और खाली जमीन की ओर इसके रूख की वजह से चारों ओर पड़े पीपों में आग नहीं लग पाई वर्ना बड़ा हादसा हो जाता । ढढाल इनाम में शाम को मदरसे से लौटते बच्चें ने जब धमाके की आवाज सुनी तो वे उत्सुकतावश उसी ओर भागे और धुएं की चपेट में आ गए । प्रदूषण के असर की जांच के लिए हवा में मौजूद जहरीली गैसों की पहचान आवश्यक होती है किंतु बीइआयएल अभी तक जलने वाले रसायनों के नामों का खुलासा नहीं कर पाया है । जबकि प्रबंधन केन्द्र के लिए अपेन यहां उपचार के लिए अपने वाले अपशिष्ट के प्रकार का रिकॉर्ड रखना और लेने से पहले उसकी जांच कर तस्दीक कर लेना कानूनन आवश्यक है । दुर्घटना के अगले दिन गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने हवा की जांच के लिए जिताली, बीइआयएल और एवेंटिस नामक दवा फैक्ट्री में मशीनें लगा दी थी। अधिकारियों ने बताया कि स्थिति आमतौर पर नियंत्रण में है । लेकिन जब उनका ध्यान डायोक्सिन, फ्यूरॉन और अन्य अत्यंत खतरनाक रसायनों के नमूने एकत्र न करने की ओर आकृष्ट किया गया तो गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पर्यावरण यंत्री आर.जी. शाह का जवाब था `इसका क्या फायदा ? हमारे देश में किसी भी प्रयोगशाला ने इनकी जांच की व्यवस्था ही नहीं है ।' हाँ धातुकणों के नमूने जरूर ४ अप्रैल को मुम्बई स्थित नेटेल इण्डिया लेब को भेज दिए हैं । डाउन टू अर्थ ने जब ८ अप्रैल की शाम को नेटेल से सम्पर्क किया तो पता चला कि नमूने अभी भी उन तक नहीं पहुंचे थे । यह भस्मक अपशिष्ट को बहुत ऊँचे तापमान पर जलाता है जिससे इसका जहर हवा में घुल नहीं पाता, जबकि दुर्घटना में यह काफी कम तापमान पर जला जिससे हवा दूषित होने और फलस्वरूप भूमि और जल के भी दूषित होने की निश्चित संभावना है । नियमों के मुताबिक कोई भी औद्योगिक ईकाई अपने परिसर में ९० दिनों से ज्यादा अपशिष्ट संग्रहित नहीं रख सकती है किंतु बीइआयएल ने ५० टन प्रतिदिन उपचार क्षमता के विरूद्ध १२,८२५ टन अपशिष्ट संग्रहित कर रखा था । बीइआयएल की अपशिष्ट उपचार की दर १५ रू. प्रति किलो है और वह इसे अग्रिम लेता है, इस तरह उसके यहां कुल भंडारित अपशिष्ट का उपचार मूल्य १९ करोड़ रूपया जो वह प्राप्त् कर चुका है फिर भी उसने उपचार नहीं किया है । बल्कि दुर्घटना ने तो उसे २५० टन अपशिष्ट जलाकर ३७.५० लाख रूपयों का फायदा करा दिया है । बीइआयएल अधिकारियों, पुलिस और जिला प्रशासन अधिकारियों ने आग के कारणों पर चुप्पी साथ ली । जिला आपदा दल के शीर्ष अधिकारी जिलाधिकारी द्वारा संयोजित तीन सदस्यीय समिति ने अपनी रपट ९ अप्रैल को सौंप दी जिसमें उन्होंने दुर्घटना का निश्चित कारण जान सकने में असफलता स्वीकार की और संभावित कारण अपशिष्ट और लोहे के पीपों की बीच पायरोफोरिक रासायनिक क्रिया माना । रपट में अपर्याप्त् सुरक्षा उपायों की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया गया । जिसमें गैस रिसाव से आग टकराने वाले सेंसरों का कार्यरत न होना, खतरनाक रसायनों की पहचान न किया जाना, उन्हें अलग-अलग संग्रह न किया जाना, आग से बचाव के लिए समुचित उपकरण न होना आदि शामिल हैं । गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव संजीव त्यागी ने कहा कि कंपनी के विरूद्ध प्राथमिकी दर्ज करवाना हमारे क्षेत्राधिकार में नही है । जबकि मामाल निश्चित रूप से लापरवाही का है और आग मानव द्वारा लगाई गई प्रतीत होती है । एक बार निश्चित कारणों का पता लगने पर हम पर्यावरण नियमों के तहत कार्यवाही करेंगे । दुर्घटनास्थल पर कुछ और जानकारियां भी मिली हैं । जैसे कंपनी की ओर से फायर हाइड्रेंट की कोई अवस्था नहीं थी । दमकल कर्मचारियों को आग बुझाने में बड़ी मशक्कत करना पड़ी । सड़क बहुत सकरी होने और गहरे धुंए के कारण दमकल पहुंचने के लिए परिसर की पिछली दीवार का एक हिस्सा तोड़ना पड़ा । स्थानीय चिकित्सक के मुताबिक अगर मजदूर अंदर फंसे होते तो स्थित और खराब होती क्योंकि बाहर निकलने के लिए वहां कोई आकस्मिक दरवाजा भी नहीं है । दुर्घटना की अगली सुबह यहां लोगों को तेल और कीचड़ से सना पाया गया । यह सब कुछ जमीन के अंदर रिसेगा। यहां के कर्मचारी भी मास्क की कमी और थकान की शिकायत करते हैं । इस तरह के उपचार स्थलों पर तो सामान्य से ज्यादा निरीक्षण और सुरक्षा उपायों की दरकार होती हैं किन्तु इस मामले में तो ठीक इसका उल्टा हो रहा है । ***

शनिवार, 12 जनवरी 2008

१० वातावरण

ग्लोबल वार्मिंग : जिम्मेदारी से भागता अमेरिका
जे. सकलेचा
कुछ साल पहले पर्यावरण कार्यकर्ता प्रोफेसर वांगारी एम. मथाई को शांति का नोबेल पुरस्कार दिए जारे पर उसे पर्यावरण के प्रति समर्पण का `सम्मान' निरूपित किया गया था । अब इस साल फिर यह प्रतिष्ठित सम्मान पर्यावरण के क्षैत्र को समर्पित किया गया है । यह पुरस्कार जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा गठित अंतर्राष्ट्रीय समिति (आइ्रपीसीसी) और अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति अलगोर को संयुक्त रूप से देने की घोषणा की गई है । नोबेल पुरस्कार की इस घोषणा से साफ है कि जलवायु परिवर्तन, खासकर वैश्विक गर्माहट (ग्लोबल वार्मिंग) में बढ़ोतरी को लेकर दुनिया की चिंता बढ़ती जा रही है । विडंबना यह है कि जिस देश के एकपूर्व उपप्रमुख को यह पुरस्कार देने का ऐलान किया गया है , वही देश वैश्विक तापमान को बढ़ाने में सबसे आगे है । जी हां, यहां बात उसी अमरीका की हो रही है जो विश्व स्तर पर एक चौथाई ग्रीन हाउस गैस उगलकर ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने में सर्वाधिक `योगदान' दे रहा है । नीम पर करेला यह कि उसने क्योटो संधि के अनुमोदन से भी इंकार करके इसकी सफलता पर ही सवालिया निशान लगा दिया है । ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने से चिंतित विश्व समुदाय ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव को कम करने के मकसद से इस संधि पर राज़ी हुआ है, लेकिन अमेरीका ने अपने `राष्ट्रहित' के नाम पर इसे पलीता लगाकर मानव जाति के कल्याण की सामूहिक वैश्विक प्रतिबद्धता की भावना को ताक पर रख दिया है । हम आगे बढ़ें, उससे पहले एक नजर क्योटो संधि पर डाल लेते हें । क्योटो प्रोटोकॉल या संधि को लेकर दिसंबर १९९७ में जापान के क्योटो शहर में वार्ताआे का क्रम शुरू हुआ था। इसी वजह से इसे `क्योटो संधि' नाम दिया गया हे । नवंबर २००४ में रूस द्वारा अनुमोदन के बाद इसके क्रियान्वयन का रास्ता साफ हो गया । यह १६ फरवरी २००५ से लागू कर दी गई । यह संधि विश्व के औद्योगिक देशों को छह ग्रीनहाउस गैसों - कार्बन डाइऑक्साईड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साईड, सल्फर हेक्साफ्लोराइड, एचएफसी और पीएफसी में एक निश्चित सीमा तक कटौती करने को आध्य करती है । इसके तहत वर्ष २०१२ तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के स्तर को १९९० के स्तर से ५.२ फीसदी कम करना है । वैसे विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वाकई अस लक्ष्य को हासिल कर लिया जाता है प्रभावी तौर पर यह कटौती २९ फीसदी तक होगी। इस प्रकार बढ़ते वैश्विक तापमान के इस दौर में यह संधि पूरी मानव जाति के लिए वरदान साबित हो सकती है । लेकिन अड़ंगा है तो केवल अमरीका का। अमरीका ने इसका अनुमोदन करने से अंकार कर दिया। हालांकि पूर्व डेमोक्रेट राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने इस पर हस्ताक्षर किए थे लेकिन २००१ में जार्ज डब्ल्यू. बुश के राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने इसे अनुमोदन के लिए कांग्रेस में पेश नहंी किया । बुश ने संभवत: ऐसा सीनेट में इस तरह की किसी संधि के खिलाफ ९५-० से पारित एक प्रस्ताव के मद्देनजर किया था । सीनेट का कहना था कि वह ऐसी किसी `भेदभावपूर्ण' वैश्विक संधि का समर्थन नही कर सकती जो केवल औद्योगिक देशों पर बंधनकारी हो । यहां एक सवाल उठता है कि नोबेल पुरस्कार विजेता अल गौर अगर राष्ट्रपति होते तो कया वे अमरीकी संसद को ऐसी संधि के अनुमोदन के लिए मना पाते । वर्ष २३००० के राष्ट्रपति चुनाव मे बुश के ख्लिाफ अल गौर ही डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मदीवार थे और विवादास्पद मतगणना मेंबहुत ही कम अंतर से पराजित हुए थे । अल गोर दुनिया के उन चुनिंदा राजनीतिज्ञों में शामिल हैं , जो राजनीति की शतरंज पर मोहरे चलने के साथ- साथ पर्यावरण संरक्षण के प्रति भी सक्रिय रहे हैं। उप राष्ट्रपति के पद पर रहते हुए वर्ष १९९४ में उन्होंने पृथ्वी दिवस के दिन विद्यार्थियों में पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागृति पैदा करने के मकसद से `ग्लोब कार्यक्रम' शुरू किया था । उनकी चिंता के केन्द्र में ग्लोबल वार्मिंग सदैव से रहा है । वे जगह-जगह घुमकर इसके खतरों के प्रति अलख जगाते आए हैं । उनके संगठन `सेव अवरसेल्व्स' के तत्वावधान में ७ जुलाई २००७ को `लाइव अर्थ' नाम से संगीत कार्यक्रम का आयोजन किया गया था जिसमें संगीत के क्षैत्र की कई हस्तियों ने भागीदारी की थी । गोर ने क्योटो संधि की भी जोरदार पैरवी की है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि अमरीका के अन्य राजनेताआे की सोच उनकी जैसी नहीं है वे ऐसी किसी भी संधि को मानने को तैयार नहीं है जो अमरीका की अर्थव्यवस्था पर विपरीत असर डाले । सवाल यह है कि कया अमरीका भी भागीदारी के बगैर क्योटो जैसी संधियों की कोई प्रासंगिकता है ? दिक्कत यह है कि अमरीका ऐसी संध्यिों को मानने को बिल्कुल तैयार नहंी है क्योंकि इसमें उसके आर्थिक हित आड़े आते हैं । अमरीका की जैसी नीति रही है, उसके चलते आगे भी उससे कोई विशेष उम्मीद नही रखी जा सकती और फिलहाल तो अमेरीका की अर्थव्यवस्था डांवाडोल चल रही है , डॉलर न्यूनतम स्तर पर है और `यूरो' के साथ संघर्षशील है , कच्च्े तेल की कीमते १०० डॉलर प्रति बैरल तक जा पहुंची है । ऐसे में अमरीका नहीं चाहेगा कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर उसकी अर्थव्यवस्था को कोई और धक्का लगे । लेकिन आईपीसीसी की हाल ही जारी रिपोट्र के संदर्भ में एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि आखिर अमरीका इस दुनिया में अपनी `बादशाहत' कायम करके कया पाना चाहेगा जो शायद अगले कुछ दशकों में रहने लायक भी नहीं बचेगी । आईपीसीसी ने १७ नवंबर को स्पेन के वैलेंशिया में जारी अपनी चौथी और अंतिम रिपोर्ट में कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि ग्लोबल वार्मिंग की क्षतिपूर्ति नहीं हो पाएगी । इसके दुष्प्रभाव से कोई भी देश नहीं बच पाएगा । सैकड़ों वैज्ञानिकों व पर्यावरण विशेषज्ञों द्वारा तैयार इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता असंदिग्ध है, इस पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता । शायद खुद अमरीका भी इसके निष्कर्षो से असहमति नहीं जता सकता । इसलिए इस रिपोर्ट की उपरोक्त चेतावनी से भी वह शायद ही असहमत होगा कि ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभावों से कोई भी देश नहीं बच सकता । यह सच है कि गरीब व विकासशील देशों को इसकी ज्यादा कीमत चुकानी होगी, लेकिन अमरीका जैसे विकसित देश भी इसके प्रभाव से अछूते नहीं रह पाएंगे । आखिर ऐसे किसी कवच का निर्माण तो अब तक अमरीका भी नहीं कर पाया है और न ही कर पाना संभव है कि बाहर पूरी दुनिया जलती रहे और वह कवच के भीतर बैठकर खुद को सुरक्षित महसूस कर सके । अंत में आईपीसीसी के अध्यक्ष डॉ. आर.के. पचौरी का यह कथन महत्वपूर्ण है जो उन्होंने अंतिम रिपोर्ट जारी करते हुए व्यक्त किया था, ``हमें अब उन मूल्यों या नैतिकता की जरूरत है जिनमें हर मानव अपनी जीवन प्रणाली व व्यवहार में बदलाव कर उस चुनौती का सामना करने के लिए कमर कस सके जो हमारे सामने पेश आ रही है ।'' क्या अमरीकी शासन इस पर ध्यान देंगे ? आखिर इस दुनिया को तपने से बचाने की जिम्मेदारी केवल मथाई, बहुगुणा, पचौरी या अल गोर की तो नहीं है ! ***

मंगलवार, 26 जून 2007

४ वातावरण

४ वातावरण
भारत ग्लोबल वॉर्मिंग का सामना कैसे करे ?
सुश्री रेशमा भारती
हाल के समय में हुए कई वैज्ञानिक अध्ययन-अनुसंधानों और विश्व के कई भागों में प्रकट जलवायु परिवर्तन की विकट स्थितियों ने ग्लोबल वॉर्मिंग के संकट की गंभीरता को प्रकट किया है और इसका सामना करने के लिए बिना विलंब के ठोस व अहम कदम उठाने की जरूरत पर बल दिया है ।
विश्व भर में इस संकट का सामना करने के लिए ग्रीन हाऊस गैसोंके बढते उत्सर्जन को कम करने की बुनियादी जरूरत को महसूस किया जा रहा है । औद्योगीकरण, मशीनीकरण वाली दुनिया में इसे एक गंभीर चुनौती माना गया है ।
तेजी से विकसित होती भारत की अर्थव्यवस्था भी काफी ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन की स्थिति पैदा कर रही है । कार्बन डायॉक्साइड के उत्सर्जन में भारत विश्व के चार-पाँच प्रमुख देशों में से एक है ।
इंटरगर्वंमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आई.पी.सी.सी ) के अध्यक्ष डॉ. आर.के. पचौरी का मानना है कि जलवायु परिवर्तन का सामना करने के संदर्भ में भारत को एशिया में प्रमुख सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए ।
सवाल उठता है कि ग्लोबल वॉर्मिंग का सामना करने के लिए भारत कौन-सा मार्ग अपनाएगा ? क्या वह आकर्षक दिखने वाले उस गैर टिकाऊ व विसंगतिपूर्ण विकास को अंधाधुंध अपनाएगा जिस पर चलकर स्वयं कई विकसित देश आज थके हुए व हताश मालूम होते हैं? तब तो शायद वह भी स्वयं को महज कुछ ग्रीन व ईको फैं्रडली दिखाकर फील गुड करके संतुष्ट हो लेगा ! अथवा क्या भारत कई अन्य देशों की स्थिति व स्वयं अपने अतीत के अनुभवों से ठोस सबक लेता हुआ वैकल्पिक विकास की नई राहें तलाशेगा ? ग्लोबल वॉर्मिंग का सामना करने में कई विकसित देशों की दोहरी नीतियों पर भारत का क्या रूख होगा ?
बेलगाम बढता औद्योगिकरण, मशीनीकरणण, शहरीकरण बिजली की खपत को बेइंतहा बढा रहा है । जहां एक ओर कोयला तेल जैसे जीवाश्म इंर्धनों की खपत को कम करना जरूरी है; वहीं दूसरी ओर यह समझना भी जरूरी है कि ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोतों की भी अपनी कई सीमाएं हैं ।
बडी पनबिजली योजनाआें से जुडे पर्यावरण संबंधी नुकसानों, विस्थापन, बाढ की बढती समस्या, दुर्घटनाआें की संभावना, अपेक्षित लाभ न मिल पाना, सिकुडते ग्लेशियरों के चलते इनके अनिश्चित भविष्य ने इनपर कई सवाल खडे किए हैं। कई वैज्ञानिकों-पर्यावरणविदों ने बांधों के जलाशय की सतह से व पनबिजली सयंत्र संचालन के दौरान होने वाले ग्रीन हाऊस गैस उत्सर्जन की समस्या पर भी ध्यान दिलाया है ।
परमाणु ऊर्जा में रेडियोएक्टिव कचरे से होने वाले प्रदूषण की गंभीर समस्या है जो भूमिगत जल में भी फैल सकता है और शेष पर्यावरण में भी । परमाणु ऊर्जा सयंत्रों में दुर्घटना व चोरी की संभावना भी मौजूद रहती है । परमाणु इंर्धन की मौजूदगी अधिकाधिक हिंसक होती दुनिया में अपने आप में खतरा तो उपस्थित करती ही हैं ।
ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोतों के रूप में सौर व पवन ऊर्जा को भी महत्त्वपूर्ण माना गया है । बिजली की बचत करने वाली तकनीकों को भी प्रोत्साहन मिल रहा है ।
हर संभव तरीके से बिजली की बचत करने वाली तकनीकों को भी प्रोत्साहन मिल रहा है ।
हर संभव तरीके से बिजली की बचत करना आज की जरूरत है । अधिक बिजली खींचने वाले उपकरणों जैसे ए.सी., फ्रिज (जो ओजोन परत को भी नुकसान पहुँचाते हैं), कम्प्यूटर आदि का उपयोग यथासंभव सीमित किया जाए । इसके प्रति विशेष सजग रहा जाए कि जब जरूरत न हो तब बिजली के उपकरण अवश्य बंद रहें। बिजली की जरूरतों को कम करना प्राथमिकता होनी चाहिए । विकल्पों को भी अंधाधुंध नहीं अपनाया चाहिए और वैकल्पिक वस्तुआें को अपनाते हुए इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि क्या समाज में मेहनतकश गरीबों के लिए वैकल्पिक रोजगार भी पनप रहे हैं या नहीं।
बढती कार्बन डायॉक्साइड को एकत्र कर भूमिगत या समुद्र की गहराईयों में छोड देना धरती व समुद्र की प्रकृतिपर बोझ तो होगा ही; साथ ही इस प्रक्रिया के दौरान भी कार्बन डायॉक्साइड वातावरण् में छूट सकती हैं और यह खतरा पैदा करती हैं ।
बायोइंर्धन के अंधाधुंध प्रसार पर भी सवाल उठे हैं । इसके कच्च्े माल की खेती के अंधाधुंध प्रसार से पर्यावरण, जैव विविधता, सीमित भूमि संसाधन पर पडते दबावों और इसकी रसायनयुक्त खेती के प्रसार से मोनोकल्चर को मिलता बढावा सवालों के घेरे में है । बायोइंर्धन निर्माण प्रक्रिया व ट्रांसपोर्ट में होते ग्रीन हाऊस गैस उत्सर्जन पर भी चिंता प्रकट हुई है । वस्तुत: इंर्धन की खपत ही कम करना प्राथमिकता होनी चाहिए ।
वाहनों के संदर्भ में अपेक्षाकृत कम प्रदूषण करने वाली तकनीकों व इंर्धनों को कई जगह बढावा दिया जा रहा है । सार्वजनिक वाहनों की गुणवत्ता में सुधार व उनको बढावा दिया जाना चाहिए । साथ ही, बेलगाम बढते निजी वाहनों पर नियंत्रण बहुत जरूरी है । कुछ पश्चिमी देशों में सुव (डणत) जैसे बडे व काफी प्रदूषण करने वाले वाहनों पर कुछ सीमाएं लगायी जा रही हैं । हमें भी इससे सबक लेना चाहिए। एक विरोधाभास देश की राजधानी दिल्ली में यह देखा जा रहा है कि सडके चौडी करने व बेहतर सार्वजनिक वाहन सेवा की व्यवस्था के नाम पर बडी संख्या में पेड काटे जा रहे है ! इस तरह के दोहरे मापदण्डो से अंतत: पर्यावरण् की क्षति ही होती है ।
वायुयानों से होने वाला काफी ग्रीन हाऊस गैस उत्सर्जन सीधा वायुमण्डल की ऊपरी सतहों को प्रदूषित करता है, ओजोन परत को नुकसान पहुँचाता है वायुमण्डल का रेडियोएक्टिव संतुलन बिगाडता है । बेइंतहा बढती हवाई यात्राआें को सीमित करना प्राथमिकता होनी चाहिए।
साईकिल, साईकिल रिक्शा व पैदल चलने वालों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए । घर व कार्यस्थल की दूरियों को यथासंभव कम करने की दिशा में भी सोचा जा सकता है । इसके अतिरिक्त निजी मोटर वाहनों का सोच समझकर किया गया सीमित उपयोग ठीक रहेगा जैसे सामान्य कम दूरी के कामों के लिए मोटर वाहन का उपयोग न करना, अपने वाहनों में यथासंभव परिचितों के साथ मिलकर यात्रा करना आदि सुलभ उपाय हैं।
हर तरह से जल-संरक्षण को बढावा देना जरूरी है । वर्षा जल संचयन की पद्धतियों को बढावा मिलना चाहिए और परम्परागत जल संरक्षण विधियों से भी सीखा जाना चाहिए। परम्परागत जल स्त्रोतों की देखरेख व वृक्षारोपण को प्रोत्साहन मिलना चाहिए।
कार्बन ट्रेडिंग वस्तुत: ग्लोबल वॉर्मिंग का सामना करने के नाम पर भ्रमपूर्ण स्थिति ही अधिक पैदा करती है और कुछ संकीर्ण हितों की पूर्ति करती है। जहां एक ओर महज कार्बन क्रेडिट में निवेश करके विकसित देश अपना ग्रीन हाऊस गैस उत्सर्जन बढाते रहते है; वहीं दूसरी ओर विकासशील देशों में इस ट्रेडिंग के अंतर्गत होने वाले प्रोजेक्ट भी ग्रीन हाऊस गैस उत्सर्जन में काई वास्तविक व उल्लेखनीय कटौती करने के स्थान पर कई बार कुछ नई समस्याएं ही पैदा कर देते हैं (जैसे परम्परागत जंगलों को काटकर किसी नए किस्म के पेड-पौधे का प्रसार अथवा मोनोकल्चर को मिलता बढावा)।
गांवों में जलवायु परिवर्तन की मार झेलते कृषकों व अन्य ग्रामवासियों को विशेष सहायता की जरूरत है। परम्परागत जल स्त्रोतों के उत्थान और बिजली-पानी की बचत की ओर ध्यान देना होगा। गैर रसायनिक, गैर मशीनीकृत, गैर जी.एम., परम्परागत खेती की ओर लौटना होगा और जलवायु परिवर्तन की नई चुनौतियों का सामना करने के अनुरूप कदम खेती में उठाने होंगे। जलवायु बदलाव व प्राकृतिक आपदाआें के दौर में गांवों से बढते पलायन को कम करने के लिए गांवों में छोटे स्तर के श्रम प्रधान, उत्पादनात्मक, रचनात्मक व गांवों की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति में आत्मनिर्भरता लाने वाले रोजगारों का सृजन करना होगा।
यह सब तभी संभव है जब भूमण्डलीकरण की ताकतों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट व उसके चलते गांववासियों को उनके जल-जंगल-जमीन से वंचित किए जाने का अन्यायपूर्ण सिसलिता थमेगा।
बढते उपभोक्तावाद, बढती विषमता, बेलगाम बढते औद्योगिकरण-मशीनीकरण और प्राकृतिक संसाधनों की अन्यायपूर्ण लूट की प्रक्रिया प्राकृतिक असंतुलन और ग्लोबल वॉर्मिंग को बढाएगी ही। ग्लोबल वॉर्मिंग की प्रकट होती गंभीर चुनौती विकास के इस प्रचलित रास्ते पर प्रश्नचिह्र लगाती है और संतोष, सादगी, समता व प्राकृतिक जीवन शैली के महत्व को उभारती है। ***

गुरुवार, 31 मई 2007

गंदगी से फैलता जहर

वातावरण

गंदगी से फैलता जहर

कुशलपाल सिंह यादव

नागरीय निकाय अपना इलाका साफ रखने के लिए अभी तक तो अपने आस-पड़ौस को ही प्रदूषित कर रहे थे। अब तो वे दूसरे राज्यों में जंगलों इत्यादि में कचरा फेंककर पर्यावरण को जबरदस्त नुकसान पहुंचा रहे हैं। वहीं इस कचरे से बिजली उत्पादन करने वाले संयंत्र भी बड़े स्तर पर प्रदूषण फैला रहे हैं।

दिसम्बर २००६ में कोची नगर निगम ने अपशिष्ट निपटान का एक अद्भुत तरीका इजाद किया। इसके अंतर्गत उन्होंने कचरे से भरे ट्रकों को न केवल नजदीकी जिलों के गांवों में, बल्कि नजदीक के राज्यों में भी खाली करने को भेज दिया। इस कचरे को ले जाने हेतु एक ठेकेदार से १३६५ रुपये प्रति टन का भाव तय हुआ था। विचारणीय तथ्य यह है कि नगर निगम ने ठेकेदार से यह पूछने का कष्ट भी नहीं उठाया कि वह यह कचरा कहां फेंकेगा और यह कि क्या उसमें उन गांवों से अनापत्ति प्रमाण-पत्र ले लिया है जहां पर कि यह कचरा फंेका जाना है।

कुछ ही दिन पश्चात् कचरे से लगे १९ ट्रकों का काफिला पड़ौसी कर्नाटक राज्य के बंदिपुर राष्ट्रीय पार्क के मुलाहल्ला वन नाके पर पहँुचा। ये ट्रक केरल के पाँच जिलों को पार करके उस नाके से करीब २० किमी. दूर गुंडुल्पेट नामक छोटे से गांव में कचरा फेंकने जा रहे थे। वन रक्षक ने इस हेतु आवश्यक कागजों की मांग करने पर ट्रक ड्राईवरों ने कोची नगर निगम और ठेकेदारों के बीच हुआ अनुबंध उसे दिखाया। ड्राईवरों को उस रात नाके पर ही रोक लिया गया। अगले दिन मामला निपटा दिया गया और उस कचरे को वहीं पास की किसी निजी भूमि पर डाल दिया गया।

स्थानीय निवासियों ने नगर निगम को लज्जित करते हुए इसका भरपूर नैतिक विरोध किया। केरल और तमिलनाडू के सीमावर्ती क्षेत्रों जैसे कम्बामेट्टू आदि जगह तो ट्रक ड्राईवरों से झूमा-झटकी भी की गई। इस कारण ये वाहन कचरा फेंकने का स्थान ढूंढने के लिये इधर-उधर मारे-मारे फिरते रहे। इसी क्रम में ४ जनवरी २००७ को आठ ट्रकों द्वारा पालक्कड़ जिले के नेल्लीप्पेली के नजदीक स्थित वीरान्दोट्टा में कचरा फंेंकने को लेकर पुलिस में रिपोर्ट करने गये व्यक्तियों ने इतना उग्र प्रदर्शन किया कि पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा। इस सबके चलते नगर निगम ने एक अन्य ठेकेदार को यह ठेका दे दिया जिसके बारे में कहा जा रहा है कि उसके पास इस अपशिष्ट के निपटान हेतु गुड्डालोटे में जमीन व आवश्यक संसाधन उपलब्ध है।

कोची नगर निगम द्वारा हड़बड़ी में लिये जा रहे कदमों पर विचार करना आवश्यक है। ७ लाख जनसंख्या के इस शहर में अपशिष्ट निपटान का कोई ठीक-ठाक प्रबंध नहीं था। पूर्व में जो भूमि इस हेतु ली गई थी वह उस पानी के स्त्रोत के मुहाने पर भी जिससे कि पानी नदी में पहँुचता है। इसके अतिरिक्त चार गांवों के निवासी न केवल पीने के पानी हेतु इस पर निर्भर हैं बल्कि ३०० मछुआरों के परिवारों की जीविका भी इसी पर निर्भर है। इसके विरोध में ग्रामवासियों ने आंदोलन किया और अंतत: वह स्थान बदल गया।

इन सब विवादों के चलते कोची नगर निगम ने कोचीन पोर्ट ट्रस्ट के नजदीक की अपने स्वामित्व की जमीन जो कि वेलिंगटन द्वीप पर स्थित भारतीय नौ सेना के दक्षिणी कमान के पास स्थित थी पर कचरा निपटान का कार्य प्रारंभ किया। नौसेना ने थोड़े समय के लिये कि जब तक निपटान का यथोचित तंत्र खड़ा न हो जाए अनुमति भी दे दी। पर जब इससे समस्या खड़ी होने लग गई तो नौसेना ने नगर निगम से चर्चा की। क्योंकि कचरे की वजह से वहाँ आ रहे पक्षियों के कारण विमान वाही पोत गरुड़ के विमानों को खतरा पैदा होने लगा था।

इसी दौरान केरल उच्च न्यायालय ने नगर निगम को निर्देशित किया कि वह ब्रह्मापुरम में अपशिष्ट निपटान का कार्य करे। साथ ही न्यायालय ने पुलिस को आदेश दिया कि गांववासियों के विरोध के चलते वे अधिकारियों को संरक्षण प्रदान करें।

दूसरी ओर न्यायालय इस बात पर भी विचार कर रहा है कि क्या निगम ने ठोस अपशिष्ट निपटान की विस्तृत योजना उसके सम्मुख प्रस्तुत न कर उसकी अवमानना की है? इसी दौरान निगम ने पुन: अपशिष्ट निपटान के स्थल में परिवर्तन का मन बना लिया है।

अनुमान है कि केरल में प्रतिदिन ३००० टन कचरा पैदा होता है। इसमें से आधे से भी कम इकट्ठा होता है और उसमें से भी बहुत ही थोड़ी मात्रा को पुर्न:चक्रण (रिसायकल) किया जाता है एवं बाकी का या तो पानी के स्थानीय स्त्रोतों या बहुत ही नजदीक के क्षेत्रों में भराव के काम में ले लिया जाता है।

शहरी भारत में अनेक स्थानों पर कचरे से निपटने की तथाकथित कार्यवाहियाँ चल रही हैं। गुजरात के सूरत नगर निगम ने शहर के पश्चिम में करीब १५ किमी. की दूरी पर ३.६ हेक्टेयर खारे पानी वाली भूमि को कचरे से भरने हेतु नियत किया है। तीन वर्ष पूर्व निर्मित यह स्थान अभी भी प्रयोग में नहीं आ रहा है। इसकी वजह यह है कि गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने वहां पर कचरे के भराव की अनुमति नहीं दी है। इस संदर्भ में बोर्ड ने ठोस अपशिष्ट निवारण नियम २००० का कड़ाई से पालन करवाने का निश्चय किया है। जिसके अंतर्गत सिर्फ वो ही कचरा भरा जा सकता है जिसका पुर्न:चक्रण नहीं किया जा सकता हो। चंूकि निगम के पास दोनों तरह के अपशिष्टों को अलग-अलग करने की व्यवस्था नहीं है अतएव वह इसका उपयोग नहीं कर पा रहा है।

जहां सूरत और कोची के माध्यम से कचरे के भराव में आने वाली मुश्किलों पर प्रकाश पड़ा है वहीं इस दौरान कचरे से उर्जा जैसे संयंत्रों के प्रति भी अतिरेक भरा उत्साह भी पैदा हो गया है। इसकी खास वजह है कि इस पर सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी।

केन्द्रीय वैकल्पिक उर्जा मंत्रालय (न्यू एवं रिन्यूवेबल एनर्जी) इस हेतु ब्याज पर २ करोड़ रुपये तक की छूट उपलब्ध करवाता है। इतना ही नहीं इसमें अनेक अन्य सुविधाआें के साथ ही साथ ३० वर्षोंा तक मुफ्त कचरा उपलब्ध कराने का आश्वासन भी शामिल है। यह नीति व्यापारियों को इस तरह प्रोत्साहित करती है, जिससे सरकार और व्यापारियों की बंदरबाट चलती रहती है। इसके बावजूद इस तरह के मात्र चार संयंत्र अभी तक भारत में सामने आए हैंं। ये हैं आंध्रप्रदेश के हैदराबाद व विजयवाड़ा, उत्तरप्रदेश में लखनऊ और दिल्ली। इसमें से दिल्ली का संयंत्र सन् १९९० में प्रारंभ हुआ और मात्र २१ दिन चलकर अभी तक बंद है। लखनऊ के संयंत्र की नींव सन् १९९८ में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने रखी थी, परंतु वह अब तक प्रारंभ नहीं हो पाया है।

वहीं हैदराबाद के नजदीक सेल्को इण्डस्ट्रीज द्वारा सन् १९९० में प्रारंभ हुए संयंत्र में हैदराबाद के कचरे के निपटान के कारण समीपस्थ भू-जल पूरी तरह से दूषित हो गया है। यहां स्थित घरों में लोगों को बोतलबंद पानी खरीदकर पीना पड़ रहा है। परंतु बोतलबंद पानी से खेती संभव तो नहीं हो सकती, अतएव वहां पर खेती पूर्णतया समाप्त हो गई है। इसी के साथ खुले में पड़े कबाड़ जिसमें प्लास्टिक और अन्य जहरीले पदार्थ जैसे बैटरी, टूटे थर्मामीटर, रयासन रखने के डिब्बे आदि के जलने से आसपास का पूरा वातावरण दूषित हो गया है। सन् २००१ में आसपास की तीन छोटी बस्तियों के बाशिंदे १५ दिनों तक संयंत्र के दरवाजे पर धरने पर बैठे रहे। इसी दौरान आंध्रप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पानी की जांच में पाया कि भू-जल पूरी तरह से प्रदूषित हो चुका है। इसमें तेजाब, क्लोराईड, सल्फेट और नाईट्रेट की मात्रा अत्यधिक हो गई है जिससे कि कैंसर जैसी बीमारियां भी हो सकती हैं। जिसके पश्चात् संयंत्र पर रोक लगा दी गई। परंतु संयंत्र के मालिक ताकतवर लोग थे अतएव एक महीने में ही उक्त आदेश वापस ले लिया गया।

इसी दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने इस तरह के संयंत्रों की जांच हेतु कमेटी गठन करने का आदेश दिया। परंतु जो कमेटी गठित हुई उनमें से अधिकांश सदस्यों का इन संयंत्रों के विकास में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहयोग रहा था। अतएव इसके सदस्यों ने अलग-अलग मन्तव्य की रिपोर्ट प्रस्तुत की। वहीं विशेषज्ञों का साफतौर पर मानना है कि अपशिष्ट उर्जा संयंत्र गर्म देशों में सफल हो ही नहीं सकते। दूसरी ओर आर्थिक रुप से भी ये लाभप्रद नहीं है। क्योंकि इनमें हमारे जैसे देश में यदि १०० इकाई कचरा डाला जाए तो २५ इकाई ऊर्जा मिलती है वहीं ठंडे व यूरोपीय देशों में ३४ यूनिट तक ऊर्जा प्राप्त होती है।

इसके बावजूद मंत्रालय ने सितंबर २००६ में फरमान निकाला कि बड़े शहरों के आसपास ऐसे १००० संयंत्र लगाये जाएं। दूसरी ओर योजना आयोग का कहना है कि कम्पोस्ट संयंत्रों में निर्मित जैविक खाद पर सब्सिडी देने का प्रावधान हो, क्योंकि भारत मात्र रासायनिक खादों पर ही १४००० करोड़ की सब्सिडी दे रहा है।

आज आवश्यकता है कि अपशिष्ट प्रबंधन को संस्थागत किया जाए। अभी तक अपशिष्ट प्रबंधन नगर निगम के स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत किया जाता है। जो कि किसी स्वास्थ्य चिकित्सक के अधीन होता है एवं वह इस विषय का विशेषज्ञ भी नहीं होता। दूसरी ओर इस निजी क्षेत्र के कई संस्थान व व्यक्ति कम्पोस्ट खाद का संयंत्र डालने को तैयार हैं, जिन्हें कि प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

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शनिवार, 31 मार्च 2007

पड़ती भूमि पर पुनर्विचार की ज़रुरत

2 हमारा आसपास

पड़ती भूमि पर पुनर्विचार की ज़रुरत

जयश्री वेंकटेशन

पिछले दिनों पड़ती भूमि कई कारणों से खबरों में रही। तमिलनाडु सरकार ने यह कदम उठाया कि राज्य के भूमिहीनों को ढाई-ढाई एकड़ जमीन दी जाएगी। इस निर्णय के चलते यह बहस छिड़ गई कि जमीन आएगीकहां से?

इसी प्रकार से चेन्नै जैसे महानगरों के आसपास सेटेलाइट टाउन निर्मित करने के प्रस्ताव के बाद भी इसी तरह की शंकाएं व्यक्त की गई। इन शंकाओं का समाधान करते हुए तमिलनाडु सरकार ने स्पष्ट किया कि इस काम के लिए भी मात्र पड़ती भूमि या सूखी भूमि का ही अधिग्रहण किया जाएगा। यह भी कहा गया था कि पानी के स्त्रोतों, रिहायशी इलाकों और जंगलों को इस कार्यक्रम के दायरें में नहीं लाया जाएगा।

तमिलनाडु में कुल 17,303.29 वर्ग कि.मी. भूमि को पड़ती भूमि के रुप में चिन्हित किया गया है। यह राज्य के भौगोलिक क्षेत्रफल का 13.3 प्रतिशत है। तर्क यह दिया जा रहा है कि यह जमीन सरकारी जरुरत को आसानी से पूरा कर सकती है। इस तरह के सुझाव भी आए हैं कि पड़ती भूमि का उपयोग प्लांटेशन, खास तौर से रतनजोत के प्लांटेशन हेतु किया जए ताकि जैव ईंधन उद्योग को बढ़ावा मिल सके। यह सही है कि जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल, डीजल वगैरह) से हटकर जैव ईंधन की ओर कदम बढ़ाना एक अच्छा कदम होग, मगर पड़ती भूमि को जैव ईंधन प्लांटेशन में तब्दील करने के विचार की छानबीन करने की जरुरत है।

मसलन, यह सुझाया जा रहा है कि पालनी पर्वत की पड़ती भूमि पर रतनजोत उगाया जाए जबकि यह इलाका कुछ ऐसे पौधों का प्राकृत वास है जो सिर्फ यहीं पाए जाते हैं। इसके लिए प्रस्ताव यह है कि रेल्वे के साथ वापिस खरीद की व्यवस्था कर ली जाए।

इसी प्रकार से, हाल के दिनों में तटवर्ती क्षेत्रों को प्रोसोपिस जुलीफेरा उगने के लिए छोड़ दिया गया है, यहां तक कि मैन्ग्रोव वनों के पट्टों को भी। यह प्रजाति ईंधन की जरुरत की पूर्ति करती है। इन जमीनों को भी पड़ती भूमि के रुप में वर्गीकृत किया गया है।

दक्षिण चेन्नै में एक दलदल है जो इकॉलॉजी की दृष्टि के काफी महत्वपूर्ण है। इसके संरक्षण के लिए पांच वर्षो से किए जा रहे प्रयासों में अवरोध पैदा हो गया क्योंकि यह पड़ती भूमि है।

यह चिंता व्यक्त की गई है कि पड़ती भूमि कहीं एक मोहक शब्द में न बदल जाए जो दानदाता संस्थाओं को उसी तरह रिझाने लगे जैसे स्थानीय लोगों व संस्थाओं की भागीदारी और जेंडर जैसे जुमलें रिझाते हैं। मगर इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि हम भूमि बंदोबस्त व प्रशासन की औपनिवेशिक विरासत को सीने से चिपकाए बैठे हैं और अभी भी उसका पालन कर रहे हैं।

पड़ती भूमि दरअसल प्राकृतिक संसाधनों को लेकर औपनिवेशिक धारणा की अवशेष है। यह धारणा मूलतः राज्य द्वारा प्राकृतिक संसाधनों पर एकछत्र नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से निर्मित की गई थी। इन संसाधनों में भूमि प्रमुख थी। कोशिश यह थी कि दुविधा वाले क्षेत्र कम से कम रहें। नजूल बंदोबस्त प्रणाली के जरिए जंगल व कृषि भूमि के बीच काल्पनिक मगर कारगर विभेद पैदा किया गया। शुध्दतः प्रबंधन के मकसद से ब्रिटिश शासन ने इस तरह के वर्गीकरण किए और जमीनों को वन भूमि व कृषि भूमि में बांट दिया। कृषि भूमि को उत्पादक भूमि व पड़ती भूमि (वेस्टलैण्ड्स) में बांटा गया। इस तरह के वर्गीकरण के उदाहरण हमें कई और मामलों में भी देखने को मिलते हैं। जैसे प्रायद्वीपीय भारत के घाट को पश्चिमी व पूर्वी घाट में बांटना, जंगलों को नम व शुष्क जंगलों में बांटना या यह कहना कि लोग या तो जातियों में शामिल होंगे या जनजातियों में।

मद्रास प्रेसिडेंसी में अपनाई गई भूमि बंदोबस्त प्रक्रिया इसका उम्दा उदाहरण है। ब्रिटिश आगमन से पहले दक्षिण भारत के ग्रामीण समाज विकेंद्रीकृत इकाइयों में संगठित था जिन्हें नाडु कहते थे। अलबत्ता ब्रिटिश शासकों ने दावा किया कि लोगों की हालत अत्यंत शोचनीय है और पूर्ववर्ती सरकारों, और खासकर टीपू सुल्तान के राज, ने गांवों को ऐसी हालत में पहुचा दिया है कि सम्पन्न किसान ढूंढे नहीं मिलेगा। यह भी कहा गया कि किसान ईमानदारी से लगान नहीं चुकाते हैं। इन मान्यताओं के आधार पर ब्रिटिश शासन ने व्यवस्थित ढंग से नियंत्रण की स्थानीय प्रणालियों को कमजोर किया और राजस्व व्यवस्था लागू करके पूरा नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया। इन व्यवस्थाओं में रैयतवाड़ी और स्थायी बंदोबस्त प्रमुख थीं। जंगल के बंदोबस्त की प्रक्रिया को मद्रास फॉरेस्ट एक्ट, 1882 पारित करके संभव बनाया गया। इस कानून के जरिए जंगल के एक बड़े हिस्से को आरक्षित जंगल घोषित कर दिया गया था।

मद्रास प्रेसिडेंसी के राजस्व इतिहास को उजागर करते हुए बेडन पॉवेल ने दो अवधियां चिन्हित की हैं - प्रारंभिक व आधुनिक बंदोबस्त। जहां प्रारंभिक बंदोबस्त कमोबेश पूर्व के आकलन पर आधारित थे, और क्षेत्रीय स्वायत्तता को प्रोत्साहित करते थे, वहीं 1858 में बंदोबस्त महकमे की स्थापना के बाद जो दौर शुरु हुआ उसमें कठोर मापदण्ड लागू किए गए और इस काम में बंदोबस्त व सर्वेक्षण अफसरों की मदद ली गई जो जमीनों के नक्शे बनाया करते थे। इस दूसरे दौर में प्रशासन के मकसद से जमीन को आक्यूपाइड और अन-ऑक्यूपाइड भूमियों में बांट दिया गया।

इन्हें इस तरह परिभाषित किया गया कि जिस जमीन पर खेती होती है वह आक्यूपाइड है और जिस जमीन पर खेती नहीं होती वह पड़ती भूमि है। वैसे दिखता तो यह है कि इससे ज्यादा से ज्यादा जमीन को कृषि भूमि में तब्दील करके निजी स्वामित्व में देने को बढ़ावा मिलेगा जगर दरअसल सर्वे की पूरी प्रक्रिया पड़ती भूमि को चिंहित करके राज्य के नियंत्रण में लाने की प्रक्रिया थी।

आरक्षित जंगलों के अलावा जो जमीन थी उसमें निम्नलिखित बारीक वर्गीकरण किए गए ः पट्टा भूमि, आकलित सूखी व नम पड़ती भूमि, अनाकलित पड़ती भूमि और पोरोम्बोके (राजस्व और वन)। आकलित सूखी व नम पड़ती भूमि वह थी जो उस समय तक खेती विहीन रहती थी जब तक कि राजस्व विभाग उसका आवंटन न कर दे। इस श्रेणी में कई किस्म के प्राकृतवास शामिल थे, जैसे दलदल, मौसमी नम भूमियां, पथरीली ढलवां भूमि, परित्यक्त चारागाह, और झूम खेती के अंतर्गत आने वाली जमीनें। पोरोम्बोके जमीनें सामुदायिक उपयोग के लिए निर्धारित थीं।

वास्तविक परिस्थिति में पड़ती भूमि की बेवकूफी स्पष्ट नजर आती है। मसलन तमिलनाडु में अधिकांश अनाकलित नम पड़ती भूमि के रुप में वर्गीकृत नम भूमियां वास्तव में कृषि तंत्र का अभिन्न अंग हैं और यहां मौसमी तौर पर धान की खेती होती है। इसके अलावा स्थानीय लोग इन नम भूमियों से कई लाभ प्राप्त करते है। जैसे चारा, मछली तथा चटाई, टोकरियां वगैरह बनाने के लिए कच्चा माल आदि। इस तरह की नम भूमियां शहरी क्षेत्र में हों, तो उन्हें कचरा व मलबा फेंकने का स्थान बना दिया जाता है। पहाड़ी इलाकों की नमभूमियों का उपयोग मोटा अनाज और फलियां वगैरह उगाने के लिए किया जाता है और कहीं-कहीं तो इनमें व्यापारिक फलोद्यान (बाड़ियां) भी लगाए जाते हैं। ऐसे क्षेत्रों में खेती-बाड़ी के जो तौर-तरीके अपनाए जाते हैं वे जांच-परखे हैं और इनमें बाहरी इनपुट्स की जरुरत बहुत कम होती है। यह भी जानी-मानी बात है कि कई पड़ती जमीनें पशु पालक समुदायों के लिए चारागाह हैं।

इस तरह के अवलोकनों से सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह सामने आता है कि पारंपरिक रुप से जमीन को मात्र सेवा प्रदाता के रुप में नहीं देखा जाता था। काफी प्राचीन समय में ही समझ लिया गया था कि ये जमीनें कई सारी इकॉलॉजिकल भूमिकाएं अदा करती हैं।

भूमि का जो प्रारंभिक वर्गीकरण चरक, कौटिल्स और कश्यप ने किया था वह मिट्टी की गुणवत्ता और उर्वरता, स्थानीय जलवायु की परिस्थितियों, और अनोखेपन जैसी कसौटियों पर आधारित था। भूमि वर्गीकरण की एक राजस्व प्रणाली भी अस्तित्व में थीं जो मिट्टी की गुणवत्ता पर आधारित थी। इसका विवरण हमें अर्थशास्त्र और अग्निपुराण में मिलता है। इसी प्रकार से संगम साहित्य (300ई.पू. से 300 ई.) के एक ग्रंथ तोल्काप्पियम में भूमि ह्रास और मरुस्थलीकरण को वर्गीकरण का एक आधार जरुर बताया गया है मगर किसी भी प्राकृतिक संसाधन के बारे में उपयोगहीनता की बात बिलकुल नहीं कही गई है। इस बात को सहजता से स्वीकार किया गया था कि प्राकृतिक संसाधन एकाधिक सेवाएं प्रदान करते हैं। वनवासी समुदाय जिस ढंग से भूमि का वर्गीकरण करते हैं उसमें यह मान्यता स्पष्ट झलकती है। मसलन नीलगिरी के कुरुम्ब समुदाय में जमीन का परिसीमन परिपाटियों के अनुसार किया जाता है और अपने दायरे में आने वाली जमीन का विवरण उसके कार्य के आधार पर होता है। इसी प्रकार का वर्गीकरण कोली पर्वत के मलई अली में भी मिलता है। ये लोग जमीन का वर्गीकरण वहां पाए जाने वाले पानी की गुणवत्ता और गहराई के आधार पर करते हैं।

इन वैकल्पिक प्रणालियों के उल्लेख का आशय प्राचीन व पारंपरिक ज्ञान को महिमामंडित करना नहीं है बल्कि यह रेखांकित करना है कि हमें जमीन के उपयोग व बंदोबस्त की वर्तमान नीतियों में आधुनिक समझ को जगह देनी चाहिए। ***

मंगलवार, 27 फ़रवरी 2007

जहरीली हवाओं से बचने के रास्ते

वातावरण


विवेक चट्टोपाध्याय

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अक्टूबर 2006 में विश्वभर की सरकारों को चेतावनी देते हुए उनके शहरों में शुध्द वायु उपलब्ध करवाने हेतु नए पैमाने स्थापित करते हुए दिशा निर्देशक सिध्दांत जारी किये हैं। इसकी अनुशंसाओं के अंतर्गत पी.एम. 10, ओजोन

और सल्फर डाईआक्साईड की मात्रा को नियंत्रित करने की सलाह दी गई है। प्रस्तावित मानक विश्व के विभिन्न हिस्सों में वर्तमान प्रचलित मानकों की तुलना में कहीं अधिक कठोर हैं। साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठन का यह भी मानना है कि इससे जन स्वास्थ्य संगठन का यह भी मानना है कि इससे जन स्वास्थ्य के स्तर में काफी सुधार होगा। इन मानकों के संबंध में एक अन्य गौरतलब तथ्य है कि पूर्व में जहां यह मानक मात्र यूरोप के लिये बनाये गये अब इन दिशा निर्देशों को विश्वव्यापी स्तर पर लागू किया जाएगा।

कुछ शहरों को इन दिशा निर्देशों को लागू करने हेतु अपने यहां व्याप्त प्रदूषण को तीन गुना तक कम करना होगा। कुछ शहरों में पीएम 10 प्रदूषण प्रति क्यूबिक मीटर 70 माईक्रोग्राम से भी ज्यादा हो गया हैजबकि नए दिशा निर्देशों के अनुसार इसे घटाकर 20 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर के स्तर तक लाना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि इस स्तर तक अगर प्रदूषण घटा लिया गया तो प्रदूषण के कारण होने वाली मौतों में 15 प्रतिशत कमी आ जाएगी। दिशा निर्देशों में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि वायु प्रदूषण घटाने से विश्वभर में श्वास, हृदय रोग व फेफड़ों के कैन्सर से होने वाली मौतों में भी कमी आएगी।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि 80 वैज्ञानिक से सलाह मशविरे एवं विश्वभर में इस विषय पर छपे हजारों शोधपत्रों की समीक्षा करने के बाद ही उसने इन दिशा निर्देशों को बनाया हैं। संगठन का अनुमान है कि वायु प्रदूषण के परिणाम स्वरुप प्रतिवर्ष 20 लाख से ज्यादा असामयिक मौतें विश्वभर में हो जाती हैं। साथ ही यह भी अनुमान लगाया गया है कि इनमें से आधे से अधिक का भार विकासशील देशों पर पड़ता है।

नवीन दिशा निर्देशों की अन्य मुख्य प्रावधान हैं ः-

1. ओजोन की सीमा प्रतिदिन 120 माइक्रोग्राम प्रतिमीटर प्रतिदिन से घटाकर 100 माइक्रोग्राम प्रतिदिन तक लाना।

2. सल्फर डाई आक्साईड के संबंध में इसमें दिशा निर्देश है कि इसे 125 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से घटाकर 20 माइक्रोग्राम के स्तर पर लाया जाये।

3. नाइट्रोजन डाईआक्साइड की सीमा के संबंध में दिशा निदर्ेशों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है।

4. दिशा निर्देशों का मुख्य उद्देश्य प्रगतिशील तात्कालिक लक्ष्यों को प्राप्त करना एवं बेहतर वायु प्रदान करने के संबंध में मील का पत्थर सिध्द होना है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन अब सभी देशों के साथ इस तरह से सहयोग करने का इच्छुक है जिससे कि इस संबंध में प्रत्येक राष्ट्र के स्वयं से राष्ट्रीय कानून बन सकें। वैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन इस बात को भी स्वीकार करता है कि यह बात राष्ट्रों की सरकारों के विवेक पर छोड़ देना चाहिये कि वे स्वविवेक से परिस्थितिजन्य राष्ट्रीय मानक स्थापित कर सकें। परंतु इस संबंध में उन्हें यह तो ध्यान रखना ही चाहिये कि स्वास्थ्य पर न्यूनतम प्रतिकूल प्रभाव पड़े।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के यूरोप स्थित आंचलिक कार्यालय के क्षेत्रीय सलाहकार माइकल क्रजीजेनोवस्की ने वायु की गुणवत्ता की ओर इशारा करते हुए कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जो नए लक्ष्य स्थापित किए हैं उस हेतु सदस्य देश अपनी नीति बनाने में इन दिशा निर्देशों का सहारा ले सकते हैं। देशों को स्वयं ही तय करना होगा कि वे इन उद्देश्यों से कितने दूर हैं। प्रदूषण के वर्तमान स्तर से उनके नागरिकों के स्वास्थ्य को कितनी हानि पहुंच रही है एवं इससे होने वाली बीमारियों को किस प्रकार कम किया जा सकता है।

इन दिशा निर्देशों को लागू करने हेतु भारत एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है। भारत ने वायु प्रदूषण हेतु तो पैमाना बना दिया है परंतु ओजोन, पीएम-5 और अन्य जहरीली गैसों के लिये कोई पैमाना तय नहीं किया है। अगर हम विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित दिशा निर्देशों से तुलना करें तो पाएंगे कि सल्फर डाई आक्साईड, नाईट्रोजन डाई आक्साईड और पीएम 1010 के मामलों में यह स्तर तय किये गये मानकों से 1.5 से 4 गुना तक अधिक है।

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