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गुरुवार, 22 मार्च 2012

हमारा भूमण्डल

भारत में एण्डोसल्फान पर प्रतिबंध
डॉ एस. एज़हिल वेंदान

एण्डोसल्फान एक कार्बनिक -क्लोरीन कीटनाशक है जिसका उपयोग कई खाद्य फसलों और नगदी फसलों में किया जाता है । यह पानी में आसानी से नहीं घुलता । धूप में तो यह आसानी से विघटित हो जाता है, मगर छाया में या नम स्थान में यह मिट्टी के कणों से चिपक जाता है और इसे विघटित होने में बहुत समय लगता है । एण्डोसल्फान एक तंत्रिकाविष है और हल्के सिरदर्द से लेकर गंभीर विषाक्तता तक उत्पन्न करता हे । इससे संपर्क का परिणाम मौत भी हो सकता है, जो इसकी मात्रा व अन्य कारकोंपर निर्भर है ।
यूएस पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी ने एण्डोसल्फान को अत्यन्त विषैला पदार्थ के रूप में वर्गीकृत किया है । जन्तुआें पर कुदरती पर्यावरण में किए गए प्रयोगों में एण्डोसल्फान का कैंसरकारी खतरा साबित हुआ है । अलबत्ता, मनुष्यों में इसके कैंसरकारी गुण का कोई प्रमाण नहीं है ।
एण्डोसल्फान को ७५ से ज्यादा देशों में प्रतिबंधित किया गया है । अर्जेटाइना, पेरू और चिली जैसे देशों में एण्डोसल्फान पर प्रतिबंध के बाद वैकल्पिक कीटनाशकों की मांग में वृद्धि हुई है । हाल में, एण्डोसल्फान पॉइजनिंग की रिपोट्र्स और राजनैतिक दबाव के चलते भारत में एण्डोसल्फान पर प्रतिबंध के लिए काफी हंगामा मचा था ।
कीटनाशक हानिकारक कीटोंके खिलाफ कारगर हथियार हैं मगर ये कभी-कभी गैर-लक्षित या गैर हानिकारक और लाभदायक जीवों को भी प्रभावित करते हैं । कई बार ये हवा, पानी या मिट्टी में बने रहते हैं । अधिकांश संश्लेषित रासायनिक कीटनाशक पर्यावरण के लिए विभिन्न स्तरों तक विषैले होते हैं । सजीवों पर कीटनाशकों के विषैले असर संपर्क के तरीके, मात्रा, संपर्क की अवधि और व्यक्तिगत गुणधर्मोपर निर्भर करते हैं । कृषि में प्रयुक्त कीटनाशकों से संपर्क मूलत: भोजन व संदूषित पेयजल के जरिए होता है । असुरक्षित ढंग से इस्तेमाल, त्वचा से सीधे संपर्क और सांस के जरिए किसानोंका कीटनाशकों से संपर्क होने की संभावना ज्यादा होती है ।
१९५० से लेकर आज तक मानव आबादी बढ़ने के साथ विश्व स्तर पर कीटनाशकों का उपयोग ५० गुना बढ़ गया है । निम्नलिखित कीटनाशकों की वजह से देश के विभिन्न भागों में १९५८-२००२ के बीच कई दुघटनाएं हुई हैं : पेराथियोन, बीएचसी, एण्ड्रिन, डीडीटी, डाएजिओन, एल्युमिनियम फॉस्फाइड, मिथाइल आइसोसायनेट, कार्टेप हायड्रोक्लोराइड, फोरेट और एण्डोसल्फान । इनमें से डीडीटी, डाएजिओन, एल्युमिनियम फॉस्फाइड, मिथाइल आइसोसायनेट, कार्टेप हायड्रोक्लोराइड, फोरेट और एण्डोसल्फान पर अब तक प्रतिबंध नहीं लगा है ।
पूर्व में केरल में एण्डोसल्फान पर प्रतिबंध लगा था और हाल में बिहार में इस पर प्रतिबंध लगाया गया है । भारत में कीटनाशक कानून (१९६८) के सेक्शन ९(३) के तहत २१७ कीटनाशकों का पंजीयन है, जबकि ६५ तकनीकी दर्जे के कीटनाशकों का उत्पादन देश में ही होता है ।
दुनिया भर में भारत एण्डोसल्फान का सबसे बड़ा निर्माता है । भारत में इसका उपयोग भी सबसे ज्यादा होता है । भारत में कृषि वैज्ञानिक आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण तमाम कीटों के नियंत्रण के लिए एण्डोसल्फान के उपयोग की सलाह देते हैं : जैसे अमरीकन बोलवर्म (हेलिकोवर्पा आर्मीजेरा), एशियन आर्मीवर्म (स्पोडोप्टेरा लिटुरा) । अकेले अमरीकन बोलवर्म ने भारत में ५००० करोड़ रूपए की फसलों का नुकसान किया है । फिलहाल देश में विभिन्न फसलों की रक्षा के लिए एण्डोसल्फान ही सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाना वाला कीटनाशक है ।
कीट प्रबंधन के संदर्भ में कीटनाशकों के खिलाफ प्रतिरोधी कीट सबसे प्रमुख समस्या रहे हैं । अधिकांश पोलीफैगसकीटों में सामान्यत: उपयोग किए जाने अधिकांश कीटनाशकों के खिलाफ प्रतिरोध विकसित हो गया है । इनमें अमरीकन बोलवर्म और एशियन आर्मीवर्म शामिल हैं । प्रतिरोध पैदा हो जाने के चलते कई सारे कीटनाशक नाकाम हो गए हैं । इस वजह से किसान अपने खेतों में इनकी ज्यादा से ज्यादा मात्रा डाल रहे हैं और एण्डोसल्फान जैसे अपेक्षाकृत ज्यादा विषैले कीटनाशकों का उपयोग कर रहे हैं ।
हानिकारक कीटों की आबादी को नियंत्रण में रखने, कीटनाशकों के विरूद्ध प्रतिरोध के विकास से बचने और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए आजकल एकीकृत कीट प्रबंधन रणनीति की सलाह दी जाती है । भारत में कई कृषि विश्वविद्यालय, स्वैच्छिक समूह, व एनजीओ एकीकृत कीट प्रबंधन, जैविक खेती और गैर-रासायनिक प्रबंधन कार्यक्रमों में शामिल हैं । ये किसानों में जागरूकता व प्रशिक्षण के कार्यक्रम भी चलाते हैं । भारत सरकार की फंडिंग संस्थाएं, जैसे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, वैज्ञानिक व औद्योगिक अनुसंधान परिषद, विज्ञान व टेक्नॉलॉजी विभाग, जैव टेक्नॉलॉजी विभाग, और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग वैज्ञानिकों व स्वैच्छिक कार्यकर्ताआें को पर्यावरण मित्र खेती के कार्यक्रम चलाने के लिए वित्तीय सहायता दे रही हैं । इसके बावजूद, जानकारी के अभाव, निरक्षरता, गरीबी व प्रतिस्पर्धा के चलते किसान रासायनिक कीटनाशकों का अंधाधंुध उपयोग कर रहे हैं ।
भारत एक कृषि प्रधान विकासशील देश है । करीब ६०-७० प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर हैं । एकीकृत कीट प्रबंधन या जैविक खेती पूरे देश में लागू नहीं किए जा रहे हैं । शायद ५-१० प्रतिशत किसान ही पर्यावरण-मित्र कीटनाशक प्रबंधन के तरीकों को अपनाते हैं । पर्यावरण मित्र कार्यक्रम बड़े किसानों के समान ही छोटे किसानों के लिए भी आकर्षक नहीं हैं क्योंकि इनमें मेहनत और हुनर की जरूरत होती है ।
विकासशील देशों में कीटनाशक छिड़काव के समय सुरक्षा हेतु विशेष पोशाकें न तो उपलब्ध है, न ही किसान व छिड़काव करने वाले मजदूर इनका खर्च वहन कर सकते हैं । आम तौर पर छिड़काव करने वाले लोग नंगे पैर ही छिड़काव का काम करते हैं । उनके पास चश्मे, दस्ताने, पूरी बांह के कमीज या रेस्पिरेटर जैसा कोई सुरक्षा उपाय नहीं होता है । इसके विपरीत विकसित देशों में किसान परिष्कृत सुरक्षा उपायों के साथ काम करते हैं ।
इसके अलावा समशीतोष्ण इलाकों में कीट की समस्या गर्म इलाकों की तुलना में कम होती है । बदकिस्मती से भारत की जलवायु गर्म है और फसलों पर कीटों का हमला ज्यादा होता है । कीटनाशक के मुद्दे को सुलझाने के लिए वैकल्पिक संसाधनों की तत्काल जरूरत है । भारत में जैविक कीटनाशकों और अन्य संसाधनों की मांग पहले ही बढ़ चुकी है । जर्मनी में जहां एण्डोसल्फान पर प्रतिबंध है, फसलों की सुरक्षा के वैकल्पिक तरीके उपलब्ध करा रहे हैं । मगर सवाल यह है कि क्या ये तरीके भारतीय परिस्थिति के लिए उपायुक्त हैं ।
भारत एण्डोसल्फान का प्रमुख उत्पादक, उपभोक्ता व निर्यातक है । जहां तक एण्डोसल्फान पर प्रतिबंध का सवाल है, निर्णय प्रक्रिया में चिकित्सा विशेषज्ञों, पर्यावरणविदों, समाज वैज्ञानिकों रणनीतिज्ञों की अपेक्षा कीट प्रबंधन विशेषज्ञ, खासकर कीट वैज्ञानिक अहम भूमिका निभाते हैं । जरूरत इस बात की है कि मैदानी स्तर पर अधिक संख्या में एकीकृत कीट प्रबंधन कृषक शालाएं खोली जाएं और जैविक खेती के कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाए । जिनेटिक रूप से परिवर्तित फसलों का उपयोग करके हम कीटनाशक का उपयोग कम कर सकते हैं । अन्यथा एण्डोसल्फान पर प्रतिबंध खेती में दिक्कतें पैदा कर सकता है ।

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

हमारा भूमण्डल

डरबन में धीमी रफ्तार से पहल
मार्टिन खोर

पिछले दिनों डरबन में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में काफी गहमा-गहमी रही । आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर भी चला । दो सप्तह के इस सम्मेलन में कई रूकावटें भी खड़ी हुई लेकिन अंतत: एक नई जलवायु नीति निर्माण की दिशा में पहला कदम भी रखा गया । कुल मिलाकर यह सम्मेलन भी पिछले जलवायु सम्मेलनों से ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाया ।
डरबन में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन का ११ दिसम्बर २०११ को समापन वर्ष २०१५ तक एक नई वैश्विक जलवायु नीति बनाने के संकल्प के साथ हुआ । इस नई नीति का उद्देश्य है सभी भागीदारों द्वारा आपसी समझैते हेतु अधिकतम प्रयासों का किया जाना । इसका अर्थ है देशों को या तो ग्रीन हाउस उत्सर्जन में अत्यधिक कमी करनी होगी या उनके उत्सर्जन की वृद्धि दर को कम करना होगा । यह संलेख (प्रोटोकॉल) एक अन्य कानूनी दस्तावेज या कानूनी शक्ति वाले परिणाम के रूप में सामने आएगा । एक नाटकीय घटनाक्रम में यूरोपियन संघ ने भारत और चीन पर दबाव डालकर यह प्रयास किया कि वे एक कानूनी बाध्यता वाले प्रपत्र (प्रोटोकॉल) पर हस्ताक्षर करें और संभावित नतीजों की सूची में से कानूनी निष्कर्ष या परिणाम जैसी शब्दावली को निरस्त कर दें । उनका मानना था कि यह अत्यन्त कमजोर विकल्प है ।
यूरोपियन यूनियन एवं अमेरिका का कहना था कि वे चाहते हैं कि मुख्य विकासशील देश उनके जैसे ही उत्सर्जन कम करने वाले बंधनों को मानें । यह उस जलवायु परिवर्तन सम्मेलन से अलग हटना है, जिसने अमीर देशों के लिए उत्सर्जन में बंधनकारी कमी की बाध्यता और विकासशील देशों द्वारा स्वैच्छिक तौर नर कमी किए जाने के मध्य भेद किया था । ११ दिसम्बर को भारत की पर्यावरण मंत्री श्रीमती जयंती नटराजन ने अपने भावावेश से भरे संबोधन में इस बात का बचाव किया कि भारत किसी भी कानूनी बाध्यकारी दस्तावेज के खिलाफ क्यों है और नई बातचीत समानता के आधार पर ही होना चाहिए । उन्होंने पूछा कि भारत ऐसे दस्तावेज का सहभागी होने के लिए आंख मींच कर हामी क्यों भर दे जबकि दस्तावेज की विषय वस्तु ही अभी तक ज्ञात नहीं है ?उनका कहना था हम जीवनशैली में परिवर्तन की नहीं कर रहे हैं बल्कि हम लाखों लाख किसानों की जीविका पर पड़ने वाले प्रभावों पर बात कर रहे हैं । मैं एक अरब २० करोड़ लोगों के अधिकारों को लेकर हस्ताक्षर क्यों कर दूं ? क्या यह समदृष्टि है ?
श्रीमती नटराजन का कहना कि वार्ता के दौर के प्रस्ताव में समदृष्टि या साझा लेकिन विभेदीकरण मूलक जिम्मेदारी जैसा शब्दों को शामिल ही नहीं किया गया जबकि सम्मेलन की एक शब्दावली के हिसाब से जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में अमीर देशों को गरीब देशों से अधिक योगदान देना होगा (यह सिद्धांत उनकी उस ऐतिहासकि जवाबदारी पर आधारित है जिसके अनुसार अमीर देशों द्वारा वातावरण में ग्रीन हाउस गैसें एकत्रित हुई हैं) और इसी के परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन हुआ है । यदि इस तरह का दस्तावेज विकसित किया जाता है जिसमें गरीब देशों को अपने उत्सर्जन में अमीर देशों जितनी ही कमी लानी होगी तो इसे समानता या समदृष्टि नहीं कहा जा सकता । यह साझा और विभेदी जिम्मेदारी से पलायन होगा । इतना ही नहीं यह सबसे बड़ी त्रासदी भी होगी ।
अनेक देश जिनमें चीन, फिलीपींस, पाकिस्तान और मिस्त्र भी शामिल हैं, ने भारत की बात का समर्थन किया । अंतत: कानूनी परिणाम शब्द को कानूनी शक्ति से परिणाम के रूप में बदलने पर सहमती बनी । इसी समय जलवायु परिवर्तन पर वर्तमान रूपरेखा में, जिसमें क्योटो प्रोटोकॉल एवं बाली रोड मेप को धीमे लागू करने के लिए कदम उठाने पर भी चर्चा हुई । क्योटो प्रोटोकॉल को मुख्यतया यूरोपियन देशों और उत्सर्जन कमी हेतु वर्ष २०१३ से प्रारंभ होने वाले दूसरी अवधि में शामिल होने की सहमति देने से बचाया जा सका ।
इसके बावजूद क्योटो प्रोटोकॉल काफी हद तक कमजोर हुआ है । जापान, रूस एवं कनाड़ा ने दूसरी अवधि में इसमें शामिल होने से स्वयं को अलग कर लिया जबकि ऑस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैंड का कहना था वे इसमें शामिल भी हो सकते हैं और नहीं भी । और जबकि क्योटो प्रोटोकॉल में केवल यूरोपीय देश ही बचे हैं ऐसे में यह प्रोटोकॉल वर्ष २०१७ या २०२० तक जिंदा तो रह सकता है लेकिन इस पर अभी से ही नए समझौते की परछाईयां पड़ने लग गई है । इस नए समझौते में अंकित शब्दावली विकसित देशों के पूर्णतया पक्ष में है और समदृष्टि का सिद्धांत इसमें से जानबूझकर अनुपस्थित है और इसमें यह सिद्धांत थोपा जा रहा है कि सभी देश इसमें भागीदारी करें और इसमें उत्सर्जन मे ंपूर्ण कमी को लेकर अत्यधिक महत्वाकांक्षा दिखाई गई है । डरबन सम्मेलन में ग्रीन जलवायु कोष की बातों को लेकर अंतिम सहमति बनी है जो कि अपने बोर्ड एवं सचिवालय के माध्यम से वर्ष २०१२ के प्रारंभ में परिचालन प्रारंभ कर देगा । डरबन सम्मेलन में अनेक बार ऐसा लगा कि वार्ता पटरी से उतर रही है क्योंकि वहां अनेक मसलों पर असहमति साफ नजर आ रही थी ।
इतना ही नहीं दो हफ्तों के सत्र के बावजूद अंतिम सत्र को एक दिन के लिए बढ़ाया गया और दक्षिण अफ्रीका जिस तरह से बिना परिवर्तन के दस्तावेजों को पारित करवाने का प्रयास कर रहा था उसे लेकर सबके बीच नाराजगी भी थी । अंत में यही कहा जा सकता है कि डरबन को समानता आधारित जलवायु परिवर्तन रूपरेखा से अलग हटने और एक नई संधि जिसकी विषय वस्तुत अभी ज्ञात नहीं है, की ओर कदम बढ़ाने के लिए याद रखा जाएगा ।

बुधवार, 9 नवंबर 2011

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निर्धनतम देश : वादे हैं वादों का क्या
मार्टिन खोर

आर्थिक उदारीकरण के विनाशकारी परिणामों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले चार दशकों में अत्यन्त अविकसित राष्ट्रों की संख्या २५ से बढ़कर ४७ हो गई है । इससे यह स्थापित हो जाता है कि आधुनिक पूंजीवादी व्यवस्था गरीब देशों के शोषण पर न केवल टिकी है बल्कि इस शोषण में दिनों - दिन वृद्धि हो रही है ।
इस्तानम्बुल में सम्पन्न हुई संुयक्त राष्ट्र संघ की बैठक का मुख्य विषय दुनिया के निर्धनतम राष्ट्रों की स्थिति पर विचार करना था । इसमें तकरीबन ५० राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्षों एवं सैकड़ों मंत्रियों ने भाग लिया था । दुनिया भर में ४७ अत्यन्त अविकसित देश हैं । इसमें से ३३ अफ्रीका में और १४ एशिया प्रशांत क्षेत्र में स्थित हैं । इनकी सम्मिलित जनसंख्या ८० से ९० करोड़ के मध्य है । वर्ष १९७१केवल २५ अत्यन्त अविकसित देश थे । लेकिन पिछले चार दशकों में इनकी संख्या दुगुनी हो गई है और इनमें से मात्र तीन देश विकासशील देशों की श्रेणी में आ पाए हैं । इन अत्यन्त अविकसित देशों में गरीबी, बद्तर स्वास्थय स्थितियों और बेरोजगारी की निरंतरता चिंता का विषय है ।
पिछले दशक के दौरान इन अत्यन्त अविकसित देशों में काफी अच्छी आर्थिक वृद्धि दर दर्ज की गई थी । पंरतु यह वृद्धि अत्यन्त अविकसित देशों द्वारा वस्तुआें (कच्चा माल) के निर्यात की वजह से हुई थी, न कि औद्योगिक या कृषि विकास के कारण । २००८-०९ में आई वैश्विक मंदी के कारण वस्तुआें की बिक्री में कमी आई और इस वजह से इनकी अर्थव्यवस्था बैठ गई । पिछले वर्ष कच्चे माल की कीमतों में पुन: तेजी आई थी लेकिन विश्व अर्थव्यवस्था की वर्तमान धारा से प्रतीत हो रहा है कि स्थितियां पुन: पलट सकती हैं । विश्व अर्थव्यवस्था के उतार-चढ़ाव की वजह से यह अत्यन्त अविकसित देश और भी अधिक संकट में पड़ जाएंगे । अत्यन्त अविकसित देशों के चौथे संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन ने एक बार पुन: अवसर दिया है कि एक दशक पूर्व हुए सम्मेलन के बाद समीक्षा कर सकें कि इस दौरान इन गरीब राष्ट्रों के साथ क्या हुआ और विकसित देश इनकी मदद हेतु नए सिरे से प्रतिज्ञान कर सकें ।
दुर्भाग्यवश अमीर देश अपने द्वारा जताई गई प्रतिबद्धता के नवीनीकरण की मनोदशा में ही नहीं थे । अनेक यूरोपीय अर्थव्यवस्थाएं ऋण संकट मेंफंसी हुई हैं, अमेरिकी राजनीतिज्ञ सरकारी खर्चो में कमी के प्रति लालायित है और जापान भूकंप और सुनामी की वजह से वैसे ही आपातकाल में है । इस तरह अमीर देश सार्थक मदद हेतु या तो अनिच्छुक या असमर्थ है ।
इस्ताम्बुल कार्ययोजना कार्यक्रम में स्पष्ट कहा गया है कि उपरोक्त देश अपने सकल राष्ट्रीय उत्पाद का ०.२ प्रतिशत अत्यन्त अविकसित देशों को देते रहे हैं और भविष्य में भी देते रहेगे । जो देश ०.१५ प्रतिशत के लक्ष्य तक ही पहुंचे है, वे वर्ष २०१५ तक अपने लक्ष्य को पूरा करने का प्रयत्न करेंगे । जिन सिविल सोसायटी समूहों ने इस सम्मेलन में भागीदारी की थी, उन्होनें इस खामी की निंदा की है । इन देशों के नागरिक समूहों के नेता अर्जुन कर्की ने कहा है कि हमे धक्का लगा है और निराशा हुई है । वहीं कंबोडिया के गैर सरकारी संगठन सिलिका के निर्देशक थिडा खस का कहना है इस सम्मेलन की असफलता का ठीकरा विकसित राष्ट्रों की आर्थिक मदद करने में असफल रहे हैं ।
वैसे भी अत्यन्त अविकसित देशों की बिगड़ती स्थिति के लिए अमीर देश कम जिम्मेदार नहीं हैं । साथ ही पिछले सम्मेलन में अपने द्वारा किए गए वादों से मुकरने से भी इन गरीब देशों को हानि पहुंची है । उदाहरण के लिए जलवायु परिवर्तन इन अत्यन्त अविकसित देशों की प्रमुख समस्या है । क्योंकि इसके कारण उन्हें बाढ़ की बढ़ती समस्या, कृषि की घटती उत्पादकता और अन्य समस्याआें का सामना करना पड़ रहा है । साथ ही कोई नया वायदा न करने से भी इन राष्ट्रों के सामने सकंट और गहरा गया है ।
विकसित राष्ट्रों द्वारा नई तकनीकों से भी इन राष्ट्रों को वंचित रखा जाना इनकी गरीबी बढ़ा रहा है । इसके बावजूद इन देशों ने जलवायु संबंधी समस्याआें को अपनी राष्ट्रीय विकास योजनाआें में समाहित किया है । ये वादे संयुक्त राष्ट्र संघ के जलवायु परिवर्तन के प्रस्तावों से भी आगे के है ।
इस सम्मेलन में विकासशील देशों ने प्रयत्न किया है कि इन देशों को विकसित देशों द्वारा दी गई ९७ प्रतिशत उत्पादों को कर मुक्त करने के वादे को बढ़ाकर १०० प्रतिशत कर देना चाहिए। परन्तु इस दिशा में पहल का अभाव नजर आया । जो थोड़ी बहुत प्रािप्त् इन देशों को हुई भी है उस भी यूरोपीय संघ ने मुक्त व्यापार समझौता कर लेने से पानी फिर जायएगा । इसी के साथ अपने ८० प्रतिशत आयात पर कर सीमा को शून्य पर लाने से इन राष्ट्रों पर नया सकंट आ जाएगा । इसी के साथ उन्हें अपने सेवा, निवेश एवं सरकारी खरीदी व्यापार को भी खोलना पड़ेगा ।
इन तरह इन अत्यन्त अविकसित राष्ट्रों के लिए आने वाला समय और भी संकटपूर्ण हो सकता है । क्योंकि अब तो उनकी विकास योजनाआें की भी लगातार समीक्षा की जाएगी । इस सम्मेलन की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि विकसित देशों द्वारा किए गए वायदों की सतत् निगरानी की जाए ।

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

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विश्व व्यापार संगठन और तीसरी दुनिया
रॉबर्टो बिस्सियो

विश्व व्यापार संगठन के निदेशक पास्कल लामी अपने तर्को के समर्थन में जिन प्रतीकों को सहारा ले रहे हैं वे कहीं इस संगठन की वास्तविकता को ही समाने ला रहे हैं । भारत सहित तीसरी दुनिया के अधिकांश देश विश्व व्यापार संगठन की जोर जबरदस्ती नीतियों से त्रस्त हो चुके हैं । वैसे भी इस संगठन के अस्तित्व में आने के बाद अधिकांश देशोंमें सामाजिक व आर्थिक खाईयों में वृद्धि ही हुई है ।
वैश्विक व्यापार को स्वतंत्र करने हेतु वर्षो से वार्ताआें के दौर चल रहे हैं । उरूग्वे दौर जिसमें विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की स्थापना की गई थी एवं बौद्यिक सम्पदा, सेवाआें और निवेश को इस प्रक्रिया में समाविष्ट किया था, सन् १९८६ से १९९४ तक यानि ८ वर्ष तक चला । वर्तमान का दोहा दौर जो कि सन् २००१ में प्रारंभ हुआ और जिसे विकास के दौर भी कहा जाता है, में सीमांत राष्ट्रों की रूचि के विषयों को भी समाहित किया गया था, अब ठहर सा गया लगता है ।
उकताहट से बचने एवं प्रेस को इच्छुक बनाए रखने हेतु कुछ समझौताकर्ताआें ने पत्रकारों की क्षुधापूर्ति हेतु चतुर लाक्षणिक स्थितियों की खोज कर उन्हें आंकड़ों के वास्तविक विश्लेषण और दस्तावेजों के पढ़े जाने से भी बचा लिया । उरूग्वे दौर के परिशिष्ट करीब बीस हजार पृष्ठों में संकलित है, उदाहरण के लिए यह तर्क कि व्यापारिक उदारीकरण एक स्थायी प्रक्रिया है और इसे गंभीर जोखिम लिए बिना रोका ही नहीं जा सकता, को हमेशा सायकल के प्रतीक के रूप में दिखाया जाता है । यानि कि जो भी यदि सतत चलता नहीं है वह गिर जाता है ।
अंतत: एक दिन अपने देश के व्यापार को बगैर तैयारी के तेजी से खोलने को लेकर बनाए जा रहे निरन्तर व अनावश्यक दबाव से नाराज होकर जेनेवा में तत्कालीन भारतीय राजपूत बी.के. जुत्शी ने उत्तरी अमेरिका के समझौताकार को व्यंग्य से जवाब देते हुए कहा, अपने देश में हम लोग भी सायकलों के बारे में थोड़ा बहुत जानते हैं और मैं आपको विश्वास दिलाता हॅूं कि जब ट्रेफिक लाइट लाल हो जाती है तो सभी सायकलें रूक जाती हैं और कोई भी गिरता नहीं है । यदि आप चाहें तो मैं आपको यह बता सकता हॅू कि हम ऐसा कैसे कर पाते हैं ।
७ अप्रैल २०११ को विश्व व्यापार संगठन के निदेशक पास्कल लामी ने मीडिया से चर्चा करते हुए उनके संगठन द्वारा हाल ही प्रकाशित आंकड़ों को और भी बेहतर बताने का प्रयत्न किया । डब्ल्यूटीओ ने बताया कि सन् २०१० में व्यापार में रिकार्ड १५ प्रतिशत के करीब का वृद्धि हुई है, लेकिन सन् २०११ के लिए निराशाजनक ६ प्रतिशत की वृद्धि की ही भविष्यवाणी की है । इतना ही नहीं जापान में आए भूकंप और परमाणु आपातकाल की वजह से यह आंकड़ा और भी नीचे जा सकता है । वैश्विक राजनीतिक माहौल के दौर अधिक व्यापारिक उदारीकरण के पक्ष में न होने से मामला अधिक बिगड़ गया है और दोहा दौर, गैर कृषि उत्पादों की बाजार तक पहुंच के मामलों में लगे रोड़ों को हटाने में भी असफल सिद्ध हुआ है ।
श्री लामी ने स्वीकार किया है कि यह बहुत ही कठिन समय है लेकिन विश्व व्यापार संगठन एक खच्च्र की तरह विश्वसनीय और दृढ़ है । उनका कहना है कि व्यापारिक आंकड़े खच्च्र की तरह हैं, जो कि पीछे नहीं जाते । खच्च्र के साथ समस्या यह है कि कई बार वह रूक जाता है और आगे नहीं बढ़ता और वापस भी नहीं आता है । लेकिन आगे बढ़ने से भी इंकार कर देता है । उनका कहना है कि विश्व व्यापार प्रणाली में वर्तमान में यही हो रहा है ।
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार सन् २००९ में १२ प्रतिशत गिरा परन्तु सन् २०१० में यह उभर गया और सन् १९५० जबकि पहली बार आंकड़े तैयार किये गये थे, के बाद पहली बार एक वर्ष में इतना ज्यादा बढ़ा । वैसे सन् २०१० में विश्व का कुल उत्पादन ३.६ प्रतिशत बढ़ा, जिसका कि अर्थ है कि व्यापार में वास्तविक उत्पादन में चार गुना अधिक की वृद्धि हुई । विश्व व्यापार संगठन का कहना है, इस वृद्धि का कारण भी वही है जिस कारण से वर्ष २००९ में इसमें गिरावट आई थी । यानि वैश्विक उत्पादन श्रृखंला का अर्थ है निर्माण प्रक्रिया के दौरान वस्तुआें का अनेक बार राष्ट्रीय सीमाआें के आर-पार परिवहन ।
वस्तुआें के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को सबसे गंभीर रूप से चोट पहुंचाने वाली समस्याएं है, औद्योगिक मशीनें और उपभोक्ता वस्तुएं जिसमें अंतिम उत्पादन के अनेक हिस्से बड़े अनुपात में होते हैं । इससे सन् २००९ में आई तीव्र गिरावट और पिछले वर्ष संभलने में दोनों ही बातें स्पष्ट हो जाती है ।
इसे समझाते हुए श्री लामी फायनेंशल टाइम्स के अपने स्तंम्भ में लिखते है तीस वर्ष पूर्व एक देश में उसी के संसाधनों का इकट्ठा कर उत्पाद तैयार किए जाते थे । इस व्यापार को मापना आसान था । परन्तु आज निर्माण कार्य वैश्विक श्रृंखला के माध्यम से होता है और कहा जा सकता है कि अधिकांश वस्तुएं वैश्विक तौर पर निर्मित होती हैं न कि चीन निर्मित । और यह अकादमिक भिन्नता भर नहीं हैं । व्यापार असंतुलन से राजनीतिक द्वेष पैदा हो सकत है । अतएव जिस तरह से हम व्यापार को मापते हैं उससे वैश्विक राजनीतिक तनाव में वृद्धि भी हो सकती हैं ।
वरिष्ठ पत्रकार चक्रवर्ती राघवन जो कि पिछले ३० वर्षो से जेनेवा में हो रहे व्यापारिक समझौतों पर निगाह रखे हुए है, श्री लामी के इस आकलन से असहमत हैं कि यह एक नई धारणा है। अपनी आलोचना की पुष्टि हेतु उन्होनें सन् १७५० से लगातार प्रकाशित होने वाले एक पंचाग के सन् १७८५ के वार्षिक रजिस्टर की प्रति प्रस्तुत की है । इसमें लिखा है, फ्रांसीसियों को अंग्रेजी वाहन बहुत पंसद है । इस हेतु पहियों और शाक एर्ब्जवर के ८०० सेट फ्रांस भेजे गए जिनका इस्तेमाल वहां वाहन बनाने (अलामोड डी एंग्लोइस) के लिए किया जाएगा । यदि उत्पादन श्रृंखला इतनी पुरानी धारणा है तो इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि चीन जो निर्यात कर रहा है उसमें ६० प्रतिशत हिस्सा आयातित है या उससे भी अधिक । वास्तविक बात यह है कि वैश्विक व्यापार को संगठित करने की प्रक्रिया में चीन उस वस्तु पर कितना लाभ ले रहा है ।
श्री राघवन ने इस संबंध में पुर्तगाल और इंग्लैंड के मध्य के व्यापारिक रिश्तों का उदाहरण भी दिया जिनका अध्ययन एडम् स्मिथ और रिकॉर्डो जैसे पारम्परिक अर्थशास्त्रियों ने दो सौ वर्षो से भी पहले किया था । पुर्तगाली किसान अंगूर उपजाते थे, उनके रस में खमीर उठाते थे और नाल (पीर्पो) में भर कर ब्रिस्टोल के व्यापारियों को बेच देते थे और वे इसे बोतलों में भरकर ब्रिटिश जहाजों द्वारा ब्रिटेन भेज देते थे । इसका अर्थ यह हुआ कि पुर्तगाली निर्यात का लाभ ब्रिटिश व्यापारियों को मिलता था । पुर्तगाली अर्थव्यवस्था आज भी विकासशील है जबकि ब्रिटेन २० वीं शताब्दी के मध्य तक विश्व की बड़ी आर्थिक ताकत बना रहा ।
किसी भी कीमत पर खुले व्यापार की वकालत करने वालों को प्रतीक चुनने में सावधानी रखना चाहिए और यह बात भी ध्यान में रखना चाहिए कि खच्च्र गधे और घोड़े की संकर संतान है और वह नंपुसक भी है ।

शनिवार, 17 सितंबर 2011

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स्वयं का विस्तार है ट्रस्टीशिप
डॉ. अवध प्रसाद

गांधीजी द्वारा ट्रस्टीशिप के सिद्धांत को सार्वजनिक जीवन का आधार बनाया गया था । परन्तु निजी जीवन में अपनाए बगैर इसको व्यापकता प्रदान नहीं की जा सकती ।
प्रकृतिप्रदत्त सभी पदार्थ पर प्रकृति अर्थात ईश्वर का स्वामित्व मान कर स्वयं को उसका न्यासी (ट्रस्टी) मानना ट्रस्टीशिप है । अपने लिए आवश्यकता से ज्यादा लेने की इच्छा नहीं रहे और स्वयं में अनासक्त भाव बढ़े इसका प्रयास करना संरक्षक का गुण है । अनासक्ति युक्त न्यासिता (ट्रस्टीशिप) अहिंसक अर्थव्यवस्था का आधार है ।
गांधीजी ने गीता में स्थितप्रज्ञ को ट्रस्टीशिप का आधार मानकर इसकी व्याख्या की और इसे नियमित प्रार्थना का अंग बनाया । गांधीजी ने कौसानी में ७ दिनों तक रहकर श्रीमद्भगवद्गीता का अनुवाद पूरा किया और इस पुस्तक का नाम अनासक्ति रखा जो कि व्यक्ति के अनासक्त भाव को अपनाने में मददगार है । कौसानी का यह स्थान आज अनासक्ति आश्रम के नाम से जाना जाता है ।
ट्रस्ट या संरक्षा शब्द संपत्ति के स्वामित्व से जुड़ा हुआ है । ट्रस्टीशिप संपत्ति पर सामूहिक स्वामित्व को इंगित करता है । किसी वस्तु पर अधिकार स्थापित करने की वृत्ति मनुष्य में है । जबकि देखा जाए तो मनुष्य किसी वस्तु का स्वामी है ही नहीं क्योंकि हमने मूलत: किसी वस्तुत का निर्माण किया ही नहीं है । सभी वस्तुएं प्रकृति निर्मित हैं। तो स्वामित्व किसका है ? स्वामित्व का भाव एवं विचार लोभवश मनुष्य द्वारा स्थापित किया गया है । विश्व में अनेक विचारकों ने इस भाव को कम करने, उससे मुक्त होने का मार्ग बताया । इस प्रयास को मोटे तौर पर दो वर्गो में देख सकते हैं । एक, पाश्चात्य विचारों द्वारा व्यक्त विचार जिसमें स्वामित्व समाज या राज्य आधारित माना । इसमें मुख्य कार्ल मार्क्स एवं अन्य समाजवादी विचारक, चिंतक हैं । दो, भारतीय चिंतन जिसमें स्वामित्व भाव से पूर्ण मुक्ति का मार्ग बताया गया है । यह मार्ग परिग्रह से अपरिग्रह की ओर बढ़ने का है ।
अपरिग्रह एक आर्थिक व्यवहार है जो कि किसी वस्तु के निजी स्वामित्व को कम करता है - उससे मुक्ति का मार्ग बताता है । पिछली सदी में ट्रस्टीशिप का विचार मजबूती से सामने आया । इस विचार को मजबूती प्रदान करने में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का योगदान प्रमुख है । इसे वैचारिक आधार प्रदान करने में और एक सीमा तक लोक जीवन में स्थापित करने में आचार्य विनोबा भावे और प्रो.जे.सी. कुमारप्पा का भी मौलिक योगदान है । मेरी राय में गांधी विचार के संदर्भ मेंट्रस्टीशिप केवल संपत्ति की सामुहिक स्वामित्व की व्यवस्था नहीं है । इसके लिए स्व का विकास एवं अनासक्त जीवन आवश्यक है । इसका अभ्यास गांधी ने स्वयं किया । व्यक्तिगत अपरिग्रह एवं ट्रस्टीशिप दोनों साथ-साथ चलना चाहिए ।
भारतीय चिंतन में पांच महाव्रत माने गये हैं, सत्य, अहिंसा, ब्रम्हचर्य, अस्तेय और असंग्रह अपरिग्रह । गांधीजी ने आज की परिस्थिति में इसमें ६ व्रत जोड़े - शरीर श्रम, अस्वाद, निर्भयता, सर्वधर्म समभाव, स्वदेशी और अस्प्रश्यता निवारण । इस प्रकार सुन्दर मानव से सुन्दर समाज (सर्वोदय) की संपूर्ण व्यवस्था एकादश व्रत में समाहित है । यह व्यक्ति के निर्माण के साथ-साथ सामाजिक-आर्थिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्था का आधार है । ट्रस्टीशिप को स्वीकारना स्वामित्व मुक्ति की ओर बढ़ाया गया कदम है ।
गांधीजी ने सर्वप्रथम १९०९ में अपनी मौलिक पुस्तक हिन्द स्वराज में तत्कालीन आर्थिक एवं भौतिकवादी दौड़ की कड़ी टीका प्रस्तुत की थी ।
उन्होनें भारतीय दर्शन व आध्यामिक चिंतन की गहराई में जाते हुए गीता में में व्यक्त किये गये स्थितप्रज्ञ का अभ्यास प्रारंभ किया । प्रारंभ में दक्षिण अफ्रीका और बाद में भारत में हरिजन आश्रम, साबरमती एवं सेवाग्राम आश्रम की स्थापना की । इन आश्रमों में स्वयं को सर्व में समाहित करने, समर्पित करने का अभ्यास तो था ही साथ ही साथ संपत्ति के स्वामित्व भाव से मुक्ति का अभ्यास भी था । इसे आश्रम वासियों के दैनिक जीवन, नियम और आश्रम व्यवस्था मेंदेखा जा सकता था ।
ट्रस्टीशिप की दिशा में गांधी विचार आधारित प्रयास को तीन रूप में देख सकते हैं । पहला, गांधी एवं उनके प्रयोग से जुड़े व्यक्तियों द्वारा व्यक्तिगत एवं पारिवारिक जीवन में स्वामित्व मुक्ति अर्थात स्वयं को ट्रस्टी मानना । ऐसे लोगों में गांधी, विनोबा, जे.सी. कुमारप्पा, धीरेन्द्र मजूमदार और कुछ सीमा तक कृष्णदास जाजू, जमनालाल बजाज आदि का उल्लेख किया जाना चाहिए । दूसरा, सेवाग्राम आश्रम के नियम एवं व्यवस्था में स्व एवं स्वामित्व भाव से मुक्ति का प्रयास । तीसरा गांधीकाल में स्थापित संस्थाआें में ट्रस्टीशिप की व्यवस्था को स्थापित करना । इन संस्थाआें में अ.भा. चरखा संघ व अ.भा. ग्रामोद्योग संघ को याद कर सकते हैं ।
इन संस्थाआें को ट्रस्टीशिप के आधार पर स्वामित्व के सामाजिक दायित्व को स्थापित किया था । इन संस्थाआेंद्वारा आर्थिक गतिविधियां संचालित होती थी जिसमें आर्थिक कार्यो के स्पष्ट नियम बनाये गये थे जिसका पालन किया जाना आवश्यक था । आर्थिक व्यवस्था में संपत्ति एवं उसका स्वामित्व, आर्थिक प्रक्रिया (कच्च माल, उत्पादन, बाजार, लाभांश, पूंजीगत व्यवस्था, रोजगार, मजदूरी-मानदेय, तकनीकी सुधार एवं प्रशिक्षण आदि) के विभिन्न कार्यो के सामाजिक उत्तदायित्व संबंधी नियम थे।
गांधीजी के निधन के बाद आचार्य विनोबा भावे ने स्वामित्व विसर्जन का ऐतिहासिक कार्य किया । इसे ट्रस्टीशिप की व्यवस्था का उदाहरण मानना चाहिए । विनोबा ने दान को आधार मानकर भूदान मांगा और उसे भूमिहीनों में वितरित किया । विनोबा ने दान का जो अर्थ किया उसका विशेष महत्व है । उनके अनुसार दान अर्थात संपत्ति का, स्वामित्व का सम विभाजन है । इस अर्थ को उन्होनें स्वामित्व मुक्ति का प्रयास मान कर कहा सम्पत्ति रघुपति की अर्थात् सबैभूमि गोपाल की । विनोबा संत थे, अध्यात्म में उनकी पहुंच थी, गीता उनके लिए माता समान थी । उन्होनें सभी प्रकार की संपत्ति को ईश्वर को समर्पित करने का विचार रखा । इस कार्य के लिए १४ वर्षो तक पदयात्रा की । इस यात्रा में स्वेच्छा से ४१,७७,५७२ एकड़ जमीन का दान प्राप्त् हुआ और इसमें से २४,४९,१८३ एकड़ जमीन भूमिहीनों में वितरित की गई ।
इस प्रयास को संपत्ति विसर्जन का एक कदम माना जाना चाहिए । यह भी उल्लेखनीय है कि दान प्राप्त् जमीन जिस व्यक्ति को खेती के लिए दी गई उसे उस जमीन को बेचने का अधिकार नहीं है । उसे सिर्फ खेती करने का अधिकार है । यह जमीन स्वामित्व मुक्त मानी गई । विनोबा ने इस विचार को आगे बढ़ाया और ग्रामदान का विचार रखा जिसमें पूरे गांव की जमीन स्वामित्व मुक्त होता है । गांव की जमीन पर ग्राम समाज का स्वामित्व हो - स्वामित्व अर्थात ग्रामसभा धरती का ट्रस्टी हो उसका मालिक या स्वामी नहीं । किसी भी स्थिति में जमीन की बिक्री नहीं हो । ग्रामसभा एवं उसके सदस्य परिवार ट्रस्टी हैं, मालिक नहीं । यह उल्लेखनीय है कि भू-दान एवं ग्रामदान विचार को स्वीकार करते हुए अनेक राज्यों में भू-दान एवं ग्रामदान कानून बने और इस व्यवस्था को कानूनी माना गया । पूरे देश में ग्रामदान हुए । राजस्थान में २१० ग्रामदान गांव ग्रामदान कानून से संपुष्ट है । इसे ट्रस्टीशिप की दिशा में स्वैच्छिक प्रयास मानना चाहिए ।
भारतीय सांस्कृतिक की परम्परा में व्यक्तिगत एवं व्यवस्था के स्तर पर निजी स्वामित्व से मुक्ति एवं अपरिग्रही जीवन जीने को गंभीरता से स्वीकार किया गया है । इसे साधु, संत समाज, जैन मुनि, बौद्ध भिक्षु के जीवन में साफ तौर पर देखा जा सकता है । इनका जीवन अपरिग्रही होने के साथ-साथ निज स्वामित्व से मुक्त होता है । इसी परम्परा में संपत्ति एवं उसके उपयोग की व्यवस्था ट्रस्टीशिप आधारित है ।
धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्थाआें में संपत्ति का स्वामित्व ट्रस्ट में निहित माना गया है । स्वामित्व का स्वरूप की दृष्टि से भारतीय परम्परा में संपत्ति का स्वामित्व ईश्वर में निहित माना गया है । इनके मालिक ठाकुरजी हैं तथा इस प्रावधान को कानूनी मान्यता भी है । मंदिर की संपत्ति ठाकुरजी की है अर्थात स्वामित्व भगवान में निहित है । इसकी खरीद-बिक्री नहीं की जा सकती है । आवश्यकता है कि सेवा करने वाला इसका उपयोग अपरिग्रही होकर स्वयं की जीविका के लिए करे तथा भक्ति-भाव के निमित्त किए जाने वाले कार्य के साथ-साथ लोक कल्याण के लिए भी करें । ***

बुधवार, 17 अगस्त 2011

हमारा भूमण्डल

हमारा भूमण्डल
सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य अभी दूर
कनग राजा
विश्व स्वास्थ्य आंकड़े २०११ वास्तव में हमारी आंखे खोलने को पर्याप्त् आधार दे रहे है । विश्वभर में भारत की कुल आबादी (करीब ११० करोड़) जितने व्यक्तियों को शौचालय या साफ सफाई की किसी भी तरह की सुविधा ही उपलब्ध नहीं है । वैश्विक संदर्भ में बीमारियों की गंभीरता और व्यापकता में कमी तो आ रही है लेकिन जितनी तीव्रता से यह कार्य होना चाहिए था वह नहीं हो पा रहा हे । अतएव सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्यों की प्रािप्त् अभी दूर की कौड़ी है ।
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा हाल ही में जारी रिपोर्ट विश्व स्वास्थ्य आंकड़े - २०११ में बताया गया है कि ऐसे देशों की संख्या बढ़ती जा रही है जिनमें बीमारी का कहर दोहरा हो गया है । एक ओर यहां असंक्रामक रोग जैसे ह्दय रोग, मधुमेह व कैंसर की संख्या बढ़ रही है वहीं दूसरी ओर संक्रामक रोगों के कारण वे मातृ-शिशु मृत्युदर में भी कमी नहीं कर पा रहे हैं । विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वैश्विक रूप से ह्दयरोग, ह्दयघात, मधुमेह व कैंसर जैसे रोगों से मरने वालों की संख्या कुल मृतकों की संख्या की दो तिहाई तक पहुंच गई है । इसकी वजह है बढ़ती उम्र और वैश्वीकरण एवं शहरीकरण से जुड़े खतरों में विस्तार ! इसके अलावा अनेक विकासशील देश निमोनिया, दस्त और मलेरिया जैसी स्वास्थ्य समस्याआें से लड़ रहे हैं जिनकी वजह से ५ से कम उम्र के बच्च्े बड़ी तादाद में मारे जाते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के टाइस बोइरामा का कहना है तथ्य बताते है कि दुनिया का कोई भी देश स्वास्थ्य समस्याआें को संक्रामक अथवा असंक्रामक में से किसी एक नजरिए से देखकर उनसे नहीं निपट सकता । इसे तो परिपूर्णता में ही देखना होगा । विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि रिपोर्ट १९३ सदस्य देशों एवं अन्य स्त्रोतों से स्वास्थ्य के १०० बिन्दुआें को ध्यान में रखकर तैयार की गई है । साथ ही इसमें स्वास्थ्य संबंधी सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्यों को भी ध्यान में रखा गया है । रिपोर्ट में पाया गया है कि विश्व के अनेक भागों में बच्च्े अभी भी अल्प-पोषण का शिकार हैं । इतना ही नहीं करीब १७.८ करोड़ बच्च्े अत्यधिक कुपोषण का शिकार हैं । वैसे विश्वभर में बाल मृत्युदर में कमी आ रही है और वर्ष २०००-२००९ के मध्य इसमें वर्ष १९९० के दशक की बनिबस्त काफी कमी आई । विश्व के कई हिस्सोंखासकर अफ्रीका और कम आय वाले देशों में यह अभी भी चिंताजनक स्थिति में है ।
रिपोर्ट के अनुसार निमोनिया और दस्त आज भी बच्चें की मृत्यु के सबसे बड़े कारण बने हुए है और सन् २००८ में इनसे पांच वर्ष के कम उम्र के क्रमश: १८ व १५ प्रतिशत बच्चें की मृत्यु हुई है । इन बीमारियों से अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया में सर्वाधिक मौतें हुई हैं और ये देश सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य में निर्धारित बाल मृत्युदर के लक्ष्य (दो तिहाई कमी) को भी प्राप्त् नहीं कर पाए हैं ।
रिपोर्ट में कहा गया है कि गर्भावस्था और बच्च्े को जन्म देने के दौरान महिलाआें की मृत्यु में करीब ३४ प्रतिशत की कमी आई है । सन् १९९० में इनकी संख्या ५ लाख ८० हजार थी वह सन् २००८ में घटकर ३ लाख ५८ हजार रह गई । हालांकि यह प्रगति ध्यान आकर्षित तो करती है लेकिन यह अभी भी निर्धारित लक्ष्य ५.५ प्रतिशत से आधी से भी कम यानि २.३ प्रतिशत ही है । यह भी पाया गया है कि सन् २००८ में प्रसव के दौरान मृत में से अधिकांश महिलाएं यानि ९९ प्रतिशत विकासशील देशों की थी । हालांकि दक्षिण पूर्व एशिया में मातृ मृत्यु में सर्वाधिक कमी आई है लेकिन अफ्रीका देशों में यह सन् २००८ में उच्च् स्तर यानि १ लाख जीवित जन्मों में ६२० थी ।
रिपोर्ट में कहा गया है कि दूसरी तरफ मातृ मृत्युदर कम करने हेतु हस्तक्षेप बढ़ा है और इसमें परिवार नियोजन कार्यक्रम सेवा का प्रावधान व सभी महिलाआें को गर्भावस्था, शिशु जन्म एवं जन्म के उपरांत कुशल स्वास्थ्य सेवाएं शामिल है ।
मलेरिया के संबंध में रिपोर्ट में पाया गया है कि ऐसे देशों की संख्या में वृद्धि हो रही है जहां पर सन् २००० के बाद से मलेरिया के मामलों में अस्पतालों में भर्ती और मृत्यु के आंकड़ों में कमी आई है । राष्ट्रव्यापी प्रयासों के कारण जहां सन् २००० में मलेरिया से अनुमानित मौतें १० लाख थीं वे वर्ष २००९ में घटकर ७ लाख ८१ हजार पर आ गई । वहीं सन् २००५ में मलेरिया से पीड़ित लोगों की संख्या बढ़कर २४ करोड़ ४० लाख हो गई जो कि सन् २००० में २३ करोड़ ३० लाख थी । परन्तु सन् २००९ में यह पुन: घटकर २३ करोड़ ५० लाख पर आ गई ।
टी.बी. के मामले में रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक तौर पर इसकी संख्या में थोड़ी बहुत वृद्धि हुई है । सन् २००९ में इसके कुल मामले १.२ करोड़ से १.६ करोड़ के मध्य थे और इसमें से करीब ९४ लाख नए मामले थे । यह भी अनुमान लगाया गया है कि सन् २००९ में १३ लाख एच.आई.वी. नेगेटिव व्यक्ति टी.बी. से मारे गए है । रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि इस बीमारी से होने वाली मौतों में सन् १९९० के मुकाबले एक तिहाई की कमी आई है । अगर वैश्विक रूप से गिरावट की वर्तमान दर बनी रहती है तो टी.बी. को लेकर सहस्त्राब्दी लक्ष्यों में निर्धारित मृत्यु के लक्ष्य को सन् २०१५ तक पाया जा सकता है ।
विश्वभर में जीवित एचआईवी पॉजिटिव व्यक्तियों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है और यह सन् २००९ में ३.३ करोड़ तक पहुंच गई है जो कि सन् १९९९ से २३ प्रतिशत अधिक है । अनुमानत: सन् २००९ में करीब २६ लाख नए लोग इस संक्रमण से ग्रसित हुए और इस दौरान एचआईवी/एड्स से संबंधित १८ लाख व्यक्तियों की मृत्यु हुई । यह भी पाया गया कि एच.आई.वी. पॉजिटिव जीवित व्यक्तियों की संख्या बढ़ने का कारण एंटी रीट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) की उपलब्धता भी है । दिसम्बर २००९ में कम और मध्यम आय वाले देशों के ५० लाख व्यक्तियों को एआरटी सुविधा उपलब्ध थी । इसके अलावा इसी दौरान उच्च् आय वाले देशों में अतिरिक्त ७ लाख लोगों को यह उपचार उपलब्ध था । इसके बावजूद वैश्विक रूप से उचित प्रगति नहीं हो पा रही है । उपचार व प्रभावितों के अनुपात में अभी भी अंतर है । निम्न और मध्यम आय वाले देशों में केवल ३६ प्रतिशत प्रभावितों को ही यह उपचार मिल पा रहा है ।
रिपोर्ट में सुरक्षित पेयजल और सेनेटरी की मूलभूत आवश्यकताआें पर पहुंच को भी दृष्टिगत रखा गया है । पाया गया है कि सन् १९९० में जहां ७७ प्रतिशत आबादी सुरक्षित पेयजल की पहुंच में थी वहीं सन् २००८ में यह बढ़कर ८७ प्रतिशत तक पहुंच गई है । जहां तक सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्यों की बात है वर्तमान दर से वृद्धि से इन्हे प्राप्त् कर पाना मुश्किल है । सन् २००८ में करीब ८८.४० करोड़ व्यक्ति बिना सुरक्षित पेयजल के थे जिनमें से ८४ प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करते है ।
सेनिटेशन संबंधी सहस्त्राब्दी लक्ष्यों की पूर्ति की संभावनाएं भी कम ही नजर आ रही हैं । सन् २००८ में तकरीबन २६० करोड़ व्यक्ति विकसित सेनिटेशन सुविधाआें का उपयोग नहीं कर पा रहे थे । इनमें वे ११० करोड़ लोग भी शामिल हैं जिनके पास सेनीटेशन और शौचालय को किसी भी प्रकार की सुविधा ही उपलब्ध नहीं है ।
रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि विकासशील में अनिवार्य औषधियों की कमी और अधिक मूल्य की समस्याएं अभी भी विद्यमान है । ४० से अधिक देश जिनमें से अधिकांश निम्न और मध्य आय वर्ग के थे, में किए गए सर्वेक्षण से यह बात सामने आई है कि चुनिंदा जेनेरिक दवाइयां सार्वजनिक क्षेत्र की सुविधाआें में से केवल ४२ प्रतिशत में और निजी क्षेत्र में केवल ६४ प्रतिशत में उपलब्ध हैं । सार्वजनिक क्षेत्र में औषधियां की कमी से मरीज निजी क्षेत्र से दवाईयां खरीदने को मजबूर हैं जहां पर ये दवाईयां अंतर्राष्ट्रीय मूल्यों के अनुसार देखें तो जेनेरिक दवाइयों से औसतन ६३० प्रतिशत तक महंगी हैं ।
असंक्रामक रोग जिसमें ह्दयरोग मधुमेह, कुछ खास तरह के कैंसर और श्वास संबंधी गंभीर बीमारियां शामिल हैं, विकसित और विकासशील देशों और सभी उम्र एवं समूहों के व्यक्तियों में लगातार बढ़ रहे हैं । इन दीर्घकालिक बीमारियों की महामारी के कारणों में अस्वास्थ्यकर भोजन, अत्यधिक खाद्य ऊर्जा ग्रहण करना, शारीरिक गतिविधियों में कमी, अधिक वजन और मोटापा, तंबाखू और शराब का हानिकारक इस्तेमाल शामिल है । रिपोर्ट में स्वास्थ्य पर किए जाने वाले अधिक व्यय और व्यक्तियों के जीवनकाल में बढ़ोत्तरी को भी रेखांकित किया गया है । सन् १९९० में जहां औसत आयु ६४ वर्ष थी वह सन् २००९ में बढ़कर ६८ वर्ष हो गई । परन्तु निम्न और मध्यम आय के देशोंमें स्वास्थ्य पर होने वाले व्यय में अत्यधिक खाई अभी भी मौजूद है ।

सोमवार, 25 जुलाई 2011

हमारा भूमण्डल

किसकी सुरक्षा कौन करेगा ?
लता जिश्नु

भारत अमेरिकी शब्दावली और विचारधारा को अपनाने की हड़बड़ी में यह भूल जाता है कि वह एक विकासशील देश है और उसे अभी भूख, गरीबी, बीमारी और बेरोजगारी से निपटना है । साथ ही शिक्षा व आधारभूत ढांचे पर भी बड़ी मात्रा में निवेश करना है । परन्तु भारतीय व बहुराष्ट्रीय कंपनियां भय का वातावरण बनाकर देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को हथिया लेना चाहती हैं । क्या ऐसा करना देशहित में है
घरेलू (होमलैंड) सुरक्षा एक फलता-फूलता व्यवसाय है। इसका सीधा सा अर्थ है बड़ी मात्रा में धन और वास्तविक और काल्पनिक दोनों ही तरह के खतरों से हमें बचने में निजी सुरक्षा सलाहकारों और ठेकेदारों की महती भूमिका ! हम बहुत आसानी से अमेरिकी शब्दावली व विचाराधारा अपना लेते हैं । वैसे यह तय नहीं

है कि होमलैंड शब्द का भारत में निश्चित तौर पर पदार्पण कब हुआ - अब हम सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए अमेरिकी प्रशासनिक तरीकों को भी अपना रहे हैं । दुनिया की सबसे प्रसिद्ध निजी सुरक्षा एजेंसी ब्लेकवाटर को याद कीजिए जिसने इराक में चांदमारी कर सुर्खिया प्राप्त् की थी । क्या इस तरह का कोई हल हमारे यहां अच्छा विकल्प हो सकता है ?
कुछ निजी कंपनियां जो कि मुख्यत: ऐसे अमेरिकी और यूरोपियन निर्माताआें की एजेंट थी जो कि नवीनतम सुरक्षा उपकरण बनाते हैं, के लिए सेवाआें की श्रृंखला के माध्यम से एक बड़ा बाजार तैयार करने में जुटी हुई हैं । संभवत: वह एक अतियथार्थवादी सुबह थी जो मैंनें फेडरेशन इण्डियन चेम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इंडस्ट्रीज (फिक्की) की बोलचाल
वाली दुकान (टॉक शॉप) में बिताई । इसमें सभी तरह के सुरक्षा विशेषज्ञ जिसमें सेना के अवकाश प्राप्त् जनरल, निगरानी रखने वाले निजी समूह और जोखिम का आकलन करने वाली उच्च् श्रेणी की कंपनियां शामिल थीं, देश के सम्मुख आ रही सुरक्षा समस्याआें पर माथापच्ची कर रहे थे ।
शामिल होने वाले समूहों में से अधिकांश के लिए नक्सलवादियों अथवा माओवादियों द्वारा प्रस्तुत संकट सबसे अधिक विचलित करने वाला विषय था । शस्त्रों का धड़ल्ले से उपयोग करने के हिमायती एक अवकाश प्राप्त् मेजर जनरल के पास इस समस्या का हल मौजूद था । गरम खून वाले इन महाशय ने इशारा करते हुए सुझाया कि माओवादियों का नेतृत्व बहुत ही छोटा है । उनके पॉलित ब्यूरो में ३२ और केंद्रीय सैन्य कमान में १३ सदस्य हैं । उनका कहना था इन सबको खत्म कर दीजिए । आदिवासियों को आदिवासियों के खिलाफ खड़ा कर दीजिए और इस तरह हम इस

समस्या को समाप्त् कर सकते हैं ।
एक पूर्व सैन्य अधिकारी के इस सिद्धांत से दर्शकों में जिसमें गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल थे, सन्नाटा खिंच गया । उनके हिसाब से केन्द्रीय रिजर्व बल इस विद्रोह से निपटने में सक्षम नहीं है और इस हेतु उसी तरह के कदम उठाने चाहिए जिस तरह के कदम सेना ने जम्मू कश्मीर में उठाए थे । निश्चित तौर पर कोई भी इस तरह के विचारों को गंभीरता से नहीं ले सकता भले ही प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने इसे देश के लिए सबसे बड़ा आंतरिक खतरा ही घोषित क्यों न कर दिया हो ।
हालांकि इस समय भारत के मध्य में माओवादियों के खिलाफ सरकार का हथियारों से दिया जा रहा जवाब धीमा है और इस समस्या से किस तरह निपटा जाए उस मामले में भी स्पष्टता नहीं हैं । वे यह स्वीकार भी कर रहे है कि अत्यधिक प्रभावित जिले विकास से छूटे हुए हैं । इसके बावजूद यह भी दिखाई दे रहा है कि योजना आयोग द्वारा अप्रैल २००८ में गठित विशेषज्ञ समूह ने जो अनुशंसाए की थीं उस दिशा में भी बहुत कम कार्य हुआ है ।
रिपोर्ट के तैयार होने के करीब ३२ महीनों बाद आयोग ने तय किया वह ऐसे ६० जिलों में दो किश्तों में नगण्य सी नजर आने वाली ५० से ६० करोड़ रूपए की रकम देगी । परन्तु इस आवंटन पर भी रोक लग गई है क्योंकि विभिन्न संस्थाआें में इस पर मतभेद है कि इस रकम का इस्तेमाल किस तरह से हो । तो जहां एक ओर सरकार में इस मसले पर भ्रम की स्थिति मेंे है वहीं दूसरी ओर होमलैंड सुरक्षा के लिए मुक्त हस्त से धन मुहैया कराया जा रहा है ।
उम्मीद की जा रही है कि सन् २०२० तक भारत दुनिया का सबसे बड़ा सुरक्षा बाजार बन जाएगा । विशेषज्ञ रक्षा मंत्रालय को उद्धत करते हुए कहते है कि भारत अगले दो वर्षो में आंतरिक सुरक्षा पर आकस्मिक तौर पर १० अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक खर्च करेगा ।

इसका अर्थ है कंपनियों की चांदी ही चांदी । (सरकार ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में ड्रोन विमानों की अनुमति देेकर इस दिशा में निवेश प्रारंभ कर दिया है ।) इस संबंध में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की सुरक्षा को प्राथमिकता से सामने रखा जा रहा है । इसी के साथ तेलशोधक कारखाने और बंदरगाह भी फेहरिस्त में हैं । उनके हिसाब से सरकार इस तरह की चुनौतियों से निपट पाने हेतु पूर्णतया सुसज्जित नहीं है । फिक्की व भागीदारी करने वाले अन्य संस्थानों का इस सेमिनार से मुख्य आशय यही था कि सुरक्षा उद्योग इस तरह की घटनाआें को श्रृंखलाबद्ध तरीके से प्रस्तुत करें । इस हेतु एसोचेम ने एक बड़े सलाहकार की सेवाएं ली है जो कि होमलैंड सुरक्षा पर निजी सार्वजनिक भागीदारी को दृष्टिगत रखते हुए एक दस्तावेज तैयार करेगा । महिंद्रा स्पेशल सर्विस ग्रुप जिसने इस सेमिनार को प्रायोजित भी किया था, ने इस उद्योग में प्रारंभिक बढ़त भी प्राप्त् कर ली है।
फिक्की के महासचिव व पश्चिम बंगाल के वित्तमंत्री अमित मित्रा ने गृह मंत्रालय के साथ मिलकर एक कार्यसमूह बनाने की वकालत की है जिससे कि निजी खिलाड़ियों की पहुंच मंत्रालय के अधिकारियों तक हो सके और वे सेमिनार से चर्चा में आई तकनीकों को आगे प्रयोग में लाने पर विमर्श कर सकें । इन सुझाव को गृह मंत्रालय में आंतरिक सुरक्षा सचिव यू.के. बंसल ने सहर्ष मान भी लिया है ।
इस बीच भारत के गृह मंत्री पी.चिदंबरम और अमेरिका की होमलैंड सुरक्षा सचिव जेनेट नापोलिटानों के मध्य इस विषय पर चर्चा भी हो चुकी है । हम सशंकित है कि यह प्रक्रिया हमें कहा ले जाएगी । अमेरिका की तरह की सुरक्षा व्यवस्था से क्या हम आंतकवादियों और आतिवादियों से ज्यादा सुरक्षित हो पाएगें ? या हम पहले की ही तरह जोखिम के धुंधलके में पड़े रहेंगे ?
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रविवार, 24 अप्रैल 2011

हमारा भूमण्डल


खाद्यान्न का संकट कहां है ?
आई.आर.आई.एन

विश्वभर में खाद्यान्न के बढ़ते मूल्य संकट का कारण बनते जा रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि मूल्योंे में संतुलन रखने हेतु सारी दुनिया नई कृषि नीति का विकास करें जिससे कि स्थानीय आवश्यकताआें की पूर्ति ठीक से हो सके।
सन् २०१० का समापन २००८ के बाद के सबसे अधिक खाद्यान्न मूल्यों के साथ हुआ । इस समय विश्व बहुत से मुख्य खाद्यान्नों की अत्यधिक कीमतों के संकट से भी जुझ रहा है । इस वजह से कुछ राष्ट्रों में दंगे हुए है और कम से कम एक सरकार का तख्ता पलट भी हो चुका है । इतना ही नहीं इसकी वजह से दुनियाभर में एक अरब से अधिक लोग भूख का शिकार है । यह बात ध्यान देने योग्य है कि क्या किसी ने खाद्यान्न के मूल्यों में इस उछाल की कल्पना की थी और यदि की थी तो इससे निपटने के लिए क्या कुछ उपाय भी किये थे ? सन् २०१० की स्थिति के मद्देनजर कुछ सवाल सामने आ रहे है जिनका जवाब खोजना अब आवश्यक हो गया है । अधिकाशं विशेषज्ञ इसे अस्थायी मूल्य वृद्धि के रूप में देख रहे है ।
परंतु यह बहस भी जारी है कि क्या खाद्य मूल्य जून २००८ में खाद्य एवं कृषि संगठन (एफ.ए.ओ. ) के अंतर सरकार खाद्यान्न समूह के सचिव अब्डोल्रेजा अब्बासिअन का कहना है कीमतों में वृद्धि से हमें धक्का तो पहुंचा है ै। लेकिन हम वैश्विक संकट में नहीं है और अभी वैश्विक आपूर्ति के सामने भी कोई संकट नहीं है । उनका यह भी कहना है कि राष्ट्रों के सामने यह संकट इस बात पर निर्भर करता है कि उनके पास भरपूर आपूर्ति है और उनके पास खाद्यान्न के आयात हेतु वित्तीय क्षमता कितनी है । वहींयूरोपियन आयोग के कृषि प्रवक्ता रोजन वैटी का कहना है कि कुछ वस्तुआें की बाजार में कमी है और औसत मूल्य भी हालिया औसत मूल्यों से अधिक है। लेकिन वे अभी भी २००८ के भावों के आस-पास नहीं है । इस हेतु वे विश्वबैंक के आंकड़े भी प्रस्तुत करते है ।
वहीं २००७-०८ में आए खाद्य संकट पर शेनग्गन फेन के साथ पुस्तक लिखने वाले सह लेखक डेरेक हेडी का कहना है कि वर्तमान वैश्विक वातावरण में बहुत समानता है । उनका कहना है कि यह एक बुलबुले की तरह है । कृषि में आपूर्ति के धीमा होने की वजह मौसमी है । अमेरिका जैसे बड़े कृषि उत्पादक देश में आई एक अच्छी फसल कीमतों को पुन: नीचे ले आएगी ।
विशेषज्ञ इस बात पर एकमत है कि मौसम इसका एक महत्वपूर्ण कारक है । खाद्यान्न विशेषकर गेंहू की कीमतों में सन् २०१० की दूसरी छ:माही में मूल्यों में आया एकायक उछाल रूस और युक्रेन जो कि दुनिया के विशालतम अन्न उत्पादक राष्ट्रों में से है में पड़ा सूखा व आग के कारण है । इस खबर से २०१० की दूसरी छ:माही में कुछ देशों में गेेंहू की कीमतों में ४५ प्रतिशत और कुछ देश में तो ८० प्रतिशत तक की वृद्धि हो गई ं एक अन्य गेहूं निर्माता देश कनाडा को भी अत्यंत खराब मौसम का सामना करना पड़ा और रूस द्वारा गेंहू निर्यात पर प्रतिबंध लगाने से स्थितियां और भी विषम हो गई ।
हेडी विश्व वैश्विक वित्तीय संकट को इसका एक दूसरा कारण मानते हुए कहते है कि अनेक देशों खासकर अमेरिका ने अपनी अर्थव्यवस्था में खूब धन का प्रवेश कराया और ब्याज दरों में भी कमी कर दी । इसके साथ डॉलर के बहुत कमजोर होने ने भी वस्तुआें के अधिक मूल्य की स्थिति पैदा की । इसी के साथ तेल की बढ़ती कीमतों से खाद्यान्न उत्पादन प्रक्रिया और परिवहन की लागत भी बढ़ जाने से खाद्य कीमतों में उछाल आया । हेडी और वेटी ने खाद्यान्न का जैविक ईधन बनाने में इस्तेमाल को भी मूल्य बढ़ाने वाली सूची में शामिल किया है । इसी के साथ वेटी सट्टेबाजी को भी एक बड़ा कारण बताते हुए कहते है कि अगस्त २०१० में युक्रेन और रूस में खराब मौसम की भविष्यवाणी होने के दो हफ्तों के भीतर विश्व में गेहूं के दाम दुगने हो गए ।
अब्बास्सियान का कहना है कि सौभाग्यवश अधिकांश विकासशील देशों में इस वर्ष अच्छी फसल आई है और वे वैश्विक मूल्य वृद्धि से अप्रभावित रहे है । वे कहते है कि लोग कुछेक देशों पर प्रभावों को ही देख रहे है और उन ६०-७० देशों की ओर से आंख मूंदे है, जो कि अप्रभावित है और इसे संकट निरूपित कर रहे है । हालांकि वैश्विक मूल्यों कों घरेलू बाजारों में आने में थोड़ा समय लगेगा क्योंकि मूल्यवृद्धि के प्रभाव का असर तो अधिकांशत: स्थानीय परिस्थितियां ही तय करती है । वहीं विश्व बैंक का कहना है कि उसके विश्लेषण बताते है कि गेंहूं की ऊंची कीमतें कुछ विकासशील देशों तक पहंुच भी चुकी है । आटे के मूल्यों में आई अत्यधिक तेजी में ईधन के मूल्य का भी योगदान है । अफगानिस्तान में अब इतनी क्षमता नहीं बची की वे गेहूं की पिसाई स्वयं कर सके अत: वह पडौसी पाकिस्तान और कजाकिस्तान से आटा आयात करता है । इसके विपरीत केन्या जैसे अनेक देशों में मक्का की अच्छी पैदावार से कीमतों में कमी आई है । परंतु वियतनाम में चावल का उत्पादन घटने से इस खाद्यान्न की कीमतों में वृद्धि हुई है । कीमतों के बढ़ने का पहला शिकार अच्छी गुणवत्ता का भोजन ही होता है । विश्वबैंक द्वारा २००७ -०८ में अफगानिस्तान के २०,००० घरों में किए गए सर्वेक्षण से पता चला कि अधिकांश परिवारों को भोजन की विविधता से हाथ धोना पड़ा और बढ़ती कीमतों से सामंजस्य स्थापित करने हेतु उन्हें पोषण भरे आहार जैसे मांस, फल और सब्जी के स्थान पर गेहूं जैसे खाद्यान्नों को अपनाना पड़ा है ।
हेडी का मानना है कि देशों को अपने खाघान्न भंडारण की सूची जारी करना चाहिए और आयातित खाद्य वस्तुआें पर कर कम करना चाहिए । उनका कहना है कि कुछ मामलों में देश विनिमय दर नीतियों का इस्तेमाल कर महंगाई के प्रभाव को कम कर सकते है । अधिकांश विशेषज्ञ निर्यात पर प्रतिबंध के पक्ष में नहीं है । उनके हिसाब से इससे स्थितियां और बदतर होंगी । वहीं एफएओ का कहना है कि जिन देशों को खाद्यान्न के आयात की आवश्यक पड़ रही है उनके लिए शर्तेअनुकूल करना आवश्यक है । सभी विशेषज्ञ मानते हैं कि दीर्घकालीन हल के लिए सुरक्षा जाल बढ़ाया जाए और जिन देशों में क्षमता है वहां पर उत्पादन भी बढ़ाया जाए ।
यह एक महत्वपूर्ण मसला है । हेडी और फेन द्वारा अमेरिका के कृषि विभाग द्वारा एफएओ और ओईसीडी के साथ मिलकर अगले १० वर्ष के लिए पूर्वानुमान लगाया है जिसमें संतुलन बनाए रखने के लिए सामान्य आपूर्ति और मांग को लिया है तथा जनसंख्या और आर्थिक वृद्धि, तेल की कीमतों का रूख और जैविक ईधन हेतु खाद्यान्नों के इस्तेमाल को ध्यान में रखा है । इस तारतम्य में उनका कहना है अब जबकि संतुलन स्थापित करने वाले मूल्य ही अधिक है ऐसे में कम अवधि के कारक खतरनाक उतार चढ़ाव पैदा करने वाले साबित हो सकते है क्योंकि बाजार में पहले से ही खाद्यान्नों की कमी है ।
हमें विचार करना होगी कि जहां पूर्व में ही बाढ़ आई हुई हो वहां थोड़ी सी बूंदाबांदी भी स्थिति को बहुत खतरनाक बना देती है । हम पहले ही चरम पर पहंुच चुके है। ऐसे में आगे किसी भी तरह की मूल्यवृद्धि के असर अकल्पनीय है । ***

गुरुवार, 24 मार्च 2011

हमारा भूमण्डल


दोहा दौर की धीमी गति
कनग राजा

दोहा दौर के किसी निर्णय पर न पहुंच पाने के लिए भारत व अन्य विकासशील देशों को दोषी ठहराया जा रहा है जबकि वास्तविकता यह है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां जिनके हाथों में विकसित देशों की नकेल है, दोहा दौर के सफल होने की राह में रोड़े अटका रही हैं । इस बीच तीसरी दुनिया के देशों ने भी कृ षि संबंधी अपनी मांगों को लेकर एक स्पष्ट नीति बनाने के प्रयास प्रारंभ कर दिए हैं ।
विश्व व्यापार संगठन के व्यापार समझौते के दोहा दौर ने विकास के मूलभूत क्षेत्रों में बहुत ही सीमित प्रगति की है । अब जबकि समझौता अटका पड़ा है तो प्राथमिकता वाले व्यापार अनुबंधों (पीटीए) की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है । जिससे व्यापार बहुत ही उलझन भरा और कठिन होता जा रहा है। उपरोक्त विचार संयुक्त राष्ट्र संघ की विश्व अर्थव्यवस्था स्थिति और संभावनाएं २०११ नामक रिपोर्ट में प्रमुखता से दर्शाए गए हैं । विश्व अर्थव्यवस्था में इस वर्ष और अगले वर्ष की मेक्रो आर्थिक संभावनाआंे पर जोर डालते हुए रिपोर्ट में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के मोर्चे और खासकर दोहा दौर पर एक पूरा अध्याय समर्पित किया गया है ।
दोहा दौर के बारे में अन्य बातों के अलावा रिपोर्ट में कहा गया है कि मुक्त व्यापार समझौतों के चलते न्यूनतम विकसित राष्ट्रों के लिए कर मुक्त और कोटा मुक्त व्यापार के खतरे बढ़ते जा रहे हैं आंचलिक बहुपक्षीय व बहुपक्षी प्राथमिकता व्यापार समझौते व्यापार नीति के दृष्यबंध को प्रभावित कर रहे हैं और व्यापार के न्यून कराधान वाले स्वरूप पर विपरित प्रभाव भी डाल रहे हैं ।
रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक वित्तीय एवं आर्थिक संकट के अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक वातावरण में नई वास्तविकताआें को आगे ला दिया है । इसमें संरक्षणवाद का पुर्नउदय और एक दशक पूर्व २००१ में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) द्वारा शुरू किए गए बहुपक्षीय व्यापार समझौतों से नीति निर्माताआें का ध्यान हटना भी शामिल है ।
वर्ष २०१० में इसे सफल बनाने और निष्कर्ष पर पहुंचाने के अनेक प्रयत्न हुए जिसमें जी-२० के दो सम्मेलन भी शामिल हैं । रिपोर्ट में चेताते हुए बताया गया है कि वास्तव में समझौतों के मुख्य विषयों पर बहुत कम प्रगति हुई है । जिसमें कृषि का क्षेत्र, गैर कृषि बाजार तक पहुंच (नामा) और विकासशील देशोंें के लिए विशिष्ट और
भेदीय (असमान) व्यवहार शामिल हैं । दोहा दौर की अनिश्चित स्थिति और इसके विकास में व्याप्त् अनियमितता बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली की विश्वसनीयता के लिए चुनौती पैदा कर रही हैं । अपनी टिप्पणी में रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सिओल (दक्षिण कोरिया) में पिछले वर्ष हुए जी-२० सम्मेलन के बाद से यह स्पष्ट होता जा रहा है कि इन समझौतों के वर्ष २०११ में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की संभावनाएं बहुत कम हैं ।
ऐसा माना गया था कि दोहा समझौते में संतुलित और दूरगामी परिणामों से यह शक्तिशाली संदेश जाएगा कि सरकारें आपस में मिलकर कार्य करने में सक्षम हैं जिससे बहुपक्षीय व्यापार नीतियों के लिए नए नियम बनाए जा सकेंगे और वर्तमान में विद्यमान विषमताआें को भी ठीक किया जा सकेगा। इससे ये अधिक विकासोन्मुखी हो सकेंगी जिसके परिणामस्वरूप विकासशील देशों की नीति निर्माण में अधिक भूमिका होगी ।
रिपोर्ट का कहना है कि ये नतीजे न केवल अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में स्थिरता के लिए आवश्यक हैं बल्कि वैश्विक मौद्रिक एवं वित्तीय प्रणाली में सुधार के लिए भी आवश्यक है जो कि नए बहुपक्षीय तयशुदा समझौतों की मूल जरूरत भी है । अंतर्राष्ट्रीय वित्त के लिए भी सभी को समावेशित करने वाली नियामक प्रणाली के निर्माण में प्रगति का अभाव वास्तविक अर्थव्यवस्था की वृद्धि और सुस्थिरता पर विपरित प्रभाव डालेगा । इसके परिणामस्वरूप विकासशील देश वैश्विक वित्त के वर्तमान स्वरूप से अधिक संरक्षणवादी प्रक्रिया अपना सकते हैं ।
दोहा दौर के अनिर्णित रहने को लेकर चेतावनी देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि व्यापारिक प्रणाली प्राथमिकता वाले आंचलिक बहुपक्षीय, बहुपक्षीय व द्विपक्षीय व्यापार नीति का क्षितिज धुंधला होता जा रहा है और जो राष्ट्र दोहा दौर को गन्तव्य तक पहुंचाना चाहते हैं, उनके सामने संकट खड़े होते जा रहें हैं ।
डब्ल्यूटीओ के अनुसार फिलहाल विश्वभर में करीब ३०० प्राथमिकता वाले ऐसे समझौते प्रचलन में हैं जो कि वर्ष २००० के बाद प्रभावशील हुए हैं । वैश्विक आर्थिक संकट के चलते किसी तरह नए समझौतों पर सहमति बनने पर रोक लगी थी । परंतु इसके ठीक होने के पश्चात इस प्रक्रिया ने पुन: जोर पकड़ लिया है और वर्ष २०१० में इस तरह के अनेक नए समझौते हुए जिसमें ट्रांस-पेसेफिक भागीदारी समझौता भी शामिल है ।
ये समझौते अन्य भागीदारों के प्रति भेदभावपूर्ण होते हैं और सर्वाधिक प्राथमिकता वाले राष्ट्र का सिद्धांत बहुपक्षीय व्यापारिक प्रणाली में एक ओर रह जाता है । आज आधे से अधिक विश्व बहुपक्षीय प्राथमिकता वाले अनुबंधोंें की जद में आ चुका है । इसको विस्तार देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे भी अधिक चिंता की बात है निजी क्षेत्र । विकसित और विकासशील दोनों ही देशों में निजी क्षेत्र बहुपक्षीय व्यापार उदारीकरण और नियम तय करने हेतु प्राथमिकता वाले अनुबंधों का अधिक इच्छुक रहता है । ये प्रणाली अधिक लम्बी, अव्यवहार्य और अत्यधिक राजनीतिक भी है ।
रिपोर्ट में संरक्षणवाद को लेकर भी चेतावनी दी गई है । लगातार बढ़ता बेरोजगारी स्तर, विकासशील देशों को घटता वित्तीय स्थान, निर्यात को सहायता के लिए विनिमय दर का अवमूल्यन और अंतत: वैश्विक असंतुलन के पुन: उभरने की संभावना के मद्देनजर किन्हीं गंभीर समायोजन प्रयत्नों का अभाव संरक्षणवादी दबावों को बढ़ावा दे सकता है । व्यापार नियमों मे ही निहित है ं । इसके पक्ष में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और निर्माण नेटवर्क कार्य करता है । निर्माता, निर्यातकों एवं आयातकों ने परस्पर निर्भरता और मदद से इस स्थिति को और भी विषम बनाने में मदद की है ।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले दो दशकों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की यह प्रवृत्ति बन गई है कि अंतिम उत्पाद की आपूर्ति इसी श्रंृखला और अंतर्राष्ट्रीय फर्मोंा के माध्यम से हो । इस प्रवृत्ति से संरक्षणवाद के खिलाफ पारम्परिक तर्क का महत्व भी कमतर नजर आने लगा है । ***

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

हमारा भूमण्डल

असंतुलित होता चीन का पर्यावरण
मार्टिन खोर

चीन भले ही दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया हो लेकिन आवश्यकता इस बात की है कि वह आर्थिक वृद्धि, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समानता के क्षेत्र में संतुलन बैठाए । गौरतलब है कि अत्यधिक निर्माण कार्य से प्राकृतिक निर्माण कार्य से प्राकृतिक असंतुलन बढ़ने की आशंका है जो पहले से ही जलवायु परिवर्तन से प्रभावित विश्व को संकट में डाले हुए हैं । अत्यधिक उपभोग की प्रवृत्ति से तो विश्व विनाश की ही ओर बढ़ेगा ।
चीन की वृद्धि को आधुनिक विश्व का आर्थिक चमत्कार माना जा रहा है । पिछले तीन दशकों से चीन का सकल घरेलु उत्पाद करीब १० प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़ रहा है । इसे विश्व इतिहास की एक दंतकथा की तरह देखा जा रहा है । वैश्विक आर्थिक संकट के दौर में इसकी वृद्धि दर में थोड़ी कमी जरूर आई लेकिन जल्द ही वह सुधार पर भी आ गई । परन्तु इस वर्ष वृद्धि के पहली तिमाही में ११.९ प्रतिशत से घटकर दूसरी तिमाही में १०.३ प्रतिशत व बाकी के वर्ष में ९ से १० प्रतिशत के मध्य रहने की वजह से चिंता की लकीरें पड़ रही है । इसके बावजूद यह बाकी के विश्व के लिए ईर्ष्या का विषय है ।
दहाई वाली इस वृद्धि दर के पीछे चीन का भविष्य के परिवर्तन के पीछे का असमंजस भी साफ दिखाई पड़ रहा है, क्योंकि आगामी वृद्धि के लिए भौतिक एवं पर्यावरणीय सीमाआें को भी तोड़ना आवश्यक होगा । ये असमंजस और विरोधाभास पिछले कुछ हफ्तों में साफ तौर पर दिखाई भी दे रहे हैं । इस दौरान चीन पिछले एक दशक की सबसे भयानक बाढ़ का भी शिकार हुआ है ।अत्यधिक वर्षा और नदियों के उफान के कारण उत्तरपूर्वी प्रांत गोंसू के झोक्यू जिले का बड़ा भाग व्यापक भूस्खलन और समतलीकरण से प्रभावित हुआ जिसके परिणामस्वरूप एक हजार से अधिक व्यक्ति मारे गए और सैकड़ों व्यक्ति अभी लापता है ।
जलवायु परिवर्तन संबंधी वायदों के अंतर्गत चीन को अपनी सकल घरेलु उत्पाद ऊर्जा घनत्व में इस वर्ष के अंत तक वर्ष २००५ के अंत से २०प्रतिशत की कमी करना है । जबकि इस वर्ष की पहली तिमाही मेंऊर्जा कार्यक्षमता में कमी आई है । अतएव सरकार वर्ष के अंत तक इस लक्ष्य की प्रािप्त् के लिए अभियान चला रही है । बैंकों से कहा गया है कि वे ज्यादा ऊर्जा खपत वाली फर्मोंा
को ऋण देने में कटौती करें, इनके करोंमें छुट भी कम की गई है तथा स्टील, सीमेंट और अन्य ऊर्जा की अधिक खपत करने वाले २००० पुराने कारखानों को सितंबर के अंत तक बंद करने का आदेश दे दिया गया था । पिछले वर्ष अगस्त में चाइना डेली ने अपने पहले पृष्ठ पर यह रहस्योद्घाटन किया था कि चीन के वर्तमान में विद्यमान आधे से अधिक रहवासी घरों को नष्ट कर अगले २० वर्षोंा में पुन: बनाया जाएगा । इस प्रक्रियामें १९९९ के पूर्व सभी घरों को तोड़ दिया जाएगा ।
चीनी गृह मंत्रालय के शोध निदेशक के अनुसार सन् १९४९ से पूर्व बने भवनों का निर्धारित ५० वर्षोंा का जीवन समाप्त् हो चुका है । १९४९ से १९७९ के मुश्किल समय में बने घर लम्बी अवधि के लिए नहीं बनाए गए थे तथा सन् १९७९ से १९९५ के मध्य बने घर आधुनिक जीवनशैली के अनुकूल नहीं हैं । इस रिपोर्ट से वर्तमान में विद्यमान मकानों की गुणवत्ता और पुननिर्माण की वजह से पड़ने वाले पर्यावरणीय प्रभावों पर विमर्श प्रारंभ हो गया है ।
चीन प्रतिवर्ष दुनिया के स्टील एवं सीमेंट उत्पादन का ४० प्रतिशत का उपभोग करता है जो कि निर्माण के प्रमुख अवयव
है । इसके अलावा तटों से कितनी रेती उठाई जाएगी और कितने पहाड़ इस प्रक्रिया में विलुप्त् हो जाएंगे यह भी विचारणीय है ।
पिछले दिनों बीजिंग में साउथ सेंटर सम्मेलन के दौरान भी भविष्य की वृद्धि के पैमानों पर भी चर्चा हुई थी । चीनी सामाजिक विज्ञान अकादमी के प्रो.योंग डिंग का कहना है कि वर्ष २००२-२००७ के मध्य चीन की उच्च् वृद्धि दर के कारण स्थायी सम्पतियों (खासकर भवन निर्माण विकास) और निर्यात में निवेश में बढ़ोत्तरी हुई है ।
वैश्विक वित्तीय संकट ने २००८ की दूसरी छ:माही में चीन को भी अपने चपेट में लिया था । इसके परिणामस्वरूप २००९ की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर में निर्यात में कमी की वजह से इसमें गिरावट आई थी । इसका सामना स्थायी संपत्ति के निवेश में ३१ प्रतिशत की वृद्धि करके किया गया जो कि सकल घरेलु उत्पाद में ८ प्रतिशत का योगदान करती है । इस बदलाव हेतु करीब ६२३ अरब अमेरिकी डॉलर का प्रोत्साहन पैकेज दिया गया था । इसमें से अधिकांश निवेश बजाए उत्पादन के अधोसंरचना पर किया गया था । इस तहर चीन ने गिरावट के बाद अंग्रेजी के वी (त) की तरह की आर्थिक प्रगति की । अपनी सृदृढ़ वित्तीय स्थिति के कारण वह बजट-सकल घरेलु उत्पाद अंतर को भी ३ प्रतिशत पर रखने में सफलता प्राप्त् कर पाया इसमें उसकी स्वस्थ बैंकिंग प्रणाली ने भी सहयोग दिया था ।
प्रो.यू.इसके दुष्प्रभाव बताते हुए कहते हैंकि इस अतिरिक्त तरलता के कारण भविष्य में बैंकों पर अतिरिक्त दबाव भी पड़ सकता है और मुद्रास्फीति में भी उछाल आ सकता है । इसके परिणामस्वरूप सरकार को अपनी फैलाव वाली नीतियों में भी परिवर्तन करना पड़ रहा है । इसी वजह से चीन की वृद्धि दर पर प्रतिकुल प्रभाव दिखाई देने लगा है । लेकिन प्रो. यू. आशावादी हैं और मानते हैं कि चीन अच्छी वृद्धि दर बनाए रखेगा । क्योंकि उसकी आर्थिक स्थिति विश्व में सबसे सुदृढ़ है ।
लेकिन साऊथ सेंटर के मुख्य अर्थशास्त्री यिलमाज अकीयूज का कहना है कि चीन वर्तमान वृद्धि मुख्यतया निर्यात पर निर्भर है । अतएव अमेरिका और यूरोपीय संघ की कमजोर वृद्धि से इस पर विपरित प्रभाव पड़ सकता है उन्होंने सुझाव दिया है कि वृद्धि की नई रणनीति के अंतर्गत वेतन में वृद्धि कर परिवारों की आय बढ़ाकर और सरकारी हस्तांतरण एवं सामाजिक कार्योंा पर अधिक खर्च कर उपभोग को बढ़ाया
जाए । इस हेतु उद्योगों को भी नए सिरे से तैयार करना होगा । निर्यात किए जाने वाले अनेक उत्पाद सिर्फ विदेशों को ध्यान में रखकर ही बनाए जाते हैं । अत: निर्यात क्षेत्र में अतिरिक्त क्षमता पैदा हो गई है जिसका घरेलु क्षेत्र में उपयोग नहीं किया जा सकता ।
इस बीच गरीबी उन्मूलन और विकास विभाग ने न्यायसंगत और संतुलित विकास के सामने प्रस्तुत चुनौतियों की ओर भी इशारा किया है । हालांकि चीन ने गरीबी समाप्त् करने के क्षेत्र में काफी तरक्की की है लेकिन कुछ असंतुलन अभी भी बाकी है । पहाड़ी क्षेत्रों में ऐसे क्षेत्र जहां अल्पसंख्यक रहते हैं और जहां महामारियां होती हैं वहां अभी भी काफी बड़ी सामाजिक दरार बनी हुई है । यही वे क्षेत्र हैं जहां पर सामाजिक विकास का प्राथमिक कार्य होना है । विभाग ने इस विषय पर इंगित करते हुए कई चुनौतियों की बात की है । इसमें प्रमुख हैं पर्यावरणीय समस्याएं और प्राकृतिक विध्वंस तथा नई महामारियां और बाजार की असफलता का जोखिम जिससे कि गरीब अधिक प्रभावित होते हैं ।
इसी के साथ पलायन की प्रवृत्ति पर भी प्रकाश डाला गया है । साथ ही बढ़ते शहरीकरण की दिक्कतें जिसमें प्रवासियांे बीमा या किसी भी किस्म की सामाजिक सुरक्षा न मिल पाना शामिल है । ग्रामीण और शहरी लोगों के मध्य आमदनी का अंतर भी बढ़ता जा रहा है ।
निष्कर्ष यह है कि चीन अभी बहुत नाजुक दौर में है और आवश्यकता इस बात की है कि पर्यावरण और प्रदूषण को ध्यान में रखते हुए एक बेहतर जीवन की ओर अग्रसर हुआ जाए । अत्यधिक जनसंख्या वाले किसी भी देश में इस तरह का संतुलन बनाना बहुत कठिन होता है । सारा विश्व देख रहा है कि चीन में भविष्य में क्या होगा क्योंकि वह उन्हें भी उसी तरह प्रभावित करेगा । ***

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

हमारा भूमण्डल

प्राकृतिक गैस से बदलते अमेरिकी समीकरण
भारत डोगरा

गैस परियोजना में होने वाले बदलावों में अभी कई अटकले हैं । अमेरिका की आदत है कि वह अपनी रणनीति को महान उद्देश्यों से जोड़ कर प्रस्तुत करता है । अत: वह इस परियोजना को भी मध्य एशिया व दक्षिण एशिया को नजदीक लाने व भारत-पाकिस्तान को नजदीक लाने जैसे शानदार प्रोजेक्ट के रूप में प्रस्तुत करेगा ।
मध्य एशिया से पाकिस्तान और भारत को गैस आपूर्ति हेतु बनने वाली पाइपलाइन परियोजना के न केवल आर्थिक-सामाजिक आशय है बल्कि इसके राजनीतिक आशय भी अत्यंत महत्वपूर्ण और सामयिक है । इस परियोजना की आड़ में अफगानिस्तान और पश्चिम एशिया में अमेरिका और नाटो देश अपना प्रभाव बढ़ा सकते हैं । वहीं दूसरी ओर रूस और चीन अपनी घटती भूमिका को लेकर आक्रामक रूख अपना सकते हैं, जिसका सीधा असर भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की मांग पर पड़ सकता
है ।
जहां एक ओर अफगानिस्तान के संदर्भ में व्यापक चर्चा यह है कि अमेरिका व नाटो की सेनाएं यहां से निकट भविष्य में वापसी का रास्ता तलाश कर रही हैं, वहीं अमेरिका व नाटो देश यहां एक अन्य तरह की अधिक स्थाई भूमिका भी तलाश रहे हैं । यह स्थाई भूमिका मध्य एशिया के गैस व खनिज भंडार के दोहन से जुड़ी है ।
इस नई भूमिका के कुछ संकेत १६०० कि.मी. की तर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तडद्धॅकमेंर्र्ण्ीं%ॅडीण्-ईर्र्त्र्गीण्ीं%ॅडीण्-र्र्त्त्ीकीं%ॅड पाइपलाइन परियोजना पाइपलाइन दौलताबाद (तुर्कमेनिस्तान) के समृद्ध भंडारोंकी गैस को भारत व पाकिस्तान तक पहुंचाएगी । यह संभावना बनी हुई है कि पाइपलाइन के अन्य गैस भंडारों को भी इससे जोड़ दिया जाए । फिलहाल इसका मार्ग कंधार और मुल्तान होते हुए फाजिल्का (भारत) मे पहुंचने का है । जानकार सूत्रोंके अनुसार क्वेटा (पाकिस्तान ) में एक उपशाखा ग्वादर बंदरगाह की ओर भी बढ़ सकती है, जहां से गैस भंडारों को आगे यूरोप या दुनिया के अन्य देशों तक भी समुद्री मार्ग से भेजा जा सकता है ।
इतना ही नहीं, जब इतनी बड़ी पाइपलाइन विकसित होगी तो उसके लिए सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम होगा । इसी के साथ-साथ अफगानिस्तान के अन्य मूल्यवान खनिजोंको भी बंदरगाह तक सड़क मार्ग से पहुंचाने की तैयारी हो सकती है । इस तरह यह पाइपलाइन परियोजना गैस के साथ अन्य खनिजोंके निर्यात में सहायता भी कर सकती है ।
इस समय तापी परियोजना अमेरिका की छत्रछाया में फल-फूल रही है व इसकी आरंभिक वित्तीय व्यवस्था एशियन
विकास बैंक की ओर से होने की संभावना है । एक समय सोवियत संघ व बाद में रूस का नाम भी इस परियोजना से जुड़ा था । कुछ समय पहले तक रूस ने इसमें दिलचस्पी दिखाई है । पर संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रभाव में इसका नियोजन होने के बाद रूस फिलहाल इस परियोजना से बाहर है । रूस के लिए एक अन्य झटका यह है कि मध्य एशिया की गैस अब रूस की मध्यस्थता के बिना ही यूरोप तक पहुंच पाएगी । इस तरह तेल व गैस व्यापार व कीमतों पर उसकी पकड़ ढीली हो जाएगी ।
चीन भी अमेरिका की छत्रछाया में पल रही इस परियोजना से प्रसन्न नहीं है क्योंकि इससे क्षेत्र में अमेरिका का असर बहुत बढ़ सकता है । चीन ने पाकिस्तान के नए बंदरगाहों में काफी निवेश भी किया है । यदि उनका उपयोग अमेरिका की छत्रछाया में हो रहे व्यापार के लिए हो तो चीन निश्चय ही इससे नाराज होगा ।
फिलहाल अमेरिका के लिए यह परियोजना एक बड़ी कूटनीतिक जीत भी साबित हो सकती है व क्षेत्र की खनिज, गैस व तेल संपदा पर उसकी कंपनियों का नियंत्रण भी बढ़ सकता है । इस समय अमेरीकी व नाटो सेना की ओर से करजई को तालिबान के कुछ गुटोंसे समझौते के प्रयासों को समर्थन बढ़ने लगा है । इसके पीछे एक सोच यह भी है कि कम से कम कुछ लड़ाकू संगठनोंको अपनी ओर किया जा सके ।
तापी परियोजना का एक बड़ा हिस्सा अफगानिस्तान में हेरात, हेलमंत और कंधार जैसे संवेदनशील क्षेत्रों से गुजरने वाला है । इस क्षेत्र में गैस पाइपलाइन की सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती है । यदि इसमें उपशाखाएं जुड़ती हैं व अन्य खनिजों के परिवहन का कार्य जुड़ता है तो यह चुनौती और भी बड़ी होगी । इस सुरक्षा कार्य के लिए काफी पैसा भी उपलब्ध होगा । केवल मूल तापी पाइपलाइन परियोजना को देखें तो गैस गुजरने की ट्रांसिट फीस से अफगानिस्तान को प्रतिवर्ष ३० करोड़ डालर उपलब्ध हो सकते हैं ।
अत: एक योजना यह हो सकती है कि साल दर साल मिलने वाले इस धन के एक हिस्से का उपयोग कर कुछ लडाकुआें को इसकी सुरक्षा कार्य से जोड़ दिया जाए । पर निर्णायक भूमिका उनके हाथ में नहीं दी जा सकती है अत: नाटो इस नई पाइपलाइन की सुरक्षा की भूमिका में उतर सकता है व इसके लिए वह कुछ लड़कुआेंका सहयोग प्राप्त् करना चाहेगा । लेकिन यह सब नियोजन गड़बड़ भी हो सकता है । कुछ समस्याएं चीन और रूस की ओर से आ सकती हैं। तालिबान के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता कि उन्हें दी गई सीमित भूमिका से आगे निकलकर वे कब पूरी सत्ता हथियाने का प्रयास करने लगेंगे ।
यदि केवलआर्थिक हितों व खनिज दोहन को ध्यान में रखकर तालिबान से समझौते किए जाते हैं तो इनका मानवाधिकार व विशेषकर महिला अधिकारों पर बहुत प्रतिकूल असर पड़ सकता है । जहां एक ओर तालिबानों की ताकत बढ़ेगी वहीं दूसरी ओर पूर्व में उनका बहादुरी से विरोध करने वाले व्यक्तियों व समुदायों पर अत्याचार भी हो सकता है । महिलाआें के अधिकार छीने जा सकते हैं व विरोध करने पर उन पर भीषण अत्याचार भी हो सकते हैं ।
अत: तापी परियोजना के पैटर्न पर होने वाले बदलावों में अभी कई अटकले हैं । अमेरिका की आदत है कि वह अपनी रणनीति को महान उद्देश्यों से जोड़ कर प्रस्तुत करता है । अत: वह इस परियोजना को भी मध्य एशिया व दक्षिण एशिया को नजदीक लाने व भारत-पाकिस्तान को नजदीक लाने जैसे शानदार प्रोजेक्ट के रूप में प्रस्तुत करेगा । लेकिन इस तरह की किसी व्यापक सफलता को प्राप्त् करने के लिए अभी बहुत से अन्य प्रयास करने होंगे व केवल एक परियोजना के माध्यम से इतनी पेचीदी समस्याएं नहीं सुलझ सकती हैं । ***

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

हमारा भूमण्डल

वैश्विक गर्मी और जलवायु शरणार्थी
रिचर्ड महापात्र

वैश्विक तापमान में वृद्धि के परिणामस्वरूप समुद्र का स्तर बढ़ता जा रहा
है । इस वृद्धि से भारत के सर्वाधिक प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है । हमें यह समझना होगा कि महज आखें बन्द कर लेने से समस्या हल नहीं हो जाएगी । आवश्यकता इस बात की है कि विश्व के सारे देश आपसी मतभेद भुलकर इस समस्या से छुटकारा पाने का प्रयत्न करें ।
पश्चिम बंगाल के संुदरबन मेंस्थित सागर द्वीप का निवासी बिप्लब मण्डल पिछले २५ वर्षोंा से एक शरणार्थी की तरह दिल्ली की गोविन्दपुरी नामक गंदी बस्ती में रह रहा है । पिछली बातों को याद करते हुए वह कहता है कि मैं जब भी समुद्र को देखता था तो मुझे लगता था कि जैसे वह मेरे गांव में घुस
आएगा । वह १९९२ में दिल्ली में बस गया और दिहाड़ी पर काम करने लगा । साथ ही दिल्ली में बसने के लिए उसने मकान खरीदने के लिए बचत भी प्रारंभ कर दी । १७ वर्ष बाद बिप्लब की आशंका सही साबित हुई । उसके रिश्तेदारों ने बताया कि समुद्र ने धीरे-धीरे मेरे घर को डुबोना प्रारंभ कर दिया है और अब वहां घर जैसा कहने को कुछ भी नहींबचा है ।
सन् २००९ में उसने गोविन्दपुरी में ७० हजार में एक अवैध झोपड़ी खरीद ली । अब उसका कहना है कि मेरी झोपड़ी अवैध जरूर है परंतु वह डूबेगी नहीं । पिछले ३० वर्षोंा में सुंदरबन के अनेक द्वीप डूब गए हैं और अनेक लोग दिल्ली, कोलकाता और मुंबई में जाकर बस गए हैं । बिप्लब और उसके जैसे अनेक अब जलवायु शरणार्थीहो रहे थे । आने वाले वर्षोंा में मुंबई, चेन्नई और अन्य बड़े समुद्र तटीय शहरों के निवासी भी समुद्र की मार से जलवायु शरणार्थी बनने लगेंगे ।
दिल्ली के दिहाड़ी मजदूर बाजार में देश के तटीय इलाकों के निवासी बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं । सभी जगह पलायन की परिस्थितियां एक सी है तूफान, सूखा, समुद्र का रहवासी इलाकों में प्रवेश और खेती के लिए शुद्ध पानी का अभाव । उड़ीसा का केन्द्रपाड़ा जिला जो कि १९९९ के भयानक तूफान में सर्वाधिक प्रभावित था, के निवासी जगन्नाथ साहू का कहना है कि मेरे पिता १९७१ के तुफान बाद कोलकता चले गए थे क्योंकि वह हमारे ६ लोगों के परिवार का पोषण नहीं कर पा रहे थे । वे कभी गांव वापस नहीं लौटे । मैंने अपनी थोड़ी सी कृषि भूमि के साथ १९९९ तक संघर्ष किया । परंतु उस भयानक समुद्री तुफान ने मेरी पुरी जमीन को क्षारीय कर
दिया । अभी १५ गांवों में समुद्र प्रवेश कर गया है जिससे आव्रजन एकदम से बढ़ गया
है ।
भारत की ८००० कि.मी. लम्बी समद्री सीमा में नौ राज्य और द्वीपों के दो समूह आते हैं । वास्तव में वैश्विक तापमान वृद्धि से समुद्र का स्तर बढ़ गया है जिसके कारण समुद्री तट के किनारे बसने वाली भारत की २५ प्रतिशत आबादी के लिए यह महज वैज्ञानिक सिद्धांत भर नहीं बल्कि जिन्दा बचे रहने का सवाल है । इसके परिणामस्वरूप भारत के अन्य इलाकों में प्रवासियों की बाढ़ आ जाएगी । कभी उम्मीदों की द्वीप कहे जाने वाले मुंबई, चेन्नई और कोलकता जैसे शहरों को अब और अधिक प्रवासियों को अपने अंदर समेटना
होगा । इसका सीधा सा अर्थ है वर्तमान उपलब्ध सुविधाआें पर अतिरिक्त भार । इससे आपसी संघर्षोंा में भी वृद्धि होगी ।
गत वर्ष एक आस्ट्रेलियाई वैज्ञानिक ने रहस्योद्घाटन किया कि समुद्र का बढ़ता जलस्तर नई पीढ़ी को जन्म लेने से पहले ही मार देगा । उन्होंने अंदेशा जताया कि इसकी वजह से लोगों को मजबूरन खारा पानी पीना पड़ेगा । जिससे तटीय इलाकों में रह रही गर्भवती महिलाआें में गर्भपात की संख्या बढ़ जाएगी । कई अन्य वैज्ञानिक भी इससे सहमत हैं । ब्रिटिश वैज्ञानिकों के एक दल जिसने बांग्लादेश में तटीय गर्भवती महिलाआें पर बढ़ते समुद्री जलस्तर के प्रभाव का सर्वेक्षण किया है, का कहना है कि भारत में परिस्थितियां इससे भिन्न नहीं होंगी ।
उष्मीय विस्तारण की वजह से समुद्र का पानी गरम होने से उसके आकार में वृद्धि होती है । सन् १९६१ के प्रयोग बताते हैं समुद्र ३००० मीटर तक गर्म हो चुका हैं और यह वातावरण में मौजूद ८० प्रतिशत गर्मी को सोख लेता है । इसकी वजह से पानी का फैलाव होता है साथ ही ग्लेशियर के पिघलने से भी स्तर बढ़ता है । समुद्र का स्तर बढ़ने के बहुआयामी प्रभाव पड़ते हैं । इससे समुद्र तटीय बसाहटें जलमग्न होती हैं, बाढ़ की भयावहता में वृद्धि, तट का टूटना, आगे की बसाहटों पर विपरित प्रभाव पड़ना, बड़ी मात्रा में भूमि का बंजर होना और पानी के स्त्रोतों का खारा होना भी शामिल है । संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन पर अन्तर मंत्रीय समिति का कहना है बढ़ते जलस्तर से एशिया और अफ्रीका के सर्वाधिक घने बसे तटीय शहर प्रभावित होंगे जिनमें मुंबई, चैन्नई एवं कोलकता भी शामिल हैं । समिति के अनुसार भारत में २.४ मि.मी. प्रतिवर्ष के हिसाब से समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा जो कि २०५० में कुल ३८ सें.मी. हो जाएगा ।
संयुक्त राष्ट्र की एक दूसरी समिति के अनुमान से यह ४० सें.मी. होगा क्योंकि हिमालय व हिन्दुकुश श्रंृखला के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इसके परिणामस्वरू भारत के तटीय इलाकों में रहने वाले ५ लाख लोग तत्काल प्रभावित होंगे तथा सुंदरबन सहित तटीय इलाकों के पानी में खारापन भी बढ़ जाएगा । समिति का यह भी आकलन है कि सन् २१०० तक भारत व बांग्लादेश के तटीय इलाकों में रह रही ८ करोड़ अतिरिक्त जनसंख्या प्रभावित होगी । वहीं ग्रीन पीस का तो कहना है कि सदी के अंत तक स्तर में ३ से ५ मीटर एवं वैश्विक तापमान में औसतन ४ से ६ डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से इन्कार नहीं किया जा सकता ।
भारत में लाखों लोग तट से ५० कि.मी. की परिधि में रहते हैं । समुद्र तट से १०
मीटर तक की ऊँचाई वाला इलाका निम्न ऊँचाई समुद्री क्षेत्र कहलाता है । यह सबसे पहले डूबेगा । इस क्षेत्र में ग्रामीण व शहरी आबादी बराबर है । इससे भारत का ६००० वर्ग कि.मी. क्षेत्र डुब में आ जाएगा । अनेक अध्ययन बताते हैं कि समुद्री जलस्तर बढ़ने से भारत और बांग्लादेश में सन् २१०० तक करीब १२ करोड़ लोग बेघर हो जाएगें । संयुक्त राष्ट्र विश्व विद्यालय के कोको वार्नर का कहना है जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप ऐसा विशाल मानव अप्रवास होगा जैसा पहले कभी नहीं देखा गया ।
संयुक्त राष्ट्र संघ के आंकड़े बताते हैं कि वर्तमान में २.४ करोड़ व्यक्ति जलवायु शरणार्थी बन चुके हैं। श्री वार्नर का कहना है कि भारत इससे सर्वाधिक प्रभावित हो सकता है । जलवायु परितर्वन के मानव प्रभाव रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन का आगामी २० वर्षोंा में अधिक प्रभाव पड़ेगा । इसके अनुसार बढ़ता समुद्री जलस्तर जो अभी कम लोगों पर असर डाल रहा है, भविष्य में अधिक आबादी पर असर पड़ेगा । पानी गरम होने में समय लेता है, अतएव अगले कुछ वर्षोंा में समुद्र का तापमान बढ़ने से इसके आकार में वृद्धि होगी तथा इसका परिणाम अधिक विध्वंस ही
होगा । ***

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

३ हमारा भूमण्डल


शताब्दी विकास लक्ष्य की वस्तुस्थिति
रेम्जी बरॉड

शताब्दी विकास लक्ष्यों (एम.डी. जी.) के महत्व को ध्यान में रखते हुए इनके क्रियान्वयन की समीक्षा करना आवश्यक है । इसी के साथ संयुक्त राष्ट्र संघ के दोहरे व्यक्तित्व पर भी विचार करते हुए इसमेंसुधार के लिए उठने वाली आवाजों को मजबूती प्रदान की जाना चाहिए ।
संयुक्त राष्ट्र शताब्दी विकास लक्ष्यों (एम.डी.जी.) को जिस उम्मीदों के साथ सभी सरकारी दावों के बावजूद नजर आता है कि विकास की प्रवृत्ति प्रारंभ से ही त्रृटिपूर्ण थी । पिछले दस वर्षोंा में असंख्य समितियों, अंतर्राष्ट्रीय एवं स्थानीय संगठनों एवं स्वतंत्र शोधकर्ताआें ने दिन रात एक कर के चरम गरीबी और भूख, सभी को उपलब्ध प्राथमिक शिक्षा, लैंगिक समानता, शिशु मृत्यु आदि से संबंधित सभी प्रकार के सूचकांक, संख्या, तालिका और आंकड़े इकट्ठा किए हैं ।
आवश्यक नहीं है कि इन आंकड़ों से निकाले गए सभी निष्कर्ष भयंकर ही निकले हों । साथ ही संयुक्त राष्ट्र के सभी १९२ सदस्य देशोंें द्वारा स्वीकार किए गए आठ अन्तर्राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों को सुनिश्चित करने में अथक रूप से जुटे सभी स्त्री, पुरूषों की विश्वसनीयता पर संदेह भी नहीं किया जाना चाहिए । ये वे लोग हैं जो मुद्दों को सामने लाए और आज भी कृत संकल्प होकर उन्हें पाने में जुटे हुए
हैं ।
समस्या तो इस विचार में ही छुपी हुई है कि सरकारों और राजनीतिज्ञों पर फिर वे चाहे अमीर हों या गरीब, लोकतांत्रिक या तानाशाह या बढ़ते वैश्विक युद्ध या अकाल के अगाध गर्त से निकलने का प्रयास कर रहे हों, पर क्या सहज भरोसा किया जा सकता है कि वे मानवता के प्रति स्वार्थहीन एवं बिना शर्त लगाए ऐसे लोग, जिसमें गरीब, प्रतिकूल परिस्थितियों में रहने वाले, भूखे एवं बीमार शामिल हैं के साथ साझा लगाव दिखा पाएंगे? इस स्वप्नदर्शी स्थिति को किसी न किसी दिन पाया अवश्य जा सकता है लेकिन निकट भविष्य में उस दिन के आने की कोई संभावना नहीं है ।
तो फिर ऐसे लक्ष्यों को लेकर विशिष्ट समायावधि और नियमित रिपोर्टोंा के माध्यम से प्रतिबद्धता क्यों दर्शाई जा रही है जबकि इस हेतु ईमानदार वैश्विक सामंजस्य का अभाव है? अपने गठन के साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ दो विरोधाभासी एजेन्डे का स्त्रोत रहा है । पहला है इसका अलोकतांत्रिक स्वरूप, जिसका नेतृत्व सुरक्षा परिषद में वीटो का अधिकार प्राप्त् देशांे को प्राप्त् है और दूसरा है समानतावादी और यह सामान्य सभा में परिलक्षित होता है । दूसरा स्वरूप वैश्विक मनोदशा और अंतर्राष्ट्रीय विचारों को पहले स्वरूप के मुकाबले ज्यादा सटीक रूप में सामने रखता है । क्योंकि पहला स्वरूप तो कमोबेश तानाशाह और शक्ति संपन्नता को ही प्रश्रय देता है ।
इसके परिणामस्वरूप पिछले छ: दशकों में विचार और व्यवहार के दो विरोधाभासी मत सामने आए हैं । इसमें से एक रोक लगाता है, युद्ध छेड़ता है और राष्ट्रों को नष्ट करता है, और दूसरा मदद के लिए हाथ बढ़ाता है, विद्यालय बनाता है और शरणार्थी को छत मुहैया कराता है । यद्यपि वह कमोब ेश छोटे स्तर पर ही सही, पर मदद तो देता है जबकि पहला बड़े स्तर पर ही सही, पर मदद तो देता है जबकि पहला बड़े स्तर पर तबाही और विध्वंस फैलाता है । शताब्दी लक्ष्य भी इसी द्वंद से उपजे हैं जो कि संयुक्त राष्ट्र संघ के आदर्श सिद्धांतों को कमतर कर रहे हैं । एम.डी.जी. जहां एक ओर व्यक्तियों की चाहत का वास्तविक प्रतिबिंब है वहीं दूसरी ओर उन्हें प्राप्त् करने की उम्मीद कम ही है ।
इसका यह अर्थ भी नहीं है कि कोई भी अच्छी खबर नहीं है । ८ सितंबर २००० को जब साधारण सभा ने शताब्दी लक्ष्यों को अपनाया था तब से कई उत्साहजनक नतीजे भी सामने आए हैं । हालांकि २००५ में विश्व नेताआें के सम्मेलन में यह बात सामने आई थी कि प्रगति की गति धीमी है और नियत समय तक लक्ष्यों को प्राप्त् नहीं किया जा
सकता । २३ जून को अफ्रीका के लिए एम.डी.जी. अभियान के निदेशक चार्ल्स अबुग्रे ने बर्लिन में एम.डी.जी. २०१० रिपोर्ट प्रस्तुत की । इसके अनुसार २००८ में खाद्य एवं २००९ में वित्तीय संकट ने प्रगति को रोका तो नहीं परन्तु इसने वैश्विक गरीबी हटाने के लक्ष्य पाने को और अधिक कठिन बना दिया है ।
श्री अबुग्रे के अनुसार गरीबी में १५ प्रतिशत तक की कमी आई । साथ ही मध्य एशिया जहां पर सशस्त्र संघर्ष एवं युद्ध चल रहे हैं को छोड़कर पूरे विश्व में इस दिशा में प्रगति की है । परन्तु शिशु मृत्यु दर एवं महामारियों से बचाव के मामलों में या तो बहुत कम या बिल्कुल भी प्रगति नहीं हुई है । इतना ही नहीं पर्यावरण ह्ास भी खतरनाक रफ्तार से गतिमान है । श्री अबुग्रे का कहना है कि पिछले १७ वर्षोंा में कार्बन डायआक्साइड का उत्सर्जन ५० प्रतिशत बढ़ा है । संकट के चलते उत्सर्जन में थोड़ी बहुत कमी होने के बावजूद भविष्य में इसमें और अधिक वृद्धि की संभावना है ।
यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि कुछ देश अन्य देशों के मुकाबले शताब्दी विकास लक्ष्यों को प्राप्त् करने के अधिक नजदीक हैं । उदाहरण के लिए चीन को लें, जिसने अपने यहां गरीबी की संख्या में जबरदस्त कमी की है । जब कई अन्य देश और अधिक गरीबी में धंस गए हैं । गरीबी कम करने की दिशा में सख्या के हिसाब से तो कमी आती दिखती है । लेकिन सन् २००० में इसे लेकर जो वैश्विक संकल्प लिया गया था, उससे तुलना करने पर यह नगण्य जान पड़ती है ।
इसे राष्ट्रों की अपनी स्थिति से भी समझना होगा । उदाहरणार्थ चीन की आर्थिक प्रगति को शायद ही वर्ष २००० के सम्मेलन से जोडा जा सकता है । वहीं अफगानिस्तान ने २००१ में अमेरिका और नाटो हमले को नहीं चुना था । जिसनक उसके द्वारा इन लक्ष्यों की प्रािप्त् की सम्भावना को ही नष्ट कर दिया ।
एकमत होने को प्रयासरत होते हुए भी संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा तय किए गए लक्ष्यों की गंभीरता से समीक्षा करना कठिन
है । क्योंकि इन्हें अंतर्राष्ट्रीय इकाईयों जैसे अंतरर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक द्वारा गरीब देशों को आधारभूत परिवर्तन के बहाने उधारी और अत्यंत गरीबी में ढकेले जाने को ध्यान में रखा ही नहीं गया था । इनमें इस बात की भी अनदेखी की गई थी कि किस तरह अमीर और ताकतवर देश अपना सैन्य, आर्थिक एवं राजनीतिक वर्चस्व सुनिश्चित बनाए रखने के लिए गरीब, राजनीतिक रूप से संवेदनशील एवं रक्षा मामलों में कमजोर राष्ट्रों को अपने अधीन बनाए रखना चाहते हैं ।
सर्वसम्मति बनाने की निरर्थक खोज न केवल वास्तविक मुद्दों से ध्यान बटाएगी बल्कि इससे साधारण सभा की सौहार्दपूर्ण छवि को भी धक्का पहुंचेगा । यह कार्य सुरक्षा परिषद पर या सुरक्षा परिषद के उन सदस्योंे पर छोड़ देना चाहिए जिनका मत वास्तव में मायने रखता है कि और निर्बाध रूप से निर्णयात्मक और कू्रर नीतियां लागू करते रहते हैं ।
यह सब कुछ इसलिए नहींकहा जा रहा है कि शताब्दी लक्ष्यों को ही छोड़ देना चाहिए । परन्तु अनावश्यक आशावादिता भी मूल्यांकन में बाधा पहुंचाती है । शताब्दी विकास लक्ष्यों पर वास्तविकता और सच्चई की कीमत पर बहस नहीं की जानी चाहिए । साथ ही इसे अमीरों के लिए एक बार और अच्छा महसूस करने एवं गरीबों को और अपमानित करने के लिए भी प्रयोग में नहीं लाया जाना चाहिए । ***

बुधवार, 9 जून 2010

२ हमारा भूमण्डल

हमारी सांस से डोलती prithviigaar
गार स्मित
संयुक्त राज्य अमेरिका पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी (ईपीए) ने कार्बन डाईऑक्साईड को क्लीअर एयर एक्ट (स्वच्छ वायु अधिनियम) की धारा २०२ (अ) के अंर्तगत दूषित करने वाले एक तत्व के रूप में परिभाषित कर दिया है । एक वयस्क सामान्य तौर पर प्रति मिनट २५० मिलीलिटर ऑक्सीजन खींचता है और २०० मिली लिटर कार्बन डाईआक्साइड छोड़ता है । इस तरह करीब ६.६ अरब मनुष्यों के फेफड़े निरन्तर कार्यशील रहते है जिनसे प्रतिवर्ष २.१६ खरब टन कार्बन डाईआक्साइड वातावरण में इकट्ठा होती है । मनुष्यों द्वारा सांस लेने के दौरान छोड़ी गई कार्बनडाईआक्साईड वैश्विक कार्बन डाईआक्साईड उत्सर्जन की ९ प्रतिशत बैठती है जो कि ५० करोड़ कारों द्वारा छोड़ी गई गैस के बराबर है । वहीं संयुक्त राष्ट्र संघ का अनुमान है कि सन् २०५० तक विश्व की आबादी में ३७ प्रतिशत की वृद्धि हो जाएगी । ये फेफड़े भी प्रतिवर्ष ८२४ अरब टन अतिरिक्त गैस उत्सर्जन करेंगे । पृथ्वी पर सांस लेने वाले जीवों का प्रार्दुभाव करीब ६० करोड़ वर्ष पूर्व हुआ है । तब से कार्बन डाईआक्साईड और ऑक्सीजन के स्तरों में उतार चढाव आता रहा है । आक्सीजन के मामले में यह १६ से ३५ प्रतिशत तक रहा है । औद्योगिक क्रांति के पूर्व मानवीय सांस का हिसाब-किताब ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं था क्योंकि प्रकृति के चक्र से न्यूनतम छेड़छाड़ होती थी । जितनी भी कार्बन डाईआक्साईड निकलती थी वह पेड़-पौधों द्वारा सोख ली जाती थी, जानवर पेड़ पौधे खाते थे तथा पेड़-पौधों और जानवरों को मनुष्य खा जाते थे । परंतु जब से हमने जीवाश्म इंर्धन जलाना प्रारंभ किया तब से डायनासोर के समय से चला आ रहा कार्बन समीकरण बदल गया है । आऊट आफ थिन एयर : डानासोर्स, बर्ड एण्ड अर्थ एन्शिन्ट एटमॉसफियर के लेखकों का आकलन है कि पृथ्वी के पांच विशाल की विलुिप्त् अधिक कार्बन डाईऑक्साइड और कमतर ऑक्सीजन के दौर में हुई । आक्सीजन के स्तर में थोड़ी सी गिरावट को प्राणियों की थोकबंद विलुिप्त् से जोड़ा जा सकता है । पृथ्वी की अनेक प्रजातियां पहले ही बड़ी संख्या में समाप्त् होती जा रही है । दूसरी ओर बाघ से लेकर ध्रुवीय भालु विलुिप्त् की कगार पर खड़े है । सिर्फ हमारी कारें और कारखाने ही कार्बन डाईऑक्साइड नहीं छोड़ते, हमारे भोजन का हिस्सा बना मांस भी जान लेवा साबित हो रहा है । खाद्य एवं कृषि संगठन का कहना है कि वैश्विक तापमान वृद्धि से निपटने के लिए मीथेन मांस और दुधारू पशु, भौगोलिक बायोमास का २० प्रतिशत उत्सर्जित करते है । पशुआें ने पृथ्वी के ३० प्रतिशत भाग पर कब्जा जमा रखा है और ग्रीन हाऊस गैसों में उनका योगदान १८ प्रतिशत है जो कि यातायात क्षेत्र से भी अधिक है । इससे भी बुरी स्थिति यह है कि गाय मीथेन गैस का अत्यधिक उर्त्सजन करती है । मीथेन गैस, कार्बन डाईऑक्साइड के मुकाबले वैश्विक तापमान वृद्धि में २३ गुना ज्यादा योगदान करती है इसी तरह गाय नाईट्रस आक्साईड भी छोड़ती है जो कि कार्बन डाईआक्साइड से २८६ गुना अधिक ताप एकत्रित करता है इतना ही नहीं हमने कार्बन डाईआक्साइड संचित करने वाले वनों और उत्तरी अमेरिका के घास के विशाल मैदानों के स्थानापन्न के रूप मेंका उत्सर्जन करने वाले जानवरो में विशाल बाड़ो को अपना लिया है मीथेन के उत्सर्जन में कमी पर तुरंत ध्यान देना आवश्यक है । इसीलिए पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. राजेन्द्र पचौरी ने मांस न खाने हेतु वैश्विक अपील जारी की है । यह एक अत्यन्त साधारण चुनाव है कि या तो आज आप भुने मांस को छोड़े या कल के अपने टिकाऊ भविष्य को दांव पर लगा दें । इस दौरान लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स की रिपोर्ट बताती है कि जलवायु परिवर्तन के हल हेतु किसी हरी तकनीक में निवेश करना पांच गुना सस्ता है । ब्रिटिश वैज्ञानिक जेम्स लव लॉक का अनुमान है कि इस शताब्दी के अंत तक कार्बन डाईआक्साइड की चपेट में आकर जलवायु विप्लव से करीब १० अरब लोग अपने प्राण गवां चुके होंगे और इस घरती पर मात्र एक अरब लोग बचेंगे । हम सांस की नियामत को समझें और सब लोग रूक कर गहरी सांस भरें । अब समय आ गया है कि लवलॉक की चेतावनी को ध्यान में रखते हुए हम अपने इस ग्रह पर जीवन को बचाए रखने में अपनी जिम्मेदारी स्वीकारें । हम जिस अवस्था में पहुंच रहे हैं उसमें मानवता की अगली सांस उसकी अंतिम सांस सिद्ध हो सकती है । ***

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

२ हमारा भूमण्डल

जलवायु परिवर्तन का शिकार होते बच्च्े
लिडिया बेकर
यह कटू सच्चई है कि आज प्रतिवर्ष ९० लाख बच्च्े ५ वर्ष की उम्र तक पहुंचने से पहले ही काल कवलित हो जाते हैं । इसमें से ९७ प्रतिशत बच्च्े न्यून या मध्यम आय वाले देशों के गरीब समुदायों एवं परिवारों के होते है । इनमें से अधिकांश बच्च्े कुछ ही बीमारियों एंव स्थितियों जैसे कुपोषण, निमोनिया, चेचक, उल्टी दस्त, मलेरिया, एच.आई.वी., एवं एड्स व नवजात के उपचार मेंलापरवाही जैसी परिस्थितियों के कारण असमय मारे जाते हैं । इस पृष्ठ भूमि में देखे तो हम पाएँगे की जलवायु परिवर्तन इक्कीसवी शताब्दी में वैश्विक स्वास्थ्य हेतु सबसे बड़ा खतरा है । जल वायु परिवर्तन विभिन्न प्रकार से बच्चें के स्वास्थ्य को भी प्रभावित करेगा । यह स्वास्थ्य सेवाआें की कार्यप्रणाली महिला शिक्षा एवं सशक्तिकरण, खाद्य सुरक्षा, साफ पानी और साफ सफाई जैसे साधनों पर विपरीत असर करेगा । जो कि बच्चें के स्वास्थ्य के आधार स्तम्भ हैं । वैसे जलवायु परिवर्तन सभी को प्रभावित करेगा । लेकिन गरीब परिवारों के बच्च्े इससे सर्वाधिक प्रभावित होंगे । जलवायु परिवर्तन से ५ वर्ष तक के बच्च्े सर्वाधिक प्रभावित होंगे और ये कई देशों में कुल जनसंख्या के १० से २० प्रतिशत तक हैं । इस उम्र के बच्चें की प्रतिरोधक क्षमता भी कम होने से जोखिम का खतरा भी अधिक है । उल्टी और दस्त का उदाहरण लें इससे प्रतिवर्ष ५ वर्ष से कम उम्र के २० लाख बच्चें की मृत्यु होती है । पानी और सेनिटेशन की कमी इनमें से ९० प्रतिशत मोतों के लिए जिम्मेदार है । जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप पानी की कमी ब़़ढेगी । अतएव अनुमान हैं कि २०२० तक इस बीमारी में २ से १० प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है । कुपोषण से विश्व भर में प्रतिवर्ष ३२ लाख बच्चें की मृत्यु होती है और १७.८ करोड़ बच्च्े इससे प्रभावित हैं । जिन देशों में सर्वाधिक कुपोषण व्याप्त् है उनमें से कुछ हैंबांग्लादेश, इथियोपिया, भारत एवं वियतनाम तथा जलवायु परिवर्तन से इन देशों के सर्वाधिक प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है । इसी के साथ खाद्यान्न की उपलब्धता में कमी आएगी और उनकी कीमतें भी बढ़ेगी। इससे भी सर्वाधिक प्रभावित गरीब परिवारों के बच्च्े होंगे । आज गरीब परिवार अपनी आय का ८० प्रतिशत तक खाद्य पदार्थो पर खर्च कर रहे है । इसके बावजूद उन्हे पोषण आहार नहीं मिल पा रहा है । इसके अतिरिक्त प्राकृतिक आपदाएँ भी प्रतिवर्ष करोड़ो लोगों को प्रभावित कर रही है ओर इनकी निरंतरता से बच्चें के स्वभाव पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है । इस प्रवृति में आगामी २० वर्षोंा में ३२० प्रतिशत की वृद्धि की आशंका है । इसके परिणाम स्वरूप प्रतिवर्ष ११.५० करोड़ बच्च्े प्रभावित होंगे । वर्तमान में पूर्वी अफ्रीका में सूखे से २.५ करोड़ व्यक्ति प्रभावित है । वहीं दक्षिण पूर्व एशिया में बाढ़ के कारण बच्चें की मौतें हो रही है । अफ्रीका में सूखे के कारण अब पशु पालन भी नहीं हो पा रहा है । ऐसे में बच्च्े सर्वाधिक कुपोषित हो रहे हैं । अस्पताल में भर्ती कर अस्थाई रूप से तो उन्हें ठीक कर लिया जाता है लेकिन दीर्घावधि में वे पुन: पूर्ववत स्थिति में पहुँच जाते हैं । पिछले दशक में पृथ्वी का १ से ३ प्रतिशत तक का भू भाग सूखे जैसी स्थितियों का शिकार हुआ है । सन् २०२० तक इसके २० प्रतिशत तक में फैल जाने की आशंका है ओर इस सदी के अंत तक यह ३० प्रतिशत तक पहुँच सकता है। इससे परिवारों की आर्थिक क्षमतापर विपरीत प्रभाव पड़ेगा । इसलिए जोखिम नियंत्रण पर विशाल निवेश के बिना यह समस्या विकराल रूप ले लेगी । अनेक शोधों से यह सिद्ध हो रहा है कि अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रीय एवं स्थानीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन से बच्चें की मृत्युदर बढ़ रही है । इस समस्या से निपटने के लिए आवश्यक है कि बच्चें पर जलवायु परिवर्तन से होने वाले प्रभावों का आकलन हो । इस तारतम्य में एक समाधान तो यह हो सकता है कि बच्चें की भलाई के लिए नगद वाउचर जारी किए जाएं जिससे की उनका ठीक से लालन पालन हो सके। इसी के साथ हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जलवायु परिवर्तन में बच्चें की कोई भूमिका नहीं है । परंतु वे इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित हो रहे हैं । साथ ही हमें यहाँ सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में प्रत्येक बच्च्े को जीवित रहने के अधिकार को जलवायु परिवर्तन न छीन पाए ।***

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

३ हमारा भूमण्डल

बीमार से दवाई छीनने की साजिश
मार्टिन खोर
यूरोपीय सीमा शुल्क अधिकारियों द्वारा भारत और चीन के विकासशील देशों को निर्यात की जाने वाली कम मूल्य वाली जेनेरिक दवाआें को जब्त कर लिए जाने से इन देशों के निवासियों के स्वास्थ्य को नया खतरा पैदा हो गया है । इस कार्यवाही से एड्स, हृदयरोग, अल्जीमर्स जैसी बीमारियों एवं मनोवैज्ञानिक समस्याआें एवं उच्च् रक्तचाप से पीड़ित मरीज दवाईयों से वंचित हो रहे हैं । मुख्यत: भारत के जेनेरिक दवाई निर्माताआेंद्वारा निर्मित ये दवाईयां लेटिन अमेरिका एवं अफ्रीकी देशों को निर्यात की जा रही थीं । अपने अंतिम गंतव्य पर पहुंचने के पहले ही इन्हें नीदरलैंड और जर्मनी के हवाई अड्डों पर नकली होने की संभावना बताते हुए जब्त कर लिया गया। अक्सर होता यह है कि यूरोप की बड़ी दवाई कंपनियां यह आरोप लगाते हुए शिकायत करती हैं कि ये दवाईयां नकली हैं या इनके निर्माण में बौदि्घक संपदा कानून का उल्लंघन किया गया है । हालांकि बाद में पता यह चला कि न तो ये उत्पाद नकली है और न ही इनके माध्यम से किसी पेटेंट कानून का उल्लंघन हुआ है । बल्कि इन्हें पूरी कानूनी वैद्यता के साथ भारतीय कंपनियेां ने उत्पादित किया है और ब्राजील, पेरू, कालंबिया, मेक्सिको, नाईजीरिया व अन्य अफ्रीकी देश इन्हें ब्रांडेड दवाईयों के मुकाबले काफी कम मूल्य पर खरीद रहे हैं। इस जब्ती से इन दवाईयों के निर्यातक व आयातक देशाों के अलावा स्वास्थ्य समूहों में भी रोष फैल गया है । उनकी चिंता का विषय यह है कि यूरोपीय सरकारें बड़ी दवाई कंपनियों के व्यावसायिक हितों को अवांछित रूप से प्रश्रय देते हुए विकासशील देशों के मध्य हो रहे इस पूर्णतया वैधानिक व्यापार को रोकने में लगी हुई हैं । वाल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार पिछले वर्ष नीदरलैण्ड और जर्मनी में २० से अधिक बार भारतीय औषधियों को यह कहते हुए रोक लिया गया है कि इनके निर्माण में यूरोपीय पेटेंट कानूनों का उल्लंघन किया गया है । जबकि ये दवाईयां यूरोप में बेचने के उद्देश्य से बनाई ही नहंीं गई थीं। भारत अब औपचारिक रूप से विश्व व्यापार संगठन में इस मामले की शिकायत करने जा रहा है जिससे कि यूरोपीय कार्यवाही को रोका जा सके । शिकायत में यह दवा किया जाएगा कि यूरोपीय यूनियन ने अपनी महाकाय दवाई कंपनियों को सीमा शुल्क नियमन के दुरूपयोग की छूट इसलिए दी है जिससे कि इस वैघानिक जेनेरिक औषधि व्यापार को रोका जा सके। कहा जा रहा है कि अनेक यूरोपीय देश मुख्यत: यूरोपीय आयोग नियमन १३८३/२००३ का दुरूपयोग कर रहे हैंजिसके अंतर्गत इस बात की अनुमति है कि किसी औषधि को नकली होने या बौद्धिक संपदा कानूनों की अवहेलना करने के शक पर राजसात किया जा सकता है। भारतीय वाणिज्यमंत्री आनंद शर्मा का कहना है कि उनकी सरकार ने यूरोपीय यूनियन से यह कहते हुए कि उनकी कार्यवाही पूर्णतया अनुचित है, अपना विरोध दर्ज करवाया है । भारतीय वाणिज्य एवं व्यापार फेडरेशन का कहना है कि इस कार्यवाही से देश की दवाई कंपनियों को गहरा धक्का लगा है । भारतीय कंपनियों को अब ऐसे वैकल्पिक मार्गोंा से दवाई भेजना पड़ रही है जो यूरोप से न गुजरता हो । इसमें उन्हें दुगुना व्यय करना पड़ रहा है । जिससे दवाई की लागत में वृद्धि हो रही है । इसी के साथ यूरोपीय कार्यवाही से स्वयं को बचाने के लिए वकीलों की सेवाएं लेने में भी उन्हें काफी खर्च करना पड़ रहा है । १६ गैर सरकारी संगठनों ने भी डच और जर्मनी की इन कार्यवाहियों का विरोध किया है । वालस्ट्रीट जर्नल ने जब्ती की कुछ घटनाओं का वर्णन करते हुए बताया कि नवम्बर २००८ में डच अधिकारियों ने एमस्टरडम हवाईअड्डे पर खून पतला करने वाली दवाईयों के दो शिपमेंट, जो कोलंबिया जा रहे थे, को जब्त कर लिया ।यह दवाई भारतीय कंपनी इंड-स्विफ्ट द्वारा निर्मित की गई थी एवं इसे यूरोपीय कंपनी सनोफी के कहने पर जब्त किया गया । इन दवाईयों को मई २००९ में लौटाया गया । इस दौरान भारतीय कंपनी को निर्यात हेतु मार्ग पुर्ननिर्धारण कर दवाईयां मलेशिया एवं सिंगापुर के रास्ते भेजना पड़ी जिसमें दुगुनी लागत आई । इसी तरह नवम्बर २००८ में भारतीय कंपनी सिपला द्वारा पेरू को निर्यात की जा रही अल्जीमर्स के उपचार की औषधी को नोवारटीस कंपनी के कहने पर जब्त कर लिया गया । ये दवाईयां अभी तक नीदरलैंड के ही कब्जे में हैं । फरवरी २००९ में पुन: एमस्टरडम हवाई अड्डे पर नाइजीरिया को निर्यात की जा रही एड्स निरोधक दवाईयों को जब्त कर लिया गया। नाईजीरिया द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में शिकायत किए जाने के बाद ही ये दवाईयां मुक्त की गई । विश्व व्यापार संगठन की बैठक में भारत और ब्राजील ने यूरोपीय यूनियन की इस मामले में आलोचना की है । आलोचना में कहा गया है कि वैधानिक रूप से निर्मित जेरेनिक औषधियों को नकली बताकर गरीब देशों की कम कीमत प दवाईयों की उपलब्ध पर रोक लगाने का प्रयास किया जा रहा है । ब्राजील का कहना है कि ये जेनेरिक दवाईयं पूर्णतया वैध हैं एवं इन्हं नकली या मिलावटी बताना एक भूल है । यूरोपीय सीमा शुल्क विभाग की कार्यवाही से विकासशील देशों की सस्ती जीवन रक्षक दवाईयों की पहुंच में बाधा पड़ रही है । चीन, क्यूबा, कोलंबिया, इक्वाडोर, मिस्त्र, अर्जेंाटाईना, वेनेजुएला और दक्षिण अफ्रीका ने भी यूरोपीय कार्यवाही की खिलाफत की है । यूरोपीय आयोग ने जवाब में कहा है कि वह सस्ती दवाईयों तक पहुंच बनाए रखने के प्रति पूर्णतया प्रतिबद्ध है, परंतु वह नकली दवाईयों की रोकथाम के खिलाफ सीमा शुल्क अधिकारियों की मुहिम भी जारी रखे ।***
विफल रहे तो फायदा : नासा
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के प्रमुख वैज्ञानिक जेम्स हंसेन ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन पर होने वाली कोपेनहेगन वार्ता का विफल होना पृथ्वी के लिए फायदेमंद साबित होगा । हंसेन ने कार्बन मार्केट योजना का विरोध करते हुए कहा कि कार्बन उत्सर्जन के लिए परमिट खरीदना और बेचना जलवायु परिवर्तन को रोकने का हल नहीं है । नासा गोडार्ड इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस स्टडीज के प्रमुख ने कहा कि इस वक्त जो कदम उठाए जा रहे हैं, या जिनके उठाने की तैयारी है उनकी बुनियाद ही गलत है , इसलिए पूरी स्थिति को दोबारा देखने की जरूरत है । उन्होंने कहा कि अगर यह क्योटो प्रोटोकॉल की तरह ही हुआ तो लोगों को इसे समझने में ही वर्षोंा लग जाएेंगें । कोपेनहेगन सम्मेलन की सफलता /विफलता को लेकर कयास लग रहे हैं । ब्रिटिश अखबार `गार्जियन' के एक सर्वे के मुताबिक दुनिया के १० में से ९ वैज्ञानिकों का मानना है कि कोपेनहेगन में उठाए जाने वाले कदम सफल नहीं होंगें । इसके पीछे जो कारण हैं उनमें चीन जैसे देशांे का रवैया और आर्थिक मंदी प्रमुख है ं ।

गुरुवार, 19 नवंबर 2009

३ हमारा भूमंडल

निर्धन होता एशिया
ची योक हिआेंग
वैश्विक आर्थिक संकट के गहराते संपूर्ण एशिया में गरीबी में और भी वृद्धि हो रही है । आज एशिया में एक अरब से अधिक व्यक्ति घटती आमदनी, रोजगार की हानि और निर्यात आधारित वृद्धि जो कि एशिया की समृद्धि को मुख्य मार्ग थी, के घटते विपन्नता का शिकार हो गए हैं । गौरतलब है कि दुनिया की सर्वाधिक गरीब आबादी एशिया में ही निवास करती है । पहले कहा जा रहा था कि विकसित देशों की मंदी एशिया पर प्रभाव नहीं डालेगी परंतु यह बात गलत साबित हुई । एशिया विकास बैंक (एडीबी) के अनुसार इस वर्ष एशिया महाद्वीप में वृद्धि दर के तीन प्रतिशत तक गिरकर ३.४ प्रतिशत के निम्न स्तर तक पहुंच जाने की आशंका है, जो कि १९९७-९८ के बाद न्यूनतमहै ।इस स्थिति में परिवर्तन अमेरिका, यूरोपीय यूनियन और जापान की मंदी की व्यापकता और अवधि पर निर्भर करता है क्योंकि इन देशों में एशिया के निर्यात के ६० प्रतिशत होती है । एडीबी के अनुसार धीमी वृद्धि दर मायने हैं विकासशील एशिया में ८ करोड़ से अधिक व्यक्ति जिसमें से १.४ करोड़ अकेले चीन में हैं और २०१० तक २.४ करोड़ की अतिरिक्त आबादी का, गरीबी की चपेट में आ जाना । ये वो लोग हैं जो कि गरीबी के शिकंजे से मुक्त हो सकते थे बशर्तेंा वर्तमान आर्थिक संकट न आता और आर्थिक वृद्धि दर पूर्ववत कायम रहती । संयुक्त राष्ट्र संघ का भी अनुमान है कि कम वृद्धि दर वाली अर्थव्यवस्थाआें में गरीबों की संख्या और गरीबी दर में बढ़ोत्तरी हो सकती है । जमीनी हकीकत यह है कि इस वैश्विक उथल-पुथल ने गरीबो को सर्वाधिक चोट पहुुंचाई है । हालांकि खाद्य पदार्थोंा एंव इंर्धन के मूल्य अपने जीवन स्तर से नीचे आ गए है परंतु लोगों को जीवन स्तर २००७ के स्तर पर वापस नहीं आ पाया है । साथ ही अब यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जा रहा है कि वर्तमान वैश्विक आर्थिक संकट ने पिछले दशक में गरीबी को कम करने में पाई गई सफलता पर पानी फेर दिया है । ब्रिटेन स्थित विकास अध्ययन संस्थान (आईडीएस) द्वारा पांच राष्ट्रों की शहरी और ग्रामीण आबादी जिसमें बंगलादेश और इंडोनेशिया भी शामिल हैं, में किए गए जमीनी अध्ययन से पता चलता है कि निर्धन समुदाय के भोजन की मात्रा में कमी आई है, उनके भोजन में विविधता समाप्त् होती जा रही है एवं पोषण खाद्य पदार्थ भी उनकी पहुंंच से बाहर हो गए हैं । कुछ मामलों में व्यक्ति अपना उपचार स्वयं करने को मजबूर हो गए हैं क्यांकि वे महंगी स्वास्थ्य सेवाआें के भुगतान मेंअसमर्थ हैं । इतना ही नहीं इस मंदी के कारण बच्चें की शिक्षा तक खतरे में पड़ गई हैं और अनेक लोगों ने अपने बच्चें को स्कूल से निकाल कर सस्ते मदरसो में भर्ती करा दिया है । इंडोनेशिया के शहरी इलाकों में रहने वाले बड़ी तादाद में २००८ के अंत में अपने मूल निवास की ओर लौटने लगे क्योंकि निर्यात में आई कमी के कारण उनके अनुबंधो का नवीनीकरण नहीं हो पा रहा था । वहीं ढाका में वस्त्र निर्माण में कार्यरत श्रमिकों का कहना है कि उन्हें अब बेहतर कार्य स्थिति वाले कारखानों के बजाए जोखिम भरे व गंदे कारखानों में ही कार्य मिल पा रहा है । वहीं अनेक स्थानों पर लोग सोना खनन जैसे जोखिम भरे अथवा तस्करी जैसे असामाजिक कार्योंा की ओर मुड़ गए हैं । वहीं चीन में शंघाई एवं गुंआंगझो जैसे निर्यात आधारित औद्योगिक शहरों से २ करोड़ आंतरिक अप्रवासी अपने घरों को लौट गए हैं । एडीबी के अनुसार २००८ की चौथी तिमाही में विकासशील एशिया जिसमें पूर्वी एवं दक्षिण पूर्वी एशिया शामिल हैं की वृद्धि दर में ३० प्रतिशत तक की कमी आई हैं । वहीं दक्षिण एशिया में भी यह दोहरे अंकों में पहुंच चुकी है । विश्व बैंक का अनुमान है कि यूरोप, अमेरिका ओर मध्यपूर्व में आई मंदी के फलस्वरूप विकासशील देशों में आवर्जन के माध्यम से आने वाले धन में पिछले दो वर्षो में करीब १५ अरब डॉलर तक की कमी आई है । फिलीपींस जैसे देश जो कि इस तरह के धन पर अत्यधिक आश्रित हैं, कंगाली के कगार पर पहुंच चुके है । दक्षिण एशिया जिसमें भारत, बांगलादेश और पाकिस्तान शामिल हैं, में २००८ में इस धनराशि में १६ प्रतिशत की वृद्धि हुई थी जो कि २००९ में घटकर शून्य पर आ गई । इंडोनेशिया के ४० लाख नागरिक विश्वभर में कार्य करते हैं । एक अनुमान के अनुसार इनसे २ लाख से अधिक को स्वदेश लौटना पड़ सकता हैं । आर्थिक गिरावट की गंभीरता को अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के इस तथ्य से भी समझा जा सकता है कि सन् २००७ से २००९ के मध्य एशिया में कार्य करने वाले गरीबों की संख्या में ५ से १२ करोड़ तक की वृद्धि हुई है । इन परिस्थितियों का सर्वाधिक विपरीत प्रभाव महिलाआें पर पड़ा हैं । क्योंकि वे वस्त्र निर्माण, कपड़ा और इलेक्ट्रानिक उद्योग में बहुतायत में कार्य कर रहीं थी और इन्हीं उद्योगों पर मंदी का सर्वाधिक प्रभाव भी पड़ा है । इन उद्योगों में पांच महिलाआें के मुकाबले दो पुरूषों को नियुक्त किया जाता था अतएव जीविका के साधने से उन्हें ही अधिक संख्या में हटाया गया । पूंजी बाजार की जाखिम लेने की क्षमता में कमी का खमियाजा भी एशिया के देशोंको उठाना पड़ रहा है । एडीबी का मानना है कि इन देशों में सीधे विदेशी निवेश में काफी कमी आई है और अधोसंरचना आधारित परियोजनाआें में तो निवेश का सूखा-सा पड़ गया है । अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं अन्य वैश्विक विकास बैंकों में प्रस्तावित सुधार के पश्चात यह उम्मीद बंधी है कि विकासशील देशों को कुछ अतिरिक्त धन प्राप्त् हो पाएगा परंतु वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए इसके बहुत न्यन होने की आशा है । इसी के समानांतर वर्तमान पूंजी बाजार का अत्यंत संरक्षणवादी रवैया भी चिंता पैदा कर रहा हे । पिछले कुछ महीनों में अमीर देशों ने अपने घरेलू वित्तीय क्षेत्र को विभिन्न तरीकों से सहायता पहुंचाई है । आईडीएस के शोध में बताया गया है कि मंदी की वजह से बढ़ रहे तनावों की वजह से घरेलू हिंसा के प्रकरणों में भी वृद्धि हुई है । इसी के साथ छोटे अपराध, ड्रग्स और शराब पीकर हंगामा करने के मामलों में भी तेजी आई है । इतना ही नहीं बच्चें और बूढ़ों को त्यागने और युवाआें द्वारा अपराधों की संख्या मे भी वृद्धि हुई है ।इन परिस्थितियों में वैश्विक अंतरनिर्भरता को भी चर्चा के दायरे में ला खड़ा किया है और इसके लाभों को लेकर बहस प्रारंभ हो गई हैं । सत्यता तो यही है कि गरीबी की समस्या सिर पर आकर खड़ी हो गई है और अधिकांश देश इसके लिए तैयार नहीं हैं । ***