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गुरुवार, 22 मार्च 2012

सामयिक

खाद्य सुरक्षा बनाम सुरक्षित खाद्य
वीरेन्द्र पैन्यूली

खाद्यान्न सुरक्षा का आधार महज खाद्यान्नों की आपूर्ति नहीं हो सकता । आवश्यकता इस बात की है कि हमें मिलने वाला अनाज सुरक्षित भी हो । मिलावट व अल्प उपलब्धता की वजह से मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है ।
खाद्य सुरक्षा का मुद्दा अब एक महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है । जब हम खाद्य सुरक्षा के मसले को स्वच्छ पेयजल से या इंर्धन से जो खाना पकाने के लिए काम में आता है अथवा उचित सफाई से जोड़ते है तो लगता है कि इस दिशा में अभी बहुत काम करना बाकी है । दुनिया में करीब एक अरब ऐसे लोग हैं, जिनको साफ पेयजल उपलब्ध नहीं है व २ अरब लोगों को उचित शौचालय जल निकासी आदि की व्यवस्था एवं साफ इंर्धन उपलब्ध नहीं है । जिन्हें सब सुविधाएं उपलब्ध भी हैं, उन्हें इसकी अधिक कीमत देना पड़ती हैं । आज पूरे विश्व में स्थाई रोजगार ने ले ली है तो कई नए लोग उन करोड़ों लोगों के संख्या में जुड़ जाते हैं जो छुपी भूख अर्थात कुपोषण से ग्रसित रहते हैं ।
पानी तो कई जगह दूध से ज्यादा महंगा हो रहा है और दूध की बात करें तो मौत के सौदागर उसे घातक रसायनों से बना रहे हैं । सन् १९९८ में ही पश्चिमी उत्तरप्रदेश में सोलह जिलों में करीब एक करोड़ लीटर कृत्रिम विषैला दूध तैयार होता था । इसी से जुड़ा सवाल खाद्यान्नों, मसालों आदि में घातक मिलावट का भी है । कहने का अर्थ है कि हम जो खा रहे है उससे हमारा जीवन सुरक्षित भी है कि नहीं ? इस बात से भी यह तय होगा कि हम खाद्य सुरक्षा के दायरे में हैं कि नहीं । बढ़ते भ्रष्टाचार व घटते उपभोक्ता संरक्षण की वजह से भी हम मात्रात्मक खाद्य सुरक्षा की परिभाषा में होते हुए भी वास्तव में खाद्य असुरक्षा की ओर जा रहे हैं ।
नि:संदेह उत्पादित कुल खाद्यान्न भी खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के लिए जरूरी है परंतु इसे एकमात्र व पर्याप्त् कारक नहीं माना जा सकता है । मान लीजिए खंतों में खूब उगा भी लिया है परंतु यदि उनके भंडारण की व्यवस्था पारिवारिक स्तर पर, सामुदायिक स्तर पर या राज्य या राष्ट्र स्तर पर भी न हो तो भी खाद्य असुरक्षा का दंश सभी को झेलना पड़ सकता है । उड़ीसा में जहां अकाल से मौतें होती हैं, वहीं का समाचार है कि यहां विषाक्त आम की गुठलियों के खाने से भी लोगों की मौतें हुई हैं । जब किसानों ने २००१ में भारी मात्रा में धान उगाया, तो उन्हें सन् २००२ के मध्य तक न तो धान का कोई खरीददार नहीं मिला ना ही भंडारण की कोई व्यवस्था मिली । यहां तक मांग कर डाली कि उन्हें पानी, बिजली के बिल, बच्चें की फीस धान के रूप में दिये जाने की अनुमति दी जाए ।
इससे खाद्य सुरक्षा के संदर्भ मेंदो बातें और भी साफ हो जाती है कि जैसे किसान जब धान के द्वारा बिजली का बिल, बच्चें की फीस आदि के भुगतान की बात कर रहे थे तो सरकार इसे मानने में दिक्कत का अनुभव कर रही हे क्योंकि उसके अनुसार पैसों का काम तो पैसों से ही चलेगा । उसी तरह से जब वह भी काम के बदले अनाज देती है तो उससे भी गरीबों की जरूरतें पूरी नहीं होती हैं । इसी क्रम में गांवों में ही अनाज बैंक बनाकर खाद्य सुरक्षा की रणनीति को लागू करना एक तरफ जहां आवश्यक लग रहा है, वहीं ढांचागत व्यवस्थाआें की कमी होने से इस योजना का लागू करना आसान नहीं होगा ।
आज स्थिति यह हो गई है कि किसान कर्जे लेकर महंगे बीजों और उर्वरकों का उपयोग कर जो फसल उगा रहा है, उसकी बिक्री न होने से या कर्जो को न चुका पाने के कारण जगह-जगह आत्महत्याएं कर रहा है । आंध्र, कर्नाटक, गुजरात में मूंगफली, कपास व अन्य नगदी फसल उगाने वाले किसानों को अच्छी फसलों को उगाने के बाद भी अपने कर्ज को लौटाने के लिए परिवार की जमीनें, गहने आदि बेचने पड़े । यह स्थिति तब है जब खुले विश्व व्यापार व्यवस्था के अन्तर्गत भारत मेंअभी विदेशी अनाज नहीं बिक रहा है । यदि यह क्रमभी शुरू हो जाएगा तब तो अनाज उगाने वाले के घर में ही चूल्हा जलाना मुश्किल हो जायेगा ।
अत: यदि किसी देश में खाद्य सुरक्षा लाना है तो केवल ज्यादा अनाज उगाना ही पर्याप्त् नहीं होगा, परन्तु कभी-कभी अमेरिका जैसे देशों की तरह ऐसे भी निर्णय लेने पड़ेगे कि किसानों को खेतों में कुछ न उगाने के लिए भी धन देना होगा । परन्तु शायद यह अमेरिका जैसा शक्तिशाली और धनी देश ही कर सकता है जो भारत में किसानों को दस डॉलर तक की सब्सिडी देने तक का विरोध करता है और स्वयं अपने किसानों को विभिन्न मदों में लगभग एक हजार डॉलर तक की सब्सिडी दे रहा है ।
जो भी हो तथ्य यही है कि भारत का अन्नदाता किसान आज राशन की दुकान में खड़े होने की स्थिति में आ गया है । अभी तो हरित क्रांति मार देगी । बीजों का पेटेन्ट उसे मार देगा व ऐसे बीजों का प्रचलन भी उसे मार देगा जिन्हें वह एक फसल के बाद अगले फसल के लिए नहीं रख पाएगा । उसे बिजली, पानी, भण्डारण का किराया भी मार देगा । कुल मिलाकर खेतों को खेती के लिए उपयोग करने के बजाए, उसे उन्हें बेचना ज्यादा लाभदायक लगेगा । इससे खेती की जमीन में आई कमी देर सबेर बढ़ती जनसंख्या के लिए खाद्य सुरक्षा देना एक मुश्किल काम बना देगी । तब ऐसे लागों की बन आयेगी, जो कहते हैं कि भविष्य की खाद्यान्न सुरक्षा ऐसे बीजों से ही लाई जा सकेगी, जिन्हें जीन टेक्नोलॉजी का उपयोग कर मनचाहे गुणों वाला गैर प्राकृतिक तरीके से प्रयोगशालाआें में बनाये जायेंगे । ऐसी खाद्य क्या सुरक्षित होगी, यह भी बड़ा सवाल है ?

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

सामयिक

मानव विकास मेंपिछड़ता भारत
डॉ. रामप्रताप गुप्त

संयुक्त राष्ट्र मानव विकास २०११ में दिए गए आंकड़ों से भारत की इस क्षेत्र में दयनीय स्थिति स्पष्ट होती है । सरकारी दावों के बावजूद स्थितियाँ उतनी तीव्रता से सुधर नहीं रही हैं जितनी की अपेक्षा की जा रही थी । इस रिपोर्ट के जारी होने के बाद भारत सरकार व राज्य सरकारों के रूख में कोई परिवर्तन आता है या नहीं यह तो समय ही बताएगा ।
पूंजीवादी व्यवस्था और नवउदारवाद के कारण आय वितरण की बढ़ती विषमता के विरूद्ध आक्रोश के प्रतीक अमेरिका मेंवाल स्ट्रीट पर कब्जे के आंदोलन की खबरों और विश्लेषणों की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि यूएनडीपी की मानव विकास रिपोर्ट सन् २०११ ने भी कुछ इसी तरह की चेतावनी दी है । कोपनहेगन (डेनमार्क) में गत २ नवम्बर को प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर हमने जलवायु परिवर्तन पर रोक लगाने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए तो सबसे गरीब राष्ट्रों की सन् २०५० तक विकास प्रक्रिया रूक जायेगी और विश्व के राष्ट्रों के मध्य तथा उनके भीतर आय के वितरण की विषमता में और भी वृद्धि हो जाएगी ।
यह रिपोर्ट इस तथ्य को भी रेखांकित करती है कि हम जो भी कार्य करते हैं, वह विश्व की ७ अरब आबादी को प्रतिकूल या अनुकूल रूप से प्रभावित करते ही हैं । यूएनडीपी के प्रशासक हेलन क्लार्क का कहना है कि हमारे अनसोचे कदमों के कारण जलवायु में परिवर्तन और प्राकृतिक परिवेश के विनाश के कारण विकासशील राष्ट्रों में आय और स्वास्थ्य में सुधार के प्रयास खतरे में पड़ जायेंगे ।
मानव विकास सूचकों की गणना के लिए तीन घटकों को शामिल किया जाता है, प्रथम है दीर्घ स्वस्थ जीवन, द्वितीय है ज्ञान और शिक्षा तक पहुंच और तृतीय है समुचित जीवन स्तर । अगर इन तीन घटकों के आधार पर निर्मित सूचकांकों में स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधाआें तक पहुंच और आय के वितरण की विषमता को भी समायोजित कर लिया जाए तो वर्तमान में मानव विकास सूचकांकों की दृष्टि से प्रथम दस राष्ट्र - ऑस्टे्रलिया, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाड़ा, जर्मनी, जापान, फ्रांस, इटली, इंग्लैंड, चिली और अर्जेंाटीना - में से कुछ राष्ट्र विश्व के प्रथम २० राष्ट्रों की सूची से भी बाहर हो जायेंगे ।
अमेरिका और इजराइल के क्रम में गिरावट मुख्यत: आय वितरण की विषमता के कारण होगी । अमेरिका के संबंध में स्वास्थ्य सुविधाआें में विषमता का भी महत्व है । दक्षिणी कोरिया के संदर्भ में शिक्षा तक पहुंच में विषमता समायोजित मानव विकास सूचकांक में गिरावट के लिए जिम्मेदार होगी । यूएनडीपी के प्रमुख सांख्यिकीविद मिलोरड कोवो सेविक का कहना है कि आय वितरण की विषमता के मानव विकास सूचकांकों की गणना में शामिल किये जाने से हम मात्र औसत के स्थान पर समाज के सभी वर्गो के विकास स्तर का बेहतर अनुमान लगा सकते हैं । उनका यह भी कहना कि आय वितरण की विषमता के साथ-साथ अनेक राष्ट्रों में जनता के शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाआें तक पहुंच में भी भारी विषमताएं हैं । इनमें व्याप्त् विषमताएं मानव कल्याण को प्रमुखता से प्रभावित करती है । अत: विषमता के साथ समायोजन करने वाले मानव विकास सूचकांक ही बेहतर होंगे । ये समाज के सभी वर्गो के विकास को बेहतर ढंग से प्रस्तुत करते हैं ।
अगर हम भारत की बात करें तो सन् २०११ में इसको मानव विकास सूचकांक वाले राष्ट्रों में शामिल किया जाता है और विश्व के १८७ राष्ट्रों में इसका स्थान १३४ वां आता है । जब हम इसमें आय वितरण की विषमता को भी समायोजित करते हैं तो यह २८ प्रतिशत गिरकर मात्र ०.३९२ ही रह जाता है । हम भारत में लैंगिक विषमता सूचकांक की बात करें तो सन् २०११ में इसका आकार ०.६१७ के बराबर आता है और विश्व के १४६ राष्ट्रों में भारत का स्थान १२९ वां आता है ।
मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार भारत की संसद में १०.७ स्थान महिलाआें के पास है, २६.६ प्रतिशत महिलाएं ही हायर सेकेण्डरी या इससे उच्च् स्तर की शिक्षा प्राप्त् कर पाती है, जबकि पुरूषों के संदर्भ में यह आंकड़ा ५०.४ प्रतिशत का है । श्रम बाजार में पुरूषों की ८१.५ प्रतिशत की भागीदारी के मुकाबले महिलाआें की भागीदारी ३२.८ प्रतिशत ही है । महिलाआें को प्रजनन संबंध खतरे भी उठाने पड़ते हैं, प्रति एक लाख जीवित प्रसवों में प्रतिवर्ष २३० महिलाएं अकाल मृत्यु का शिकार हो जाती हैं । इन सब तथ्यों को देखते हुए मानव विकास प्रतिवेदन सन् २००१ में बहुआयामी गरीबी सूचकांकों की गणना की थी ।
बहुआयामी गरीबी सूचकांक परिवारों की शिक्षा, स्वास्थ्य और रहन-सहन के स्तर की दृष्टि से लोगों के बहिष्कार को प्रदर्शित करता है । भारत के संदर्भ में इस तरह के आंकड़े सन् २००५ से ही उपलब्ध हैं । भारत में ५३.७ प्रतिशत लोग इस तरह के बहुआयामी पिछड़ेपन के शिकार हैं और इसके अलावा १६.४ प्रतिशत लोगों में इस तरह के पिछड़ेपन के शिकार होने की प्रबल संभावनाएं मौजूद हैं ।
भारत में गरीबी के मापदण्ड को लेकर इस समय विवाद हो रहे हैं और अलग-अलग मापदण्डों पर प्रतिशत में काफी अंतर बताया जा रहा है । परन्तु मानव विकास की दृष्टि बहुआयामी बहिष्कार के शिकार लोगों के प्रतिशत का ५३.७ होना शासकों की आंखे खोल देने वाला है । इससे हमारी सरकार का यह दावा कि यह सर्वसमावेशी विकास की दिशा में प्रयास कर रही है, भी खोखला ही सिद्ध होता है ।
मानव विकास प्रतिवेदन का कथन है कि सर्वाधिक गरीब लोग बहिष्कार का दोहरा भार वहन करने के लिए बाध्य होते है । वे पर्यावरण के प्रभावों के शिकार होेते ही हैं, साथ ही उन्हें अपने आवास में वायु प्रदूषण, अशुद्ध पेयजल तथा शौचालयों के अभाव में खुले में शौच करने के दुष्प्रभावों को भी झेलना पड़ता है । रिपोर्ट के अनुसार गरीबी के कारण खाना पकाने की गैस, शुद्ध पेयजल और मूलभूत साफ सफाई की सुविधाआें के अभाव का भी इन्हें अलग से शिकार होना पड़ता है । इस दृष्टि से गरीब आबादी का इनसे बहिष्कार अपने आप में महत्वपूर्ण तो है ही, यह मानव अधिकारों का उल्लंघन भी है । इस प्रकार के बहिष्कारों को दूर करने से आम आदमी की कार्यकुशलता में वृद्धि भी होगी और मानव विकास की दिशा में भी प्रगति होगी, सूचकांक भी बेहतर होंगे ।
अनेक राष्ट्रों में गरीब वर्गो को इस तरह के वंचन से मुक्त करने के लिए निश्चित हीवित्त की भी आवश्यकता होगी जो गरीब राष्ट्रों के लिए एक बड़ी समस्या होती है । मानव विकास प्रतिवेदन में इसके लिए भी एक रास्ता सुझाया है । अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की तुलना में विश्व में मुद्राआें का लेनदेन कई गुना होता है, अत: रिपोर्ट का सुझाव है कि अगर अंतर्राष्ट्रीय मुद्राआें के लेनदेन पर ०.००५ प्रतिशत भी कर लगा दिया जाए तो उससे ४० अरब डॉलर एकत्रित हो सकेंगे जो वर्तमान में प्रदत्त विदेशी सहायता को मिलाकर १३० अरब डॉलर के बराबर हो जायेंगे ।
जलवायु परिवर्तन के साथ समायोजन करने के लिए भी विकासशील राष्ट्रों को विशेषकर दक्षिणी एशिया के राष्ट्रों को १०५ अरब डॉलर की आवश्यकता होगी । अत: अंतर्राष्ट्रीय लेनदेन पर ०.००५ प्रतिशत का कर इस दिशा में सहायक सिद्ध हो सकेगा ।
रिपोर्ट आम जनता के पर्यावरणीय अधिकारों का संविधान में प्रावधान की आवश्यकता को भी प्रतिपादित करती है । अतएव मूलभूत अधिकारों में भी पर्यावरणीय अधिकारों को शामिल किया जा सकता है ।

बुधवार, 25 जनवरी 2012

सामयिक

पर्यावरण और आपदा प्रबंधन
डॉ. मनमोहन सिंह

पिछले पचास वर्षो में हमने असामान्य जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय हादसों को होते देखा है । यह तेजी से बढ़ते औद्योगिकरण और प्राकृतिक संपदाआें के अदूरदर्शी शोषण के कारण हुआ है । विश्व में अमीर और गरीब राष्ट्रों में अंतर किये बिना जन समुदाय को प्रकृति का कोप-भाजन बनना पड़ा है ।
संयुक्त राष्ट्र संघ की १९७२ में हुई स्टॉकहोम कांफ्रेस पर्यावरण मामलों पर विचार-विमर्श की एक बड़ी घटना थी । इसके बाद पर्यावरण रक्षा और प्रकृति संरक्षण में विश्व में देशों का अपेक्षित सहयोग प्राप्त् नहीं हुआ क्योंकि सभी देश अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए कार्य कर रहे है । पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन समूची मानव जाति से संबंध रखता है इसलिये सभी विकसित और विकासशील देशों के लोगों को इस वैश्विक मुद्दे पर सहयोग करने की आवश्यकता है । विश्व की पर्यावरणीय चुनौतियों का मुकाबला करने के लिये सहयोगात्मक हल खोजने की आवश्यकता है ।
पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन इस चुनौती के अन्तर्गत मुख्य मुद्दे है । इस संदर्भ में पर्यावरण मित्र तकनिकी बहुत करागर सिद्ध होगी । ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें तकनीकी को नया आयाम मिल सके और साथ ही यह भी सुनिश्चित हो कि उसका लाभ सभी गरीब देशों को मिल सके ।
स्थायी विकास एक ऐसी नीति है जिसमें पर्यावरण का संरक्षण करते हुए समृद्धि की आकांक्षाआेंसे गठ-जोड़ किया जा सके लेकिन इस विकास नीति को संकुचित चिंतन से, केवल वर्तमान युवा पीढ़ी की आवश्यकता पूर्ति से जोड़कर देखा जा रहा है जिसमें भविष्य के युवा वर्ग की योग्यता को नजर-अंदाज किया जा रहा है । उचित और स्थायी विकास की धारणा किसी भी राष्ट्र की अपनी आवश्यकताआें से बड़ी है । यह हमारे उन सामूहिक प्रयत्नों में निहित है जिसमें हम हमारी भविष्य की युवा पीढ़ी की जीवन शैली, ज्ञान और विशिष्ट योग्यताआें को पर्यावरण एवं संपदा दोहन के परिप्रेक्ष्य में सम्पन्न करते हैं । विकास के लक्ष्य को एकांगी न मानकर ही हम अपनी सभ्यता के विकास की परम्परा भावी पीढ़ी को प्रदान कर पायेंगे ।
जन साधारण के मन में आर्थिक विकास और पर्यावरण स्थिरता के मध्य व्यवसायिक भावना पनपती रही है लेकिन अब इसमें बदलाव आ रहा है और अधिकतम व्यक्ति इस पर विचार कर रहें हैं कि वास्तविक विकास कैसे संभव हो ? यथार्थ में, विकास वृद्धि की परिभाषा का दायरा बढ़ा है और यह सीमा पर्यावरण और उससे संबंधित विषयों पर सामंजस्य के कारण ही बढ़ी है । अब इस विचार पर सहमति बढ़ी है कि विकासशील देशों की निर्धनता के चलते पर्यावरण संरक्षण संभव नहीं है, परन्तु इस विचार को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता कि पर्यावरण अवनति और प्राकृतिक संपदा का अति-दोहन अवश्यम्भावी है ताकि विकास गतिशील रहे । पर्यावरण को निष्क्रियता से समझना अब संभव नहीं होगा और यह विचार भी अब स्वीकार नहीं होगा कि पर्यावरण केवल सम्पन्न राष्ट्रों का विषय है ।
विगत वर्षो में हमारी सरकार ने एक नेशनल एजेंडा, आपदा प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटते हुए पर्यावरण रक्षा का तैयार किया है । इसके अनुसार हमने एक करोड़ हेक्टर में फैले जंगलों को हरा-भरा करके, नेशनल ग्रीन इंडिया मिशन के जरिए गरीबों की आमदनी बढ़ाने का लक्ष्य रखा है । बीस हजार मेगा-वाट सौर ऊर्जा २०२० तक बनाने का कार्य भी प्रगति पर है । हमारा मिशन स्थिर, आवास के मानकों को, हमारी नगर पालिका नियमों के साथ विकसित करके, हरित-भवनों के निर्माण हेतु भी विचार कर रहा है ।
पानी का संग्रह सूखी कृषि भूमि का उत्पादन बढ़ाने के लिए भी हमारा अभियान जारी है । कार्बन मुक्त उत्पादन भी हमारा निर्णायक कदम है जो हम जिम्मेदार विश्व नागरिक की हैसियत से उठाने जा रहे है । इन वर्षो में हमने आपदा प्रबंधन, कानून के तहत अपने प्रयत्नों को, प्राकृतिक विपदाआें से निपटने की दिशा में गति प्रदान की है । इसके लिये संस्थागत मेकेनिज्म की व्यवस्था बनाई है । इस संदर्भ में हमने अन्य देशों के अनुभवों को, अपने विशेषज्ञों से सीखने को कहा है । अंतरिक्ष के इंटरनेशनल चार्टर पर दस्तखत करके भारत ने अपनी अंतरिक्ष क्षमता बढ़ाकर, आपदाआें की जानकारी के लिये डाटा प्रणाली विकसित कर ली है । हमने आपदा से निपटने के लिए समुचित प्रशिक्षण की भी व्यवस्था की है ।
हमारी मान्यता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल परामर्श से नही होगा वरन् इसके लिये एक ठोस कानून की आवश्यकता है । पर्यावरण पर हमारी प्रतिबद्धता को पूरा करने के लिए हमने एक कानून बनाया जो एक ट्रिव्युनल के द्वारा पर्यावरण मामलों को हल करने के लिये कार्यरत है । इस ग्रीन ट्रिव्युनल ने अपना कार्य भी प्रारंभ कर दिया है जिसकी वजह से न्यायालयों पर पड़ने वाला विवादों का भार कम हुआ है ।
पिछले दशक में भारत ने अनेक उल्लेखनीय परिवर्तन देखे हैं । अर्थव्यवस्था के कारण फले-फूले । ऐसे समय कई राष्ट्रों ने प्राकृतिक संपदाआें के रिक्त होने को चुपचाप सहन कर लिया होगा किन्तु हमने ऐसा नहीं किया । हमारी न्यायपालिका ने दूरदर्शी संविधानिक प्रक्रिया को कानूनी जामा पहनाया और हमारी चिंताआें को न तो नजर अंदाज और न ही कमजोर किया । हमारी योजना की सफलता के लिए इन कानून के रखवालों को एक शक्तिशाली कार्य पालिका का निरन्तर सहयोग चाहिए साथ ही विवेक पूर्ण न्याय पालिका भी उसके हौसलों को बाधित न करते हुए उसे सहयोग दे । कुल मिलाकर एक ऐसे कानून व्यवस्था का निर्माण करना है जो पर्यावरण संरक्षण के निमित्त कारगर हो ।
पर्यावरण पर कोई चर्चा हमारी स्थानीय कार्य शैली और हमारी सांस्कृतिक विरासत को नजर अंदाज करके सार्थक नहीं हो सकती है । हमारे देशवासियों ने प्रकृति के विरोध का उत्तर अपने उस आचरण और कार्यशैली से दिया है जो पर्यावरण की दृष्टि से बुद्धिमता पूर्ण थे । हमने प्रकृति को दाता के रूप में देखा है न कि एक विजेता के रूप में जो हमारी इच्छा अनुरूप कार्य करे । आज हमें वैश्विक अनुभव से काफी समझदारी मिली है । पर्यावरण प्रबंधन ने भी बहुत कुछ सीखा है । इस समझ को भारतीय नजर से प्रकृति को देखने की जरूरत है । ऐसा करने से ही वांछनीय परिणाम मिलेंगे ।

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

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गैस त्रासदी : प्रभाव, घाव और अभाव
अज़हर हाशमी

त्रासदी की तोप में बरबादी की बारूद भरी हुई होती है । सन् १९८४ की दो और तीन दिसंबर की दरम्यानी रात में घटित भोपाल गैस त्रासदी ऐसी ही तोप की तरह थी, जिसने मासूमों की मुस्कानें छीनी, सुहागनों का सिंदूर उजाड़ा, हवाआें में जहर घोला, जिसकी वजह से शहर में कहर डोला । भोपाल में यूनियन काबाईड के कारखाने से रिसी गैस ने तोप की तरह काम किया था ।
जिसने जिंदगियों का काम तमाम कर दिया था । इस इस गैस त्रासदी के प्रभाव को चिन्हित करते हुए प्रसिद्ध पत्रकारद्वय डोमिनीक लापियर और जोवियर मोरो ने लिखा था - इस विषैली गैस के गुबार ने पांच लाख से अधिक भोपालियों को प्रभावित किया था, दूसरे शब्दों में शहर के हर चार निवासी में से तीन इससे पीड़ित थे ।
आंखों और फेफड़ों के बाद सबसे अधिक प्रभावित होने वाले अंगों में मस्तिष्क, मांसपेशियां, अस्थिजोड़, लीवर, गुर्दे, प्रजनन-तंत्र, स्नायु तंत्र तथा प्रतिरक्षा-तंत्र शामिल थे । भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद् के अनुसार ५२१२६२ लोग प्रभावित हुए थे ।
इस आंकड़े में वे पीड़ित शामिल नहीं थे जो भोपाल के स्थायी निवासी नहीं थे और वे जिनका कोई नियत घर नहीं था अथवा जो घूमंतु जातियों के थे । इसमें वे पीड़ित भी शामिल नहीं थे, जो इस त्रासदी से अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए, जैसे वे बच्च्े जो मां की कोख में थे अथवा जो उसके बाद पैदा हुए जब उनके माता-पिता जहरीली गैस से प्रभावित हो चुके थे । अनेक पीड़ित ऐसी देशा में पहुंच चुके थे कि, उनके लिए हिलना-डुलना भी असंभव था । कई लोग अकड़न, असहाय खराश अथवा दोहरे माइग्रेन से प्रभावित हो गए थे । बस्तियों की ये महिलाएें भोजन पकाने के लिए चूल्हें नहीं जला सकती थी, क्योंकि धुएं के फेफड़ों में बैठ जाने की दशा में उनसे खून बाहर आने का खतरा था । दुर्घटना के दो हफ्ते बाद बचे हुए लोगों को पीलिया की महामारी ने अपनी चपेट में ले लिया, जिनकी रोगों से लड़ने की प्रतिरक्षा प्रणाली खत्म हो चुकी थी । कई मामलों में तंत्रिका तंत्र के प्रभावित होने से कुछ लोगों के शरीर में एेंठन थी तथा कुछ को लकवा मार गया था, कुछ अचेत हो गए तो कुछ काल का ग्रास बन गए ।
मनोवैज्ञानिक दुष्परिणामों का आकलन करना तो और भी कठिन है । इस त्रासदी के बाद शुरूआत के महीनों में एक नया ही लक्षण पैदा हो गया था। डॉक्टर उसे मुआवजा तंत्रिका रोग कहने लगे थे । सबसे अधिक गंभीर मानसिक प्रभाव था घबराहट के साथ उदासी, कमजोरी और भूख की कमी के बचे हुए लोगों में से अधिकांश में सूनापन और निराशा पैदा कर दी थी । इससे कभी कभी वे इस विनाश को ईश्वर-दण्ड के रूप में देखते थे । घबराहट से अनेक लोग निराश होकर आत्महत्या करने को मजबूर हो गए थे ।
यह बात हिंद पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित पुस्तक भोपाल बारह बजकर पांच मिनट में लेखक लापियर और मोरो ने भी लिखी है । यूनियन कार्बाइड से रिसी गैस ने तोप की तरह काम करके जिंदगियों का काम तमाम कर दिया था, जिसके बाद रही-सही कसर व्यवस्था की विसंगतियों ने पूरी कर दी । मेरे मत से एंडरसन (यूनियन कार्बाइड के तत्कालीन सर्वेसर्वा) ने थंडरसन के रूप में यमदूत की तरह कार्य किया था लेकिन लीपापोती करके उसे देवदूत के रूप में वंडरसन की तरह पेश किया गया था ।
जनता को यह मुगालता देकर कि एंडरसन फ्रंटडोर से लाया जा रहा है, उसे दरअसल बैकडोर से गुपचुप बाहर भेज दिया गया । इसके बाद बयानों के बवंडर चलते रहे लेकिन गैस त्रासदी के पीड़ित हाथ मलते रहे । घंटिया बजती रही । फाइलें सजती रही, फिर ऐसा दौर आया कि फाइलों पर धूल जमती गई । पीड़ितों की तकदीर में परेशानी रमती रही । न्यायिक प्रक्रिया का भी सहारा लिया गया । मुआवजा भी मिला, मगर वह ऊंट के मुंह में जीरा रहा । कुल मिलाकर गैस त्रासदी का प्रभाव आज भी घाव और अभाव ही है ।

बुधवार, 9 नवंबर 2011

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बाढ़ रोकने में कारगर नहीं हैं, बड़े बांध
भारत डोगरा
भारत में इस वर्ष चहुंओर बड़े बांधों ने बाढ़ रोकने की बजाए उसको और मारक व विनाशक बनाने में मदद की है । इसकी वजह बांधों को लचर प्रबंधन रहा है या बांध बाढ़ नियंत्रण का जरिया हैं, जैसे सिद्धांत का ही असफल हो जाना है ? आवश्यकता इस बात की है कि बड़े बांध निर्माण के पारम्परिक विचार की ही समीक्षा की जाए ।
अनेक राज्यों में बाढ़ की समस्या उग्र होने का कारण यह बताया गया कि बड़े बांधों से अधिक पानी छोड़ना एक मजबूरी थी । एक ओर झारखंड के चांडिल बांध से पानी छोड़ने से पश्चिम बंगाल के पूर्व व पश्चिम मिदनापुर में बाढ़ की भीषण समस्या उत्पन्न हुई, तो दूसरी ओर झारखंड की अपनी शिकायत यह थी कि उत्तर प्रदेश में रिहंद बांध से सोन नदी में अधिक पानी छोड़ने के कारण राज्य के गढ़वा और डालटनगंज जिलों के कई गांव बाढ़ग्रस्त हो गए । भाखड़ा व पोंग बांधों से अधिक जल छोड़े जाने के कारण पंजाब के एक बड़े क्षेत्र में कपास की फसल तहस-नहस हुई । उधर हीराकुंड बांध से अधिक पानी छोड़े जाने के कारण उड़ीसा के लाखों लोग बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हुए ।
इस तरह बड़े बांधों से उत्पन्न भीषण बाढ़ के उदाहरण केवल भारत में नहीं देखे गए हैं । अनेक पड़ोसी देशों जैसे चीन में भी ऐसे उदाहरण सामने आए है । बड़े बांध बनाने में तो चीन भारत से भी कही आगे रहा है व चीन की कुछ सबसे विशाल व प्रतिष्ठित बांध परियोजनाएं तो विशेषकर बाढ़ नियंत्रण के बड़े दावे कर रही थीं । अत: यह सोचना होगा कि बाढ़ नियंत्रण के उपायों में निवेश का समुचित लाभ भारत व आस-पड़ोस के देशों को क्यों नहीं मिला व बाढ़-नियंत्रण नीतियों - परियोजनाआें में कैसेबदलाव की जरूरतें हैं ?
वैसे तो देश के एक बड़े भाग में बाढ़ की समस्या काफी समय से व्यापक रूप में मौजूद रही है । जलवायु बदलाव के दौर में यह और गंभीर हो सकती है व इसके रूप में कुछ बदलाव आ सकते है । वैज्ञानिक जिस तरह के बदलते मौसत की तस्वीर हमारे समाने रख रहे हैं, उसमें प्राय: वर्षा की मात्रा बढ़ने पर एवं वर्षा के दिन कम होने की बात की गई है । दूसरे शब्दों में अपेक्षाकृत कम समय में कुछ अधिक वर्षा होने की संभावना है । कम समय में अधिक वर्षा होगी तो बाढ़ की संभावनाएं बढ़ेगी ।
बड़े बांधों के बारे में प्राय: यह देखा गया है कि अधिक वर्षा होने पर उनमें इतना जल छोड़ने की स्थिति आ जाती है जो अधिक वेग तथा अधिक विनाशक बाढ़ का कारण बनता है । बांध-प्रबंधन में बाढ़-नियंत्रण को कम महत्व देने व बांध-प्रबंधन में कमियों के बारे में कई बार सवाल उठाए गए हैं ।
अब यह सवाल उठाना और जरूरी है कि इन सभी बांधों से पानी छोड़ने से आई बाढ़ों के अनुभव को देखते हुए हम महंगे एवं कई अन्य समस्याआें से भी जुड़े बांध निर्माण को बाढ़ नियंत्रण का उपाय कब तक मानते रहेंगे ?
बड़े बांधों में जितनी तेजी से मिट्टी-गाद भरती है, यह भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है । इसके साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि जलवायु बदलाव के दौर में अप्रत्याशित तौर पर अधिक वर्षा की संभावना होने पर बांध कितनी सुरक्षा दे सकते हैं या यह कितने असुरक्षित हो सकते है ।
इस बारे में विचार करना जरूरी है कि बहुउद्देश्यीय परियोजनाआें में जब बाढ़ नियंत्रण, बिजली उत्पादन व सिंचाई के उद्देश्यों में टकराव उत्पन्न होता है तो इनमें बाढ़ नियंत्रण को कितना महत्व दिया जाता है ।
इन सब पहलुआें पर समुचित ध्यान देते हुए सरकार को इस बारे में निष्पक्ष निर्णय लेना होगा कि बड़े बांधों का सक्षम उपाय माना जाए या नहीं । साथ ही यह तय करना होगा कि क्या कठिन परिस्थितियों में बांध प्रबंधन को बाढ़ नियत्रंण को प्राथमिकता देने संबंधी नए निर्देश देने जरूरी हैं ?
जहां बड़े बांधों में पानी छोड़ने के कारण भीषण बाढ़ आती है, वहां की परिस्थितियों के बारे में सरकार की ओर से जनता को लिखित व प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध करवानी चाहिए ।

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

सामयिक

वृक्ष, वन और नदी का प्रबंधन
डॉ. कश्मीर उप्पल

भारत में प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन और स्वामित्व कमोवेश सरकारी विभागों के ही हाथ में है । इसके बावजूद इन संसाधनों में आ रही कमी आश्चर्य का विषय है । इन दिनों में संपदाएं निजी एवं सार्वजनिक दोनों ही क्षेत्रों में सुरक्षित नहीं है तो इन्हें संभालने के लिए सीधे-सीधे आम जनता को सामने आना होगा ।
कृषि संत मसोनाबू फुकुओका के अनुसार प्रकृति ने सभी प्राणियों के भरण-पोषण की व्यवस्था की है । प्रकृति में सात मूल तत्व हैं- मिट्टी, पानी, हवा, वनस्पति जगत, जीव-जन्तु, सूक्ष्म जीवाणु तथा सूर्य का प्रकाश । इनमें से किसी एक तत्व के बीमार या नष्ट हो जाने से उसका प्रभाव अन्य तत्वों पर भी पड़ना शुरू हो जाता है । यह माना जाता है कि हिमालय पर्वत ३३००० वर्ग कि.मी. या १७ प्रतिशत हिम से आच्छादित है । हिमालय के क्षेत्र में लगभग १५००० हिमनद हैं । इनमें से कुछ हिमनद ६० कि.मी. से अधिक और कुछ ३ से ५ कि.मी. लम्बे हैं ।
यह एक अद्भुत तथ्य है कि भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी भाग की नदियां लगभग हिमालय के एक ही स्थान से निकलती है । कैलाश पर्वतमाला के हिमनद पूर्व की ओर बहने वाली ब्रम्हपुत्र के जलस्त्रोत है । सिन्धु नदी इसी पर्वतमाला से मानसरोवर उत्तर-पश्चिम से प्रवाहित है । मानसरोवर के पश्चिम में स्थित राकास झील सतलुज नदी का स्त्रोत है । मानसरोवर से ही १०० कि.मी. दूर की हिमालय की पर्वतमालाआें से भागीरथी और अलकनंदा अपनी सहायक नदियों के साथ नीचे उतरकर पवित्र गंगा में मिल जाती है । इसी तरह घाघरा, गंडक एवं कोसी नदियां कई अन्य सहायक नदियों के साथ हिमालय से निकलती हैं ।
संसद के मानसून सत्र में एक प्रश्न के उत्तर में जल संसाधन व अल्पसंख्यक मामलों के राज्यमंत्री विनसेंट एच. पाल ने बताया कि आगामी २० वर्षो में हिमालयी उपक्षेत्र के देश भारत, नेपाल, चीन और बांग्लादेश हर वर्ष लगभग २७५ अरब घन मीटर जलस्तर की गिरावट का सामना करेंगे ।
इसके अलावा ग्लोबल वार्मिग के कारण हिमनदों के पिघलने से हिमालय से बहने वाली नदियों में बाढ़ का भी खतरा बढ़ है । पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि से धु्रवों पर जमे हुए हिमखंड भी पिघल रहे हैं । इससे समुद्र का जलस्तर १ मीटर तक ऊपर उठ सकता है । इससे समुद्रतटीय क्षेत्र डूब जाएंगे तथा इससे मानसूनी हवाएं प्रभावित होगी । जिससे भारत में लम्बा सूखा भी पड़ सकता है ।
इस तरह मानव एवं प्रकृति का संबंध विध्वंसात्मक हो गया है । पृथ्वी पर उत्पन्न पारिस्थितिकीय असन्तुलन हर प्राणी को प्रभावित कर रहा है । हम ग्लोबल वार्मिग के कारण हिमखंडो को पिघलने से नहीं रोक सकते । तो हम क्या कर सकते है ? भारत के अनेक प्रदेशों के पर्वतों पर कोई हिमनद नहीं है । इसलिए प्रकृति ने विशाल हिमनदों का काम हमारे वनों को सौंप रखा है । भगवान शंकर की पिण्डी पर जैसे किसी घड़े से बूंद-बूंद पानी अनवरत गिरता रहता है उसी तरह हमारे वन भी वर्षा की करोड़ों-अरबों बूंदों को धरती में सहेजकर वर्ष भर नदियों का अभिषेक करते रहते हैं ।
एक वृक्ष अपनी जड़ों के आसपास लगभग ५०० गैलन पानी रोककर रखता है । वन क्षेत्र की सतह के पास जलस्तर रहने से घास और कई तरह की वनस्पतियां भी खूब विकसित होती है और जल समेटती है । घास भू-कटाव को रोकने के साथ-साथ भूमिगत जल के वाष्पीकरण को भी रोकती है ।
एक अनुमान के अनुसार वर्षा का लगभग ३३ प्रतिशत पानी धरती के भीतर समाना चाहिए परन्तु बड़े पैमाने पर वनों के विनाश के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा है । वनों के निकट स्थित तालाबों, पोखरों और नदियों को वर्ष भर अन्तर-भूमि जल नहीं मिल रहा है । वनों के नष्ट हो जाने पर अन्य वनस्पतियों में स्वत: खत्म होने की प्रक्रिया शुरू जाती है । धरातल से हरियाली का आवरण हट जाने से नदियों के पेटे में गाद जमने लगती है । इससे नदियों की जलग्रहण क्षमता कम हो जाती है । जिससे जन-धन और कृषि की हानि होती है ।
नर्मदा नदी विध्यांचल और सतपुड़ा पर्वत के संगम स्थल मैकल पर्वत से निकलने के कारण मैकलसुता कहलाती है । इन पर्वतों पर स्थित वन नर्मदा का सदनीरा बनाते हैं तथा यहां से बहने वाली सभी छोटी नदियां नर्मदा की सहेलियां है । वनों की कटाई से ये स्थिति छोटी-छोटी नदियां भी सूख गई है ।
इसी तरह चम्बल नदी मध्यप्रदेश के बड़े शहर इन्दौर के नजदीक महू के पश्चिम में स्थित उच्च् भूमि से बेतवा नदी भोपाल के दक्षिण पठार से और सोन नदी नर्मदा के उद्गम से कुछ दूर स्थित पेन्ड्रा से निकलकर मध्यप्रदेश को हरा-भरा बनाती है । वनों के कटने के बाद इन नदियों में भी जल सूख गया है तथा पहाड़ी झरने और करोड़ों झिरियां भी सूख गई है । वनस्पतियों की जड़ें पहाड़ी झिरियों को सतत प्रवाहमान बनाये रखती है । भारतीय संविधान में वन एवं पर्यावरण की रक्षा को विशेष महत्व दिया गया है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद ४८(क) में दिये गये नीति निर्देशक तत्वों के अनुसार राज्य देश के पर्यावरण संरक्षण तथा संवर्धन का एवं वन्य तथा वन्यजीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा ।
नर्मदा नदी पर बन रहे इंदिरा सागर जलाशय के लिए ४० हजार हेक्टेयर और सरदार सरोवर जलाशय के लिए १,३८,००० हेक्टेयर वन क्षेत्र काटकर डुबा दिया गया है । इसी प्रकार अनेक नदीघाटी परियोजनाआें में लाखों हेक्टेयर का वनक्षेत्र काटकर डुबाया जा चुका है । परियोजनाआें से विस्थापितों को पुन: बसाने के लिए भी जंगल काटा गया है । वन क्षेत्रों में खनन उद्योग खतरनाक स्तर तक बढ़ गया है । इन परियोजनाआें से जल-स्त्रोत नष्ट होने का खतरा है ।
मध्यप्रदेश व देश के अन्य प्रदेशों के अनेक जिलों में वन-विभाग के काष्ट-डिपो वृक्षों की लाशों से भरे पड़े है । वनों की सबसे अधिक कटाई वन-विभाग द्वारा ही की जाती है । कई बार सरकारी कटाई का आधार वृक्षों की वृद्धावस्था और बीमारी को माना जाता है । यही वन कटाई का बड़ा बहाना है । वन विभाग को डॉक्टर बनकर जंगल में जाने की क्या जरूरत है ? इस प्रक्रिया में जबकि प्रकृति अपना इलाज खुद करती है । सरकारी कुल्हाड़ी के पीछे अन्य कुल्हाड़िया भी वन का रास्ता पकड़ लेती है । सरकार की नीतियों के कारण ही जंगलों में वृक्षसंहार चल रहा है । संसद में हथियार लेकर जाना अपराध है तो प्रकृति की संसद हमारे वनों में भी वृक्ष कटाई के हथियार लेकर जाना भी अपराध होना चाहिए । चाहे वे सरकारी हथियार ही क्यों न हो ।
हम लोगों को सुधारने का दावा करते हैं लेकिन सरकार को कौन सुधारेगा ? यह सिद्ध हो चुका है कि इस देश के पर्यावरण को सरकार के संगठित संगठनों से सबसे अधिक नुकसान पहुंच रहा है । सरकार के वन-विभाग में फारेस्ट-मैनेजमेन्ट की बैलेन्स शीट को किसी कंपनी की बैलेन्स शीट की तरह देखने की परम्परा बंद होनी चाहिए ।
यह स्मरण रखना जरूरी है कि वनों की व्यावसायिक कटाई एवं स्थानीय वनवासियों एवं ग्रामवासियों द्वारा जंगल के उपयोग में अंतर करना जरूरी है । ब्रिटिश फारेस्ट सेटलमेन्ट अधिनियम (१८६०) में निस्तार अधिकारों को कुछ सीमा तक मान्यता दी गई थी । परन्तु अंग्रेजों ने वनों को उनकी निजी संपत्ति मानकर उसकी देखरेख के लिए एक वनविभाग बनाया था । सन् १९५२ में नई वन नीति बनी थी परन्तु औद्योगिक विकास की जरूरतों के लिए इसमें भी कई विरोधाभास थे । सन् १९८० और १९९४ में नये वन कानूनों का मसविदा सरकार द्वारा जारी किया गया था । विश्व बैंक से सहायता प्राप्त् करने के लिये वन सुरक्षा समिति एवं ग्राम वन समितियां बनाई गई हैं । इन वन योजनाआें को लाभ कमाने के साधन के रूप में देखा गया है । हमारी नदियां और पानी के अन्य स्त्रोत असहाय है क्योंकि हमारे वन असहाय है ।
हमें समझना होगा कि संसार का कोई भी देश ग्लोबल वार्मिंग से बचने के लिए पिघलते हिमनदों को सुरक्षित और संवर्धित नहीं कर सकता है । लेकिन वनों को बचाकर अैर बढ़ाकर आने वाली पीढ़ियों का जीवन खुशहाल बनाया जा सकता है ।

शनिवार, 17 सितंबर 2011

सामयिक

मृग मरीचिका है, भूमि अधिग्रहण अधिनियम
राकेश कुमार मालवीय

प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून तो अंग्रेजों द्वारा सन् १८९४ में बनाए गए कानून से भी ज्यादा अमानवीय हैं । इस नए अधिनियम के अन्तर्गत इस बात का पुरजोर प्रावधान किया गया है कि निजी उद्यमियों को भूमि अधिग्रहण में किसी भी तरह की कोई परेशानी न आए । दूसरे शब्दों में कहे तो यह शहद के मुलम्मे मेंचढ़ी ऐसी कड़वी गोली है जिसे न तो निगला जा सकता है और न ही उगला जा सकता है ।
आजादी के बाद से भारत में अब तक सा़़ढे तीन हजार परियोजनाआें के नाम पर लगभग दस करोड़ लोगों को विस्थापित किया जा चुका है । लेकिन सरकार को अब होश आया है कि विस्थापितों की जीविका की क्षति, पुनर्वास-पुनर्स्थापन एवं मुआवजा उपलब्ध कराने हेतु एक राष्ट्रीय कानून का अभाव है । यानि इतने सालों के अत्याचार, अन्याय पर सरकार खुद अपनी ही मुहर लगाती रही है । तमाम जनसंगठन कई सालों से इस सवाल को उठाते आ रहे थे कि लोगों को उनकी जमीन और आजीविका से बेदखल करने में तो तमाम सरकारें कोई कोताही नहीं बरतती हैं । लेकिन जब बात उनके हकों की, आजीविका की, बेहतर पुनर्वास एवं पुनर्स्थापना की आती है तो वहां सरकारों ने कन्नी ही काटी है । प्रशासनिक तंत्र भी कम नहीं है जिसने खैरात की मात्रा जैसी बांटी गई सुविधाआें में भी अपना हिस्सा नहीं छोड़ा है ।
इनके कई उदाहरण है कि किस तरह मध्यप्रदेश में सैकड़ों सालों पहले बसे बाईस हजार की आबादी वाले हरसूद शहर को एक बंजर जमीन पर बसाया गया । कैसे तवा बांध के विस्थापितों से उनकी ही जमीन पर बनाए गए बांध से उनका मछली पकड़ने का हक भी छीन लिया गया । एक उदाहरण यह भी है कि पहले बरगी बांध से विस्थापित हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी का एक झुनझुना पकड़ाया गया । बांध बनने के तीन दशक बाद अब तक भी प्रत्येक विस्थापित परिवार को तो क्या एक परिवार को भी नौकरी नहीं मिल सकी है ।
दरअसल जिस कानून के निर्माण का आधार और मंशा ही संसाधनों को छीनने और उनका अपने हक में दोहन करने की हो, उससे और क्या अपेक्षा की जा सकती है । लेकिन दुखद तो यह है कि सन् १८९४ में बने ऐसे कानून को आजादी के इतने सालों बाद तक भी ढोया गया । इस कानून में अधिग्रहण की बात तो थी, लेकिन बेहतर पुनर्वास और पुनर्स्थापन का सिरे से अभाव था । यही कारण था कि केवल मध्यप्रदेश में ही नहीं बल्कि भारत के सभी हिस्सों में भूमि अधिग्रहण अधिनियम विकास का नहीं बल्कि विनाश का प्रतीक बनकर आया ।
सरकार अब एक नए कानून का झुनझुना पकड़ाना चाहती है । इस संबंध में देश में कोई राष्ट्रीय कानून नहीं होने से तमाम व्यवस्थाआें ने अपने-अपने कारणों से लोगों से उनकी जमीन छीनने का काम किया है । देश भर में अब तक १८ कानूनों के जरिए भूमि अधिग्रहण किया जाता रहा है । यह बात भी सामने आई है कि एक बार जमीन ले लेने के बाद यह देश उनके इस बलिदान के बदले उनको एक सम्मानपूर्वक जिंदगी देने में विफल रहा है ।
प्रस्तावित कानून में भी जितना जोर जमीन के अधिग्रहण पर है उतना ही जोर प्रभावितों के पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन पर भी होनी चाहिए । लेकिन उस नजरिए से कानून में कोई भी ठोस प्रबंध दिखाई नहीं देते हैं । कानून में मुआवजा, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन के प्रावधान सैद्धांतिक रूप से तो हैं पर उन्हेंं जमीन पर उतारने की प्रक्रियाएं स्पष्ट नहीं हैं ।
आजादी के बाद से अब तक हुए विस्थापन के आंकड़े हमें बताते हैं कि सर्वाधिक विस्थापन आदिवासियों का हुआ है । नर्मदा नदी पर बन रहे सरदार सरोवर बांध से दो लाख लोग प्रभावित हुए, इनमें से ५७ प्रतिशत आदिवासी हैं। महेश्वर बांध की जद में भी बीस हजार लोगों की जिंदगी आई, इनमें साठ प्रतिशत आदिवासी हैं । आदिवासी समुदाय का प्रकृति के साथ एक अटूट नाता है । विस्थापन के बाद उनके सामने पुनर्स्थापित होने की चुनौती सबसे ज्यादा होती है । जाहिर है आदिवासी, उपेक्षित और वंचित समुदाय के लिए इस प्रस्तावित अधिनियम में सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए लेकिन इस मसौदे में इसी बिन्दु पर सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है ।
मसौदे में कहा गया है कि ऐसे सभी जनजातीय क्षेत्रों में जहां कि सौ से अधिक परिवारों का विस्थापन किया जा रहा हो वहां एक जनजातीय विकास योजना बनाई जाएगी । भारत की भौगोलिक संरचना में बसे जनजातीय क्षेत्रों में एक ही जगह सौ परिवारों का मिल पाना बहुत ही कठिन बात है । अतएव मजरे-टोलों में बसे आदिवासियों के लिए इस मसौदे में रखी न्यूनतम सौ परिवारों की शर्त को हटाया जाना चाहिए । ऐसा नहीं किए जाने पर आगामी विकास योजनाआें के नाम पर जनजातीय क्षेत्रों से लोगों का पलायन तो जारी रहेगा ही और उन्हें पुनर्वास और पुनर्स्थापन भी नहीं मिल पाएगा ।
प्रस्तावित अधिनियम में जमीन के मामले पर भी सिचिंत और बहुफसलीय वाली कृषि भूमि के अधिग्रहण नहीं किए जाने की बात कही गई है । जनजातीय क्षेत्रों में ज्यादातार भूमि वर्षा आधारित हैं और साल में केवल एक फसल ही ली जाती है । तो क्या इसका आशय यह है कि आदिवासियों की एक फसलीय और गैरसिंचित भूमि को आसानी से अधिग्रहित किया जा सकेगा ?
सरकार जिस तरह अब खुद कहने लगी है कि तेल की कीमतें उसकी नियंत्रण में नहीं है उसी तरह संभवत: इस तंत्र को सुधार पाना भी उसके बस में नहीं है । भूमि अधिग्रहण का यह प्रस्तावित कानून भी ऐसी ही बात करता है । किसी नागरिक द्वारा दी गई गलत सूचना अथवा भ्रामक दस्तावेज प्रस्तुत करने पर एक लाख रूपए तक अर्थदण्ड और एक माह की सजा का स्पष्ट प्रावधान किया गया है । गलत सूचना देकर पुनर्वास लाभ प्राप्त् करने पर उनकी वसूली की बात भी कही गई है, लेकिन मामला जहां सरकारी कर्मचारियों द्वारा कपटपूर्ण कार्यवाही का आता है तो इस पर कोई स्पष्ट बात नहीं हैं । वहां पर केवल सक्षम प्राधिकारी द्वारा अनुशासनात्मक कार्यवाही करने भर का जिक्र आता है ।
इस कानून को दूसरी योजनाआें के संदर्भ में भी देखा जाना जरूरी है । सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए कम दरों पर खाद्यान्न की उपलब्धता इस देश के गरीब और वंचित और उपेक्षित लोगों के पक्ष में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है । मौजूदा दौर में इस व्यवस्था को कई तरह से सीमित करने की नीतिगत कोशिशें दिखाई देती हैं । विस्थापितों के पक्ष में इस योजना के महत्व को सभी मंचों पर स्वीकार किया जाता है । लेकिन भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास का यह प्रस्तावित कानून ठीक इसी तरह पारित हो जाता है तो तमाम विस्थापित लोग सार्वजनिक वितरण प्रणाली की इस व्यवस्था से बाहर हो जाएंगे ।
इस कानून के मसौदे में यह बात तो ठीक दिखाई देती है कि प्रभावित लोगों को ग्रामीण क्षेत्र और शहरी क्षेत्र के मापदंडों के मुताबिक पक्के घर बनाकर दिए जाएंगे । लेकिन इसका एक पक्ष यह भी होगा कि ये गरीबी की रेख से अपने आप ही अलग हो जाएंगे क्योंकि यह आवास गरीबी रेखा में आने वाले मकान के मापदण्डों से बड़ा होगा । ऐसे में उन्हें सस्ता चावल, सस्ता गेहूं और सस्ता केरोसीन उपलब्ध नहीं हो पाएगा । जबकि होना यह चाहिए कि ऐसे प्रभावित परिवार जो विस्थापन से पहले गरीबी रेखा की सूची में शामिल हैं उन्हें पुनर्वास और पुनर्स्थापन के बाद भी गरीबी रेखा की सूची में विशेष संदर्भ मानते हुए यथावत रखा जाए ।

बुधवार, 17 अगस्त 2011

सामयिक

सामयिक
पॉस्को : विकास विरूद्ध विकास
सुश्री सुनीता नारायण

यह विचार का विषय है कि ठीक ठाक मुआवजे के बावजूद लोग अपनी जमीन को छोड़ना क्यों नहीं चाहते । हम शहरी जो कि जमीन को महज लाभ या भविष्य के लिए निवेश के रूप में जानते है और इसे मात्र खरीदने-बेचने की वस्तु समझते है, वे आदिवासी और किसान की अपनी जमीन से लगाव के पीछे की संवेदना को समझ ही नहीं सकते है ।
टेलीविजन में वह दृश्य देखकर दिल दहल जाता है जिसमें बच्च्े धधकते सूर्य के नीचे खुले आसमान तले दक्षिण कोरिया के विशाल पास्को संयंत्र के खिलाफ मानव ढाल बने कतारबद्ध बैठे है । उनके सामने राज्य सरकार द्वारा भेजा गया सशस्त्र पुलिस बल है जो कि इस ऑपरेशन में मदद कर रहा है । ओडिशा के समुद्र तट के नजदीक स्थित यह इस्पात संयंत्र एवं बंदरगाह परियोजना और ऐसे लोग जिनकी जमीन अधिग्रहित की जानी है पिछले ६ वर्षो से आमने-सामने हैं । अब जबकि पर्यावरणीय स्वीकृतियां प्राप्त हो गई है।
राज्य सरकार किसी भी कीमत पर अधिग्रहण पर उतारू है । उसने इस हेतु ऐसा आर्थिक पैकेज भी देने की बात कही है जिसमें अतिक्रमित भूमि का भी मुआवजा दिया जाएगा । सरकार का विश्वास है कि यह एक ऐसा सुनहरा मौका है जो लोगों को जीवन में दोबारा नहीं मिलेगा । अतएव उन्हें इसे स्वीकार कर लेना चाहिए । सभी को आगे बढ़ना चाहिए और अब परियोजना का निर्माण हो जाना चाहिए क्योंकि इससे इस गरीब राज्य के समुद्र तट पर बहुमूल्य विदेशी निवेश की आवक संभव हो पाएगी ।
हमें स्वयं से यह प्रश्न एक बार पुन: पूछना चाहिए कि ये लोग जो अत्यधिक गरीब दिखाई देते हैं, इस परियोजना के खिलाफ संघर्षरत क्यों है? वे नकद मुआवजा स्वीकार क्यों नहीं कर रहे हैं जो कि न केवल उन्हें एक नया जीवन प्रारंभ करने का मौका देगा बल्कि उनके बच्चें को सुपारी उगाने में कोल्हू के बैल की तरह जुटे रहने से भी छुटकारा दिलवाएगा । क्या यह वृद्धि और विकास विरूद्ध पर्यावरण का संघर्ष है या ये महज गैर जानकार, अशिक्षित व्यक्ति हैं, या ये राजनीतिक रूप से उद्वेलित लोग है ? मेरे ख्याल से ऐसा नहीं है ।
पॉस्को परियोजना विकास विरूद्ध विकास है । यहां रहने वाले लोग गरीब है लेकिन वे जानते है कि ये परियोजना उन्हें और अधिक गरीब बनाएगी । यही वह सच्चई है जो कि हम आधुनिक अर्थव्यवस्था में रहने वाले नहीं समझ पाते । यह ऐसा क्षेत्र है जहां अधिकांश ऐसे वनों में सुपारी की खेती होती है जो कि सरकार के हैं । परियोजना के लिए आवश्यक १६२० हेक्टेयर भूमि में से ९० प्रतिशत यानि १४४० हेक्टेयर भूमि इसी विवादास्पद वन में है ।
जब परियोजना के लिए इस स्थान का चयन किया गया तो सरकार ने इस बात पर विचार ही नहीं किया कि उसे इस जमीन के लिए मुआवजा भी देना पड़ सकता है । क्योंकि उसका विचार था कि इस पर लोगों ने अतिक्रमण कर लिया है और सरकार इस विशाल इस्पात संयंत्र के लिए आसानी से इसे अपने कब्जे में ले लेगी । परन्तु यह वन भूमि थी और वे लोग अनादिकाल से वहां रह रहे थे और खेती कर रहे थे । इसी बीच वन अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत निहित शर्तो की बात भी उठने लगी जिसमें परियोजना हेतु वहां रह रहे लोगों की सहमति भी आवश्यक थी । केन्द्रीय पर्यावरण व वन विभाग ने स्वगठित कमेटी की प्रतिकूल टिप्पणियोंको रद्द करते हुए कहा कि उसे राज्य सरकार की इस बात पर भरोसा है कि यह सुनिश्चित करने में ऐसी सभी प्रक्रियागत कार्यवाहियां पूरी कर ली गई हैं जो यह सुनिश्चित करती है कि इन गांवों में रह रहे व्यक्तियों को स्वामित्व का कोई अधिकार ही प्राप्त् नहीं है क्योंकि ये पारम्परिक रूप से वन में रहने वाला समुदाय नहीं है ।
इसी प्रत्याशा के साथ पर्यावरण व वन मंत्रालय द्वारा स्वीकृति दे दी गई और परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही को आगे बढ़ाया जा सकता है । परन्तु लोगों से आीाी तक कुछ भी पूछा नहीं गया था और अंतत: उन्होनें इंकार कर दिया । ऐसा क्यों ? जबकि राज्य सरकार का कहना है कि उसने अपने प्रस्ताव में सभी मांगों को समाहित कर लिया है । वह इस बात पर राजी हो गई है कि निजी रिहायशी भवनों और गांव की भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जाएगा । लोगों के पास अपने घर होगें, केवलउनकी जीविका का ही नुकसान होगा । परन्तु उसका भी मुआवजा दिया जाएगा । इस पर भी सहमति जताई गई कि वन भूमि का उपयोग न कर पाने से होने वाली हानि की भी क्षतिपूर्ति की जाएगी, जबकि तकनीकी तौर पर लोगों को उस पर कोई हक नहीं है ।
ओडिशा से आई जमीनी रिपोर्ट के अनुसार अतिक्रमित पान/सुपारी के खेतोंपर प्रति हेक्टेयर २८.७५ लाख रूपए का मुआवजा दिया जाएगा । इसके बाद उन दिहाड़ी मजदूरों के लिए भी प्रावधान किया गया है, जिनकी जीविका पान/सुपारी की खेती बंद होने से खतरे मेंपड़ जाएगी । यह क्षतिपूर्ति वेतन भी लाभदायक है । इसके अन्तर्गत सरकार अधिकतम एक वर्ष तक रोजगार ढूंढने के लिए भत्ता प्रदान करेगी । इसके अलावा जिन ४६० परिवारों को अपने घरों से हाथ धोना पड़ रहा है उन्हें कॉलोनियों में पुन: बसाया जाएगा । तो फिर ऐसे प्रस्ताव को लोग खारिज क्यों कर रहे हैं ?
क्या यह केवलकुछ लोगों खासकर एक ग्राम पंचायत धिंकिया के नेताआें का दुराग्रह हैं ? इस गांव ने पिछले तीन वर्षो से प्रशासन के लिए स्वयं के दरवाजे बंद कर रखे हैं। इस गांव को जाने वाली सभी सड़कों पर रूकावटें खड़ी कर दी गई है । यह एक तरह से विद्रोह, उत्कट जिजीविषा और पक्का इरादा ही है । यह गांव अकेला ही पॉस्को का मुकाबला कर सकता है क्योंकि इस इस्पात संयंत्र हेतु बनने वाले केप्टिव विद्युत संयंत्र और निजी बंदरगाह के लिए चिन्हित कुल भूमि में से ५५ प्रतिशत इसी ग्राम पंचायत के अन्तर्गत आती हैं, लेकिन वे छोटी है और उनका नेतृत्व भी उतना दमदार नहीं हैं । परन्तु जब मेरे सहयोगियों ने ट्रांजिट कैम्प में अपने नए घरो के बनने और उन्हें सौंपे जाने की राह देख रहे लोगों को असंतोषजनक स्थिति में शराब के नशे में चूर पाया । उन लोगों ने पूछा, हमारी जीविका (रोजगार) कहा है ? हम क्या करेंगे ?
देशभर में जहां-जहां भी विकास के नाम पर लोगों की जीविका (रोजगार) छीने जाने के खिलाफ लड़ाई चल रही है वहां यही सवाल पूछे जा रहे हैं । अभी यह जमीन पास्को की नहीं हुई है, लेकिन सुपारी/पान की खेती से यहां प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष १० से १७.५० लाख रूपए की आमदनी हो जाती है जो मुआवजा मिल रहा है वह तो दो-तीन वर्षो की आमदनी के बराबर है । इसके अलावा धान, मछलियों के तालाब और फलदार वृक्ष भी आमदनी के अन्य जरिए हैं । यह भूमि आधारित अर्थव्यवस्था अत्यधिक रोजगार मूलक भी है । हालांकि लौह और इस्पात संयंत्र देश के आर्थिक विकास के लिए आवश्यक हैं लेकिन वे स्थानीय रोजगार उपलब्ध नहीं करा पाते । इसके लिए पहला तर्क है कि इस तरह के संयंत्रों के लिए स्थानीय लोग नौकरी पर रखे जाने लायक नहीं है । दूसरा है कि इन आधुनिक सुसज्जित संयंत्रों के परिचालन में बहुत ही सीमित संख्या में कर्मचारियों की आवश्यकता पड़ती है ।
इस तरह पॉस्को विकास विरूद्ध विकास है । हम सब लम्बे समय से इस भूमि आधारित अर्थव्यवस्था को समझने का प्रयास कर रहे है लेकिन अभी तक हम शायद यह नहीं समझ पाए हैं कि इसके क्या कार्य है और भारतीय समाज में यह क्या मायने रखती है । यह सिर्फ इतना है कि हम सब यह भूल गए हैं वह विकास, विकास ही नहीं है जो उन्हें लोगों को जीवन छीन रहा हो, जिनके लिए इसे (विकास) किया जा रहा हो । संदेश एकदम स्पष्ट है, अगर हम उनकी जमीन चाहते हैं तो हमें उन्हें बदले में एक जीवन तो देना ही पड़ेगा ।

सोमवार, 25 जुलाई 2011

सामयिक

पास्को का राजा से जयराम तक सफर
भारत डोगरा

तत्कालीन पर्यावरण मंत्री ए०राजा ने पर्यावरण मंत्रालय के अपने कार्यकाल में उड़ीसा में पास्को परियोजना को प्रारंभिक अनुमति दी तो दूसरी तरफ वर्तमान पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने स्वयं के द्वारा नियुक्त विशेषज्ञों की सलाह को ठुकराते हुए पास्को परियोजना को अंतिम स्वीकृति दे दी । भारत के प्राकृतिक संसाधनों की लूट का सिलसिला बदस्तूर जारी है ।
हमारे देश में जो परियोजनाएं संसाधनों की लूट, पर्यावरण की तबाही और परम्परागत आजीविका के विनाश के कारण बेहद विवादग्रस्त हुई हैं, उन परियोजनाआें में उड़ीस की पास्को अग्रणी पंक्ति में रही है ।
पास्को दक्षिण कोरिया की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी है जिसका पूरा नाम है - पोहांग ऑयरन एंड स्टील कंपनी । इस परियोजना के बारे में पहली नजर में जो संदेह होता है उसका कारण यह है कि इतने बडे स्तर पर इस्पात उत्पादन करवाने के लिए किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी को सरकार देश का लौह अयस्क क्यों उपलब्ध करवा रही है । १२० लाख टन वार्षिक इस्पात उत्पादन करने के प्रस्ताव वाली इस परियोजना का लक्ष्य देश की पांच-छ सबसे विख्यात बडी इस्पात परियोजनाआें के कुल उत्पादन से भी ज्यादा है । सवाल यह है कि इतना लौह अयस्क परियोजना की लंबी अवधि के दौरान हम प्रतिवर्ष इस बहुराष्ट्रीय कंपनी को क्यों उपलब्ध करवाएं ? ध्यान रहें कि वर्ष २००० के बाद अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में लौह अयस्क की कीमत बहुत तेजी से बढी है व इस परियोजना की विशालता को देखते हुए पास्को की लौह अयस्क में मुनाफा कूटने की क्षमता भी बहुत बढ गई है । लौह अयस्क की विश्व बाजार में कमी व बढते मूल्य को देखते ह्ुए हमें यह भी ध्यान में रखना है कि देश में लौह अयस्क के भंडारों का बहुत जल्दी दोहन न किया जाए ताकि भविष्य की अपनी जरुरतों के लिए पर्याप्त् भंडार बचा रहे । पर पास्को जैसी परियोजना तो ३० वर्षो तक बहुत बडे पैमाने पर लौह अयस्क की नियमित आपूर्ति पर आश्रित है ।
आखिर देश की अमूल्य खनिज संपदा को इतने बडे पैमाने पर एक ही कंपनी को सौंपने की इतनी जल्दबाजी क्यों है बड़े पैमाने पर लौह अयस्क खनन से व्यापक स्तर पर पर्यावरण की तबाही ह्ोगी, विशेषकर जब परियोजना के शुरु होने के बाद साल-दर-साल तीन दशकों तक इतने बडे पैमाने पर लौह अयस्क उपलब्ध करवाना एक मजबूरी बन जाएगा । इस कारण विस्थापन भी होगा । अत समस्याएं वहीं तक सीमित नहीं हैं जहां इस्पात बनाने का कारखाना लग रहा है । पर्यावरण व विस्थापन की समस्याएं इससे कहीं व्यापक हैं ।
जगतसिंहपुर जिले में समुद्र तट के पास स्थापित होने वाली इस परियोजना में एक बंदरगाह का निर्माण भी प्रस्तावित है । हालांकि इसे अलग परियोजना के रुप में दिखाने का प्रयास किया जाता है ताकि पर्यावरण की क्षति को कम करके दिखाया जा सके । इस बंदरगाह को एक छोटी परियोजना के रुप में स्वीकृति दिलवाई गई जबकि वास्तव में प्रस्तावित बंदरगाह एक बडा बंदरगाह है ।
समग्रता से किए गए आकलनों में यह सच्चई सामने आई कि इससे जितने रोजगारों का सृजन होगा उससे कहीं अधिक रोजगार इससे उजडेंगे । पर्यावरण व वन्य जीवों की जो तबाही होगी सो अलग । सरकारी स्तर पर इस परियोजना का औचित्य ऐसे अध्ययन के आधार पर बताया गया है जिसके लिए धन प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से इस कंपनी ने ही उपलब्ध करवाया था । ऐसे अध्ययन को कितनी मान्यता मिलनी चाहिए दूसरी ओर पर्यावरण मंत्रालय द्वारा भेजे गए विशेषज्ञों ने बार-बार इस ओर ध्यान दिलाया है कि इस परियोजना से कितनी व्यापक तबाही हो सकती है ।
हाल के समय में सरकार ने ऐसे कुछ मामलों में बढती संवेदनशीलता का संदेश दिया था जिससे उम्मीद बंधी थी कि विस्थापन व वन-विनाश की संभावना को न्यूनतम करने के टिकाऊ ग्रामीण आजीविका की रक्षा के प्रयास तेज होंगे । उडीसा की नियमगिरि पर्वतमाला में बाक्साईट खनन पर रोक लगी तो उस समय इन उम्मीद को बहुत बल मिला था। पास्को परियोजना क्षेत्र में भी विस्थापन के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष बहुत समय से चल रहा है । इस तरह के अहिंसक संघर्षो की मांगों पर सरकार समुचित ध्यान दे तो इससे देश में लोकतंत्र और मजबूत होगा । जब सरकार के अपने विशेषज्ञों की रिपोर्टोंा से भी संघर्ष समिति के आरापों को समर्थन मिल रहा था तो सरकार से व पर्यावरण मंत्रालय से उम्मीद की जा रही थी कि वह गांववासियों की टिकाऊ आजीविका व यहां के पर्यावरण को बचाने के प्रयास करेंगे ।
पर्यावरण मंत्रालय ने अपने जो विशेषज्ञ मौके पर स्थिति जानने के लिए भेजे थे उन्होंने भी उडीसा के संबंधित अधिकारियों द्वारा तथ्य छिपाने या तोडने-मरोडने तथा कंपनी के अधिकारियों की सांठ-गांठ से अन्य अनियमितताएं करने के आरोप लगाए थे । सवाल यह है कि ऐसे उदाहरण सामने आने पर पर्यावरण मंत्रालय को दंडात्मक कार्यवाही करनी चाहिए या इन सब अनुचित कार्योंा पर परदा डालकर मंजूरी दे देनी चाहिए, जैसा कि उसने वास्तव में किया है यह सवाल इस कारण और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि पास्को परियोजना को आगे बढ़ाने में बार-बार नियमों का उल्लघंन हुआ है व कुछ अधिकारियों का व्यवहार तो ऐसा रहा है जैसे पास्को को आगे बढ़ाना ही उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्य हो ।
पर्यावरण संबंधित आरंभिक स्वीकृतियां इस परियोजना को तब मिली थी जब ए.राजा पर्यावरण मंत्री थे । यह स्वीकृतियां कितनी अनुचित थीं इसका कुछ समय बाद तब पता चला ज्रब नए पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने वर्ष २०१० में विशेषज्ञों की एक जांच समिति नियुक्त की । इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा है कि परियोजना द्वारा बहुत गंभीर पर्यावरणीय परिणामों के लिए नियोजन तो करना दूर, उनका ठीक से आकलन भी नहीं किया गया है । समिति ने आगे कहा कि परियोजना के संभावित अति खतरनाक परिणामों के प्रति संबंधित अधिकारियों की अत्यधिक लापरवाही खतरनाक है व इससे समिति स्तब्ध है ।
भ्रष्टाचार के संकेत तो इस तथ्य से भी मिलते हैं कि इस परियोजना के लिए खदानों के आवंटन के कार्य को दो बार अदालती कार्यवाही से रोकना पड़ा । पर्यावरण मंत्रालय की समितियों के अध्ययन से यह भी स्पष्ट हो गया कि समुद्री तटीय नियमन क्षेत्र के नियमों का उल्लघंन इस परियोजना में हो रहा है । वन-अधिकार कानून आदि के संदर्भ में प्रभावित गांववासियों व उनकी ग्रामसभाआें ने भी परियोजना के विरूद्ध अपने हस्ताक्षर वाले दस्तावेज सरकार को उपलब्ध करवाए । पर इन सभी की अवेहलना करते हुए पर्यावरण मंत्रालय ने तथ्यों को नजरअंदाज करते हुए निर्णय लिया व पास्को परियोजना को हरी झंडी दिखा दी ।
इस परियोजना की स्वीकृति के पीछे भ्रष्टाचार की एक बड़ी कहानी हो सकती है । अत: सरकार को चाहिए कि भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से बचने के लिए व खनिज संसाधनों की लूट को रोकने के लिए तुरन्त इस योजना को रद्द कर दे व साथ ही प्रभावित गांववासियों की अब तक हुई क्षति के लिए उन्हें सहायता पहुंचाए ।
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रविवार, 24 अप्रैल 2011

सामयिक


समुद्र तटीय क्षेत्रों का संरक्षण
भारत डोगरा

जापान में आई सुनामी ने एक बार पुन: समुद्र तटीय विकास के बारे में नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है । जापान में आई सुनामी ने वहां के नागरिकों को समुद्र के तल के भी दर्शन करा दिए है । अपने प्रबंधन के लिए विख्यात जापान भी इस बार किंकर्तव्यविमूड़ होकर विनाश को देखता रहा । भारत में भी समुद्र तटीय विकास को लेकर नई चेतना और दृष्टि की आवश्यकता है । क्योंकि सुनामी की विभीषिका हमसे भी अपरिचित नहीं है । आवश्यकता इस बात की है कि जापानी सुनामी को महज परमाणु त्रासदीमानने की भूल न की जाए।
समुद्र तटीय क्षेत्रों के संवेदनशील पर्यावरण को बचाने की चर्चा तो पहले ही जोर पकड़ रही थी, परन्तु जापान में आए जलजले के बाद इस ओर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है कि सुनामी व चक्रवात की स्थिति में समुद्र तटीय क्षेत्रों के जल - जीवन और पर्यावरण की रक्षा कैसे की जाए । समुद्र तटोंके पर्यावरण व जैव- विविधता को बचाने के लिए मैनग्रोव वनों व मूंगे की चट्टानों की रक्षा महत्वपूर्ण मानी गई हे क्योंकि ये सुनामी से रक्षा में भी सहायक है। अत: इस संदभ में इनका महत्व और भी बढ़ जाता है ।
सवाल उठता है कि इस तरह के संवेदनशील इको- सिस्टम की रक्षा के महत्व पर व्यापक सहमति के बावजूद वे नष्ट क्येां होते जा रहे है ? इसकी वजह यह है कि बाहरी तौर पर तटीय क्षेत्रोंके पर्यावरण की रक्षा के बारे में चाहे कुछ भी कहा जाए पर समुद्र तक की मूल्यवान भूमि का प्रबंधन बड़े व्यावसायिक हितों द्वारा ही प्रभावित हो रहा है । इसमें एक ओर बड़े होटल व रिसॉर्ट तो दूसरी ओर निर्यात बाजार में बड़ी कीमत दिलानें वाली झींगा मछली के एक्वाकल्चर फार्म भी शामिल है ।
इसके अतिरिक्त समुद्र तटीय क्षेत्रों में अधिक प्रदूषण वाली अनेक औद्योगिक व खनन परियोजनाआें का प्रवेश भी तेजी से हुआ है । यहां बड़े बांधों व ताप बिजलीघरों का निर्माण भी जोर पकड़ रहा है । यहां सबसे अधिक विवादास्पद मुद्दा तो परमाणु संयंत्रों के निर्माण का है जिनका भारत में महाराष्ट्र के जैतपुरा जैसे स्थानों पर स्थानीय गांववासी जमकर विरोध कर रहे है । इन सब गतिविधियों के बीच यह आश्चर्य की बात है कि तटीय क्षेत्रों के पर्यावरण को बचाने के मुद्दे प्राथमिकता खोते जा रहे है । इसके साथ ही तटीय क्षेत्रों की चक्रवातों व सुनामी का सामना करने का जो सुरक्षा कवच मैनग्रोव वनों, मूंगे की चट्टानों आदि के रूप में मोजूद था, वह भी कमजोर पढ़ता जा रहा है ।
इतना ही नहीं, यहां के लोग यह भी पूछ रह है कि खतरनाक उद्योागों के बढ़ती संख्या में आने से क्या प्राकृतिक आपदाआें से होने वाली संभावित क्षति भी बढ़ जाएगी। प्राय: इन परियोजनाआें का आकलन सामान्य स्थिति के संदर्भ में होता है । यदि चक्रवात व सुनामी जैसी आपदाआें के संदर्भ में यह आकलन किया जाए तो कहीं अधिक चिंताजनक संभावनाएं उत्पन्न होगी । जापान के हालिया जलजले के समय देखा गया कि सुनमी के आरंभिक दौर मेंही जितनी चिंता भूकपं व सुनामी के बारे में प्रकट की गई उतनी ही चिंता इस बारे में प्रकट की गई कि इसका परमाणु संयंत्रों पर क्या असर होगा ? हालांकि जापान के पास इस संदर्भ में आधुनिकतम तकनीक उपलब्ध थी, १ सामयिक
समुद्र तटीय क्षेत्रों का संरक्षण
भारत डोगरा

जिससे भूकंप व सुनामी के समय परमाणु संयंत्र स्वत: बंद भी भी हुए लेकिन गंभीर खतरे की संभावता बनी ही रही ।
भारत के संदर्भ में जहां हाल में परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा के बारे में विदेशी आपूर्तिकर्ताआें के दायित्व के बारे में कई गंभीर सवाल उठाए गए है । वहीं यह संभावना और विकट हो जाती है कि कहीं सुनामी या चक्रवात से परमाणु संयंत्रों पर हुए असर के कारण रेडिएशन रिसाव जैसा कोई बड़ा हादसा न हो जाए । समुद्र तटीय क्षेत्रों में स्थापित हो रहे अन्य जोखिम भरे, खतरनाक रसायनों या ज्वलनशील उत्पादों के पदार्थो के प्रयोग व भंडारण से जुड़े उद्योगों के बारे में कई बार शिकायत मिली है कि यहां खतरनाक व विस्फोटक साज - सामान बहुत समय तक पड़ा रहता है । भारत एक बड़ा तेल आयातक देश है व इसका अधिकांश आयात समुद्री मार्ग से ही होता है । हाल के समय में तेल-रिसाव की घटनाएं भी बढ़ गई है ।
इन सब सवालों को अनेक जन - संगठन व पर्यावरणविद् प्राय: किसानों व मछुआरों की आजीविका पर प्रतिकूल असर के संदर्भ में या जैव - विविधता पर प्रतिकूल असर के संदर्भ में उठाते रहे है । जापान के हादसे के बाद यह जरूरी हो गया है कि इन सब सवालों को सुनामी व चक्रवात के संदर्भ में भी उठाया जाए । सुनामी तो खैर समुद्री क्षेत्रों में आए भूकंप से उत्पन्न होता है, पर जहां तक सामान्य चक्रवातों का सवाल है जलवायु बदलाव के इस दौर मे उनकी संभावना व विनाशक क्षमता बढ़ रही है ।
इसके अतिरिक्त जलवायु बदलाव के दौर में समुद्र का जल - स्तर भी बढ़ रहा है और यदि ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन को समय रहते न थामा गया तो समुद्रों का जल-स्तर इतना बढ़ सकता है कि समुद्र तटीय क्षेत्रों का एक बड़ा भाग जलमग्न हो जाएगा । अत: यह बहुत जरूरी है कि जलवायु बदलाव व बढ़ती आपदाआें के दौर में समुद्र तटीय क्षेत्रों के पर्यावरण व जल - जीवन की रक्षा पर अधिक ध्यान दिया जाए ।
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गुरुवार, 24 मार्च 2011

सामयिक


पर्यावरण एवं धारणीय विकास
डॉ.ए.के.सिन्हा

पर्यावरण संरक्षण में मानवता व मानव मूल्य संवर्द्धन को मानव संसाधन विकास से संयोजित कर ही धारणीय विकास की प्रािप्त् संभव हो सकती है । इस हेतु एक नवीन व बहुआयामी सकारात्मक चिंतन/सोच को विकसित कर क्रियान्वयन हेतु कार्य योजना निर्मित करना अपेक्षित है ताकि मानवीय अस्तित्व कायम रह सके । मानवीय क्षमता की पहचान व समुचित विदोहन भारत के समग्र आर्थिक विकास की अनिवार्यता के रूप में परिलक्षित होती है ।
समग्र ब्रह्मांड कार्य-कारण के मौलिक व सर्वव्यापी शास्वत नियम से संचालित हैं । यह एक निर्विवाद सत्य है । ब्रह्मांड के मुख्य दो संघटक हैं : सजीव एवं निर्जीव जगत । इन दोनों के मध्य अन्योन्य क्रिया उपस्थित है । पर्यावरण एवं अर्थशास्त्र के मध्य फलनात्मक संबंधों के अध्ययन, विश्लेषण हेतु एक नवोन्मेष व नवाचार के रूप में पर्यावरण अर्थशास्त्र जैसी नवीन शाखा की महत्ता व उपादेयता विश्व स्तर पर स्वीकार की जा चुकी है । १९५० के दशक से पर्यावरण संरक्षण व संतुलन हेतु पर्यावरण अर्थशास्त्र पर चिंतन-मनन व क्रियान्वयन प्रारंभ हुआ है ।
वर्तमान में विश्व स्तर पर पर्यावरण प्रदूषण व क्षरण को देखते हुए प्रत्येक राष्ट्र विशेष अपने धारणीय विकास की स्थापना हेतु पर्यावरण संसाधन व संरचना का मात्रात्मक व गुणात्मक अध्ययन, विश्लेषण, मूल्यांकन व विदोहन के प्रयास प्रारंभ कर चुके हैंक्योंकि प्रत्येक राष्ट्र तात्कालिक आर्थिक समस्याआें के समाधान पर केन्द्रित विकास के मौद्रिक व भोतिकवादी मॉडल पर संचालित थे । पर्यावरणीय व पारिस्थितिक पहलुआेंकी अवहेलना कर विकास का मार्ग प्रशस्त होता गया । इसी तथ्य को ध्यान में रखकर पर्यावरण संतुलन व संरक्षण की दिशा में पर्यावरण अर्थशास्त्र के अध्ययन की महत्ता व उपादेयता निर्धारित की गई है ।
धारणीय विकास अर्थात् पर्यावरण संरक्षण के साथ आर्थिक विकास की प्रािप्त् हेतु पर्यावरण अर्थशास्त्र के अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण व संतुलन के लिये पर्यावरण प्रबंधन, नियोजन, लेखांकन, अंकेक्षण व मूल्यांकन के विभिन्न सोपानों को स्थान दिया जाना औचित्यपूर्ण व युक्तियुक्त है ।
वस्तुत: पर्यावरण के संघटक वर्तमान व भविष्य के मानव सभ्यता की दक्षता व अस्तित्व को प्रत्यक्षत: प्रभावित करती है । नि:संदेह अध्यात्म में जो स्थान ईश्वर या परमात्मा को प्राप्त् है वही स्थान मानव सभ्यता के समग्र विकास में पर्यावरण को प्राप्त् है अत: पर्यावरण संतुलन व प्राकृतिक संसाधनों का व्यापक, वैज्ञानिक व धारणीय अध्ययन हेतु संरक्षणात्मक तकनीक व नीति-निर्धारण व क्रियान्वयन एक अति आवश्यक मानवीय आवश्यकता बन गई है ।
आर्थिक विकास के अन्तर्गत औद्योगिक विकास की तीव्र गति पर्यावरण के प्रतिकूल होती गई । पर्यावरण प्रदूषण के
रूप में एक अदृश्य रोग का जन्म हुआ । इसके समाधान के लिए ही पर्यावरण अर्थशास्त्र के अंतर्गत प्राकृतिक संसाधन का समुचित विदोहन व मापन तकनीक की
शोधपरक खोज अपेक्षित है ।
वर्तमान में, पर्यावरण में सजीव जगत का अस्तित्व उपस्थित है । पर्यावरण संरक्षण में मानव की अहम भूमिका है । मानव को आदर्श चेतन मानव निर्मित करना अध्यात्म की विषयवस्तु है । भारतीय सभ्यता व संस्कृति के आधार पर एक भारतीय आदर्श मानव के प्रतीक बन कर पर्यावरण संरक्षण में अपनी सहभागिता निर्धारित कर सकते हैं । एक भारतीय विश्वदृष्टा विद्वान मनीषी ने इक्कीसवीं सदी का आधार स्तम्भ आध्यात्मिक अर्थशास्त्र घोषित कर भविष्य में आने वाली प्राकृतिक व पर्यावरणीय संकट के प्रति मानव को सचेत किया है । इसके साथ ही भौतिकवादिता व अति उपभोक्तावादी प्रवृति को त्याग कर अध्यात्मवादी भौतिकता अपनाई जाने को मानव हित में उदघाटित किया है । नि:संदेह समग्र विकास के केन्द्र मेंमानव है, जिसे एक आदर्श मानव के रूप में अपने दायित्वों व कर्त्तव्यों के प्रति सजग होकर मानवीयता व मानव अस्तित्व को कायम रखने हेतु अपेक्षित है ।
भारत के धारणीय आर्थिक विकास के स्तर की प्रािप्त् में पर्यावरण अर्थशास्त्र का बहुआयामी अध्ययन मानव को केन्द्र में रखकर किया जाना अपेक्षित व श्रेयकर है । भारतीय अध्यात्म के अनुसार अर्थशास्त्र का एक नवीन आयाम अध्यात्मिक अर्थशास्त्र के रूप में दी जा सकती है । अर्थशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान व कला है, जिसमें आदर्श मानव की अभिकल्पना को स्वीकार कर इच्छाआें के शमन की प्रक्रिया का व्यापक बहुआयामी व अन्योन्य विश्लेषण क्रियान्वयन मूल्यांकन किया जाता है ।
भारत की विकासशील अर्थव्यवस्था में धारणीय विकास की प्रािप्त् का एक मात्र साधन आर्थिक वृद्धि, विकास, सामाजिक व आध्यात्मिक संघटकों का एकीकरण व समन्वय में दृष्टिगत होता है । भविष्य में मानव अस्तित्व को बनाये रखने में अध्यात्म व पर्यावरण का एकीकरण ही धारणीय विकास हेतु एक फलदायी मार्ग सिद्ध होगा । मानव को सजग भविष्य के प्रति सकारात्मक चिंतन व क्रियान्वयन में सहभागिता स्वयं निर्धारित करना अपेक्षित है ।
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शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

सामयिक

जैव विविधता हानि का गणना कैसे हो ?
लता जिशनु

पिछले दिनों सीएजी द्वारा उद्घाटित २-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की राशि का तो आकलन धन में किया जा सकता है । परंतु भारतीय जैव विविधता को बिना किसी संरक्षण के विदेशी और देशी कंपनियोंके हाथों बेच देने से देश को हो रही हानि की गणना कर पाना कमोवेश असंभव है । दूरसंचार नियामक प्राधिकरण के पश्चात राष्ट्रीय जैव विविधता नियामक प्राधिकरण का गैर जिम्मेदाराना व्यवहार स्पष्ट तौर पर दर्शा रहा है कि खुलेपन की आड़ में नियामकों की सत्ता के परिणाम देश के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकते हैं।
घोटालों के इस मौसम में २-जी स्पेक्ट्रम ने अन्य सभी घोटालों की चमक फीकी कर दी है इस घोटाले से यह तो सामने आ गया है कि किस तरह व्यापारी और राजनीतिज्ञ लोकतंत्र के प्रत्येक स्तंभ को कमजोर कर रहे हैं । ऐसे में स्वाभाविक ही है कि इससे किसी भी प्रकार के घोटाले की तुलना कमतर ही जान पड़ेगी । परंतु घोटालों के पिटारे मेंअभी और भी बहुत कुछ छुपा हुआ पड़ा है । ऐसे ही अन्य घोटाले पर पिछले ही महीने नजर पड़ी है । यह घोटाला राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) से संबंधित हे और देश के सर्वश्रेष्ठ अंकेक्षकों के लिए भी इसे उजागर कर पाना कठिन होगा ।
स्पेक्ट्रम के मामले में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) का कहना है कि इस मामले में शासकीय खजाने को करीब १,७६,३७९ करोड़ रूपये का नुकसान हुआ है । परंतु क्या वह भारत के जैविक संसाधनों को होने वाली हानि का आकलन कर सकता है ? इससे देश ने जो कुछ खोया है उसकी क्षतिपूर्ति हो ही नहींसकती । जैव विविधता संरक्षण के संबंध में सीएजी की खोज पर्यावरणविदों को हताशा में डाल सकती है । इस संदर्भ में सीएजी ने पाया है कि एन.बी.ए. ने लापरवाही पूर्वक बिना व्यवस्थित निगरानी के व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को जैव विविधता के उपयोग की अनुमति प्रदान कर दी । जबकि सन् २००३ में इस प्राधिकरण का गठन विशेष रूप से भारतीय जैव विविधता के नियमन संरक्षण और सुस्थिर इस्तेमाल के लिए किया गया था । इसके अलावा इसके गठन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण यह था कि इस संसाधनों से होन वाले लाभों का न्यायपूर्ण बंटवारा सुनिश्चित किया जा
सके ।
सीएजी का कहना है कि अपने गठन के ६ वर्ष पश्चात भी एनबीए जैव विविधता तक पहुंच एवं शोध के नतीजों के हस्तांतरण और बौधिक संपदा संबंधी महत्वपूर्ण नियमों को अधिसूचित नहीं कर पाया । इसकी गंभीरतम चूक यह है कि वह पहले से ही संकट में औषधीय वनस्पति की न तो सूची जारी कर पाया और न ही इनके संरक्षण के तौर तरीके ही तय कर पाया । इसके अलावा वह अब तक २८ राज्योंमें से केवल ७ राज्यों की संकट में पड़ी स्थानीय वनस्पतियां की ही पहचान कर पाया है ।
साथ ही वह जैविक संसाधनों के आंकड़ों का नागरिक जैव विविधता रजिस्टर भी तैयार नहीं कर पाया है जो कि जैविक संसाधनों की सुरक्षा और संरक्षण दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है । सबसे ज्यादा चोट पहुँचाने वाली बात यह है कि उसके पास न तो भारत से बाहर इसके जैव संसाधनोंको लेकर बौद्धिक सम्पदा अधिकार के अंतर्गत पेटेंट को लेकर कोई जानकारी है और न ही भारत से बाहर ले जाए गए इन जैविक संसाधनों को लेकर ही कोई जानकारी है ।
सीएजी ने सिर्फ उतना ही सुनिश्चित किया है जितना कि वे स्वयं जानते हैं । एनबीए पर नजर रखने वाले पर्यावरण समुह लगातार चेताते रहे हैंकि प्राधिकरण की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं है और उन्होंने बिना विधिसम्मत प्रक्रिया के कंपनियोंको भारतीय जैविक संसाधनों के इस्तेमाल की अनुमति देने पर भी प्रश्न खड़े किए हैं । कल्पवृक्ष पर्यावरण समूह की ओर से कांची कोहली एवं मशक्यूरा फ्रीडी एवं अंतराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन ग्रेन की ओर से शालिनी भूटानी द्वारा तैयार रिपोर्ट भारत में जैव विविधता अधिनियम के ६ वर्ष जिसे २००९की शुरूआत में जारी किया गया था, में एनबीए की कार्यप्रणाली में व्याप्त् गंभीर त्रुटियों की ओर इंगित किया गया
था । इस बात की शुरूआत तभी से हो गई थी जबकि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक की अध्यक्षता में गठित एनबीए ने शोधकर्ताआें को प्रक्रियागत दस्तावेजों तक पहुंच प्रदान करने से इंकार कर दिया था ।
सन् २००७ में कोहली द्वारा सूचना का अधिकार कानून के अंतर्गत आवेदन करने के पश्चात ही शोधकर्ताआें की आंकड़ों तक पहुंच हो पाई । इस हेतु न केवल उन्हें आठ महीनों तक इंतजार करना पड़ा बल्कि इसके बावजूद उन्हें अंतत: आधी अधूरी जानकारी ही प्राप्त् हो पाई थी । इसके बाद उन्होंने केन्द्रीय सूचना आयोग में अर्जी लगाई जिन्होंने एनबीए को आदेश दिया कि वे शोधकर्ताआें द्वारा चाहे गए दस्तावेज उपलब्ध कराए । शोधकर्ताआें ने पाया कि प्राधिकरण की गतिविधियाँ इसलिए भी आश्चर्यजनक है क्योंकि विभिन्न स्तरों पर निर्णय लेने की प्रक्रिया के अंतर्गत नागरिक समितियों का गठन अनिवार्य है ।
सितम्बर २००८ तक के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जैव संसाधनोंतक पहुंच के कुल के कुल ३१५ मामलोंको स्वीकृति प्रदान की गई थी जिसमें से १६१मामलों को केवल एक ही बैठक में स्वीकृति प्रदान कर दी गई थी । इनमें से २४६ को बौद्धिक सम्पदा अधिकार के अंतर्गत भी स्वीकृति प्राप्त् हो गई है । इस सबको एक ओर भी रख दें तो भी चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से एक भी मामले में लाभ की हिस्सेदारी की बात सामने नहीं आई है तथा लाभ की पात्रता रखने वाले एक भी व्यक्ति की पहचान तक नहीं की गई है । जबकि कानून के अंतर्गत साफ तौर पर उल्लेखित है कि जैविक संसाधन समुदायों के हैं जो कि अनादिकाल से इन्हें सहेजते आए हैं । एनबीए ने न केवलइस पक्ष की अवहेलना ही की बल्कि उसने लाभ में हिस्सेदारी को लेकर कोई आचार संहिता तक नहीं बनाई ।
सीएजी की रिपोर्ट अत्यन्त सारगर्भित है । ओर उसने विदेशी व्यावसायिक उपक्रमोंके हाथों जैव विविधता को पहुंच रहे नुकसान के प्रति चिंता भी दर्शाई है । रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि जैव विविधता अधिनियम (२००२) एनबीए को अधिकृत करता है कि वह भारत से लिए गए जैव संसाधनोंया इन संसाधनों से संबंधित ज्ञान व जानकारी के संबंध में विदेशों में बौद्धिक सम्पदा अधिकार दिए जाने का विरोध करे ।
एनबीए ने नवम्बर २००५ में कानूनी विशेषज्ञ की नियुक्ति तो कर दी है लेकिन विवादास्पद बौद्धिक संपदा अधिकार प्रदान किए जाने के विरूद्ध कोई कारगर कदम नहीं उठाया । फरवरी २००६ में संसद को आवश्वासन दिए जाने के बावजूद प्राधिकरण ने भारत से बाहर आबंटित किए जा रहे बौद्धिक सम्पदा अधिकारों के संबंध में निगरानी सेल का भी अभी तक गठन नहीं किया है ।
यहां यह उल्लेख अप्रासंगिक नहीं होगा कि हाल ही में श्री गौतम ने एनबीए का कार्यभार छोड़कर पौध विविधता एवं किसान अधिकार प्राधिकरण के अध्यक्ष का पदभार ग्रहण कर लिया है ।
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शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

सामयिक

पर्यावरण और जलवायु परितर्वन
ए.के.गोस्वामी

प्रकृतिका उपहास उड़ाने की बेशर्म हरकत पेड़-पौधों, जंगल, नदियों, सागरों और हिमाच्छादित पर्वत श्रंृखलाआें को तहस- नहस कर रही है और तथाकथित सभ्य समाज सभ्यता और सामाजिक, दोनों की परिभाषा की हदें पार कर रहा है ।
पिछले दिनों यूरोप के कई देशोंमें भारी बर्फबारी ने सभी को चौंका दिया है । इससे जलवायु परिवर्तन से उपजे संकट को लेकर अनेक प्रश्न खड़े हो गए हैं । पूर्व में भी उठे ऐसे अनेक प्रश्नों का समाधान जलवायु परिवर्तन पर हुए कानकुन सम्मेलन तक नहीं खोजा जा सका और क्योटो प्रोटोकॉल तो विकसित देशोें की जिद का शिकार ही हो गया ।
पुराने जमाने से नागालैण्ड में धान के किसान अपनी फसल की हिफाजत के लिए चीटियों के भरोसे रहते आए हैं । वहां की जलवायु धान उगाने के लिए बढ़िया है सो नागालैण्ड के ज्यादातर किसान धान की खेती करते हैं । फसल कटने के बाद वे धान को सुखाने के लिए खुले में छोड़ने से पहले चीटियों पर नजर डालते हैं । अगर चीटियां अपने बिलों से बाहर घूमती दिखती हैं तो वे निश्चिंत होकर अपना धान खुले में सुखाने के लिए छोड़ देते हैं । क्योंकि उन्हें इस बात की गारंटी मिल जाती है कि हाल फिलहाल बरसात के आसार नहीं हैं, क्योंकि चीटियां बाहर हैं ।
भारत में कई जगह आम जनजीवन में पुराने समय से ही मौसम के बारे में कयास लगाने के अपने ही नायाब तरीके रहे है ं। पछुआ हवा चली, तो नहीं बरसेगा, पुरवा भिगोएगी या कोहरे के बादल ढंके हैं तो हैं तो ठिठुरन नहीं सताएगी आदि आदि । पर इधर पिछले कुछेक सालों से सारे हिसाब-किताब धरे के धरे रह जाते हैं और बिन मौसम के बरसात गर्मी में भी सर्द आबोहवा का झोंका आ जाए तो आश्चर्य नहीं । कुदरत रंग बदल रही है । वैश्विक ताप से धरती तप रही है और जलवायु परिवर्तन में ऋतुआें की युगों पुरानी चाल भी भारी फेरबदल कर दी है । दुनिया त्रस्त है क्योंकि मानव समाज ने विकास की अंधी दौड़ में जिस तेजी से भागना शुरू किया है उसने धरती को बुरी तरह आहत किया है, रौंदा
है । प्रकृतिका उपहास उड़ाने की बेशर्म हरकत पेड़-पौधों, जंगल, नदियों, सागरों और हिमाच्छादित पर्वत श्रंृखलाआें को तहस- नहस कर रही है और तथाकथित सभ्य समाज सभ्यता और सामाजिक, दोनों की परिभाषा की हदें पार कर रहा है ।
भारत में ६० करोड़ के आस-पास आबादी खेती पर निर्भर है । भारत के सकल घरेलूउत्पाद मे २० फीसदी की बड़ी भागीदारी वाली खेती पारंपरिक रूप से मौसम के मिजाज पर आधारित रही है, वैसी ही व्यवस्थाएं तंत्र भी बने हैं। लेकिन आज व
वैश्विक ताप से हुए जलवायु परिवर्तन ने मौसम की कालावधि में भारी अंतर पैदा कर दिए हैं । जाड़ों में जाड़े और गर्मियों में गर्मी कभी-कभी खो जाती है और नहीं खोती तो सीमाएं लांघकर त्राहि-त्राहि मचा देती है । गर्मी में पारा ५० तक पहुंचने को बेताब दिखता है तो जाड़े में गिर कर शून्य के आसपास मंडराता है । बारिश होती है तो मानों प्रलंयकारी होकर तबाही बरपा देती है । अभी पिछले दिनों तमिलनाडु और कर्नाटक में वे मौसम मूसलाधार बारिश ने लोगों को हैरान कर दिया । भारत में जहां औसतन सालाना बारिश १२० मिलीमीटर के आस-पास होती थी अब या तो आधी होती है या फिर थोढ़ी । कहीं भयंकर सूखा दिखता है तो कहीं नदियां हहराती अपने बांध तोड़ती दिखती हैं । पिछले मानसून में तो दिल्ली के डूबने का खतरा मुहबाएं खड़ा दिखता था ।
उधर यूरोप में बर्फबारी ने कोहराम मचाया हुआ है । कई बड़े शहर बर्फ की चादर से ढंक गए हैं । सड़क, रेल, हवाई यातायात ठप हो गया । कड़ाके की ठंड से हाहाकार मचा है । घरों, सड़क ों, राजमार्गोंा पर बर्फ की मोटी परत जीना मुहाल किए हैं । यूरोप और अमेरीका विकास की अंधी दौड़ में प्रकृतिका अपमान करने की सजा भुगत रहे हैं, पर भारत में भी जलवायु परिवर्तन के आंकड़े कम परेशान करने वाले नहींहैं । २०४५ में दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बनने जा रहे भारत की जलवायु परिवर्तन की भारी आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय कीमत चुकानी पड़ सकती है ।
विशेषज्ञों के अनुसार, मौसम के बदलते मिजाज के कुछ खास दुष्परिणाम इस प्रकार होंगे -बर्फ का आवरण घटेगा, जिससे बह्मपुत्र और गंगा जैसी ग्लेशियर पिघलने से जलाप्लावित होने वाली नदियों पर बुरा असर पड़ेगा, गंगा में गर्मियों में ७० फीसदी पानी बर्फ पिघलने से ही आता है । बरसात पर आधारित खेती प्रभावित होगी, तापमान में एक फीसदी बढ़त तक से ४० से ५० लाख टन अनाज कम पैदा होगा । समुद्रों का जलस्तर बढ़ेगा जिससे तटवर्ती इलाकों में रहने वाली बड़ी आबादी विस्थापित हो जाएगी । बाढ़ों की संख्या और बारम्बारता बढ़ेगी । भारत के ५० फीसदी जंगलोंकी प्रकृति मेंबदलाव आएगा । भारत की ७० फीसदी बिजली की आपूर्ति कोयले से होती है । हम अपनी ऊर्जा की जरूरतें पूरी करने के लिए विदेशों से जमीन के अंदर से निकलने वाला इंर्धन भारी मात्रा में लेते हैं जिसको जलाने से कुल कार्बन उत्सर्जन का ८३ फीसदी उत्सर्जन अकेले इसी से होता है ।
जलवायु परितर्वन ने एक अनिश्चितता पैदा की है । अनिश्चितता ने सारे आंकड़े धराशायी किए हैं, खेती चौपट हो रही है, पीने के पानी की किल्लत है और औसत इंसानी सेहत का आंकड़ा गिर रहा
है । ग्रामीण इलाकों में हमने अब तक अरबों रूपये खर्च करके जो बांध, कुंड, नहरें आदि बनाकर सिंचाई की व्यवस्था बनाई है वह सब मानसून के ऐतिहासिक आंकड़ों पर आधारित करके बनाई है । लेकिन आज वह व्यवस्था असफल साबित हो रही है । कम वक्त मेंअधिक बारिश हो रही है जिसके पानी को एकत्र करने की हमारे यहां कोई व्यवस्था नहींहै । अर्थात पानी बेकार जा रहा है । पुराने जमाने से हमारे यहां बरसात के पानी के भण्डारण के जो तरीके अपनाए जाते रहे हैं, वे अब बेकार साबित हो रहे हैं । इस समस्या का गंभीर पहलु शहरों में भी दिखा है । जैसे मुम्बई में एकाएक घनी बारिश आती है और बाढ़ आ जाती है । चिंता की बात यह है कि शहरी योजनाआें को अब इस नजरिए से नए सिरे से बनाना होगा । जलवायु परिवर्तन का ये गंभीर दुष्परिणाम है । अनिश्चितता इतनी बढ़ गई है कि लोगों के आकलन गलत साबित हो रहे हैं । कब बारिश आएगी कब बर्फ गिरेगी, कब गर्मी होगी, कब सर्दी जाएगी, यह कोई भी निश्चित रूप से नहीं बता पा रहा है ।
लेकिन क्या कोई इस खतरे की गंभीरता से सुध ले रहा है ? कानकुन में जुटी पर्यावरण के प्रति चिंतनशील बिरादरी क्या सच में धरती के कोप को शांत करने के रास्ते तलाश रही थी या आंकड़ों और रेखांकनों के जरिए सब्जबाग देख रही थी ? ऐसे सम्मेलनों, संगोष्ठियों की रस्मों पर प्रदीप साहा कहते हैं दुर्भाग्य से, जलवायु परितर्वन के गंभीर नतीजे दिख रहे हैं, पर कोई यह मानने को तैयार नहीं है, क्योंकि अगर यह स्वीकारेंगे तो उन्हें उसको ठीक करने के लिए प्रयास करने पड़ेंगे । भारत में भी हरे जंगल खत्म हो रहे हैं, वहां के वनवासियों को विस्थापित करके वन खदान कंपनियों को सौंपा जा रहा है जो धरती को नीचे से खोखला करती जा रही है ।
सीधी सी बात है, हरियाली खत्म तो कार्बन खत्म तो कार्बन सोखने की क्षमता खत्म, तो प्रदूषण का स्तर ऊंचा, तो वातावरण गर्म, तो गर्मी और सर्दी में उतार-चढ़ाव । सब चीजें एक दूसरे से जुड़ी हैं । अंधाधुंध विकास और यूज एंड थ्रो का चलन चीजें खराब कर रहा है । अभी कानकुन (मैक्सिको) में जलवायु परिवर्तन पर सम्मेलन हुआ जिससे कुछ हासिल नहीं हुआ । ***

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

सामयिक

पहाड़ों पर चढ़ता विकास का भूत
चण्डीप्रसाद भट्ट

इस वर्ष उत्तराखंड में आई बाढ़ ने एक बार पुन: विकास की नई अवधारणा के यंत्रों जैसे सड़क व बिजली व पानी के न्यायोचित इस्तेमाल की ओर इशारा किया है। उत्तराखंड एवं अन्य पहाड़ी क्षेत्रों को मैदानी प्रभावी तबका दुधारू गाय की तरह दुहता रहता है । पहले यहां के पानी और अन्य प्राकृतिक संसाधनों को अपने उपयोग में लाकर और बची कुची कसर यहां पर छुटि्टयां बिताने के लिए होटल और मनोरंजन केन्द्र बनाकर पूरी कर लेता है । धरती के स्वर्ग कहे जाने वाले पहाड़ी क्षेत्र अब शोषण के प्रतीक बन कर रह गए हैं ।
इस वर्ष पहाड़ों से लेकर मैदानों तक लगातार नदियों में आयी बाढ़ से डूब क्षेत्रों का विस्तार हुआ है । २५ अगस्त की सुबह दिल्ली के अन्तर्राष्ट्रीय बस अड्डे सहित यमुना नदी के किनारे की बस्तियों एवं गांवों में पानी घुसने के समाचार प्रमुखता से प्रसारित होते रहे । इससे पूर्व पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड के कई गांव और क्षेत्र बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हुए थे । इस वर्ष बारिश कुछ ज्यादा हुई है जिससे इन क्षेत्रों में जो छोटे-बड़े बांध तथा ताल-तलैया हैं उनमें आवश्यकता से अधिक पानी भर गया है । इस खतरे को देखते हुए उनसे अधिक पानी छोड़े जाने से कई राज्यों में बाढ़ की स्थिति पैदा हुई । दिल्ली-हरियाणा तथा पंजाब में तो यही कुछ देखा
गया । हरियाणा के हथिनीकुण्ड बैराज से लाखों क्यूसेक पानी लगातार छोड़े जाने से तो ऐसा लगा था कि दिल्ली में युमना के तटवर्ती इलाके अब डूबे कि तब डूबे ।
मुम्बई, दिल्ली सहित कई बड़े-बड़े शहरों मेंे बारिश के पानी के समुचित निकास एवं अपशिष्ट आदि का ठीक से प्रबन्ध न होने को भी पानी के भराव का एक कारण गिनाया जा रहा है । दिल्ली-मुम्बई में तो यह अब हर वर्ष की समस्या बन गई है । संबंधित लोग जिम्मेदारियों से बचने के लिए एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहते हैं । जैसे ही बारिश थमती है तो फिर साल भर के लिए चैन की सांस ले लेते हैं ।
सन् १९९० के जुलाई के तीसरे हफ्ते में, मैं जब मुम्बई में था तो भायकला से गोरेगांव
गया । उस दौरान लगातार मुसलादार बारिश हो रही थी । तीन घन्टे की बारिश के बाद भी सड़क जाम एवं जलभराव जैसे स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा । लेकिन एक दशक से वहां पर जलभराव की बात लगातार सुनने को मिलती है । यही हाल दिल्ली का था पहले तिलक ब्रिज एवं मिन्टों ब्रिज के नीचे जरूर जलभराव देखा जाता था । अत्यधिक बारिश के बाद स्कूटरों एव छोटे तिपहियों वाहनों को परेशानी होती थी, पर बड़े वाहन सहजता से निकल जाते थे परन्तु जाम की जैसी स्थिति कम ही होती थी ।
आज दिल्ली-मुम्बई ही नहीं देश के कई छोटे-बड़े शहरों एवं नगरों में अनियंत्रित ढंग से निर्माण हो रहा है । उसमें पानी के निकास के प्रति बहुत ही लापरवाही बरती जा रही है । जिसके कारण जलभराव की समस्या दिनों-दिन विकराल रूप धारण कर रही है । लेकिन पहाड़ों में इसका स्वरूप अलग है । पहाड़ों में अनियोजित ढंग से जो निर्माण हो रहे हैं उसके कारण समस्या दिनों-दिन विकट होती जा रही है । यहां भूमि की भारवहन क्षमता, कमजोर एवं अस्थिर क्षेत्रों में निर्माण एवं पानी के निकास को ध्यान में न रखकर जो छोटे-बड़े निर्माण हो रहे हैं उससे कई छोटे-बड़े निर्माण हो रहे हैं उससे कई छोटे-बड़े नगरों के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग गया है । भूस्खलन एवं भू-घसाव की चपेट में कई नगर और बस्तियां हैं जिनकी संख्या हर वर्ष बढ़ती ही जा रही है ।
जहां तब बारिश के पानी से जलभराव की बात है इसमें सरकार और नागरिक समय से सावधानी बरतेंगे तो इस समस्या को पूरी तरह से समाप्त् तो नहीं किया जा सकता, किन्तु इसकी विकरालता को अवश्य ही कम किया जा सकता है ।
आज मुख्य समस्या यह है उफनती नदियों का वेग कैसे कम करें। बारिश तो कम ज्यादा होती रहती है और होती रहेगी । इसके चक्र को हमें पूरी तरह से समझना होगा । हमारे देश की गंगा, सिन्धु, एवं ब्रह्मपुत्र की सहायक धाराएं हिमालय क्षेत्र से ही नहीं अपितु इनकी कई धाराएं भूटान, नेपाल के पहाड़ों के साथ-साथ तिब्बत से भी निकलती हैं । इसी प्रकार गोदावरी, नर्मदा आदि अनेकों नदियां पूर्वी घाट, पश्चिमी घाट या देश के छोटे-बड़े पहाड़ों एवं जंगलों से निकलती है ।
हिमालय से लेकर सहयाद्रि तक और उससे भी आगे सागर के छोर तक बेइंतिहा छेड़-छाड़ की जा रही है । इनके पणढ़ालों में वनों का विनाश,खनन तथा विशाल विद्युत एवं सिंचाई परियोजनाआें के लिए धरती को अविवेकपूर्ण ढंग से खोदा जा रहा है । इन इलाकों में योजनाआें के लिये सड़कों का विस्तार किया जा रहा है इस से थोड़ी सी बारिश में भी ये नदियां अपना रौद्र रूप दिखाने लग गयी हैं । नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में जो, लाखों टन मिट्टी एवं कंकड़ खोदकर मलबे के ढेर लगाया गया है वह भी नदियों में बह रहा है । साथ ही नये-नये भूस्खलनों का मलबा भी नदियों में आने से इनका तल भी ऊपर उठ रहा है । दूसरी ओर नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों तक आबादी का विस्तार हो गया है ।
हमारे यहां एक कहावत थी, नदी तीर का रोखड़ा जत-कत शोरों पार लेकिन अब इस मुहावरे को कोई मायनें नहीं रह गये
हैं । इस प्रकार आबादी नदियों के विस्तार क्षेत्र में सहज रूप से आ गई है । इसलिए नदियों का कोप भाजन व केवल इनके बेसिन के अंतर्गत आने वाले मैदानी शहर ही नहीं अपितु पहाड़ी शहर और गांव भी हो रहे हैं । अभी पिछले दिनों अलकनंदा का बहाव श्रीनगर (गढ़वाल) की बस्ती में भी देखा गया है ।
यह स्थिति अब दिनोें-दिन विकराल रूप धारण करने वाली है । बिगाड़ तो बहुत हो चुका है इसलिए अब आवश्यकता है बिगाड़ पर आगे रोक लगाने की । अतएवं सम्पूर्ण हिमालय के अत्यंन्त संवेदनशील क्षेत्रों में प्रस्तावित बड़ी परियोजनाआें का मोह छोड़ कर उन्हें तत्काल बन्द कर दिया जाना चाहिए । जो परियोजनाएं बन चुकी हैं उनके द्वारा निकाली गयी मिट्टी और बालुरेत के ढेरों का समुचित निस्तारण अति प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए । ऐसे क्षेत्रों में मोटर मार्गोंा का निर्माण पत्थरों की दीवाल बनाकर आधा कटान के आधार पर किया जाना चाहिए । काटी गई मिट्टी निचले क्षेत्रों में फेंकना प्रतिबन्धित किया जाए । सड़कों का निर्माण ढाल में किया जाए, जिससे बार-बार भूस्खलन न हो, पानी के समुचित निकास का प्रबन्ध हो, नदियों के वृक्षविहीन क्षेत्रों को अति प्राथमिकता के आधार पर हरे आवरण से भरा जाना चाहिए । इसमें न केवल बड़े वृक्ष बल्कि छोटी वनस्पति का आवरण भी आवश्यक है । नदियों में बहने वाली गाद की जो मात्रा है उसे यदि प्राथमिकता के आधार पर नहीं रोका गया तो आगे इसके भयंकर दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं । ***

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

२ सामयिक


विकास की कठिन डगर
सुश्री सुनीता नारायण

वेदान्ता परियोजना पर रोक लगाने के निर्णय के बाद विकास का मुद्दा अहम हो गया है ।
पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा ओडिशा में वेदान्ता परियोजना पर रोक लगाने के निर्णय को समझना अनिवार्य है । यह एक ताकतवर कंपनी द्वारा कानून तोड़े जाने की कहानी है । परन्तु यह कहानी उतनी ही विकास की उस भूल भुलैया की भी है जिसमें देश की सबसे समृद्ध भूमि पर सबसे गरीब लोग जीवन निर्वाह करते हैं ।
एन.सी. सक्सेना समिति ने तीन आधारों पर खनन समूहों द्वारा पर्यावरण कानूनों को तोड़ने की ओर इंगित किया है । पहला कब्जा करके गांव के वनों की बिना अनुमति फेंसिंग कर दी गई । दूसरा कंपनी अपने कच्च माल अर्थात बाक्साइट की आपूर्ति अवैध खनन के माध्यम से कर रही थी जबकि पर्यावरण स्वीकृति के अन्तर्गत यह स्पष्ट शर्त थी कि ऐसा कोई कार्य न किया जाए । तीसरा आरोप जिसके समर्थन में मंत्रालय के अफसरों एवं राज्य के पर्यावरण विभाग के दस्तावेज भी लगे हैं, सर्वाधिक गंभीर हैं । इसके अनुसार कंपनी ने बिना अनुमति लिए अपने शोधन संयंत्र (रिफायनरी) की क्षमता को १० लाख टन प्रतिवर्ष से बढ़ाकर एक करोड़ ६० लाख तक प्रतिवर्ष करना प्रारंभ कर दिया ।
दूसरे शब्दों में कहें तो संयंत्र की वर्तमान में २६ लाख टन प्रतिवर्ष कच्चे माल की मांग का बढ़कर सिर चकरा देने वाले १.६ करोड़ टन प्रतिवर्ष पर पहुंच जाने को लेकर पड़ने वाले पर्यावरणीय प्रभावों का अभी तक आंकलन ही नहीं किया गया है । बाक्साइट कहां से आएगा ? इस पर भी गंभीरता से विचार करना होगा कि इस हेतु कितना अतिरिक्त जंगल काटा जाएगा ? इस हेतु कितना पानी निगल जाएगा ? स्थानीय समुदाय में पानी को लेकर अभी भी गुस्सा है क्योंकि कंपनी वर्तमान में ६५ कि.मी. दूर स्थित तेल नदी एवं नलकूपों से पानी का दोहन कर इस संसाधन को स्थानीय
जनता की पहुंच से बाहर कर रही है । इसके अतिरिक्त क्या शोधन संयंत्र के विस्तार से होने वाले प्रदूषण के भार को कम किया जा सकता है ? परन्तु वेदान्ता एल्यूमिनियम लि. इस तरह के मामलों की तफसील में जाना ही नहीं
चाहती है । वह पर्यावरण आशंकाआें और प्रचलित कानूनों की पूर्णतया अवहेलना करते हुए, अपने विस्तार में जुटी रही ।
यह निर्णय अधिकारों से संबंधित उन कानूनों को लेकर भी है, जिनका कि राज्य सरकार ने पालन नहीं किया । वन अधिकार अधिनियम (२००६) स्पष्ट रूप से निर्देशित करता है कि किसी भी परियोजना को स्वीकृति देने से पहले आदिवासियों के अधिकारों की अनिवार्य रूप से पहचान कर उनका निपटारा कर दिया जाना चाहिए । सबसे महत्वपूर्ण यह है कि कानून कहता है कि वन में निवास करने वाले समुदायों द्वारा ग्रामसभा के माध्यम से स्वीकृति दिये जाने के बाद ही किसी परियोजना को हरी झंडी दिखाई जाए । सक्सेना समिति का अभिमत है कि इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया । सबसे घटिया बात यह है कि राज्य सरकार ने भी इस लापरवाही को छुपाने का प्रयत्न किया । वेदान्ता से लिप्त्ता हमें नहीं चौंकाती परन्तु उसे दोषमुक्त करना चौंकाता है।
अब बड़ा सवाल है कि इस निर्णय का खनिज समृद्ध क्षेत्रों के भविष्य के विकास पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? आईये हम आधुनिक भारत के मानचित्र को समझते हैं। एक नक्शा लीजिए । पहले पहल इसमें उन जिलों पर निशान लगाइये जो कि वन संपदा के लिए जाने जाते हैं और जहां समद्ध और घने जंगल हैं । अब इसके ऊपर और भारत की जल संपदा वाला का एक नक्शा रख दीजिए जिसमें हमारी प्यास बुझाने वाली नदियों व धाराआें आदि के स्त्रोत अंकित हों । अब तीसरे दौर में इसके ऊपर देश की खनिज संपदाएं जैसे लौह अयस्क, कोयला, बाक्साइट और ऐसी सभी वस्तुआें जो हमें आर्थिक रूप से समृद्ध करती हों का मानचित्र रख दीजिए । आप देखेंगे कि ये तीनों प्रकार की संपदाए साथ-साथ ही अस्तित्व में रहती हैं ।
परन्तु यहीं पर मत रूकिए । अब इस नक्शे में उन जिलों पर निशान लगाइये जहां देश के सबसे गरीब लोग रह रहे हों । ये भी इस देश के आदिवासी जिले स्थानों पर चिन्हित
हैं । सबसे समृद्ध जमीनें वहीं हैं । जहां सबसे गरीब लोग रहते हैं । अब इन पर लाल रंग छिड़क दीजिए । ये वहीं जिले हैं जहां नक्सलवादी घूमते हैं और सरकार भी यह स्वीकार करती है कि वह वहां अपने ही लोगों से लड़ रही है । यह बद्तर विकास का एक पाठ है, जिससे हमें सीख लेने की आवश्यकता है ।
समस्या यह है कि खनन खनिज जैसे संसाधनों को छीन ले लेता है । इस प्रक्रियामें उन भूमि, जंगल एवं पानी की गुणवत्ता गिरती है, जिस पर कि लोग जिन्दा रहते हैं । सबसे बुरा यह है कि आधुनिक खनन और औद्योगिक क्षेत्र उस जीविका की प्रतिभूर्ति नहीं करते जो उन्होंने छीन ली होती है । इससे स्थितियां और भी जटिल हो जाती हैं । आधुनिक उद्योग को स्थानीय रोजगार की बहुत कम आवश्यकता पड़ती है । वेदान्ता के १० लाख टन के शोधन संयंत्र को केवल ५०० स्थायी एवं इसके अलावा १००० संविदा (कांट्रेक्ट) कर्मचारियों की भी आवश्यकता होती है । चूंकि स्थानीय व्यक्ति इस तरह की कुशलता भरे कार्योंा के लिए प्रशिक्षित ही नहीं होते अतएव वे अपनी जमीन और जीविका दोनों से ही हाथ धो बैठते हैं ।
इसीलिए वेदान्ता और अन्य हजारों पर्यावरणीय विद्रोहों से जिनमें हमारा देश रंगा हुआ है, गरीब व सामान्य व्यक्तियों (नक्सलवादी नहीं) के संघर्ष है और यह समझने के लिए बहुत अधिक विद्वता की आवश्यकता भी नहीं है । ये सभी गरीब हैं परंतु आधुनिक विकास जिसे हम तरक्की कहते हैं, ने इन्हें और भी गरीब बनाया है ।
यह गरीबों का पर्यावरणवाद है । वे हमें प्राकृतिक संपदा का मूल्य सिखा रहे हैं । वे जानते हैं कि अपनी जीविका हेतु वे समीप स्थित जल, जंगल व जमीन पर निर्भर हैं । वे यह भी जानते हैं कि यदि एक बार ये संसाधन चले गए या इनकी गुणवत्ता नष्ट हो गई तो आगे कोई मार्ग नहीं है । उनके लिए पर्यावरण एक विलासिता नहीं बल्कि जीवित रहने का साधन है । इसी वजह से वेदान्ता के विरूद्ध लिया गया निर्णय भविष्य की एक कठोर मांग भी है । यह हमसे अपेक्षा रखता है कि हम व्यक्तियों और उनके पर्यावरण के साथ जिस तरह से व्यापार करते आए हैं उसमें परिवर्तन लाएं । सर्वप्रथम हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि व्यक्तियों की विकास में भागीदारी हो ।
हम इन जमीनों पर बसने वाले समुदायों को बिना लाभ पहुंचाए न तो उनके संसाधन निकाल सकते हैंन ही उनका पानी प्रदूषित कर सकते है और न उनके वनोंको संरक्षित रख सकते हैं । इसलिए खान एवं खनिज (विकास एवं नियमन) अधिनियम के मसौदे में लाभ में हिस्सेदारी की व्यवस्था का उद्योगों के विरोध के बावजूद समर्थन किया जाना चाहिए । इतना ही नहीं इसके बाद भी काफी कुछ किया जाना बाकी है ।
दूसरे हमें अपने लोकतंत्र के प्रति गंभीर होना पड़ेगा । वन अधिकार अधिनियम में दिए गए वीटो कई अन्य परियोजनाआें के संबंध में कम से कम दो आशयों को स्वीकार करना ही होगा । पहला, परियोजना प्रवर्तकों को समुदायों को अपने बोर्ड मंे शामिल करने के लिए अपनी छबि सुधारने की दिशा में गंभीर प्रयत्न करने होंगे । दूसरा भारत को कम में ज्यादा अर्थात् गागर में सागर भरना होगा । हम सभी खनिजों का खनन् या सभी जमीनों का अधिग्रहण या संपूर्ण पानी लेकर उन सभी उद्योगों का निर्माण नहीं कर सकते जिनकी हमने योजना बनाई है या बनाना चाहते हैं । हमें अपनी जरूरतें कम करना होगी तथा अपनी निपुणता बढ़ाकर अधिग्रहित की गई भूमि के एक-एक इंर्च का खोदे गए खनिज के प्रत्येक अंश का और पानी की प्रत्येक बूंद का इस्तेमाल करना होगा ।
यह वास्तव में एक सख्त पाठ है जो कि कईयों के लिए भविष्य में और भी कठोर हो सकता है । विकास काकोई आसान रास्ता नहीं है उम्मीद है वेदान्ता ने अब तक यह सबक सीख लिया होगा ।
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१ सामयिक

बाढ़ का बढ़ता संकट
भारत डोगरा

वैज्ञानिक जिस तरह के बदलते मौसम की तस्वीर हमारे सामने रख रहे हैं, उसमें प्राय: वर्षा की मात्रा बढ़ने पर वर्षा के दिन कम होने की बात कही गई है । दूसरे शब्दों में अपेक्षाकृत कम समय में कुछ अधिक वर्षा होने की संभावना है । कम समय में अधिक वर्षा होगी तो बाढ़ की संभावना बढ़ेगी ।
भारत में तो इस वर्ष की समस्या विकट है ही, पड़ोसी देशों पाकिस्तान और चीन में भी प्रलयंकारी स्थिति उत्पन्न हुई है । बड़े बाँध बनाने मेंे तो चीन भारत से भी कहीं आगे रहा है तथा वहां की कुछ सबसे विशाल व प्रतिष्ठित बाँध परियोजनाएँ तो बाढ़ नियंत्रण के बड़े दावे कर रही थीं । यह समय तो बाढ़ में फँसे लोगों के बचाव व राहत का है, पर आगे चलकर यह भी सोचना होगा कि बाढ़ नियंत्रण के उपायों में निवेश का समुचित लाभ भारत तथा पड़ोस के देशों को क्यों नहीं मिला और बाढ़-नियंत्रण नीतियों-परियोजनाआें में क्या बदलाव जरूरी है ।
वैसे तो देश के बड़े भाग में बाढ़ की समस्या काफी समय से व्यापक रूप में उपस्थित रही है, पर जलवायु बदलाव के दौर में यह और गंभीर हो सकती है तथा इसके रूप में कुछ और बदलाव आ सकते हैं । वैज्ञानिक जिस तरह के बदलते मौसम की तस्वीर हमारे सामने रख रहे हैं, उसमें प्राय: वर्षा की मात्रा बढ़ने पर वर्षा के दिन कम होने की बात की गई है ।
इसी तरह ग्लोबल वार्मिंग के दौर में ग्लेशियर अधिक पिघलने से भले ही दीर्घकालीन जलसंकट उत्पन्न हो, पर कुछ वर्षोंा तक इससे नदियों में जल की मात्रा बढ़ सकती है व अपेक्षाकृत कम वर्षा की स्थिति में भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो सकती है । गलेशियरों के नीचे बनी नई झीलों के अवरोध हटने पर फ्लेश फ्लड या अचानक अधिक वेग की बाढ़ आ सकती है । लद्दाख में बादल फटने को भी कुछ विशेषज्ञ जलवायु बदलाव से जोड़ रहे हैं ।
बड़े बाँधों के बारे में प्राय: यह देखा गया है कि अधिक वर्षा होने पर उनमें इतना जल छोड़ने की स्थिति आ जाती है अधिक वेग की और अधिक विनाशक बाढ़ -नियंत्रण को कम महत्व देने व बाँध-प्रबंधन में गलतियों के बारे में सवाल उठाए गए हैं । आगे यह सवाल उठाना और जरूरी है कि इन सभी बाँधों से पानी छोड़ने से आई बाढ़ों के अनुभव को देखते हुए कई अन्य महँगी समस्याआें से भी जुड़े बाँध निर्माण को बाढ़ नियंत्रण का उपाय कब मानते रहेंगे ?
इसी तरह कुछ स्थानों पर तटबंध निर्माण की जरूरत को मानते हुए भी बड़े पैमाने के अधिकांश तटबंधों के निर्माण की उपयोगिता पर भी प्रश्नचिन्ह लगे हैंक्योंकि इन तमाम तटबंधों के निर्माण के बाद भी न केवल बाढ़ आ रही है । अपितु इन क्षेत्रों की कई अन्य समस्याएँ भी पहले से और विकट हो गई है । तटबंधों के बीच फँसे परिवार तो बहुत ही बुरी स्थिति में हैं, पर तटबंध बार-बार टूटने से या अन्य कारणों से कुछ स्थानों पर बाढ़ की समस्या अधिक विकट रूप में उपस्थित हुई
हैं । नहरों के ठीक रखरखाव के अभाव में उनमें दरारें पड़ने की संभावना बढ़ जाती है । इस वर्ष पंजाब-हरियाणा में यह विनाशकारी बाढ़ का महत्वपूर्ण कारण बना ।
जिन नदियों में गाद-मिट्टी की मात्रा अधिक होती है (जैसा कि हिमालय की अनेक नदियों में है ) उन पर बाँध व तटबंध निर्माण की उपयोगिता और भी संदिग्ध है । हिमालय व अन्य पर्वतों में भू-स्खलन की और गंभीर होती समस्या अपने आप में बड़ी चिंता का कारण है तथा साथ ही इससे नीचे के मैदानों में बाढ़ की समस्या और विकट होती जा रही है । बढ़ते भू-स्खलन के कारण अनेक पर्वतीय आवासों, गाँवों व सड़कों का अस्तित्व संकट में है । अनेक गाँवों की हालत ऐसी हो गई है कि किसी बड़े हादसे से बचाने के लिए उन्हेंअन्यत्र बसाना होगा । यह समस्या बहुत हद तक मानव निर्मित कारणों से बढ़ी है । विभिन्न निर्माण कार्योंा के लिए संवेदनशील तथा कच्च्े पर्वतों में विस्फोटकों का अंधाधुँध उपयोग किया गया है । बाँध-निर्माण के क्षेत्र में विशेषकर भू-स्खलन बढ़ गए हैं । टिहरी जलाशय के किनारे के अनेक गाँवों में स्थिति गंभीर है । सड़क निर्माण में पर्याप्त् सावधानी न बरतने के कारण भी भू-स्खलन की समस्या विकट होती है । हिमालय जैसे अधिक भूकम्प वाले क्षेत्र बढ़ते रहे तो भूक म्प से होने वाली क्षति भी बहुत बढ़ जाएगी ।
भू-स्खलनों से नदियों में गाद व मलबा गिरता है तो उनमें बाढ़ की संभावना बढ़ती है । यदि मलबे से किसी नदी का प्रवाह रूक जाए व कृत्रिम झील बन जाए, तो यह झील टूटने पर बहुत प्रलयंकारी बाढ़ आती है, जैसा कि कुछ वर्ष पहले उत्तराखंड मेंकनोदिया गांव की बाढ़ के समय देखा गया । यदि भू-स्खलन में भारी चट्टानें व मलबा बाँध के जलाशय (जैसे टिहरी जलाशय) में गिर जाए, तो भी बहुत प्रलयंकारी बाढ़ आ सकती है । दूसरी ओर वन-रक्षा व हरियाली बढ़ाकर तथा भू-संरक्षण उपायों से भू-स्खलन कम किया जा सकता है ।
इस तरह जहाँ विभिन्न कारणों से अधिक वेग की अचानक बाढ़ आने की आशंका बढ़ रही है, वहीं अनेक स्थानों पर बाढ़ के पानी के देर तक रूके रहने से जल-भराव की समस्या विकट हो रही है । सकड़ों, हाईवे, रेल लाइनों, तटबंधों, नहरों आदि के निर्माण में निकासी व पुलिया पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया जिससे यह समस्या बढ़ी है । लेह में बाढ़ के अधिक विनाशकारी होने का कारण निकासी का अभाव बताया गया है । सदियों से बाढ़ से प्रभावित कुछ क्षेत्रों में पहले बाढ़ के साथ जीना इसलिए सरल था कि बाढ़ का पानी बड़ी मात्रा में आता था पर तेजी से निकल भी जाता था । उसके साथ आई उपजाऊ मिट्टी से बाद में अच्छी खेती होती थी, परंतु अब देर तक जल-भराव रहने के कारण खेती समय पर नहीं हो पाती तथा मच्छरों और बीमारी का प्रकोप बढ़ता जा रहा है । शहरों में निर्माण कार्योंा में असावधानी, निकासी की गड़बड़ी व मलबों के ढेर के कारण जल-भराव की समस्या तेजी से बढ़ रही है । पॉलीथिन के बढ़ते कूड़े ने भी यह समस्या बढ़ाई है ।
जहाँ पहले वर्षोंा का बहुत-सा-पानी तालाबों, पोखरों में सजा जाता था, वहाँ इनके अतिक्रमण या इन्हें पाट दिए जाने के कारण वह बाढ़ उत्पन्न करता है व रिहायशी इलाके या खेती को क्षतिग्रस्त करता है । अनेक क्षेत्रों में आज भी बाढ़ और सूखे दोनों का समाधान यह है कि इन तालाबों, पोखरों को साफ व गहरा किया जाए । तब वर्षा का बहुत-सा पानी इन तालाबों में समा जाएगा व सूखे के दिनों में राहत देने के साथ-साथ भू-जल में वृद्धि भी करेगा । जहाँ-जहाँ छोटे चेक डेम, मेढ़बंदी, टॉवर हार्वेस्टिंग वआदि उपायों में वर्षा के जले को यिाा संभव रोगा जाएगा, बाढ़ व सूखे दोनों से रक्षा कार्य साथ-साथ होगा ।
प्राय: माना जाता है कि पूरब में ज्यादा बारिश होती है और पश्चिम में कम । पर इस मानसून के आरंभिक दिनों को देखें तो पश्चिम (राजस्थान व गुजरात) में बाढ़ आई हुई थी जबकि पूर्व में वर्षा कम थी । इस स्थिति में विशालकाय परियोजनाआें से स्थिति और बिगड़ सकती है । ऐसी योजनाएँ कागज पर आकर्षक लग सकती है पर नदियों के प्राकृतिक बहाव से खिलवाड़ ही करेंगी और तबाही मचाएँगी । ***