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रविवार, 19 फ़रवरी 2012

सामाजिक पर्यावरण

अनाज का संकट बढ़ाती शराब
प्रमोद भार्गव

ब्रिटेन की स्वयंसेवी संस्था ऑक्सफेम ने दुनिया में बढ़ रहे खाद्यान्न संकट के सिलसिले में चेतावनी दी है कि अनाज से यदि शराब और इथेनॉल बनाना बंद नहीं किया गया तो २०३० तक खाद्यान्नों की मांग ७० फीसदी बढ़ जाएगी और इनकी कीमतें भी आज के मुकाबले दुगुनी हो जाएंगी ।
इस सच्चई को भारत के परिप्रेक्ष्य में तो कतई नहीं झुठलाया जा सकता है, क्योंकि केंद्र की वर्तमान यूपीए सरकार के महज सात साल के कार्यकाल में ही खाद्यान्नों की कीमतें डेढ़ सौ से दो सौ फीसदी तक बढ़ चुकी हैं । इस लिहाज से ऑक्सफेम के आंकड़ों को मनगढ़ंत नहीं कहा जा सकता है । शराब और इथेनॉल उत्पादन के अलावा वायदा व्यापार भी अनाज की कीमतों में इजाफा करने में सहायक हो रहा है । भारतीय अर्थशास्त्रियों की मानें तो भारत में प्रति माह करीब ३५ हजार करोड़ का वायदा व्यापार होता है ।
अकेले महाराष्ट्र में अनाज स े शराब बनाने वाली २७० भटि्टयों में ७५ हजार लीटर से डेढ़ लाख लीटर तक शराब रोजाना बनाई जा रही है । इथेनॉल बनाने का कारोबार भी हजारों टन का आंकड़ा पार कर चुका है । इसके साथ ही मांसाहारियों की बढ़ती तादाद भी खाद्यान्न संकट की एक बड़ी वजह बन रही है ।
अभी तक भूख के बढ़ते प्रकोप के लिए औद्योगिक विकास, जलवायु परिवर्तन और धरती के गरम होते मिजाज को दोषी माना जा रहा था । लेकिन ऑक्सफेम की रिपोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अनाज से शराब और इंर्धन इथेनॉल बनाए जाने के हालात खाद्यान्न संकट की पृष्ठभूमि में हैं । उपभोक्तावादी जीवन-शैली का विस्तार भी आग में घी डालने का काम कर रहा है । कुछ लोगों की क्रय शक्ति में बहुत इजाफा हुआ है और उपभोग की प्रवृत्ति बड़ी है । इसके साथ ही खाद्यान्नों की खपत में भी वृद्धि हुई है ।
जानकारों की मानें तो १०० कैलोरी के बराबर गोमांस तैयार करने के लिए ७०० कैलोरी के बराबर अनाज खर्च होता है । इसी तरह बकरे या मुर्गियों के पालन में जितना अनाज खर्च होता है, उतना अगर सीधे खाया जाए, तो वह कहीं ज्यादा भूख मिटा सकता है । ब्रिटिश प्रणीविद जेम्स बेंजामिन का अध्ययन बताता है कि एक मुर्गा जब तक आधा किलो मांस देने लायक होताहै, तब तक वह १५ किलोग्राम तक का अनाज खा चुका होता है । यह अनाज का दुरूपयोग है ।
इधर चीन और भारत में एक वर्ग की बड़ी आय के चलते शराब पीने और मांस खाने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है । एक आम चीनी नागरिक अब सालाना औसतन ५० किलोग्राम मांस खा रहा है । जबकि ९० के दशक के मध्य में यह खपत महज २० किलोग्राम थी । इन सबसे बावजूद अभी तक ऐसे कोई उपाय नहीं किए जा रहे हैं, जिनसे प्रेरित होकर लोग इस विलासी जीवन से मुक्त हों । बल्कि इन्हें बढ़ावा देने वाली नीतियों को कानून में ढालने का काम किया जा रहा है ।
खाद्यान्न संकट गहराने और बढ़ती मंहगाई की जड़ में अमरीका और अन्य युरोपीय देशों द्वारा बड़ी मात्रा में खाद्यान्न का उपयोग जैव ईधन के निर्माण में किया जाना है । गेहूं, चावल, मक्का, सोयाबीन, गन्ना और रतनजोत आदि फसलों से इथेनॉल और बायोडीजल का उत्पादन किया जा रहा है । ऐसा ऊर्जा संसाधनों की ऊंची लागतों को कम करने के लिए वैकल्पिक जैव ईधनों को बढ़ावा देने के नजरिए से किया जा रहा है । जैव ईधन के उत्पादन ने अनाज बाजार के स्वरूप को विकृत कर दिया है ।
भारत में भुखमरी के बदतर हालात होने के बावजूद महाराष्ट्र में अनाज से शराब बनाने के कारखानों में लगातार वृद्धि हो रही है । जबकि महाराष्ट्र ऐसा राज्य है जहां विदर्भ क्षेत्र में गरीबी, भुखमरी और कर्ज के चलते ढाई लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं । गरीबी का आकलन करने वाली सुरेश तेंदुलकर समिति ने भी महाराष्ट्र को देश के उन छह राज्यों में शामिल किया है, जहां गरीबी सबसे बदतर हाल में है । इन चौंकाने वाली जानकारियों के बावजूद महाराष्ट्र की राज्य सरकार ने ज्यादा से ज्यादा लोगों को शराब पिलाने का बीड़ा उठाया हुआ है । गरीब की भूख शांत करने वाले ज्वार, बाजरा और मक्का से शराब बनाने का सिलसिला जारी है । सरकार का मानना है कि जब ज्वार, बाजरा और मक्का से बड़े पैमाने पर शराब का उत्पादन होगा तो किसान इन फसलों को उपजाना शुरू कर देंगे ।

बुधवार, 17 अगस्त 2011

सामाजिक पर्यावरण

सामाजिक पर्यावरण
लोकपाल विधेयक के सफल उदाहरण
सुश्री रोली शिवहर

भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ाई को जीतने में हांगकांग ने काफी हद तक सफलता पाई है । लेकिन यह जनता और सरकार के आपसी सामंजस्य से ही संभव हो पाया है । हमारी सरकार तो इस कानून के मसले पर पहले ही दिन से टकराहट पर जोर दे रही है तथा लगातार भ्रम फैलाकर व्यापक जनआंकाशाआें की अवहेलना कर रही है ।
दक्षिण एशिया में हांगकांग एक ऐसा देश है जहां कि सरकार ने भ्रष्ट व्यवस्था से तंग आकर एक ऐतिहासिक फैसला लिया और समािप्त् के लिए एक स्वतंत्र आयोग का गठन कर दिया । इस आयोग को आज तक ना तो वित्तीय दिक्कतों का सामना करना पड़ा और ना ही इसके किसी काम मेंकभी सरकारी हस्तक्षेप ही हुआ । नतीजन वर्ष २०१० में जारी हुई ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार विश्व में भ्रष्टाचार के मामले में हांगकांग घटकर १३ वें स्थान पर आ गया है । आज हांगकांग लोकतंत्र की सौंधी खुशबू का मजा देता है । मगर भारत में बहुप्रतीक्षित लोकपाल कानून के प्रस्तावित प्रारूप में ही बहुत सारी कमियां नजर आती हैं । भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिये कानून से पहले सरकारों की दृढ़ इच्छा की जरूरत है ।
ए.राजा, कनिमोझी और अब दयानिधी मारन, हालांकि यह सूची बहुत लंबी हो सकती है लेकिन इनकी बदौलत आज भारत में रोजाना सामने आ रहे नए घोटालों की चर्चा पूरी दुनिया में है। वहीं दूसरी ओर भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे आंदोलन की खबर भी दुनिया भर में फैल चुकी है । जिसे देखो वह अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले इस आंदोलन की ही बात कर रहा है । देश का हर वर्ग आज भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने को तैयार है । ऐसा भी नहीं है कि यह सब एकाएक ही हो रहा है, बल्कि लोग इस भ्रष्ट व्यवस्थासे आजिज आ चुके थे । महात्मा गाँधी ने आजादी के बाद तुरन्त ही चेतावनी देते हुए कहा था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्यवाही करने की जरूरत है नहींतो यह पूरे देश को नुकसान पहुंचाएगा । भारत के केन्द्रीय सतर्कता आयोग के भूतपूर्व आयुक्त नागार्जुन विट्ठल ने कहा था कि देश की जनता को जागरूक करने की जरूरत है और उन सभी को एक साथ लाने की जरूरत है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना चाहते हैं ।
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल, २०१० के आंकड़ों पर नजर दौडाएं तो हम पाते है कि भारत दुनिया के १७८ देशों में पारदर्शिता के मानक अनुसार ८७ वें स्थान पर है । जबकि २००९ में यह ८४वें स्थान पर था । अर्थात् भारत में पिछले सालों की अपेक्षा भ्रष्टाचार बढ़ा है । स्विस बैंक के अनुसार भारत के अमीरों के २८० लाख करोड़ रूपये स्विटरजरलैंड में जमा है ।
आज देश में राशन कार्ड बनवाने से लेकर पेंशन लेने तक के सभी कार्यो के लिए आम आदमी को रिश्वत देनी पड़ती है । लेकिन हमारे देश की सरकार आज तक इस पर काबू करने के लिए कोई कदम नहीं उठा पाई । इससे निपटने के लिए १९९८ से एक कानून लंबित पड़ा है । इस विधेयक को इससे पहले ११ बार संसद मे ंपेश किया जा चुका है । यानि सरकार इसे पारित हीं नहीं कराना चाहती है । एन.सी. सक्सेना कमेटी के अनुसार भारत मे आधी से ज्यादा लोग गरीबी की रेखा के नीचे निवास करते हैं और देश में ४० प्रतिशत बच्च्े आज भी कुपोषित हैं । भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा यह स्वीकार कर लिया गया था कि यदि दिल्ली से १ रूपया भेजा जाता है तो जमीनी स्तर तक केवल १५ पैसे ही पहुँचते हैं । इसके बावजूद हमारे देश के सत्तानशीनों के कानों में जूं तक नहीं रेंगी । भारत सरकार कहती है कि वह भ्रष्टाचार तो मिटाना तो चाहती है लेकिन तत्काल कुछ नहीं हो सकता है ।
हालांकि ऐसा नहीं कि भ्रष्टाचार केवल भारत के लिये ही कोढ़ है बल्कि यह तो कई देशों में व्याप्त् है । हर देश में भ्रष्टाचार से संबंधी परेशानियाँ हैं जिनसे उन्होनें अपने अपने तरीका से निपटने का प्रयास किया है । एशियाई देशों में से हांगकांग एक ऐसा देश है जिसने बहुत कम समय में भ्रष्टाचार से लगभग मुक्ति पा ली है । यहां आज जनता को उनकी बात कहने का अधिकार है तथा मीडिया को लिखने और अपना पक्ष रखने का अधिकार है ।
ऐसा नहीं है कि हांगकांग की सरकार कोई अजूबा है । यहां भी भारत की तरह ही लोकतंत्र है । सन् १९५० और १९६० के दशक में हांगकांग भी वर्तमान भारत जैसा ही भ्रष्टाचार से ग्रसित था । लोग समय पर अपना काम कराने के लिए रिश्वत को ही शार्ट कट समझने लगे थे और अधिकारी भी बिना रिश्वत लिए कोई काम नहीं करना चाहते थे । परन्तु एक समय ऐसा आया जब लोगों ने जब यह तय कर लिया कि अब वे भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं करेंगे । लोगों ने लामबंद होना शुरू किया और सरकार को बाध्य किया कि वो भ्रष्टाचार विरोधी कानून लाए । हांगकांग के तत्कालीन राज्यपाल सर मुर्रे मक ली होस और सरकार दोनों ने इसका समर्थन किया और १९७४ में सरकार ने एक अध्यादेश पारित करते हुए हांगकांग में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक स्वतंत्र आयोग की स्थापना की ।
आज भारत में भी यही स्थिति है । भ्रष्टाचार के संबंध में लोगों के बर्दाश्त करने की सीमा खत्म हो चुकी है और लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने को तैयार है । इस मसले पर एक बड़ा जनांदोलन खड़ा हो गया है । सबकी सिर्फ यह मांग है कि सरकार एक ऐसा कानून लाये जिसके अन्तर्गत एक इकाई का गठन किया जाये जो कि स्वतंत्र इकाई (जिसे लोकपाल का नाम दिया जा रहा है) के रूप में काम करे और उस पर किसी का जोर नहीं चले और देश में रहने वाला हर व्यक्ति इसके दायरे में आए । परन्तु वर्तमान में सरकार के इरादे नेक नजर नहीं आ रहे है । अन्ना के ५दिनों के अनशन के बाद सरकार ने जो विधेयक प्रस्तावित किया है उसका कार्य क्षेत्र बहुत ही सीमित है । सरकार के प्रस्ताव के अनुसार उन्होंने प्रधानमंत्री, न्यायपालिका और सांसदों को लोकपाल के दायरे के बाहर रखा है, जो कि न्यायसंगत नहीं है । हांगकांग के उदाहरण देखे तो वहां के अध्यादेश की परिधि में सभी आते है फिर वो चाहे वो मुख्य कार्यकारी अधिकारी (देश का प्रथम नागरिक) ही क्यों न हो ।
भारत सरकार ने अपने प्रस्ताव में लोकपाल सदस्यों की नियुक्ति के संदर्भ मेंएक चयन समिति की बात कही है जिसमें ११ में से ६ सदस्य राजनैतिक क्षेत्र से होंगे । इसके अलावा चयन संबंधी प्रक्रियाआें में पारदर्शिता की बारे में भी प्रस्ताव में कोई जिक्र नहीं किया गया है । पारदर्शिता का भी सबसे अच्छा उदाहरण हांगकांग में बनाये गये आयोग का है । यहां आयोग का सदस्य बनने के लिये कई परीक्षाएं पास करनी पड़ती है। इसके बाद ही उनका चयन होता है । ये सभी प्रक्रियाएं पारदर्शी तरीके से सम्पन्न की जाती है ।
सरकार के प्रस्ताव में यह स्पष्ट है कि लोकपाल या उनके दफ्तर में यदि किसी अधिकारी के ऊपर भ्रष्टाचार की शिकायत आती ही है तो लोकपाल स्वयं इस मामले की जांच करेगा । जबकि हांगकांग के इस आयोग में इसके बिलकुल उलट है । यहाँ इस कार्य हेतु एक कमेटी है जिसमें कि समुदाय के कुछ लोग (जिन्हें मुख्य कार्यकारी द्वारा नियुक्त किया जाता है), कुछ अधिकारी एवं चुने हुए प्रतिनिधि मामले की जांच करते हैं । इसके अलावा एक महत्वपूर्ण मुद्दा वित्तीय प्रावधानों को लेकर है । हांगकांग में गठित आयोग अपना बजट स्वयं बनाता है । आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार आज तक उनके बजट मेंसरकार द्वारा कभी कटौती नहीं की गयी ।
बिना जनता की सहभागिता के लोकतंत्र एक अधूरी कल्पना है । हांगकांग में बनाये गए इस आयोग में एक विशेष विभाग जनता के लिए बनाया गया है जिसका काम जनता को जागरूक करने से लेकर उन्हें सलाह देने तक का है । परन्तु विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का दंभ भरने वाले भारत में तैयार किये जा रहे लोकपाल विधेयक में इसका भी अभाव है । हमारे यहां तो सरकारी नुमांइदे यहां तक कह देते हैं कि सिविल सोसाईटी सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश ना करे नहीं तो यह आवाज कुचल दी जायेगी । तो फिर सरकार इस कानूनी ढांचे में जनता की भागीदारी को किस हद तक स्वीकार करेगी ?
अगर भ्रष्टाचार से निपटना है तो सरकार और जनता दोनों को अपनी-अपनी जिम्मेदारी के प्रति प्रतिबद्ध होना जरूरी है । हांगकांग ने ऐसा कर दिखाया है और यदि भारत भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहता है तो उसे यह बात ध्यान में रखना होगी कि लोकपाल एक विशिष्ट कानून हैं और इसे किसी अन्य कानून की तरह नहीं अपनाया जा सकता ।

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

सामाजिक पर्यावरण


अच्छा भोजन अमीरों की बपौती नहीं
डॉ.वंदना शिवा

भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम अनेक विरोधाभासों से ग्रसित है । आम व्यक्ति के भोजन को बहुराष्ट्रीय या देशी कंपनियोंको सौंपने से स्थितियां और भी बिगड़ेगी और देश के समक्ष ऐसा संकट खड़ा हो सकता है जिससे कि हमारी सार्वभौमिकता को ही चोट पहुंच सकती है ।
भारत के भूख की राजधानी के रूप में उभरने को इस तथ्य से सत्यापित किया जा सकता है कि यहां प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपभोग जो सन् १९९१ में १७८ किलो या वह २००३ में घटकर १५५ किलो रह गया है । इतना ही नहीं पिछले १७ वर्षोंा में सबसे निचले स्तर पर रहने वाली २५ प्रतिशत आबादी के दैनिक उपभोग में भी कमी आई है । अतएव खाद्य असुरक्षा को समाप्त् करने की दिशा में उठाया गया कोई भी कदम राष्ट्रीय आपदा को टालने की दिशा में उठाया गया कदम साबित होगा ।
हमारे यहां घरों से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक खाद्य सुरक्षा को लेकर सर्वाधिक शोचनीय तथ्य है खाद्य उत्पादन और खाद्य उत्पादक की अनदेखी । आप व्यक्तियों को तब तक खाद्यान्न उपलब्ध नहीं करवा सकते जब तक कि आपे सर्वप्रथम यह सुनिश्चित नहीं कर लिया हो कि हम पर्याप्त् मात्रा में खाद्यान्न उत्पादकों (किसानों) की जीविका सुरक्षित हो । इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि किसानों द्वारा खाद्यान्न उत्पादन का अधिकार ही खाद्य सुरक्षा का आधार है । अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह विचार खाद्यान्न सार्वभौमिकता के अधिकार के रूप में उभरा है ।
खाद्यान्न सार्वभौमिकता का विचार सामाजिक आर्थिक मानवाधिकार से लिया गया है जिसमें भोजन का अधिकार और ग्रामीण समुदाय के लिए भोजन के उत्पादन का अधिकार भी शामिल है । पीटर रोजर ने इस संबंध में मंथली रिव्यु के अपने लेख में लिखा है खाद्य सार्वभौमिकता का तर्क है कि राष्ट्र के नागरिकों को भोजन उपलब्ध करवाना राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला है । अगर किसी देश की जनसंख्या अपने अगले समय के भोजन के लिए वैश्विक अर्थव्यवस्था की सनक या भावोंमें उतार-चढ़ाव या लम्बे समुद्री मार्ग से आने की अनिश्चितता और अत्यधिक लागत पर निर्भर है तो वह देश न तो राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से और न ही खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से सुरक्षित है ।
इस तरह से खाद्य सार्वभौमिकता का विचार खाद्य सुरक्षा के विचार से काफी अलग हैं क्योंकि खाद्य सुरक्षा इस बारे में मौन है कि भोजन कहा से आता है या उसका उत्पादन किस प्रकार किया जाता है । वास्तविक सार्वभौमिकता पाने के लिए आवश्यक है कि ग्रामीणों की पहुंच उपजाऊ भूमि तक हो और उन्हें उनकी फसल का इतना दाम मिले की वे राष्ट्र के लोगों की क्षुधापूर्ति करते हुए स्वयं भी बेहतर जीवन जी सकें । भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम को लेकर की जा रही वर्तमान पहले में भी खाद्य सुरक्षा के निम्न दो पहलुआें तो कमोवेश लुप्त् हो गए
हैं । पहला पहलु है खाद्यान्न उत्पादन का अधिकार और दूसरा है राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा । ये दोनों की पहलू खाद्यान्न सार्वभौमिकता से संबंधित है ।
कोई भी देश जो खाद्यान्न उत्पादन की अनदेखी करता है वह अपनी वास्तविक खाद्य सुरक्षा को भी खतरे में डालता है । भारत में यह खतरा और भी बढ़ जाता है क्योंेकि हमारी दो तिहाई आबादी कृषि और खाद्यान्न उत्पादन में लगी हुई है । १२० करोड़ की जनसंख्या वाले हमारे देश को छोटे किसान पारम्परिक रूप से खाद्य सुरक्षा उपलब्ध करवाते रहे हैं । इसके बावजूद आज वे स्वयं संकट में हैं । कृषि संकट का सामना कर रहे देश का सबसे त्रासदायी पक्ष यह है कि पिछले एक दशक में २ लाख से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। अगर हमारे खाद्यान्न उत्पादक ही जिंदा नहीं बचेंगे तो हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा ही कहां बचेगी ?
यह भी एक वैश्विक तथ्य है कि विश्व के भूखे लोगों में आधे वे हैं जो स्वयं खाद्यान्न के उत्पादक हैं । इस स्थिति को सीधे- सीधे पूंजी और रसायन प्रणाली जिसे हरित क्रांति ने प्रारंभ किया था, से जोड़ा जा सकता है । अत्यधिक लागत की वजह से किसान का कर्जे में पड़ना अनिवार्य हो जाता है और कर्जे के बोझ से दबे किसान को ऋण अदायगी के लिए अपने उत्पादन को हर हाल में बेचना ही पड़ता है । इसी से किसानों में व्याप्त् वरोधाभास और बेचारगी सामने आती है । किसानों की आत्महत्या भी अत्यधिक लागत के कारण होने वाली ऋणग्रस्तता का परिणाम ही है ।
किसाना समुदाय की भूख समाप्त् करने का तरीका यह है कि कृषि की ओर पुन: मुडा जाए । साथ ही हमें इस भ्रामक विचार से बाहर भी आना होगा कि छोटे किसानों द्वारा और टिकाऊ (सुस्थिर) प्रणाली से पर्याप्त् उत्पादन नहीं होता । भारत और विश्व के अन्य हिस्सों के आंकड़े बताते हैं कि बड़ी कृषि जोतों (फार्म्स) के बजाए छोटे किसान अधिक उत्पादन करते हैं और रासायनिक एकल फसल के मुकाबले जैव विविधता वाले जैविक खेतों में अधिक खाद्यान्न पैदा होता है ।
ग्रामीणों की खाद्य सार्वभौमिकता से ही ग्रामीण समुदायों और जिन्हें वे भोजन उपलब्ध करवाते हैं, उनकी भूख नष्ट हो सकती है । भूख और कुपोषण का सामना कर रहे देश के लिए कारपोरेट खेती का ठेका खेती कमोवेश झूठे सामाधान हैं । वैसे भी कारपोरेट जगत खाद्य प्रसंस्करण का कार्य पहले ही हथिया चुका है और अब यह मध्यान्ह भोजन जैसे खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमोंें का अधिग्रहण भी कर लेना चाहता है । इन व्यापक कमियों के अलावा भी प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम पक्षपातपूर्ण और पूर्वाग्रह से ग्रस्त है । उदाहरण के लिए यदि सरकारी नीतियों को देखें तो हमें साफ नजर आता है कि उनका झुकाव कारपोरेट की ओर ही है । इसी झुकाव के तहत ही वर्तमान प्रणाली के स्थान पर खाद्य टिकट/वाउचर प्रक्रिया प्रस्तावित की जा रही है । ऐसा इस कल्पित आधार पर किया जा रहा है कि ये नियम खाद्य आपूर्ति को नियंत्रित करेंगे और सरकार गरीबों को इन नियमों से खाद्य टिकट और वाउचर के आधार पर खाद्यान्न खरीदने में सहायता करेगी । अगर ऐसा हो जाता है तो गरीबों के हिस्से में न्यूनतम पोषण वाला एवं अस्वास्थ्य भोजन आएगा जैसा कि अमेरिका जैसे देशों में पहले से ही हो रहा है ।
एक ऐसी खाद्य सुरक्षा प्रणाली जिसमेंें न तो खाद्य सार्वभौमिकता और न ही सार्वजनिक खाद्य प्रणाली बनाने का प्रयास किया गया हो, वह गरीब व्यक्तियोंें को ऐसा ही भोजन उपलब्ध कराएगी जो कि मनुष्यों के खाने के लिए अनुपयुक्त हो । ऐसा दो वर्ष पूर्व हो चुका है जब भारत ने कीटनाशकों से प्रदूषित गेहूँ का आयात किया था । चेन्नई बंदरगाह प्राधिकरण एवं महाराष्ट्र सरकार दोनों ने ही इसे मानव के उपभोग के लिए अनुपयुक्त घोषित कर दिया था । वर्तमान प्रतिमान भी इसी आधार पर दिया गया था । वर्तमान प्रतिमान भी इसी आधार पर बनाए गए है कि गरीब खराब भोजन खा सकते हैं और अच्छा भोजन तो सिर्फ अमीरों के लिए है ।
जबकि खाद्य सुरक्षा में सुरक्षित, स्वास्थ्यकर, सांस्कृतिक रूप से उचित एवं आर्थिक रूप से सक्षम खाद्यान्न के अधिकार को सम्मिलित किया गया है लेकिन खाद्य टिकट इसकी ग्यारंटी नही ंदे सकते । इतना ही नहीं वर्तमान में प्रचलित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) भी कोई एक तरफा प्रणाली नहीं है । इसके अंतर्गत खाद्यान्नों का सरकारी खरीदी और खाद्यान्न वितरण प्रणाली दोनों ही आते हैं । इसे खाद्य वाउचर से बदलने से किसानों की खाद्य सार्वभौमिकता नष्ट होगी और ये बाजार की सनक के शिकार हो जाएगें जिससे कि अंतत: उनकी जीविका ही नष्ट हो जाएगी ।
इससे ६५ करोड़ ग्रामीणों के सामने विस्थापन का संकट खड़ा हो जाएगा और इन भूखे व्यक्तियोंें से भूख की ऐसी समस्या उठ खड़ी होगी जिसका समाधान कोई भी सरकार या बाजार नहीं कर
सकता । इसीलिए यदि हमें अपनी खाद्य सुरक्षा को मजबूत व सुरक्षित बनाना है तो हमें हर हाल में अपनी खाद्य सार्वभौमिकता और सार्वजनिक प्रणाली को मजबूत बनाना होगा । प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम इस मायने में भारत के संविधान के विरोध दिखाई देता है क्योंकि इसका कहना है एक केंद्रीय इकाई गरीबों की पहचान करेगी । अच्छे और प्रत्येक खेतों में प्रचुर मा भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम अनेक विरोधाभासों से ग्रसित है । आम व्यक्ति के भोजन को बहुराष्ट्रीय या देशी कंपनियोंको सौंपने से स्थितियां और भी बिगड़ेगी और देश के समक्ष ऐसा संकट खड़ा हो सकता है जिससे कि हमारी सार्वभौमिकता को ही चोट पहुंच सकती है ।
भारत के भूख की राजधानी के रूप में उभरने को इस तथ्य से सत्यापित किया जा सकता है कि यहां प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपभोग जो सन् १९९१ में १७८ किलो या वह २००३ में घटकर १५५ किलो रह गया है । इतना ही नहीं पिछले १७ वर्षोंा में सबसे निचले स्तर पर रहने वाली २५ प्रतिशत आबादी के दैनिक उपभोग में भी कमी आई है । अतएव खाद्य असुरक्षा को समाप्त् करने की दिशा में उठाया गया कोई भी कदम राष्ट्रीय आपदा को टालने की दिशा में उठाया गया कदम साबित होगा ।
हमारे यहां घरों से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक खाद्य सुरक्षा को लेकर सर्वाधिक शोचनीय तथ्य है खाद्य उत्पादन और खाद्य उत्पादक की अनदेखी । आप व्यक्तियों को तब तक खाद्यान्न उपलब्ध नहीं करवा सकते जब तक कि आपे सर्वप्रथम यह सुनिश्चित नहीं कर लिया हो कि हम पर्याप्त् मात्रा में खाद्यान्न उत्पादकों (किसानों) की जीविका सुरक्षित हो । इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि किसानों द्वारा खाद्यान्न उत्पादन का अधिकार ही खाद्य सुरक्षा का आधार है । अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह विचार खाद्यान्न सार्वभौमिकता के अधिकार के रूप में उभरा है ।
खाद्यान्न सार्वभौमिकता का विचार सामाजिक आर्थिक मानवाधिकार से लिया गया है जिसमें भोजन का अधिकार और ग्रामीण समुदाय के लिए भोजन के उत्पादन का अधिकार भी शामिल है । पीटर रोजर ने इस संबंध में मंथली रिव्यु के अपने लेख में लिखा है खाद्य सार्वभौमिकता का तर्क है कि राष्ट्र के नागरिकों को भोजन उपलब्ध करवाना राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला है । अगर किसी देश की जनसंख्या अपने अगले समय के भोजन के लिए वैश्विक अर्थव्यवस्था की सनक या भावोंमें उतार-चढ़ाव या लम्बे समुद्री मार्ग से आने की अनिश्चितता और अत्यधिक लागत पर निर्भर है तो वह देश न तो राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से और न ही खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से सुरक्षित है ।
इस तरह से खाद्य सार्वभौमिकता का विचार खाद्य सुरक्षा के विचार से काफी अलग हैं क्योंकि खाद्य सुरक्षा इस बारे में मौन है कि भोजन कहा से आता है या उसका उत्पादन किस प्रकार किया जाता है । वास्तविक सार्वभौमिकता पाने के लिए आवश्यक है कि ग्रामीणों की पहुंच उपजाऊ भूमि तक हो और उन्हें उनकी फसल का इतना दाम मिले की वे राष्ट्र के लोगों की क्षुधापूर्ति करते हुए स्वयं भी बेहतर जीवन जी सकें । भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम को लेकर की जा रही वर्तमान पहले में भी खाद्य सुरक्षा के निम्न दो पहलुआें तो कमोवेश लुप्त् हो गए
हैं । पहला पहलु है खाद्यान्न उत्पादन का अधिकार और दूसरा है राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा । ये दोनों की पहलू खाद्यान्न सार्वभौमिकता से संबंधित है ।
कोई भी देश जो खाद्यान्न उत्पादन की अनदेखी करता है वह अपनी वास्तविक खाद्य सुरक्षा को भी खतरे में डालता है । भारत में यह खतरा और भी बढ़ जाता है क्योंेकि हमारी दो तिहाई आबादी कृषि और खाद्यान्न उत्पादन में लगी हुई है । १२० करोड़ की जनसंख्या वाले हमारे देश को छोटे किसान पारम्परिक रूप से खाद्य सुरक्षा उपलब्ध करवाते रहे हैं । इसके बावजूद आज वे स्वयं संकट में हैं । कृषि संकट का सामना कर रहे देश का सबसे त्रासदायी पक्ष यह है कि पिछले एक दशक में २ लाख से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। अगर हमारे खाद्यान्न उत्पादक ही जिंदा नहीं बचेंगे तो हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा ही कहां बचेगी ?
यह भी एक वैश्विक तथ्य है कि विश्व के भूखे लोगों में आधे वे हैं जो स्वयं खाद्यान्न के उत्पादक हैं । इस स्थिति को सीधे- सीधे पूंजी और रसायन प्रणाली जिसे हरित क्रांति ने प्रारंभ किया था, से जोड़ा जा सकता है । अत्यधिक लागत की वजह से किसान का कर्जे में पड़ना अनिवार्य हो जाता है और कर्जे के बोझ से दबे किसान को ऋण अदायगी के लिए अपने उत्पादन को हर हाल में बेचना ही पड़ता है । इसी से किसानों में व्याप्त् वरोधाभास और बेचारगी सामने आती है । किसानों की आत्महत्या भी अत्यधिक लागत के कारण होने वाली ऋणग्रस्तता का परिणाम ही है ।
किसाना समुदाय की भूख समाप्त् करने का तरीका यह है कि कृषि की ओर पुन: मुडा जाए । साथ ही हमें इस भ्रामक विचार से बाहर भी आना होगा कि छोटे किसानों द्वारा और टिकाऊ (सुस्थिर) प्रणाली से पर्याप्त् उत्पादन नहीं होता । भारत और विश्व के अन्य हिस्सों के आंकड़े बताते हैं कि बड़ी कृषि जोतों (फार्म्स) के बजाए छोटे किसान अधिक उत्पादन करते हैं और रासायनिक एकल फसल के मुकाबले जैव विविधता वाले जैविक खेतों में अधिक खाद्यान्न पैदा होता है ।
ग्रामीणों की खाद्य सार्वभौमिकता से ही ग्रामीण समुदायों और जिन्हें वे भोजन उपलब्ध करवाते हैं, उनकी भूख नष्ट हो सकती है । भूख और कुपोषण का सामना कर रहे देश के लिए कारपोरेट खेती का ठेका खेती कमोवेश झूठे सामाधान हैं । वैसे भी कारपोरेट जगत खाद्य प्रसंस्करण का कार्य पहले ही हथिया चुका है और अब यह मध्यान्ह भोजन जैसे खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमोंें का अधिग्रहण भी कर लेना चाहता है । इन व्यापक कमियों के अलावा भी प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम पक्षपातपूर्ण और पूर्वाग्रह से ग्रस्त है । उदाहरण के लिए यदि सरकारी नीतियों को देखें तो हमें साफ नजर आता है कि उनका झुकाव कारपोरेट की ओर ही है । इसी झुकाव के तहत ही वर्तमान प्रणाली के स्थान पर खाद्य टिकट/वाउचर प्रक्रिया प्रस्तावित की जा रही है । ऐसा इस कल्पित आधार पर किया जा रहा है कि ये नियम खाद्य आपूर्ति को नियंत्रित करेंगे और सरकार गरीबों को इन नियमों से खाद्य टिकट और वाउचर के आधार पर खाद्यान्न खरीदने में सहायता करेगी । अगर ऐसा हो जाता है तो गरीबों के हिस्से में न्यूनतम पोषण वाला एवं अस्वास्थ्य भोजन आएगा जैसा कि अमेरिका जैसे देशों में पहले से ही हो रहा है ।
एक ऐसी खाद्य सुरक्षा प्रणाली जिसमेंें न तो खाद्य सार्वभौमिकता और न ही सार्वजनिक खाद्य प्रणाली बनाने का प्रयास किया गया हो, वह गरीब व्यक्तियोंें को ऐसा ही भोजन उपलब्ध कराएगी जो कि मनुष्यों के खाने के लिए अनुपयुक्त हो । ऐसा दो वर्ष पूर्व हो चुका है जब भारत ने कीटनाशकों से प्रदूषित गेहूँ का आयात किया था । चेन्नई बंदरगाह प्राधिकरण एवं महाराष्ट्र सरकार दोनों ने ही इसे मानव के उपभोग के लिए अनुपयुक्त घोषित कर दिया था । वर्तमान प्रतिमान भी इसी आधार पर दिया गया था । वर्तमान प्रतिमान भी इसी आधार पर बनाए गए है कि गरीब खराब भोजन खा सकते हैं और अच्छा भोजन तो सिर्फ अमीरों के लिए है ।
जबकि खाद्य सुरक्षा में सुरक्षित, स्वास्थ्यकर, सांस्कृतिक रूप से उचित एवं आर्थिक रूप से सक्षम खाद्यान्न के अधिकार को सम्मिलित किया गया है लेकिन खाद्य टिकट इसकी ग्यारंटी नही ंदे सकते । इतना ही नहीं वर्तमान में प्रचलित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) भी कोई एक तरफा प्रणाली नहीं है । इसके अंतर्गत खाद्यान्नों का सरकारी खरीदी और खाद्यान्न वितरण प्रणाली दोनों ही आते हैं । इसे खाद्य वाउचर से बदलने से किसानों की खाद्य सार्वभौमिकता नष्ट होगी और ये बाजार की सनक के शिकार हो जाएगें जिससे कि अंतत: उनकी जीविका ही नष्ट हो जाएगी ।
इससे ६५ करोड़ ग्रामीणों के सामने विस्थापन का संकट खड़ा हो जाएगा और इन भूखे व्यक्तियोंें से भूख की ऐसी समस्या उठ खड़ी होगी जिसका समाधान कोई भी सरकार या बाजार नहीं कर
सकता । इसीलिए यदि हमें अपनी खाद्य सुरक्षा को मजबूत व सुरक्षित बनाना है तो हमें हर हाल में अपनी खाद्य सार्वभौमिकता और सार्वजनिक प्रणाली को मजबूत बनाना होगा । प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम इस मायने में भारत के संविधान के विरोध दिखाई देता है क्योंकि इसका कहना है एक केंद्रीय इकाई गरीबों की पहचान करेगी । अच्छे और प्रत्येक खेतों में प्रचुर मात्रा में उत्पादन और उसकी प्रत्येक रसोई तक पहंुचने की सुनिश्चितता की कुंजी विकेंद्रीकरण में निहित हैं । केंद्रीकरण और कारपोरेट द्वारा खाद्यान्नों का अपहरण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । वहीं विकेंद्रीकरण और खाद्य सार्वभौमिकता भी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ।
***उत्पादन और उसकी प्रत्येक रसोई तक पहंुचने की सुनिश्चितता की कुंजी विकेंद्रीकरण में निहित हैं । केंद्रीकरण और कारपोरेट द्वारा खाद्यान्नों का अपहरण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । वहीं विकेंद्रीकरण और खाद्य सार्वभौमिकता भी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ।
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सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

११ सामाजिक पर्यावरण

रक्षा बंधन से वृक्ष रक्षा
डॉ.ओ.पी.जोशी
हम एक विरोधाभासी समय के साक्षी हैं। एक ओर सारी दुनिया में हरियाली बचाने के लिए जोर-शोर से प्रचार हो रहा है वहीं दूसरी और जिस तरह जंगलों और शहरों में पेड़ों को काटा जा रहा है । उससे यह लगता है कि आने वाले वर्षोंा में हमने कृत्रिम प्राणवायु पर रहने की तैयारी कर ली है । रक्षाबंधन पर वृक्षोंकी रक्षा का संकल्प हमारी सभ्यता को बचाने का एक प्रयास है । यह कार्य आज भले ही छोटा प्रतीत हो रहा हो परंतु हमारी धरती को बचाने में यह बड़ा प्रयास सिद्ध होगा । वृक्षों की रक्षा हेतु रक्षाबंधन पर्व को रक्षा के स्वरूप में मनाने की भावना बढ़ती जा रही है । रक्षाबंधन पर्व पर वृक्षों पर राखी बांधने का प्रारंभ सन् १९९२ में पांच पेड़ों पर प्रतीक स्वरूप राखी बांधकर उनकी रक्षा का संकल्प लिया था । वर्ष २००४ में व्यापक स्तर पर राज्य के लोगों ने वृक्षों को रक्षा सूत्र (राखी) बांधकर रक्षाबंधन पर्व मनाया । छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ.रमनसिंह एवं उनकी पत्नी ने भी आम के एक पेड़ पर रक्षासूत्र बांधकर इस आयोजन की सराहना की थी । १९७३ में वृक्षों को बचाने हेतु हिमाचल क्षेत्र में प्रारम्भ किये गये चिपको आन्दोलन के बाद १९९४ मे उतराखंड में रक्षासूत्र आंदोलन चलाया गया । रियाला, मेही व डालगांव की महिलाआें ने वृक्षों पर रक्षासूत्र बांधे । १० एवं ११ अगस्त १९९५ को लगभग ३०० ग्रामीण महिलाआें ने गांव के आसपास के जंगलों में जाकर वृक्षों को रक्षासूत्र बांधकर उन्हें बचाने का संकल्प लिया । उड़ीसा में वनों एवं पेड़ों की सुरक्षा हेतु प्रयासरत मयूरभंज स्वयं सेवी संस्था के सदस्य वर्षोंा से रक्षाबंधन का पर्व पेड़ों को राखी बांधकर मना रहे हैं । झारखंड के कुछ गांवों में भी एक नया त्यौहार तरूबंधन या वृक्षबंधन के रूप में मनाया जाने लगा है । पर्यावरण प्रेमियों एवं वन विभाग की प्रेरणा से गांवों में पिछले कुछ वर्षोंा से प्रारम्भ किया गया यह त्यौहार सावन में मनाया जाता है । इस अवसर पर पेड़ों के तने पर रोली कंकु लगाकर गुड़हल के फूलोंकी राखी बांधकर आरती उतारी जाती है । मध्यप्रदेश के ब्यावरा के पास स्थित १२००-१५०० की आबादी वाले गांव, नालाझीरी की महिलाआें ने पेड़ों को भाई मानने का सिलसिला १८-२० वर्ष पूर्व प्रारम्भ किया था तथा यह आज भी जारी है । महिलाआें ने लकड़ी माफिया से पेड़ों को बचाकर पूरा क्षेत्र हराभरा बनाए रखा है । मुलायमसिंह सरकार ने भी उत्तरप्रदेश मेंें लखनऊ के आसपास एक-दो वर्षोंा तक वृक्ष रक्षासूत्र कार्यक्रम कार्यक्रम चलाया था । लखनऊ में ही कछ स्कूली बच्चें ने अपने परिसर में लगे पेड़ पौधों को राखी बांधकर रक्षाबंधन पर्व मनाया था एवं एक निजी स्कूल में आम के पेड़ पर दुनिया की सबसे बड़ी राखी बनाकर बांधी गयी थी । वर्ष २००५ में पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के लोगों ने अपने आसपास स्थित वृक्षों की शाखाआें पर राखी बांधकर उन्हें सजाया एवं रक्षा का संकल्प लिया । शहर की घटती हरियाली को बचाने हेतु जनजागरण का यह सार्वजनिक प्रयास काफी सफल एवं प्रशंसनीय रहा था । वर्ष २००६ मे बिहार की राजधानी पटना में एक स्कूल के छात्रोंने पेड़ों को राखी बांधकर रक्षाबंधन पर्व मनाया था । वहीं पर कार्यरत पर्यावरण संरक्षण संगठन तरूमित्र के प्रयासों से प्रसिद्ध स्कूल डानवास्को अकादमी में यह पहल की गयी थी । इस आयोजन की एक ओर विशेषता यह रही कि छात्रों ने व्यर्थ कागज एवं कपास आदि से ईको फ्रेंडली राखियां बनाकर पेड़ों को बांधी । तरूमित्र संगठन अन्य स्कूलों में भी ऐसा आयोजन करने हेतु प्रयासरत हैं । वर्ष २००४ में राष्ट्रकुल खेलों के आयोजन के संदर्भ में यमुना किनारे प्रस्तावित निर्माण कार्योंा के लिए काटे जाने वाले वृक्षों को जल बिरादरी व यमुना सत्याग्रही संगठन के कार्यकर्ताआें ने राखी बांधकर बचाने का संकल्प लिया था । इसमें मेससेसे पुरस्कार विजेता राजेन्द्रसिंह पर्यावरणविद् डॉ.वंदना शिवा एवं एस.ए. नकवी शामिल हुए थे । वर्ष २००९ में भी वृक्षों को राखी बांधकर उन्हें बचाने हेतु कई प्रसास किये गये । ५ अगस्त को लखनऊ के हजारों हरियाली प्रेमियों ने पेड़ों पर राखी बांधी । चिड़ियाघर के प्रवेश द्वारों पर हजारों राखियां रखी गयी थीं । चिड़ियाघर आये दर्शकों ने वृक्षों पर प्रतीक स्वरूप राखियां बांधकर वृक्षों को बचाने का संकल्प लिया । म.प्र. में बैतुल के पास स्थित गांव सिमोरी के शासकीय स्कूल में बच्चें ने ६० वृक्षों पर राखी बांधकर उन्हें बचाने की प्रतिज्ञा ली । हिमाचलप्रदेश के सिरमौर जिले में रेणुका पनबिजली योजना हेतु काटे जाने वाले वृक्षों को बचाने हेतु महिलाआें ने उन पर रक्षासूत्र बांधे । वैसे प्रतिवर्ष रक्षाबंधन का त्यौहार वर्षा काल की समािप्त् के आसपास आता है ।एवं वर्षाकाल के प्रारम्भ में लगाये गये पौधों की सुरक्षा यदि इससे जोड़ दी जाए तो हरियाली फैलने के साथ-साथ पर्यावरण की आधुनिक शब्दावली में कहें तो कार्बन क्रेडिट की प्रािप्त् भी होगी । ***

रविवार, 29 अगस्त 2010

१२ सामाजिक पर्यावरण

नए कानून के नए शिकार
चिन्मय मिश्र

सूचना का अधिकार कानून के सहारे गुजरात के गिर जंगलों में अवैध खनन के खिलाफ संघर्ष करने वाले ३३ वर्षीय अमित जेठवा की हत्या के साथ इस वर्ष के पहले सात महिनोंमें सूचना का अधिकार कानून के कार्यकर्ताआें की हुई हत्याआें की संख्या ८ तक पहुंच गई है ।
अमित जेठवा की २० अक्टूबर को अहमदाबाद उच्च् न्यायालय परिसर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी । इस वर्ष ३ जनवरी को सतीश शेटट्ी की पूणे महाराष्ट्र, ११ फरवरी को विश्राम लक्ष्मण डोडिया की अहमदाबाद, गुजरात, १४ फरवरी को शशिधर मिश्रा, बेगूसराय, बिहार, २६ फरवरी को अरूण सावंत, बदलापुर महाराष्ट्र ११ अप्रेल को सोला रंगाराव, कृष्णा जिला आंधप्रदेश, २१ अप्रैल को विठ्ठल गीते, बीड जिला महाराष्ट्र और ३१ मई की दत्ता पाटिल, कोल्हापुर महाराष्ट्र की भी नृशंस हत्याएं कर दी गई थीं ।
उपरोक्त सभी हत्याआें के संबंध में संबंधित राज्य सरकारों को एक रटा-रटाया जवाब है, मामले की जांच चल रही है । हम शीघ्र की दोषी को पकड़ लेंगे । गौरतलब है कि जिन ८ आर.टी.आई. कार्यकर्ताआें की हत्या हुई है, उनमें से दो कार्यकर्ताआें सतीश शेटट्ी और विश्राम लक्ष्मण डोडिया ने तो संबंधित राज्य सरकारों से पुलिस सुरक्षा की भी मांग की थी, जिस पर सरकार ने ध्यान ही नहीं दिया ? नतीजा सबके सामने है । इसके अलावा पिछले ७ महीनों में देशभर में आर.टी.आई. कार्यकर्ताआें पर २० गंभीर प्राणघातक हमले भी हुए हैं ।
इन घटनाआें ने अक्टूबर २००५ से अस्तित्व में आए सूचना का अधिकार कानून के खतरनाक पक्ष को सामने ला खड़ा किया
है । इनमें यह संदेश भी जा रहा है कि भारत में कानून का इस्तेमाल सिर्फ शासन और प्रशासन जनता के खिलाफ कर सकता है । अगर जनता सूचना का अधिकार कानून के माध्यम से किसी को कटघरे में खड़ा करना चाहती है तो उसका हश्र भी देख लो । इस संदर्भ में भारत के मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह का कहना है, सूचना का अधिकार कानून का प्रभाव अब स्पष्ट रूप से दिखने लगा है, जो लोग सूचना को बाहर नहीं आने देना चाहते वे खतरनाक तरीके अपना रहे हैं ।
सवाल यह उठता है कि अंतत: सूचना कौन-कौन दबाना चाहते हैं ? इसमें सिर्फ वे गैर सरकारी व्यक्ति नहीं हैं, जो अपने विरूद्ध संभावित कार्यवाही से दुख की बात है कि आरटीआई कार्यकर्ताआें को सरकारी उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ रहा है । पिछले वर्ष से दिल्ली स्थित पब्लिक काज रिसर्च फाउंडेशन ने सूचना का अधिकार कार्यकर्ताआें के लिए एक राष्ट्रीय पुरस्कार देने की शुरूआत की है । इसके अंतर्गत प्रथम पुरस्कार प्राप्त् करने वाले आरटीआई कार्यकर्ता आसाम के अखिल गोगोई को भ्रष्टाचार के मामले सामने लाने की सजा के बतौर कई बार जेल भी जाना पड़ा था । देशभर में ऐसे अनगिनत मामले सामने आ रहे हैं ।
देश का शासन, प्रशासन, उद्योग वर्ग, बाहुबली, भू-माफिया आदि यह बात हजम ही नहीं कर पा रहे हैं कि उनसे कोई कुछ पूछ भी सकता है । प्रधानमंत्री के स्तर पर इस कानून मेंबदलाव की पैरवी होने से इन तत्वों के हौंसले एकाएक बढ़ते नजर आ रहे हैं । आजादी के ६ दशक बाद पहली बार जनता को पूछने का हक मिलने से यह काफी संतोष का अनुभव कर रही थी । परंतु इन हिंसक वारदातों के माध्यम से उनका मनोबल तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है । इस बीच उत्तरप्रदेश के सूचना आयुक्त ब्रजेश कुमार मिश्रा ने एक शिकायतकर्ता रामसेवक वर्मा के खिलाफ पुलिस जांच के आदेश दिए हैं। सूचना आयुक्त का मानना है कि यह व्यक्ति सरकारी अधिकारियों को परेशान करता है । अब इसके बाद और क्या कहा जा सकता है ?
इस संदर्भ में एक और घटना पर गौर करना आवश्यक है । मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले में जागृत आदिवासी दलित संगठन, महात्मा गांधी नरेगा, स्वास्थ्य सेवाआें में अनियमितताआें, राशन दुकानों से खाद्य वितरण जैसी समस्याआें के संबंध मेंकई बार आरटीआई के माध्यम से जानकारी लेकर और कई बार सीधे भी संघर्ष करता है । आदिवासियों का संघर्ष पूर्णत: शांतिपूर्ण होता है । इसलिए प्रशासन उनके विरूद्ध ज्यादा सख्त धाराएं लगाने में असमर्थ रहता है । आदिवासियों में बढ़ती जागरूकता को दबाने के लिए अंतत: प्रशासन ने अपने हथकंडे अपनाए ओर इस संगठन के प्रमुख कार्यकर्ता वालसिंह को लूट और लकड़ी की तस्करी के आरोप में गिरफ्तारी कर लिया । इस प्रकार भ्रष्टाचार का विरोध कराने वाला स्वयं ही अपराधी करार कर दिया गया । यही वास्तविक भारतीय शासनतंत्र है ।
यह लेख लिखते-लिखते ही समाचार मिला कि उत्तरप्रदेश के बहराइच जिले के कटघर गांव का रहने वाला विजय बहादुर उर्फ बब्बूसिंह जो लखनऊ में होमगार्ड में पदस्थ था, उसने अपने गांव में हो रहे निर्माण में बरती जा रही अनियमितताआें को लेकर आरटीआई के अंतर्गत आवेदन दिया था । इस बार जब वह गांव मेंआया तो संबंधित पक्षों ने २७ जुलाई को उसकी हत्या कर दी । इस तरह इस साल हत्याआें का यह आंकड़ा ९ तक पहुंच चुका है । पूणे महाराष्ट्र में मारे गए सतीश शेटट्ी ने १० वर्ष पूर्व पूणे मुम्बई एक्सप्रेस-वे परियोजना में हुए भूमि सौदों में भ्रष्टाचार उजागर किया था । वर्तमान में वे एक कंपनी द्वारा धोखाधड़ी करके अधिग्रहित की गई १८०० एकड़ भूमि से संबंधित दस्तावेजों को शासन से प्राप्त् करने में प्रयासरत थे । वही बब्बू सिंह इसके मुकाबले बहुत छोटे भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ करना चाहते थे । परंतु दोनों को अपनी जान से ही हाथ धोना पड़ा ।
आरटीआई कार्यकर्ता आम आदमी की तकलीफों को समझते हुए स्वयं को एक हथियार में परिवर्तित कर रहे हैं । सेना में संघर्ष के दौरान हुई मृत्यु को सर्वोच्च् बलिदान की संज्ञा दी जाती है । हम सबके लिए संघर्ष करने वालों के बलिदान को क्या इससे कमतर आंका जा सकता है ? मगर यह हम सबका दुर्भाग्य है कि इन कार्यकर्ताआें की असामाजिक मृत्यु अभी भी हत्या की श्रेणी तक ही पहुंची हैं । हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमारे ये कार्यकर्ता शहीद हैं और उन्होंने देशहित में सर्वोच्च् बलिदान दिया है ।
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मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

६ सामाजिक पर्यावरण

नई व्यवस्था की तलाश में मानवता
गंगाप्रसाद अग्रवाल
आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था के दुष्परिणाम अब सर चढ़कर बोलने लगे हैं। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि आज प्रत्येक आकलन का आधार आर्थिक हो गया है । आवश्यकता इस बात की है कि एक न्यायपूर्ण विश्व की स्थापना की ओर कदम बढ़ाया जाए । वैश्विक आर्थिक मंदी ने इस औद्योगिक शैतानी सभ्यता के सामने चुनौती खड़ी कर दी है कि संकटों से घिरे रहो या बुनियादी परिवर्तन अपनाआें। विगत तीन सौ सालों में पंुजीवाद पर संकट आते रहे हैं लेकिन तरह-तरह के हथकंडे अपनाकर रास्ता निकाल लिया गया परंतु वर्तमान संकट से निकलने के सब रास्ते बंद है । अब बुनियादी परितवर्तन के अलावा ओर कोई चारा नहीं बचा है। इस सभ्यता की जड़ में जाकर, उसका अंत समझना होगा क्योकि अर्थव्यवस्था मात्र एक पहलू है । अर्थशास्त्र का इतिहास परिस्थिति की समीक्षा करते हुए अपनी अवधारणा का विकास करता आया है । आज अर्थशास्त्र की अवधारणा को पुर्नव्याख्यायित करने का समय आ चुका है । अर्थशास्त्र के उद्देश्यों में से एक जनकल्याण भी है । इसका अर्थ है हर व्यक्ति की आमदनी और सुविधा में इजाफा होना । आज तो अधिकतर लोगों के साथ पक्षपात व अन्याय हो रहा है । धन, संपत्ति और आंकड़ों को अर्थशास्त्र का आधार माना जाता है । धन यानि प्रकृति की मदद से श्रम जोड़कर मानवी आवश्यकताआें का उत्पादन करना। इसमें पंचतत्व-जमीन, पानी, हवा, सूर्यप्रकाश, आकाश आदि की भूमिका हैं। मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट अपने श्रम की भूमिका अदा करते है । प्रकृति से धन पैदा होता है । धन का विनिमय करने के लिए मुद्रा जिसे संपत्ति कहते हैं, प्रचलन में आई। इसके बाद आंकड़ों का चलन चल पड़ा । शेयर बाजार में तो सिर्फ आंकड़े काम करते है न उसमें प्रकृति की कोई भूमिका है, न श्रम और उत्पादन का कोई स्थान । मिनिटों में कोई धनवान बनता है तो दूसरा दिवालिया । इन्हीं आंकड़ों ने वैश्विक मंदी का संकट पैदा किया । कहा जाता है कि भारत और चीन वैश्विक मंदी से निपट सकते हैं । इसका कारण है भारत और चीन की कृषकोंं की संख्या । वैसे वर्तमान अर्थव्यवस्था का आधार है किसानों की लूट । भारत के कुछ आंकड़ें इसकी गवाही दे सकते है । सेनगुप्त समिति की रिपोर्ट के अनुसार इस देश के ८३ करोड़ लोग ९ से २० रूपये प्रतिदिन में अपना जीवनयापन करते हैं । दूसरी और इस देश के एक उद्योगपति की आमदनी प्रति मिनिट चालीस लाख यानी दिन की ५ अरब साठ करोड़ रूपये है । क्या करता है यह उद्योगपति ? मात्र आंकड़ों का खेल चलता है । राष्ट्रीय आमदनी मापने का ढंग भी अन्यायकारी है । राष्ट्रीय आमदनी नापने के तीन पैमाने हैं- कृषि, उद्योग और सेवा। बाजार भाव से इनकी कीमत आंकी जाती है । बाजार में कृषि उपज की कीमत लागत दाम से कम होती है । वहीं उद्योग व व्यापारी लागत से कई गुना लाभ कमाते हैं । सेवा क्षेत्र में तो अति है । सेवा क्षेत्र में शिक्षा क्षेत्र भी है । जिसको आजकल मानव संसाधन विकास कहते हैं । इसी आर्थिक वर्ष में मंदी के बावजूद छठवें वेतन आयोग की बकाया करोड़ों रूपये की रकम बांटी गई । कृषि का राष्ट्रीय आय में योगदान घटता जा रहा है और सेवा क्षेत्र का बढ़ता जा रहा है । परिणाम स्पष्ट हैं । आर्थिक विषमता बढ़ती जा रही है । किसान खुदकुशी कर रहा है और उद्योगपति समुद्र में कई मंजिला महल खड़ा कर रहा है तथा पत्नी के जन्मदिन पर दो सौ करोड़ रूपये से अधिक कीमत का हवाई जहाज भेंट किया जा रहा है । इस बढ़ती विषमता को कौन और कितने दिन सहेगा ? इसीलिए नक्सलवादी बंदूक लेकर खड़े हो गए हैं । वे भारत के बीस प्रदेशों के २३१ जिलों में पहुंच चुके हैं । उनके सशस्त्र आंदोलन का दायरा निरंतर बढ़ता जा रहा है । जवाब में सरकार की ओर से भी हिंसा हो रही है । हिसंा-प्रतिहिंसा से हिंसा ही बढ़ेगी परंतु इससे आर्थिक विषमता का मसला हल नहीं होगा । चीन और भारत में वैश्विक आर्थिक मंदी के कम से कम असर और मंदी से उभरकर तेजी से विकास की ओर अग्रसर होने की बात भी गलत है । दोनों देशों में किसानों की संख्या सर्वाधिक है व इनकी लूट बढ़ती ही जा रही है । इस विनाश के बावजूद विकास की बात कही जा रही है । क्योंकि विकास का वर्तमान पैमाना ही अमानवीय है । उसमें मानव को स्थान नहीं । आज विकास को मानवीय चेहरा देने की जरूरत है । हमारे सत्ताधीश बार-बार जिस दूसरी हरित क्रांति की बात कह रहे हैं उसका मतलब साफ होता जा रहा है । किसानों को यंत्र की शिक्षा देने की बात कही जा रही है । बहुराष्ट्रीय कंपनियों को किसानों की मदद के लिए आगे बढ़ने को कहा जा रहा है । मतलब साफ है । खेती में ट्रेक्टर के हिसाब से कम स्थानहै । ऐसी छोटी जोतों में ट्रेक्टर चलाना संभव नहीं है । अत: जमीनों के टुकड़ों को इकट्ठा करना होगा इसलिए किसानों को विस्थापित करना होगा । किसान दर-दर भटकते दिखेंगे । आज तक विकास के नाम पर, बांध बनाने के कारण, चौड़ी सड़कें बनाने के कारण, उद्योग, सेज बनाने के कारण जो किसान विस्थापित हो चुके हैं, ऐसे लाखों किसान खानाबदोश होकर घूम रहे हैं । फसल कटाई, खलिहान के काम, अनाज उफनना आदि कामों के लिए हार्वेस्टर काम मे लाया जाएगा । इससे ऊगलियों पर गिनने जैसे प्रशिक्षित मजदूरों को कुछ समय के लिए काम मिलेगा । अधिकतर मजदूर बेरोजगार बनेंगा। अब तक तो किसान आत्महत्या करते थे । अब मजदूर भी उस कतार में खड़े हो सकते हैं । गांव के लोगों को नगरों में जाने के लिए कहा जा रहा है । वहां भी कुछ मजदूरों को कुछ दिनों तक ही काम मिल सकता है । दूसरी हरित क्रांति में कांट्रेक्ट फार्मिंग अपनानी होगी । बीज, खाद व कीटनाशक कंपनी से आएगा । दस साल में खेती की उपजाऊ शक्ति बड़े पैमाने पर घटने से खेती नाकारा हो जाएगी । इसके साथ ट्रेक्टर और हार्वेस्टर कम्बाईन्ड आने पर बैल बेकार हो जाएंगे । उनको कत्लखानों मे पहुंचाने का धंधा बड़े पैमाने पर शुरू हो जाएगा । इससे बचने का एक ही रास्ताहै । वर्तमान सभ्यता के स्थान पर वैकल्पिक सभ्यता का निर्माण शुरू करना होगा । इस हेतु सर्वप्रथम सजीव खेती, स्वास्थ्य स्वावलंबन और अपनाना होगा । इसी के माध्यम से कांट्रेक्ट फार्मिंग को गांव में आने से रोका जा सकता है । दूसरा कार्यक्रम है प्रादेशिक विषमता को ललकारने का । तेलगांना, विदर्भ, माराठावाड़ा, बुंदेलखंड, हरित उत्तरप्रदेश, सौराष्ट्र, गोरखालेंड, भोजपुर आदि एक दर्जन से अधिक प्रदेश आंदोलन की दिशा में बढ़ रहे हैं । यहां के निवासियों पर होने वाले अन्याय उपेक्षा और पक्षपात के खिलाफ होने वाले आंदोलन को सही दिशा देने की जरूरत है । यह मुद्दा भी आर्थिक विषमता का, अवसरों को कुचलने का व मुट्ठी भर लोगों को धनवान बनाने के लिए विकास के नाम पर अमानवीय शेषण का है । अर्थशास्त्र के क्षेत्र में वर्तमान व्यवस्था को बुनियादी तौर पर परिवर्तन की दिशा में मोड़ना होगा । उसमें तीन मुद्दे जोड़ना अनिवार्य हैं-पर्यावरण संतुलन बनाए रखने की नीति, नैतिकता को अपनाने का आग्रह और आर्थिक समता की दिशा में बढ़ने वले कदम । व्यवस्था में बुनियादी परिवर्तन लाना होगा । परंतु पहला कदम गांव से शुरू करना है । पिछड़े प्रदेशों का आंदोलन भी उबलता मुद्दा है । हिंद स्वराज्य शताब्दी वर्ष के अवसर पर इस दिशा में बढ़ना एक सामाजिक कदम होगा । ***
सन् २०२२ तक बाघों की संख्या दोगुनी करने का लक्ष्य
भारत समेत बाघों की मौजूदगी वाले १३ देशों ने वर्ष २०२२ तक तेजी से विलुप्त् होते इस वन्यजीव की संख्या दोगुनी करने के लिए प्रयास शुरू करने का फैसला किया है । बाघ संरक्षण के लिए पिछले दिनों बैंकाक में सम्पन्न पहले मंत्री स्तरीय सम्मेलन मंे तेरह देशों के मंत्रियों और १६ अंतरराष्ट्रीय दानदाता एजेंसियों ने भाग लिया । थाइलैंड के हुआ हिन में संपन्न हुए सम्मेलन मेें संयुक्त रूप से घोषणा की गई कि २०२२ तक दुनिया में बाघों की संख्या दोगुनी करने के प्रयास किए जाएंगे। एशियाई देशों के इस सम्मेलन में भारत अलावा बांग्लादेश, भूटान, कंबोडिया, चीन, भारत, लाओस, इंडोनेशिया, मलेशिया, म्यांमार, नेपाल, रूस, थाईलैंड और वियतनाम ने भाग लिया । सम्मेलन के बाद इन देशों के वरिष्ठ अधिकारियों की दो दिवसीय बैठक भी हुई । इसमें बाघों के संरक्षण और उनकी संख्या दोगुनी करने से जुड़े विभिन्न पहलुआें पर चर्चा की गई । बाघों पर पैदा हुए संकट से दुनिया के कई देश चिंतित है । इसको लेकर तरह-तरह के अभियान चलाएं जा रहें हैंलेकिन इसमें आशातित सफलता नहीं मिली है ।

बुधवार, 16 सितंबर 2009

८ सामाजिक पर्यावरण

गोरक्षा, एक सांस्कृतिक सवाल
डॉ. खुशालसिंह पुरोहित
आगामी २८ सितम्बर ०९ (विजयादशमी) से हरियाणा में कुरूक्षेत्र से विश्वमंडल गो-ग्राम यात्रा आरंभ होगी। यह यात्रा पूरे देश में करीब २०,००० कि.मी. का सफर तय करेगी। गोरक्षा और गो-संवर्धन के प्रयासों में लोक चेतना की दृष्टि से यह अब तक का सबसे बड़ा प्रयास होगा । गाय को राष्ट्र पशु घोषित कर गोवंश रक्षा हेतु केन्द्रीय कानून बनाने जैसी प्रभावी मांगों में समर्थन मेें यात्रा के दौरान हस्ताक्षर अभियान चलाया जायेगा । यह हस्ताक्षर युक्त मांगों का ज्ञापन २९ जनवरी २०१० को नई दिल्ली में राष्ट्रपति को सौंपा जायेगा । भारत कृषि प्रधान देश है । हमारी संस्कृति कृषि प्रधान है । विश्व में भारत ही ऐसा देश है जहां सदियों से करोड़ों लोग निरामिष भोजी रहे है । वैदिक काल से ही हमने गाय को अवधा माना और पारिवारिक सदस्य का दर्जा दिया । वेदों में गाय के लिये विश्वमाता संबोधन का प्रयोग है- गांवों विश्वस्य मातर: । गाय को गोमाता के रूप में पूज्य मानने में केवल धार्मिक आग्रह ही नहीं है, अपितु यह पशु और मानव संबंधों के मानवीय आधार की सर्वोत्कृष्ट परंपरा का प्रतीक है । गोवंश भारत की संस्कृति अस्मिता के प्रतीक है । महाभारत में यक्ष के प्रश्न अमृत क्या है ? के उत्तर में धर्मराज युधिष्ठिर कहते है, गाय का दूध अमृत है । भारतीय अर्थतंत्र का आधार कृषि है । पशुसंपदा भारतीय कृषि और किसान की बहुमूल्य निधि है । हमारी कृषि प्रणाली में हर स्तर पर पशु-पक्षी की महत्वपूर्ण भूमिका है । कृषि में खेत जोतने, बीज बोने से फसल आने तक और फिर कृषि उत्पादन को बाजार तक पहुँचाने के विविध कार्यो में पशु शक्ति का उपयोग होता है । देश में उपयोग आने वाली कुल ऊर्जा का एक-तिहाई भाग पशु एवं मानव शक्ति से प्राप्त् होता है । गाय और गोवंश की देश में कृषि, चिकित्सा-स्वास्थ्य, ऊर्जा, उद्योग और अर्थव्यवस्था के साथ ही पर्यावरण संतुलन में अपनी भूमिका है । गोवंश को सम्मान देने के लिए ही हमारे राष्ट्रीय चिन्ह में नंदी विद्यमान है । हमारे देश में लगभग ३४ करोड़ पशु धन है, जो विश्व में सर्वाधिक है । इसी प्रकार देश में १९ करोड़ टन अनाज उत्पादन के साथ ही ४०-५० करोड़ टन कृषि अवशेष निकलते है । अभी देश में अधिकांश ग्रामीण घरों में रसोई ऊर्जा के लिए लकड़ी, कृषि अवशेष अथवा गोबर के उपले भोजन पकाने के लिए उपयोग में आते है । पशुआें के गोबर कृषि अवशेष एवं मलमूत्र आदि जैव-पदार्थ से बायो-गैस बनायी जाती है । बायोगैस में मीथेन (५५-७० प्रतिशत), कार्बन-डाई-आक्साइड (३०-४५ प्रतिशत) तथा अल्प मात्रा में हाइड्रोजन सल्फाइड गैस होती है। बायोगैस संयंत्र से जो स्लरी निकलती है वह भी उत्तम खाद होती है। आधुनिक कृषि में हरित क्रांति के बाद रसायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग से खेतों में मृदा में पाये जाने वाले सूक्ष्म जीवाणुआें की संख्या अत्यंत कम हो गयी है । इससे कृषि पैदावार पर विपरीत असर पड़ रहा है, महंगी होती कृषि में लगातार घाटे के कारण पिछले एक दशक में देश में करीब २ लाख किसानों को आत्महत्या के लिये मजबूर होना पड़ा । इसलिए खेती में आज गाय और गोवंश के महत्व को फिर से स्थापित करने की आवश्यकता है । गाय कभी भी किसान के लिए अनुपयोगी नहीं है । गाय बूढ़ी हो जाये या दूध देना बंद कर दे तो भी गोबर और मूत्र के जरीये उसका आर्थिक स्वावलंबन बना रहता है । एक गाय प्रतिदिन लगभग १० कि.ग्रा. के हिसाब से वर्ष भर में ३६५० कि.ग्रा. गोबर देती है, जिससे करीब ३०,००० रूपये मूल्य की कंपोस्ट खाद बनायी जा सकती है । इसके साथ ही करीब २००० लीटर गोमूत्र उपलब्ध होता है, जिससे दवाईयाँ और कीटनाशक के रूप में १०,००० रूपये मिल सकते है । गोधृत में वायुमण्डल को शुद्ध करने की अलौकिक शक्ति है । देश में आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से गाय का अपना महत्वपूर्ण स्थान होने के बाद भी आज देशी गाय अपने अस्तित्व के संकट से जुझ रही है । भारतीय देशी गाय की सैकड़ों नस्लों में से केवल ३३ ही बची है, समय रहते नहीं चेते तो भारतीय गाय की सभी नस्ले समाप्त् हो जायेगी । इसलिए संकर प्रजनन पर रोक लगाकर भारतीय नस्लों की शुद्धता की रक्षा करनी होगी । हमारे देश में १९५१ में प्रति हजार व्यक्ति पीछे ४३० गोवंश था, जो २००१ में प्रति हजार ११० रह गया है। यदि गो-संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया तो २०११ में प्रति हजार २० का औसत हो जायेगा । भारत में पशुआें के वध का सवाल अर्थतंत्र के साथ ही संस्कृति मूल्यों और पर्यावरणीय संतुलन और हमारी जैव-विविधता से जुड़ा हुआ है । पशु-पक्षियों के प्रति आदर की भावना हमारी जातिय परम्पराआें और संस्कृति की शिक्षाआें में है । हम यह कैसे भूल सकते है कि हमारे पहले स्वतंत्रता संग्राम १८५७ की चिंगारी के पीछे गोहत्या विरोध की भावना मुख्य थी। देश में वर्तमान में मांस और चमड़े का व्यापार लगभग १५००० कराे़ड़ रूपये का है । केन्द्र सरकार की ११वीं पंचवर्षीय योजना में ५५० बड़ी वधशालाआें में उत्पन्न एवं आधुनिकीकरण पर ३५०० करोड़ रूपये खर्च करने की योजना है । इधर देश में गोवंश एवं पशुआें की रक्षा के लिए हमारे यहां कई कानून बने है । १९६० में भारत सरकार ने पशुकूरता निवारण अधिनियम बनाया, जिसमें पशुआें के सहजतापूर्वक परिवहन के लिए नियम निर्धारित किये गये, इसके साथ ही वर्ष २००१ में पशुवध शाला निरीक्षण एवं नियंत्रण संबंधी नियम बनाये गये । केन्द्र के साथ ही गोवंश के वध एवं अवैध परिवहन को रोकने में राजस्थान, म.प्र., उ.प्र., गुजरात एवं जम्मू कश्मीर की सरकारों ने कठोर कानुन बनाये है । इन कानुनों का व्यवहारिक रूप में पालन सुनिश्चित करना पुलिस के लिए बड़ी चुनौति है । कानून व्यवस्था और अपराधों से जुझती पुलिस के लिये पशुआें की सुरक्षा के लिए समय का संकट बना रहता है । इसलिए पुलिस वनरक्षक एवं अन्य बलांें के समान पशुधन की रक्षा के लिए विशेष बल के गठन की मांग गो-प्रेमी संगठनों ने रखी है । भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्वपूर्ण स्थान रहा है । सन् १९४७ में सकल घरेलु उत्पादन में कृषि का योगदान ६५ प्रतिशत था । सन् २००५ में यह घटकर २० प्रतिशत रह गया, वर्तमान में ११ वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक २०१०-११ में इसके १५.३ प्रतिशत और सन् २०२० में ६ प्रतिशत कर देने का लक्ष्य रख कर योजनाएं बनायी जा रही है । इस समय देश में किसानों के पास जमीन का औसत २ एकड़ है, जो इस सदी के अंत तक घटकर ०.०१ एकड़ रह जायेगा । ऐसे में ट्रेक्टर से खेती कैसे हो सकती है । छोटे किसान की खेती मेंे आज जितनी लागत है, उतनी कमाई नहीं हे । इसलिए किसान खेती से बाहर होता है । देश में हर चौथा आदमी खेत मजदूर है, जिसे खेती से मुश्किल से ५-६महिने ही काम मिल पाता है । इसके लिए ग्रामीणों के शहरों में पलायन को रोकने हेतु कृषि आधारित ग्रामीण हस्ताशिल्प को प्रोत्साहन देना होगा । जैविक कृषि को बढ़ावा देने और गौमूत्र और गोबर के उत्पादों की मांग बढ़े इस हेतु प्रयत्न करने होगें । दश्ेा में चरागाह की भूमि पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हो रहा है । इसे रोकने के लिए प्रभावी पहल की आवश्यकता है । इसके अतिरिक्त ग्रामीणोंमें पशुआें की सुरक्षा के प्रति जागरूक एवं पशुपालकों को चारा/पानी के लिए अनुदान की व्यवस्था होनी चाहिये। गोवध बंदी का सवाल भी अनेक वर्षो से लगातार उठाया जाता है, लेकिन सरकार शाब्दिक चिंता से आगे नहीं बढ़ पायी, जबकि सभी राजनीतिक दल गोवध बंदी के पक्ष में हैं तो अहिंसा, दया और करूणा जिस राष्ट्र के राष्ट्रीय आदर्श हो वहां गोवध होना राष्ट्रीय कलंक का विषय है । राष्ट्र पिता महात्मा गांधी ने आजादी के पूर्व ही गोवध पर अपनी मार्मिक वेदना व्यक्त करते हुए कहा था हिन्दुस्तान मेंे गाय ही मनुष्य की सच्ची साथी एवं सबसे बड़ा आधार है, वह हिन्दुस्तान की कामधेनु है । यह सिर्फ दूध ही नहीं देती, बल्कि सारी खेती का आधार स्तंभ है गाय हमारी अहिंसा प्रधान संस्कृति का प्रतीक है । गाय नष्ट हुई तो हमारी सभ्यता नष्ट हो जायेगी । गोहत्या जब तक होती है, तब तक मुझे लगता है मेरी खुद की हत्या हो रही है । गोवध बंदी का काम अब तक नहीं हो पाया,आशा है कि अब बापू के विचारों के अनुरूप गोवध बंदी के लिए सरकार और जनमत की ओर से समन्वय कारी पहल होगी ।**
एंडरसन के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट
भोपाल की अदालत ने पिछले माह यूनियन कार्बाइड के प्रमुख वारेन एंडरसन के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया है । अदालत ने यह वारंट भोपाल गैस पीड़ित संघर्ष सहयोग समिति के एक आवेदन पर जारी किया है । ज्ञातव्य है कि इससे पूर्व १९९२ में भी एंडरसन के खिलाफ वारंट जारी हो चुका है पर, भारत व अमेरिका के बीच प्रत्यपर्ण संधि १९९९ में हुई है जिसके बाद अपराधियों का आदान प्रदान किया जा सकता है । इस कांड से संबंधित कई मामलों की सुनवाई भोपाल से लेकर सर्वोच्च् अदालत में अभी तक चल रही है ।

सोमवार, 11 फ़रवरी 2008

८ सामाजिक पर्यावरण

दूध-दही की नदियों वाले देश में बिकता पानी
जगदीश प्रसाद शर्मा
कम आबादी के कारण प्राचीन भारत वन बाहुल्य था । भारतीय संस्कृति में वनस्पति को सजीव माना है, जिस कारण हमारी संस्कृति में वृक्षों और वनों को संरक्षण दिया गया है । इसीलिए प्राचीन भारत देश का ५० प्रतिशत से अधिक भू-भाग हमेशा वनाच्छादित रहा है । हरे-भरे वनों के कारण ही इस देश में भरपूर वर्षा होती थी, बारहमासी नदी-नाले और झरने पूरे देश में मौजूद थे, भू-जल का कोई अभाव नहीं था, जिस कारण भरपूर कृषि उत्पादन होता था। कृषि एवं वन क्षेत्रों में पशुआें के लिए पर्याप्त् चारा उपलब्ध होने के कारण दूध-दही का भी भरपूर उत्पादन होता था । शायद यही कारण था कि प्राचीन भारत में दूध-दही की नदियां बहने की कहावत चरितार्थ हुई । आज से ५० साल पूर्व तक भी खेती को ही उत्तम कर्म माना जाता था। हरियाणा और पंजाब जैसे कृषि प्रधान प्रांतों में वन भूमि नहीं के बराबर है, क्योंकि यहां बहुत पहले वनों का सफाया करके वन भूमि को कृषि भूमि में बदल लिया गया है । आज जिन प्रांतों में वन बचे हैं, वहां बढ़ती आबादी एवं निजी तथा राजस्व भूमि की अनुपलब्धता के कारण वन भूमि पर लोगों की गिद्धदृष्टि हमेशा बनी रहती है । परिवार बढ़ने के कारण अब प्राय: प्रति परिवार (पति, पत्नि और उसके बच्च्े) आधा हेक्टेयर भूमि भी नहीं रही है। ऐसे में गरीब परिवारों की गुजर-बसर के लिये वन भूमि पर किये गये अतिक्रमण का समय-समय पर व्यवस्थापन करना एक मानवीय आवश्यकता महसूस की जाती रही है । अधिकतर लोगों की धारणा है कि शायद इसीलिए ``अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, २००६'' दिनांक ३१ दिसम्बर २००७ से प्रभावशील हुआ है । वर्तमान में देश का लगभग २३ प्रतिशत भू-भाग ही संरक्षित एवं आरक्षित वन घोषित है, जिसका लगभग दो तिहाई भाग ही वन आच्छादित है, जबकि पर्यावरण सुरक्षा हेतु राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार देश का ३३ प्रतिशत भू-भाग वन आच्छादित होना चाहिए । उपरोक्त परिस्थितियों में यह लक्ष्य शायद ही कभी प्राप्त् हो सके । यह सभी जानते हैं कि वनों के नष्ट होने के कारण हमारे वातावरण में परिवर्तन आ रहा है । वर्षा कम हो गई है और अनियमित भी हो गई है । हमारे बारहमासी जल स्त्रोत सूख रहे हैं । सर्दी के दिनों में आने वाली बरसात नहीं के बराबर हो गई है, जिस कारण जहां पहले रबी की फसल थोड़ी सी सिंचाई से हो जाती थी, अब उनमें ज्यादा सिंचाई करनी पड़ती है । इस तरह बरसात की कमी तथा भू- जल का अनियंत्रित एवं अंधाधुंध दोहन होने से भू-जल स्तर गिरता जा रहा है । देश के हर शहर में प्रति लीटर के माप से प्लास्टिक की बोतलों में पीने का पानी बिक रहा है । हरियाणा के जिन गांवो में बच्च्े कभी कुआे मंे छलांग लगाकर नहाते थे, आज वहां पीने के पानी का गंभीर संकट पैदा होने के कारण गांव खाली करने का भय लोगों को सता रहा है, क्योंकि वहां का भू-जल स्तर ४०० से ५०० फुट नीचे खिसक गया है और पानी की उपलब्ध मात्रा भी कम हो गयी है, जिस कारण रहट, ढेकली और चरस जैसे सिंचाई के पुराने साधनों का स्थान अब सबमर्सिबल पम्पस ने ले लिया है । अगर कुछ दिनों के लिए इन गांवों में बिजली नहीं आये तो फसलों की सिंचाई करना तो दूर रहा, पीने का पानी भी उपलब्ध नहीं हो सकेगा, क्योंकि बिजली के बिना सबमर्सिबल पम्पस नहीं चल पायेंगे । यह हैरानी की बात है कि जहां गांवों में दूध बेचना पुत्र बेचने के समान मानते थे, बिना पैसे लिए एक-दूसरे को दूध दे देते थे और राहगीरों हेतु पीने के पानी की धमार्थ प्याऊ लगाते थे, अब वहां भी ऊंटगाड़ियों और बैलगाड़ियों से पीने का पानी बिक रहा है । इसके आगे क्या होगा, भगवान ही जाने । वन वास्तव में धरती माता के केश हैं, ठीक किसी महिला के केश की तरह । वनों के नष्ट होने से बरसात का पानी जमीन में पहले की तरह पर्याप्त् मात्रा में नहीं समा पाता और ऊपरी सतह को ही गीला करते हुए बहकर चला जाता है, ठीक उसी तरह जैसे किसी गंजे व्यक्ति के सिर पर डाला हुआ सारा पानी सिर को गीला करते हुए फिसल जाता है, जबकि केश वाले सिर में कुछ पानी रूक जाता है और केश जितने घने होते हैं, सिर में उतना ही ज्यादा पानी रूकता है । यही कारण है कि घने वनों से बाहरमासी झरनो, नालों और नदियों का उद्गम होता है और इसीलिये विख्यात पर्यावरणविद् सुन्दरलाल बहुगुणा ने वनों को जिन्दा जलाशय की उपमा दी है । खेती करने हेतु जब से ट्रेक्टरों ने बैलों का स्थान लिया है, तब से निजी कृषि भूमि में भी वृक्षों की संख्या काफी घट गई है । इस तरह धरती पर वृक्षों के अभाव में एक तो वर्षा कम हो रही है, दूसरा भूमि में पानी कम मात्रा में समा रहा है तथा तीसरा फसलों की सिंचाई के लिए मशीनों से अधिक मात्रा में भू-जल निकाला जा रहा है, जिस कारण भू-जल स्तर गिरता जा रहा है और झरने तथा नदी-नाले सूखते जा रहे हैं । मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र के संबंध में कहावत रही है, ``मालवा की धरती, गहन गंभीर । पग-पग रोटी, डग-डग नीर ।।'' वनों के घटते क्षेत्रफल एवं घनत्व के कारण पैदा हुए पानी के अभाव में अब यह कहावत झूठी पड़ चुकी है और भगवान महाकाल एवं राजा विक्रमादित्य की पवित्र नगरी उज्जैन से गुजरने वाली कभी बारहमासी रही क्षिप्रा नदी भी सूख गई है । इस कारण अब उज्जैन में कुंभ मेले के आयोजन के समय क्षिप्रा नदी में श्रद्धालुआे के स्नान हेतु मानव निर्मित जलाशयों से पानी छोड़ने की व्यवस्था करनी पड़ती है । मध्यप्रदेश का उज्जैन जिला कृषि प्रधान होने के कारण हरियाणा और पंजाब की तरह यहां के वन भी बढ़ती आबादी के कारण कई वर्ष पहले ही कट चुके हैं और इस जिले में आज केवल ०.५१ प्रतिशत वन भूमि है और वह भी वृक्षाच्छादित नहीं है । आज से ६०-७० वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश में वन बाहुल्य रहे बड़वानी जिले में जो नाले बारहमासी थे, वे अब वनों के घटने से सूख चुके हैं तथा वर्षा ऋतु में कभी-कभी ही बहते हैं । इस कारण पानी के अभाव में कृषि उत्पादन घट गया है तथा वन आवरण हटने से भूक्षरण के कारण मिट्टी के बह जाने से वन विहीन पहाड़ियां अब वृक्षारोपण के लायक भी नहीं रह गई है अर्थात सारे सोने के अंडे एक साथ पाने के लिये मुर्गी का पेट काट डाला, जिस कारण अब न तो मुर्गी रही और न ही सोने का अंडा । मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ प्रांतों के खरगोन, बड़वानी, मंडला शहडोल, बालाघाट, सरगुजा, बस्तर आदि वन बाहुल्य जिलों में वनों के घटने के कारण अनेक झरनों और नदी-नालों के सूखने की वहां के वनवासियों के मुख से आंखों देखी बातें सुनने से उक्त तथ्यों की पुष्टि भी होती है । यही हाल देश के अन्य क्षेत्रों में भी है । अगर वनों के घटने एवं नष्ट होने का सिलसिला ऐसे ही जारी रहा तो देश के वनों से निकलने वाली सभी नदियों सूख जाएंगी । पवित्र मानी जाने वाली नदियों में से मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी नर्मदा नदी, जिसका उद्गम धार्मिक स्थल अमरकंटक की साल वनों से आच्छादित पहाड़ियों से होता है भी एक दिन सूख जाएगी, जिसके फलस्वरूप इस नदी का पानी पीने वाले कई शहर और गांव प्यास से तड़पने लगेंगे, सिंचाई के अभाव में अन्न उत्पादन में गिरावट आयेगी, पन-बिजली उत्पादन बंद हो जायेगा, जिससे मध्यप्रदेश में आर्थिक विकास की गति अवरूद्ध होगी । भारत वर्ष के मेघालय प्रांत में स्थित दुनिया के सबसे अधिक वर्षा वाले क्षेत्र चेरापंूजी के निवासी वनों की अंधाधुंध कटाई के कारण पीने के पानी के लिए तरस रहे हैं । इस क्षेत्र के लोगों की प्यास बुझाने के लिए अब बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण कर पुन: वन लगाने और इजराइली तकनीक से वर्षा के पानी को भंडारित करने के प्रयास प्रारंभ कर दिए गए है । वर्ष २००७ में नोबल शांति पुरस्कार प्राप्त् करने वाली संस्था यू.एन.आई. पी.सी.सी. (यूनाइटेड नेशन्स इंटर गवर्नमेन्टल पैनल ऑफ क्लाइमेट चेंज) के अध्यक्ष एवं भारतीय वैज्ञानिक डॉ. राजेन्द्र पचौरी का मानना है कि ``ग्लोबल वार्मिंग'' के कारण दुनिया का तापमान बढ़ जाने से वातावरण में बड़ा परिवर्तन आयेगा । बर्फ के पहाड़ों पर स्थित ग्लेशियर्स से निकलने वाली बाहरमासी सतलुज, गंगा और यमुना जैसी नदियां सूख जाएंगी और इन नदियों पर बने बांध सूखने से उत्तर भारत में नहरों द्वारा सिंचाई व्यवस्था और शहरों की पेयजल व्यवस्था ठप्प हो जायेगी तथा पन-बिजली उत्पादन बंद होने से देश में आर्थिक विकास की गति अवरूद्ध होगी । बर्फ पिघलने से समुद्रों का जल स्तर बढ़ेगा, जिससे समुद्रों के किनारे बसे मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता और विशाखापट्टनम जैसे कई शहर जलमग्न हो जाएंगे । उल्लेखनीय है कि वातावरण में अन्य गैसों के साथ-साथ मुख्य रूप से कार्बन डाय आक्साइड गैस बढ़ने से ग्रीन हाउस प्रभाव के कारण ``ग्लोबल वार्मिंग'' होती है । कार्बन डाय आक्साइड गैस कम करने में वनों का सबसे बड़ा योगदान रहता है । इसीलिये बर्फीले पहाड़ों पर स्थित ग्लेशियर्स से निकलने वाली बारहमासी नदियों के अस्तित्व और समुद्रतटीय क्षेत्रों को जल मग्न होने से बचाने के लिए पृथ्वी पर वनों का बना रहना अति आवश्यक है। जिन वन बाहुल्य क्षेत्रों में गर्मियों में कभी पंखे चलाने की आवश्यकता नहीं होती थी, आज वहां वनों के कटने से तापमान इतना बढ़ गया है कि उन क्षेत्रों में एयर कूलर्स और एयर कंडिशनर्स चल रहे हैं । धरती से अनाज पैदा करने के लिए पानी भी आवश्यक है । इसीलिये गुरू ग्रन्थ साहिब में धरती को बड़ी माता और पानी को पिता की उपाधि दी गई है। अगर थोड़ी देर के लिये यह मान लिया जाए कि देश को भुखमरी से बचाने के लिये पूरे जंगल की जमीन गरीबों में खेती करने के लिए बांट दी जाए तो क्या देश में भुखमरी और गरीबी दूर हो सकेगी । वनों के कटने से बारहमासी झरनें तथा नदी-नाले, चाहे उनका उद्गम वनों से हो या फिर ग्लेशियर से हो, सूख जाएंगे, भू-जल स्तर धीरे-धीरे नीचे खिसक जायेगा तथा वर्षा और जलवायु भी अनियमित हो जायेंगी, सिंचाई के लिए बिजली उपलब्ध नहीं होगी, जिस कारण देश में जितना अनाज आज पैदा होता है, उतना भी पैदा नहीं हो पायेगा । इससे स्पष्ट है कि वन भूमि को कृषि भूमि में बदलने से भुखमरी मिटेगी नहीं, बल्कि बढ़ेगी । न केवल भुखमरी बढ़ेगी नदी-नालों के सूख जाने और भू-जल स्तर में भारी गिरावट आने और बिजली उपलब्ध न होने से पीने के पानी का भी उपलब्ध नहीं हो सकेगा, जिस कारण भविष्य में शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में भूख से होने वाली मौतों के साथ-साथ प्यास से भी मौतें होने लगेंगी । समुद्रों का जल स्तर बढ़ने से तटीय शहरों की आबादी जलमग्न होकर खत्म हो जायेगी । जब ऐसी स्थिति है तो क्या वनों को अच्छी तरह समझ लिया है, जिस कारण वहां आबादी पर सफल एवं प्रभावी नियंत्रण के साथ-साथ वृक्षों और वनों को इतनी सुरक्षा प्रदान की गई है कि पशु अवरोधक खन्ती तथा चेनलिंग या कांटेदार तार की बागड़ के बिना ही सफलतापूर्वक वृक्षारोपण किए जा रहे हैं, जबकि भारत में आबादी और पशु संख्या के दबाव के कारण अनेक तरीके अपनाने के बाद भी वृक्षारोपणों को सफल बनाना एक टेढ़ी खीर बनी हुई है । जब चीन ऐसा कर सकता है तो सारे जहां से अच्छा हमारा हिन्दुस्तान क्यों नहीं कर सकता ? कमी कहां है ? ऐसी स्थिति में देश की इस समस्या का समाधान क्या है ? अगर इस ओर गहराई से सोच-विचार किया जाए तो हमें कहीं दूर झाकने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि अपने पड़ौस में ही इसका समाधान साफ नजर आ रहा है । जिस तरह चीन ने इस समस्या पर काबू पाया है, दुनिया के दूसरे सबसे अधिक आबादी वाले देश भारत वर्ष को भी इसी रास्ते पर चलना होगा तथा धर्म, जाति सम्प्रदाय आदि को भुलाकर केवल राष्ट्र धर्म को सर्वोपरि रखते हुए आबादी नियंत्रण और वन क्षेत्र बढ़ाने हेतु कानून बनाना होगा । अन्यथा जिस तरह आज की पीढ़ी के लिए यह आश्चर्य है कि प्राचीन भारत में दूध-दही की नदियां कैसे बहती थी, उसी तरह आने वाली पीढ़ियां भी यह विश्वास नहीं कर पाएंगी कि इस देश की धरती पर कभी पानी की नदियां भी बहती थी । आज तो पानी बिक रहा है, लेकिन भविष्य में खरीदने के लिए रूपए लेकर घूमते रहेंगे तो पीने के लिए भी पानी नहीं मिलेगा । आजकल नगर पालका और नगर निगम के नलों पर पीने के पानी के लिए झगड़ों में मौतें होना आम बात हो गई है । नवम्बर २००७ में मध्यप्रदेश के बुन्देलखण्ड के किसानों ने हथियारों से लैस होकर उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती महोबा जिले में स्थित उर्मिल बाँध से पानी लूट लिया । इन सब परिस्थितियों को देखा जाए तो शायद यह सच ही है कि अगर इस धरती पर तीसरा विश्वयुद्ध हुआ तो वह पानी के लिए ही लड़ा जायेगा । कुछ अमीर और प्रभावशील लोग तो जिंदा रहने के लिए शायद किसी समृद्ध देश में चले जायें, लेकिन गरीबों और आम जनता को तो उक्त परिस्थितियों में लकड़ी के अभाव में यही दफन होना पड़ेगा । इसलिए सकारात्मक परिवर्तन लाने और इस देश की धरती को प्राचीन भारत की तरह पुन: खुशहाली से जीने लायक बनाने के लिए जनता को ही जल, जंगल और जमीन को बचाने की पहल करनी होगी । अत: यह पहल आज से ही क्यों न प्रारंभ कर दें और फिर से इस भारत देश को सबसे अच्छा देश बना दें । ***

गुरुवार, 31 मई 2007

आदिवासियों की अस्मिता का प्रश्न

सामाजिक पर्यावरण

आदिवासियों की अस्मिता का प्रश्न

शंकर तड़वाल

आदिवासियों के कल्याण को लेकर आजकल बड़ी-बड़ी बातें की जा रही हैं। इसी के साथ यह भी प्रयत्न किया जा रहा है कि उन्हें मुख्यधारा में लाने के नाम पर उन्हें उनकी संस्कृति से ही वंचित कर दिया जाए। आदिवासी समाज धर्म के नाम पर अंधविश्वास फैलाने वाले धर्म गुरुआें की जकड़ में जा रहा है। आदिवासियों के आत्मसम्मान, स्वयंनिर्णय, स्वावलम्बन, मानवप्रतिष्ठा, संस्कृति एवं मानवीय मूल्यों का क्षरण हो रहा है। आजादी मिलने के बाद पूंजीवादी विकास मॉडल के तहत् शहर के चंद लोगों के लिए जल, जंगल, जमीन व खनिज स्त्रोतों को सीमित लोगों के लिए लुटाया जा रहा है।

हम भारत के लोग ...... भारत को एक संपूर्ण, प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, सामाजिक, आर्थित और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता जैसे उसूलों को सही रूप से लागू करने में देश की सरकारें नाकामयाब रही हैं। व्यक्ति की गरिमा और बंधुता बढ़ाने के भारतीय संविधान के आश्वासन के मुताबिक देश नहीं चल रहा है। आदिवासी अपने आप को गुलाम महसूस करते हैं। उनके साथ अपने ही देश में नस्लभेद और भेदभाव का बर्ताव किया जा रहा है। देश में दस करोड़ आदिवासियों का अपना कोई संगठन नहीं है।

भारत के लोगों को बहुत कम जानकारी है कि आखिरकार ये आदिवासी लोग कौन हैं ? सन् १८९१ की जनगणना रिपोर्ट में जनसंख्या आयुक्त जे.ए.बेन्स ने आदिवासयिों का कृषक व चरवाहा जनजाति के नाम से पृथक उप-शीर्षक बनाया था। सन् १९०१ की जनसंख्या रिपोर्ट में उन्हें प्रकृतिवादी कहा गया। सन् १९११ में उन्हें जनजातीय प्रकृतिवादी अथवा जनजातीय धर्म को मानने वाले लोग कहा गया। सन् १९२१ में उन्हें पहाड़ी व वन्य जनजाति नाम दिया गया। सन् १९३१ में उन्हें आदिम जनजातीय कहा गया। सन् १९३१ तक जनगणना रिपोर्ट में भी प्रकृतिपूजक एवं एनिमिस्ट धर्म लिखा गया था।

जनजाति शब्द का अर्थ व्युत्पत्ति शास्त्र के अनुसार अंग्रेजी शब्द ट्राइब त्रिभुज शब्द से माना जाता है। जिसका अर्थ तीन अंग है। यानी राजा, रक्षा तथा हस्त-कलाकार। किसी निश्चित भू-क्षेत्र विशेष पर किसी जनजाति का स्थायी निवास उसका भौगोलिक परिचय देता था। मानव शास्त्रियों तथा समाजशास्त्रियों ने ऐसे किसी निश्चित सीमा के अन्दर निवास करने वाले लोगों की प्रजाति को जनजाति माना है। किसी भी समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के लिए निम्नलिखित मापदण्ड निश्चित किये गये हैं।

१. विशिष्ठ संस्कृति जिसमें जनजाति जीवनयापन का चित्रण जैसे भाषा, परम्पराएं, धार्मिक विश्वास, कला व दस्तकारी आदि शामिल हैं।

२. किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र पर पारम्परिक अधिकार।

३. व्यावसायिक ढांचा, आर्थिक व्यवस्था आदि को दर्शाने वाली आदिकालीन विशेषता।

४. शैक्षिक तकनीकी व आर्थिक विकास की कमी।

आदिवासी समाज के धर्म के मामले में जानकर आपको ताज्जुब होगा। भारत के संविधान ने आदिवासियों के धर्म संबंधी मामलों में बहुत ही संवैदनशीलता दिखाई हैं। आदिवासियों के धर्म को लेकर कोई कठोर कानूनी या संवैधानिक प्रावधान नहीं हैं। वैसे हर नागरिक को संविधान की धारा २५ के तहत् अपना धर्म मानने व पालन करने की स्वतंत्रता है। संविधान की धारा २९ में संस्कृति को बनाये रखने की स्वतंत्रता भी है। आदिवासियों द्वारा धर्म अपनाने में कोई कठोर प्रतिबंध नहीं है। आदिवासी हिन्दु, सिक्ख, बौद्ध, ईसाई, मुसलमान में भी हैं तथा एक मायने में वह स्वतंत्र जनजातीय धर्म का भी है। अर्थात वह चाहे तो हिन्दु, सिक्ख, बौद्ध, ईसाई, मुसलमान भी नहीं है। देश की सर्वोच्च न्यायालय भी आदिवासियों को हिन्दु नहीं मानती। शादी, विवाह के मामले में आदिवासियों को किसी अन्य धर्म के कानून के सहारे की जरूरत नहीं है। इस हेतु स्वतंत्र आदिवासी कानून संविधान में विद्यमान हैं।

आदिवासी बार-बार दुनिया के वृहद समाज वालों को कहता है कि प्रकृति ही परमेश्वर है। आज दुनिया में जितने भी अनाज के बीज जो प्रकृति ने बनाये थे, वह विलुप्त हो रहे हैं। चांवल, उड़द, बाजरा, मक्का जैसे अनेक अन्न तथा अन्य सब्जियों एवं फसलों के परम्परागत बीजों की हजारों प्रजातियां हमेशा-हमेशा के लिए विलुप्त कर दी गई हैं। उधर जड़ी बूटियों के पौधों की प्रजातिया भी धरती से विलुप्त हो रही हैं। समुद्र की मछलियों से लेकर पृथ्वी पर से चिड़िया व जंगली जानवरों की जातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। इधर धरती के हमारे पेट्रोलियम जैसे प्राकृतिक संसाधन सात पीढ़ियों के पहले ही खत्म हो जाने वाले हैं। कारखानों एवं वाहनों के धुआें के बढ़ोत्तरी के फलस्वरूप ओजोन परत के अप-क्षरण से माता आग को गोला बनने की ओर अग्रसर है। धरती पर कूलर का काम रकने वाले उत्तरी ध्रुव पर लाखों वर्षो से जमी हुई बर्फ पिघलने की गति प्रतिवर्ष तेज हो रही है।

इस संबंध में आज एक वैचारिक आंदोलन की आवश्यकता है। आंदोलन केवल आदिवासियों के अस्तित्व टिकाने का नहीं बल्कि पूरी मानव सभ्यता के अस्तित्व को बचाने का हैं देश-देश, धर्म-धर्म, जात-जात, वर्ग-वर्ग के टकराव के स्थान पर समन्वय बिठाने एवं संघर्ष टालने के लिए यह आंदोलन आवश्यक है। देश में विषम परिस्थितियां निर्मित हो रही हैं। देश दो भागों में बटता जा रहा है। पहला अमीर भारत एवं दूसरा रोजगारहीन, आवासहीन, कुपोषित, सिकलसेल एनीमिया, कारखाना जन्य सिलिकोसिस जैसी बीमारियों से ग्रस्त भारत । स्वास्थ्य सुविधाविहीन, शिक्षाविहीन, गांव, वतन, परिवार से विस्थापित नारकीय जीवन वालों एवं आत्महत्या करने वालों का भारत।

आदिवासियों पर अत्याचार व शोषण की सभी हदें पार हो गई हैं। लोक कल्याणकारी राज्य होने के बावजूद भी बड़ी-बड़ी घटनाआें के बारे में कोई भी आदिवासियों से पूछने को तैयार नहीं है। फिर यदि असंतोष के स्वर उठने लगते हैं तो उनकी आवाज को अनसुनी करने के लिए उन्हें नक्सली गतिविधि, जातिवादी आंदोलन, आतंकवादी या माहौल बिगाड़ने का षडयंत्र करार दिया जाता है।

हम मानते हैं कि ईसाई धर्म प्रचारकों ने भी आदिवासियों की संस्कृति में छेड़खानी की है। आदिवासियों की पहचान को मिटाने के कार्य भी जरूर हुए हैं। कुछ आदिवासी ईसाई धर्म में धर्मान्तरिक भी हुए हैं। परंतु शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनके सराहनीय कार्य हैं। किन्तु आदिवासियों को हिन्दु हैं कह कर ब्राह्मणवादी लोग उनसे जबरन ऊपर ब्राह्मणी संस्कृति का अनुसरण कराते हैं। इस कार्य को धर्मान्तरण की श्रेणी में क्यों नहीं लिया जाता ? आदिवासियों के बीच संस्कार या धार्मिक कार्यक्रम बताकर ब्राह्मणवादी लोगों द्वारा मंदिर निर्माण, मूर्तियों की स्थापना एवं देवी देवताआें के फोटो बांटे जाते हैं। आदिवासियों के पुराने परंपरागत देव स्थलों, देवी-देवताआें को नजर अंदाज किया या भुलाया जाता है। हिन्दु एवं ईसाई धर्म की आपसी धार्मिक प्रतिस्पर्धा में आदिवासियों को बुरी तरह से घसीटा जा रहा है। उसकी कीमत आज आम आदिवासी को चुकानी पड़ रही हैं। आदिवासी समाज धार्मिक राजनीति से भी आहत हो रहा है।

आदिवासी समाज को अपने निजी जीवनयापन के संसाधन जैसे जल, जंगल, जमीन और खनिज सम्पदा से बेदखल किया जा रहा है। वन विधेयक २००६ में भी आदिवासियों की आकांक्षाआें की आपूर्ति होने की गुंजाईश नहीं है। क्योंकि इसमें जंगल पर लोगों के सामूहिक (सामाजिक) अधिकार का कोई प्रावधान नहीं है। विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र के कानून द्वारा सामूहिक स्त्रोत जैसे जल, जंगल, जमीन और खनिज सम्पदा सरकार द्वारा ही सीमित विशिष्ट व्यक्तियों को उपलब्ध करवाई जा रही है। बड़े बांध, कारखाने, रेल्वे, हाइवे, रास्ते अभयारण्य, फिल्म शूटिंग एरिया ज्यादातर आदिवासी क्षेत्रों में ही स्थित हैं। इससे आदिवासियों में बेरोजगारी की समस्या खड़ी हुई हैं। जल, जंगल, जमीन व खजिन सम्पदा श्रमजीवियों को मुहैया कराये बिना और सुरक्षा प्रदान किये बिना इस समस्या का हल नहीं हो सकता है। भारत में ६९७ आदिवासी जातियों में से ५२ जातियां विलुप्त हो गई हैं। आदिवासी संस्कृति, इतिहास, जीवन मूल्य, कला और ज्ञान सिर्फ आदिवासी का ही नहीं बल्कि सारी मानव जाति की विरासत है। इसलिए आदिवासी पहचान बनाये रखना जरूरी है। आदिवासी क्षेत्र में ५वीं अनुसूचित की व्यवस्था संविधान में की हैं किंतु इसे आजादी से आज तक अमल में नहीं लाया गया। आदिवासी महिलाआें का दोहरा शोषण हो रहा है। सिर्फ आदिवासी समाज को ही स्पर्श करने वाली बीमारी सिकलसेल एनिमिया का फैलाव हो रहा है। आदिवासी लोग सबसे अधिक कुपोषण के शिकार हैं।

आदिवासी समाज की आकांक्षा है कि देश के सभी समाजों को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक न्याय, धर्म और संस्कृति के पालन की स्वतंत्रता हो तथा मानवप्रतिष्ठा और समानता तथा समाज के बंधुत्व भाव स्थापित हो। संविधान के उक्त उद्देश्य की प्राप्ति के आश्वासन का क्रियान्वयन हो। दुनिया में मानवों का अस्तित्व पारिस्थितिकीय संतुलन के साथ बना रहे। धरती हरी भरी बनी रहे। धर्मो पर पुनर्विचार होता रहे। मानव एक दूसरे के हित का सम्मान करें, ख्याल रखें। भाषायी, सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक, जैविक, प्राकृतिक विविधता विद्यमान रहे। ऐसे भारत का निर्माण होगा, तभी हमारे राष्ट्र निर्माताआें के सपने साकार होंगे। ***

आधी शताब्दी से भटकते हीराकुण्ड बांध के विस्थापित

१२ बांधो के बाद

आधी शताब्दी से भटकते हीराकुण्ड बांध के विस्थापित

चिन्मय मिश्र

५० वर्ष पूर्व भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उड़ीसा स्थित हीराकुण्ड बांध का लोकार्पण किया था। सन् १९५७ में बने इस बांध से २४९ गांव के २६५०१ परिवार विस्थापित हुए थे। १.८३ लाख एकड़ का इलाका इसकी डूब में आया था जिसमें से १.२३ लाख एकड़ इलाका सिंचित था। इतना ही नहीं ५०००० भूमिहीन व्यक्तियों को भी जबरदस्ती यहां से हटाया गया था।

५० वर्ष पश्चात् जबकि एक नई सदी का प्रारंभ भी हो चुका है इस बांध के प्रभावितों ने गत दिवस उड़ीसा से झरसुगुडा, सम्बलपुर, बारगढ़ और सोनीपुर के जिला प्रशासनों के सामने प्रदर्शन कर अपनी पीढ़ा व्यक्त की। सरकार के अनुसार इन प्रभावितों को मात्र १ करोड़ ३६ लाख रुपये के करीब का मुआवजा देना है।

राज्य शासन अपने कुल व्यय का एक छोटा सा हिस्सा भी पिछले ५० वर्षो से इन बांध प्रभावितों को देने में असमर्थ रही है। इस घटना से पहला निष्कर्ष तो यह निकलता है कि सरकारें चाहे किसी भी दल की हों वे अंतत: आम व वंचित वर्ग का भला सोच ही नहीं सकतीं। उड़ीसा का हीराकुण्ड बांध तो एक उदाहरण भर है इस देश के राजनीतिक व प्रशासनिक तंत्र की विफलता या संवेदनशीलता का। इस बांध की स्वर्णजयंती समारोह मनाने या देश की इस महान उपलब्धि (?) पर डाक टिकट जारी करने में प्रभावितों को देय क्षतिपूर्ति से अधिक खर्च कर दिया जाएगा परंतु प्रभावितों के लिये बजट में प्रावधान करने के लिये दूसरे गृह के व्यक्ति का इंतजार किया जाना कभी समाप्त ही नहीं होगा।

यहां पर इस बात पर गौर करना भी आवश्यक है कि आजादी के बाद विस्थापन भारत की सबसे बड़ी मानव निर्मित त्रासदी है। पिछले साठ वर्षो में ४ करोड़ से अधिक भारतीय नागरिक विभिन्न कारणों से विस्थापन का शिकार हुए हैं। यह जनसंख्या गुजरात जैसे राज्यों की जनसंख्या से थोड़ी ही कम है। इतने बड़े पैमाने पर विस्थापन तो इजराइल जैसे देश के निर्माण के लिये भी नहीं हुआ है।

बात सिर्फ पूर्व निर्मित हीराकुंड या भाखड़ा नंगल या नागार्जुन सागर की नहीं है कि इनमें हुए विस्थापितों का पुर्नवास नहीं हो पाया। आज नर्मदा पर बने रहे सरदार सरोवर, इंदिरासागर, आेंकारेश्वर व इनके जेसे देश भर की नदियों पर निर्माणाधीन बांधो के विस्थापितों के लिये भी कोई सार्थक पुनर्वास नीति का निर्माण आजादी के बाद के ६० सालों में नहीं हो पाया है। नंदीग्राम में हुए खून-खराबे के पश्चात् हुइ्र विशेष आर्थिक क्षेत्र की नीति में परिवर्तन की घोषणा एक बार पुन: एकतरफा सिद्ध हुई है। अब तो सरकारें इतनी बेगैरत हो चली हैं कि वे इस बात की परवाह ही नहीं करतीं कि उनके बारे में आम जनता क्या सोचेगी।

घोषित नई नीति में विशेष आर्थिक क्षेत्र का क्षेत्रफल कम करने और जमीन का बलात् अधिग्रहण न किये जाने की बात कही गई है। परंतु ध्यान देने योग्य बात यह है कि सरकार ने एक बार पुन: पुनर्वास नीति की घोषणा किये बगैर इस नई नीति की घोषणा कर दी है। इससे आम जनता व प्रभावितों के अधिकारों पर सीधा कुठाराघात हुआ है। जब दो परिस्थितियां एक दूसरे की पूरक हों, ऐसे में किसी एक पर निर्णय लेने का क्या अर्थ है ?

केन्द्र सरकार विश्व में अपनी पूंजीवादी छवि को बरकरार रखने हेतु पुरी तरह से तत्पर नजर आ रही हैं। वह सारे विश्व को यह संदेश दे देना चाहती है कि उसकी संपूर्ण नीतियां पूर्णत: जन विरोधी होकर एक विशेष वर्ग को ही संबोधित हैं। सरदार सरोवर बांध के विस्थापितों के साथ का अन्याय अभी ताजा ही था कि नंदीग्राम और सिंगुर का नासूर सबके सामने आ गया और अब इन दसियों विशेष आर्थिक क्षेत्रों के गठन से सारे देश में विस्थापन की महामारी फैल जाएगी। यह एक ऐसी महामारी है जिसे स्वयं इसके चिकित्सकों ने ही फैलाया है।

बात बांध से विस्थापन की हो या सेज से या खनन से या किसी भी अन्य गतिविधि से। पिछले ६० वर्षो से किसी व्यापक पुनर्वास नीति के अभाव में प्रभावितों के साथ लगातार अन्याय होता रहा है। यह बात कोई नई या पहली बार नहीं कही जा रही है। परंतु इस विशेष आर्थिक क्षेत्र की नई नीति की घोषणा ने तो सभी को इस बात से भौचक कर दिया हैइतनी असहमति के बावजूद शासक वर्ग अपनी मनमानी से बात नहीं आया। उसने पहले बजाय पुनर्वास नीति बनाने के एकबार पुन: आर्थिक व औद्योगित नीति को ही तवज्जो दी है।

केन्द्रीय सरकार को अपनी इस हठधार्मिता से बाज आना चाहिये। आज जबकि देश का प्रत्येक बुद्धिजीवी वो चाहे विशेष आर्थिक क्षेत्र का समर्थक हो या विरोधी, एक व्यापक पुनर्वास नीति की आवश्यकता से इंकार नहीं कर रहा है, तो ऐसे मे इस तरह के गैर जिम्मेदाराना कृत्य का क्या अर्थ हैं ? ***

शनिवार, 31 मार्च 2007

सामाजिक पर्यावरण

13 सामाजिक पर्यावरण

साक्षरता का सच

प्रमोद भार्गव

आखिरकार साक्षरता अभियान का वही सच सामने आया जो आम तौर पर सरकारी योजनाओं की वास्तविकता होती है। देश के मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जनसिंह को दाद देनी होगी कि उन्होंने साक्षरता मुहिम चलाने वाले मंत्रालय के मुखिया रहते हुए सार्वजनिक रुप से यह स्वीकार किया कि साक्षरता आंदोलन के साथ हमने धोखा किया है।

वैसे साक्षरता को लेकर चिंता जताना कोई नई बात नहीं है; अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस की रस्म अदायगी के अवसर पर मंत्री और शिक्षाविद् साक्षरता व शिक्षा की दशा व दिशा पर चिंता जताया करते हैं, लेकिन धोखा शब्द का इस्तेमाल करके जिस तरह से साक्षरता की अनुपब्धियों की आलोचना की गई वह साक्षरता आंदोलन की व्यर्थता को रेखांकित करती है। वैसे अरबों रुपए खर्च करके चल रही इस मुहिम में जबरन जोड़े गए शिक्षक यह आरोप लगाते रहे हैं कि सरकारी स्तर पर चलने वाली प्राथमिकता शिक्षा को कमजोर करने का काम वास्तव में साक्षरता जैसे अभियानों ने ही किया है।

दरअसल साक्षरता अभियान के हश्र के लिए एक ओर तो बेइंतहा धन और साधन मुहैया कराया जाना जिम्मेदार है। दूसरी ओर, उससे कहीं ज्यादा दोषी नौकरशाह और स्वयंसेवी संगठन हैं जिन्होंने साक्षरता अभियान की सफलता के झूठे आंकड़े गढ़े और धन का दोहन निजी हितों के लिए किया।

दरअसल साक्षरता अभियान धन व साधनों के सहारे नहीं बल्कि दृढ़ इच्दा शक्ति और निरक्षरों के प्रति प्रतिबध्दता की पवित्र भावना के साथ सफल हो सकता था। कोई भी बहुजन हितकारी योजना अथवा मुहिम न तो नौकरशाहों के रुतबे के सफल हो सकती हे और न ही उसे राजनीति में प्राथमिकता की मदद से परवान चढ़ाया जा सकता है। दरअसल साक्षरता अभियान सतत चलने वाला सिलसिला हैं, जिसकी निरंतरता प्राथमिकता शिक्षा के माध्यम से जारी रहनी चाहिए। एक अलग-थलग अभियान इसका जवाब नहीं हो सकता।

यदि सरकार इस अभियान को पुनर्जीवित कर चलाने की मंशा रखती है तो आंकड़ों की बाजीगरी की बजाय पहले इसकी असफलता के कारणों की गंभीर पड़ताल करना जरुरी है क्योंकि इसकी झूठी उपलब्धियों के ढिंढोरे में ही इसके हश्र के काण छिपे हैं, जिन्हें नौकरशाहों और स्वयंसेवी संगठनों ने नए-नए प्रयोगों का आवरण चढ़ाकर ढंके रखा है। इस आवरण को पहले उघाड़ने की जरुरत है, जिससे उस छल का खुलासा हो जिसकी ओर इशारा अर्जुन सिंह ने किया है।

भारत में साक्षरता अभियान के माध्यम से साक्षरता बढ़ जाने का ढोल जिला साक्षरता समितियों की बैठकों खूब पीटा गया। जिला कलेक्टर (जो जिला साक्षरता समिति के पदेन अध्यक्ष होते हैं) और स्वयंसेवी संगठनों ने कुछ प्रदेशों के अभियानों को उत्प्रेरक मानकर अभियान को गतिशीलता देने का ऐलान किया। केरल और मिरोजम में साक्षरता का जो प्रतिशत 90 से अधिक था उसकी वजह साक्षरता अभियान न होकर वहां दशकों से मौजूद शालेय शिक्षा की मबजूत संरचना थी। इसी के फलस्वरुप एर्नाकुलम में 1989 में साक्षरता का आंकड़ा 91 प्रतिशत पर जा पहुंचा था। साक्षरता की इन उपलब्धियों को कालांतर में साक्षरता अीयिान की उपलब्धियों के रुप में गिना गया, जबकि सच्चाई यह थी कि इन प्रदेशों और खासकर एर्नाकुलम में पौढ़ साक्षरता अभियान की शुरुआत उसी साल की गई थी।

इसी तरह 1991 की जनगणना में यह जानकारी सामने आई कि 1981 से 1991 के के दशक में साक्षरता दर में 10-12 प्रतिशत की वृध्दि हुई। कहा गया हकि यह वृध्दि साक्षरता अभियानों के चलते ही आई है जबकि इस दौरान साक्षरता अभियान प्रत्येक जिले में अस्तित्व में ही नहीं आया था। वह गठन की प्रक्रिया में ही था। साक्षरता अभियान पूरे देश में सही मायनों में 1994-95 में सक्रिय हुआ और 1999-2000 तक इसने दम तोड़ दिया।

इस नाकामी को छिपाने के लिए बड़ी चतुराई से इस अभियान को सतत शिक्षा के बहाने पुस्तकालय अभियान और ड्रॉप आउट हुए निरक्षरों के लिए सेतु पाठयक्रमों (ब्रिज-कोर्स) के संचालन से जोड़कर नौकरशाहों ने अभियान से असफलता से पिण्ड छुड़ा लिया। इस दौर में जिला साक्षरता समितियों में जो जन भागीदारी सुनिश्चित थी, जिसके माध्यम से परियोजना को कार्य रुप देने के पारदर्शी स्वरुप का प्रावधान था वह समिति के अध्यक्ष यानी कलेक्टरों के एकाधिकार में विलुप्त हो गया।

साक्षरता अभियानों की कथित सफलता की एक और बानगी देखिए। मध्यप्रदेश के धार जिले में अभियान की कामयाबी का झंडा गाड़ते हुए शासन ने 52.70 प्रतिशत निरक्षरों के साक्षर हो जाने के आंकड़े पेश कर खूब प्रशंसा लूटी थी। कुछ समय के लिए पूरे प्रदेश में धार जिले में साक्षरता के आंकड़ों मुताबिक हर दूसरा व्यक्ति साक्षर था लेकिन पंचायत चुनाव में मतदान के वक्त बीस गांवों के मतदाताओं ने हस्ताक्षर की जगह अपने अंगूठे चस्पा किए। इस रहस्य के उजागर होने के बाद धार जिले की कागजी साक्षरता दर की हकीकत सामने आईथी ।

इसी तरह खण्डवा जिले के भीकनगांव विकास खण्ड में 62 पंचायतों के 987 पंचों मसे से 400 अंगूठाछाप निकले। अंगूठाछाप साक्षरता के ये उदाहरण दरअसल पूरे मध्यप्रदेश का प्रतिबिम्ब तो हैं ही, यदि इन्हें समूचे हिन्दी क्षेत्र और समूचे उत्तर भारत का प्रतिबिम्ब मान लिया जाए तो भी कोई ज्यादती नहीं होगी। साक्षरता मिशन के वजूद में आने से पहले संविधान के अनुच्छेद 45 का लक्ष्य बालक-बालिकाओं को शिक्षित करना था न कि मात्र अक्षर ज्ञान कराना। लेकिन साक्षरता अभियानों की कथित गतिशीलता ने प्राथमिकता शिक्षा को अक्षर ज्ञान और साक्षरता एक सीमित कर दिया। सरकारी स्तर पर क्योंकि जिस प्रौढ़ साक्षरता अभियान का उद्देश्य वंचितों को अक्षर ज्ञान कराकर शालेय शिक्षा से जोड़ना, स्त्री समता को बढ़ावा देना, समाज में प्रचलित विषमता व कुरीतियों को कम करना, रोजगार हेतु कौशल निर्माण करना, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना, जनसंख्या नियंत्रण और जन जागृति लाना था, वह बारहखड़ी सीखने तक सिमटकर रह गया और अंततः इस सीमित लक्ष्य की पूर्ति भी नहीं हुई।

इन लक्ष्यों को इसलिए रेखांकित किया गया था क्योंकि साक्षरता अभियान 14 से 35 आयु वर्ग के लिए था जबकि साक्षरता केन्द्र में आने वाले लोगों में से अधिकांश 9 से 14 वर्ष आयु समूह के थे। इस विसंगति को उचित ठहराने के लिए अभियान संचालकों ने तर्क गढ़े कि वे शालेय शिक्षा के लिए बचों की मानसिकता तैयार कर रहे हैं। वस्तुतः ऐसे भटकावों पर लगाम लगाने की जरुरत थी। लेकिन इन लक्ष्य विरोधी भटकावों पर अंकुश लगाने की बजाय इन्हें उपलब्धियों की कहानियां बताकर उछाला गया। ऐसा इसलिए किया गया ताकि विश्व बैंक और उसकी अनुयायी अंतर्राष्ट्रीय वित्त पोषक संस्थाएं साक्षरता मिशन को धन उपलब्ध कराती रहें और नौकरशाह व स्वयं सेवी संगठन अभियान का आर्थिक दोहन करते रहें।

यदि साक्षरता के साथ किए गए छल से उबरना है और 2010 तक संपूर्ण सक्षरता के लक्ष्य तथा 2015 तक सभी को शिक्षा के लक्ष्य को पाना है तो साक्षरता अभियान को विश्व बैंक और उसकी सहयोगी फंडिंग एजेंसियों की मदद पर नहीं बल्कि रालेगन सिध्दि की तरह सामाजिक व्यवहार और स्थानीय परिवेश से सीखने पर आधारित करना होगा। अर्जुन सिंह यदि अपने नेता के सपने को साकार देखना चाहते हैं तो इस अभियान को बेइंतहा धन और साधन के आडंबर से मुक्त रखना होगा। इस काम का उत्तरदायित्व ऐसे लोगों को सौंपना होगा जो इसकी सफलता का अकलन कागजी आंकड़ों की अपेक्षा जमीनी हकीकत के आधार पर करें। तभी कोई परिणाम की उम्मीद की जा सकती है अन्यथा ऐसा ही चलता रहेगा ।

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शनिवार, 20 जनवरी 2007

शांति ही संस्कृति है

सामाजिक पर्यावरण

डॉ. रामजी सिंह

महाश्वेता देवी ने अपने एक लेख में एक ऐसे विश्व का सपना देखा है जो हिंसामुक्त, अभाव, अन्याय और अशिक्षा से मुक्त तो होगा ही साथ ही अशांति और आतंकवाद से भी दूर होगा।

बहुत दिन पहले विन्डेल विल्की ने अपनी पुस्तक वन वर्ल्ड में ऐसे विश्व का स्वप्न देखा था जिसमें राष्ट्र की सीमाएं न हों। एच.जी. वेल्स, बर्टेण्ड रसेल आदि कुछ और चिन्तकों ने भी विश्व राज्य की कल्पना की हैं महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन ने २२ वीं सदी नामक अपने उपन्यास में एक भावी विश्व राज्य के चित्र को निरुपित किया था। आज दो विश्व युद्धों के बाद और खासकर परमाणु बम का हिरोशिमा और नागासाकी में हाहाकार सुनकर एक विश्व राज्य की कल्पना पहले से अधिक व्यावहारिक दिख रही है।

हमने अपने समय में ही देखा कि किस प्रकार दो वियतनाम और दो जर्मनी एक हो गये और पूर्वी यूरोप के पच्चीस राष्ट्रों की एक ही संयुक्त संसद, मुद्रा, बाजार ओर पारपत्र भी हो गया है। इसके अतिरिक्त दक्षिण पूर्वी एशिया में सार्क और एशियन राष्ट्रों के क्षेत्रीय संगठनों के बावजूद भी संयुक्त राष्ट्र संघ और उससे संबंधित वैश्विक अभिकरण काम कर रहे हैं। इससे लगता है कि स्वप्न अब सत्य और साकार हो सकता है।

आज सिद्धांतवाद के दिन लदते जा रहे हैं इसलिए चाहे पूंजीवाद हो या समाजवाद, दोनों वर्तमान अस्तित्व को स्वीकार करने पर विवश हैं। शायद यह इस युग की अनिवार्यता भी है। हमें अणु बम और अहिंसा के बीच अहिंसा को चुनना ही होगा। क्योंकि आणविक युद्ध का गति पथ समाप्त हो गया है। यह अच्छा है कि अणु बम पर किसी राष्ट्र विशेष का एकाधिकार नहीं है, इसलिए अमेरिका के पास लगभग ३० हजार परमाणु बम के रहते हुए भी और हजार परेशानियों के बावजूद भी उसने वियतनाम, अफगानिस्तान या युगोस्लाविया के युद्धों में अणु बम के प्रयोग करने का साहस नहीं किया। संक्षेप में कह सकते हैं कि आज इक्कीसवीं शताब्दी में युद्ध का गतितत्व ही समाप्त हो गया है। युद्ध का प्रारंभ मानव ने अपने नाखून और दांतो के उपयोग से शुरु किया था और आज लगता है इतिहास अपनी पुनरावृत्ति करना चाहता है। वैज्ञानिक आइंस्टीन से जब पूछा गया कि तीसरा विश्व युद्ध किन अस्त्रों से लड़ा जाएगा तो उन्होंने उत्तर दिया कि तीसरा विश्व युद्ध किससे लड़ा जाएगा यही नहीं कह सकता लेकिन यह निश्चित है कि जब चौथा विश्वयुद्ध छिड़ेगा तो हम आदि मानव की भांति अपने नाखूनों एवं दांतो का ही लड़ने में उपयोग करेंगे। स्पष्ट है कि अणु बम का अर्थ ही है मानव और मानवोत्तर प्रजातियां, समस्त कला और संस्कृति, ज्ञान और विज्ञान का सर्वनाश। यही कारण है कि साम्यवाद अपने युद्ध की अनिवार्यता के सिद्धांत का परित्याग कर पूंजीवाद के साथ सह-अस्तित्व को स्वीकार कर चुका है और अब तो विश्व व्यापार संगठन में साम्यवादी चीन भी सदस्य बनकर पूंजीवादी भूमंडलीकरण का एक उपकरण बन गया है। आज शांति की संस्कृति ही मानवता का एक मात्र विकल्प बच रही है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानव प्रवृत्ति का चित्रण करते हुए कहा है सुमति कुमति सबसे लिए रहिहीं- तो क्या हम यह मान लें कि मानव स्वभाव से दुष्ट स्वार्थी और कलह वृत्ति का ही है, लेकिन मानव को स्वभाव से दुष्ट मान लेने में अखिल मानव जाति का अपमान तो है ही निराशावाद का भी चरम है। यदि मानव मूलत: दुष्ट और बुरा है तो फिर शिक्षण, प्रशिक्षण, संस्कार, परिष्कार, नीति और धर्म के उपदेश सब व्यर्थ है। जिस प्रकार बालू से तेल नहीं निकल सकता उसी प्रकार दुष्ट मानव से साधुता की अपेक्षा नहीं की जा सकती। असत् से सत् का उद्भव नहीं हो सकता, इसलिए यदि हम मनुष्य को स्वभाव से बुरा मान लेंगे तो फिर अच्छाई और अच्छे विश्व की कल्पना नहीं हो सकती। मानव सभ्यता बर्बर से सभ्य समाज की ओर अग्रसर होती रही हैंऔर आज वह पृथ्वी से भी उपर उठकर मंगल और चंाद की और बढ़ रही है।

प्रश्न है कि मानव की ही नहीं सृष्टि के समस्त प्राणियों की एक ही अभीप्सा है, सुख या आनंद। इसी को फ्रायड ने प्लेजर इंसटिंक्ट या सुख की प्राप्ति की प्रवृत्ति कहा है। महाभारत का वचन है कि सब कोई सुख चाहते है। लेकिन सुख, शांति के बिना असंभव है। गीता में कहा गया है कि अगर शांति नहीं है तो सुख कहां से मिलेगा। सुख की आकांक्षा भी तभी परिपूर्ण होगी जब हम शांति प्राप्त करें और हमारे पड़ोस, समाज और विश्व में शाति का साम्राज्य हो।

आध्यात्मिक दृष्टि से यह कहा जाता है कि बाहर शांति तभी संभव है जब हमारे मन में शाति हो इसलिए मानसिक शांति के लिए निर्वाण और मोक्ष आदि की अवधारणा आई हैं योगशास्त्र के अनुसार भी मानसिक शांति के लिए अष्टांगिक योग की योजना है। चाहे भगवान बुद्ध का अष्टांगिक मार्ग हो या भगवान महावीर के त्रिरत्न की कल्पना हो या योग, सांख्य, वेदांत आदि शास्त्र हों प्रत्येक जगह मानसिक शांति के लिए ज्ञान और समाधि पर जोर दिया जाता है।

शांति के लिए आध्यात्मिक एवं धार्मिक दृष्टि से प्रयासों के बावजूद जी जगत में अशांति और कलह की कमी नहीं हो रही हैं । पिछले पांच हजार वर्षो का इतिहास साक्षी है कि शांति के लिए धर्म की ओर से किये गये प्रयास भी सफल नहीं हो पाये है। हिन्दुआें के विभिन्न संप्रदायों के बीच जिस प्रकार हिंसा और प्रतिहिंसा चलती रही उसी प्रकार ईसाई समाज में प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक आदि सम्प्रदायों के बीच कलह का अंत दिखाई नहीं पड़ रहा है। एक अल्लाह एवं एक बिरादरी को मानने वाले इस्लाम में शिया सुन्नी आज भी लड़ ही रहे हैं।

शायद इसलिए मार्क्स ने धर्म को अफीम का नशा कहा था। जो धर्म शांति का संदेश वाहक माना जाता है, वह आज अशांति का सबसे बड़ा उपकरण बन गया है। मध्य युग में संतो ने धर्म और मत समन्वय की चेष्टा की थी। कबीर ने हिन्दु और मुसलमान दोनों की खबर ली थी और कहा था कि - इन दोनों राह न पाई । स्वामी रामानन्द ने तो स्पष्ट कहा था जाति पांति पूछे नहीं कोई, हरि को भजै से हरि का होई। इसी प्रकार संत परम्परा के प्राय: सभी संत कवियों ने धर्म समन्वय का प्रयास किया था। आधुनिक युग में भारतीय नव जागरण के पुरोधा राजा राममोहन राय ने - विश्व धर्म नामक पुस्तक लिखी और रामकृष्ण परमहंस की प्रेरणा से स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में व्यक्तिगत और साम्प्रदायिक धर्म को नकारते हुए विश्व धर्म का संदेश दिया। गांधी और विनोबा ने सर्व धर्म समभाव के सिद्धांत को अपने भीतर उतारने की पूरी कोशिश की थी।

विश्व शांति के लिए मानव मस्तिष्क की शांति और हृदय को निश्कलुष किया जाए इससे किसको विरोध होगा, लेकिन मानव शून्य में नहीं रहता वह तो समाज में ही रहता है जिस प्रकार उसकी सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक परिस्थितियां होगी उसी प्रकार उसका चिंतन और जीवन भी होगा। इस दृष्टि से शांति की संस्कृति के लिए समाज की व्यवस्था और संरचना पर सर्वाधिक ध्यान देना होगा। भरी सभा में द्रोपदी का चीरहरण सम्पूर्ण पुरुष समाज और सभ्यता के लिए कलंक है। उसी प्रकार लड़के-लड़की में विभेद, बाल विवाह, अनिवार्य वैधव्य, वैश्यावृत्ति और देवदासी प्रथा, बढ़ते हुए बलात्कार और अल्ट्रासाउण्ड परीक्षण के पश्चात् स्त्री भ्रूण को ही नष्ट करना पाशविकता की सीमा को पार करना है।

इन सभी का मूल कारण है कि हमारा समाज सदियों से पुरुष सत्तात्मक है और स्त्रियों का शोषण और उत्पीड़न पुरुषों का जन्म सिद्ध अधिकार माना जाता है।शांति की संस्कृति के विकास की सबससे बड़ी बाधा है हमारी आकांक्षा तो शांति की रहती है लेकिन आयोजन युद्ध और कलह का होता है। हमारे शास्त्र उपकरण भी युद्ध और विनाश के होते हैं। हमें शांति की संस्कृति के लिए अपने मन में शांति की भावना को स्थापित करना होगा। जिस प्रकार युद्ध का प्रारंभ मानव मस्तिष्क से होता है उसी प्रकार शांति का दुर्ग भी मानव मन में ही निर्मित होगा। इसलिए शांति की संस्कृति के निर्माण के लिए शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।

आज शिक्षण संस्थाआें में सैनिक शिक्षा के लिए प्रावधान तो है लेकिन शांति की शिक्षा की कल्पना भी नहीं की जाती। जहां महावीर, बुद्ध और गांधी का अभिर्भाव हुआ और जहां शाति की संस्कृति का विस्तार हुआ वहीं आज पुरे भारत में लगभग दो सौ पचहत्तर विश्वविद्यालयों में मात्र नौ स्थानों पर गांधी विचार और शांति की शिक्षा का प्रावधान है। एक असमान विश्व में शस्त्रीकरण और युद्ध के नाम पर लगभग २० खरब डॉलर खर्च करना एक प्रकार की असभ्यतम हिंसा ही तो है। शंाति की संस्कृति के लिए न केवल हमें शिक्षा पर ध्यान देना होगा बल्कि कला-संगीत तथा क्रीड़ा का सहारा लेकर इसे शांति उन्मुख बनाना होगा। ***