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सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

पर्यावरण परिक्रमा

बढ़ती आबादी और घटते संसाधन

ताजा जनगणना की रपट से पता चलता है कि जिस रफ्तार से देश की आबादी बढ़ रही है उस रफ्तार से संसाधनों में बढ़ोतरी नहीं हो रही है, जिससे तमाम तरह की समस्याएँ बढ़ रही है । पिछले दिनों शहरी विकास मंत्रालय के सचिव सुधीर कृष्ण ने रियल एस्टेड एंड कंस्ट्रक्शन प्रोफेशनल्स इन इंडिया २०२० (रिक्स) की रपट जारी करते हुए देश की बढ़ती आबादी और घटते संसाधनों का आँकड़ा पेश किया । इस आँकड़े के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में रोजगार, बुनियादी सुविधाआें और अन्य सुविधाआें की कमी से बहुत बड़ी तादाद में लोग गाँवों से शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। इससे शहरों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है ।
शहरों में संसाधनों की कमी है। शहरों में झुग्गियों के बढ़ने की वजह गाँवोें से शहरों की तरफ हो रहा पलायन है । रपट बताती है कि अगले दस सालों में ४२ फीसद आबादी के सेवा एवं उद्योगों में कार्यशील होने के मद्देनजर नौ करोड़ ७० लाख नौकरियों की जरूरत होगी । गौरतलब है इतनी बड़ी तादाद में नौकरियों का सृजन करना एक बहुत बड़ी समस्या है । रपट यह भी कहती है कि शहरों पर बढ़ते दबाव की वजह से देश के बुनियादी ढाँचे और अचल संपत्ति क्षेत्र पर गौर करने की जबर्दस्त आवश्यकता है ।
गांवों में संयुक्त परिवार की परम्परा लगातार टूट रही है । इस कारण पारिवारिक बँटवारे से खेती की जमीन घटती जा रही है । इससे ग्रामीण इलाकों में आय लगातार घटती जा रही है । इससे वहाँ की आर्थिक और सामाजिक स्थिति पर असर दिखाई दे रहा है । लेकिन केन्द्र और राज्य सरकारें समस्या के समाधान के लिए वैसी कोशिश करती नहीं दिखाई दे रही है जैसी कोशिश होनी चाहिए । गौरतलब है कि केन्द्र और राज्य सरकारों की ज्यादातर योजनाएँ आम आदमी को न तो फायदा पहुंचा पा रही हैं और न आम आदमी प्रकृतिप्रदत्त संसाधानों का ही बेहतर तरीके से इस्तेमाल कर पा रहे है । ऐसे में ग्रामीण इलाकों में समस्याएँ तेजी के साथ बढ़ रही है । जब तक इन समस्याआें पर गंभीरता से केन्द्र और राज्य सरकारें गौर नहीं करेेगी और इनके समाधन के लिए सच्च्े मन से प्रयास नहीं करेंगी, तब तक इनका समाधान नहीं हो सकता है । दरअसल सरकार विकास दर को महज जीडीपी की विकासदर बढ़ने से यह मान लेती है कि देश का हर तबका खुशहाल हो रहा है ।
संसाधनों की कमी की एक बड़ी वजह बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा संसाधनों की लूट भी है । केन्द्र और राज्य सरकारें इस बात को नहीं समझ पा रही हैं । ज्यादातर प्राकृतिक संसाधनों पर बहुराष्ट्रीय निगमों का कब्जा है । देश के जल, जंगल और जमीन पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा होता जा रहा है । यदि यह लूट नहीं रोकी गई तो आने वाले चंद सालों में ही समाज का बड़ा हिस्सा संसाधनों से विहीन हो सकता है ।

प्लास्टिक के कचरे से बना लिया पेट्रोल

भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (आईआईपी) के वैज्ञानिकों के एक दल ने पर्यावरण के लिए घातक प्लास्टिक को पेट्रोलियम उत्पादों में तब्दील करने की तकनीक विकसित कर ली है । एक दशक की मेहनत के बाद यह संभव हो सका है ।
इस दल का नेतृत्व खुद आईआईपी के निदेशक मधुकर गर्ग ने किया । उन्होनेंबताया कि उत्प्रेरकों का संयोजन विकसित करने में सफलता मिलने पर ही साफ हुआ कि हम प्लास्टिक को गैसोलिन या डीजल या अन्य एरोमेटिक पदार्थो में तब्दील कर सकते हैं । इसका सह-उत्पाद एलपीजी होगा । आईआईपी प्रवक्ता एसके शर्मा ने कहा कि यह बड़ी उपलब्धि है ।
भारतीय गैस प्राधिकरण लि. (गेल) ने इस परियोजना को प्रायोजित किया था । अब इसकी आर्थिक उपयुक्तता पर काम किया जा रहा है, ताकि व्यापक पैमाने पर ऐसा पेट्रोल बनाया जा सके । इस प्रौघोगिकी की खासियत यह है कि तरल ईधन-गैसोलिन और डीजल यूरो ३ मानकों पर खरे हैं । अनुसंधान करने वाली टीम ने कहा कि कच्ची सामग्री से कुछ और उत्पाद भी मिल सकते हैं, इसमें बस उत्प्रेरक बदलना होगे । इसके अलावा कोई अवशिष्ट पदार्थो का उत्सर्जन इस ईधन को जलाने से नहीं होगा ।
एक अन्य वैज्ञानिक श्रीकांत नानोति ने बताया कि यह प्रक्रियाबड़े उद्योग के लिए भी उचित है । प्रोजेक्ट वेस्ट प्लास्टिक टू फ्यूल्स एंड पेट्रोकेमिकल्स २००२ में प्रांरभ किया था । इसमें चार साल कचरा प्लास्टिक के सुरक्षित निपटान में लग गए ।
कचरा प्लास्टिक का अपघटन काफी अधिक तापमान पर करते हैं । इससे अणुआें को तोड़ा जा सकता है और उत्प्रेरक परिवर्तन करते हैं । इसके बाद कंडेनसेशन कर तरल किया जाता है, ताकि गैसोलिन, डीजल और अन्य एरोमेटिक्स बनें । एक किलो पोल्योलेफिनिक प्लास्टिक की मदद से ६५० से ७०० मिली पेट्रोल व एलपीजी, ८५० मिली डीजल व एलपीजी और ४५० मिली एरोमेटिक्स व एलपीजी बनेगा । एक अनुमान के अनुसार दुनिया में ३००० लाख टन प्लास्टिक की खपत है । यह हर साल १०-१२ फीसद की दर से बढ़ा है । पोल्योलेफिनिक प्लास्टिक जैसे पोलिथिलीन और पोलिप्रॉपिलीन पेट्रोल और अन्य उत्पाद के लिए प्रयुक्त कर सकते है ।

खतरे मेंहै नर्मदा का उद्गम

नर्मदा मध्यप्रदेश और गुजरात की जीवन रेखा कहलाती है । इसके उद्गम स्थल अमरकंटक के चप्पे-चप्पे से प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिकता और समृद्ध परम्पराआें की गंध आती है । अमरकंटक एक तीर्थ स्थान और पर्यटन केन्द्र ही नहींबल्कि एक प्राकृतिक चमत्कार भी है । हिमाच्छादित न होते हुए भी यह पाँच नदियों का उद्गम स्थल है । इनमें से दो सदानीरा विशाल नदियां हैं, जिनका प्रवाह परस्पर विपरीत दिशाआें में है । हाल ही में मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने नर्मदा की बायोमॉनिटरिंग करवाई तो पता चला कि केवल दो स्थानों को छोड़कर नर्मदा नदी स्वस्थ हैं । जिन दो स्थानों पर नदी की हालत चिंताजनक दिखी उनमें से एक अमरकंटक है।
चिरकुमारी नर्मदा पश्चिम मुखी है और यह १३०४ किलोमीटर की यात्रा तय करती है । सोन नदी का बहाव पूर्व दिशा में ७८४ किमी तक है । इसके अलावा जोहिला, महानदी का भी यह उद्गम स्थल है । यहाँ प्रचुर मात्रा में कीमती खनिजों का मिलना, इस सुरम्य प्राकृतिक सुषमा के लिए दुश्मन साबित हो रहा है । तेजी से कटते जंगलों, कांक्रीट जंगलों की बढ़ोतरी और बॉक्साइट की खदानों में अंधाधुंध उत्खनन के चलते यह भूमि विनाश की ओर अग्रसर है ।
अमरकंटक की पहाड़ियों पर बाक्साइट की नई-नई खदानें बनाने के लिए वहाँ खूब पेड़ काटे गए । इन खदानों में काम करने वाले हजारों मजदूर भी ईधन के लिए इन्हीं जंगलों पर निर्भर रहे । सो पेडों की कटाई अनवरत जारी है । पहाड़ों पर पेड़ घटने से बरसात का पानी, खनन के कारण एकत्र हुई धूल को तेजी से बहाता है। यह धूल नदियों को उथला बना रही है। यदि शीघ्र ही यहाँ जमीन के समतलीकरण और पौधोरोपण की व्यापक स्तर पर शुरूआत नहीं की गई तो पुण्य सलिला नर्मदा भी खतरे में आ सकती है ।

कौवों पर मँडरता खतरा

देश में कौवों की तादाद पिछले कई सालों से घट रही है । हालाँकि इसकी वैश्विक संख्या अब भी करोड़ों में है लेकिन इसके घटने की रफ्तार इतनी तेज है कि संभव है जल्द ही हमें टाइगर प्रोजेक्ट की तरह क्रो प्रोजेक्ट की जरूरत पड़े ।
हाल में इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर की रिपोर्ट के मुताबिक विश्व के १२ फीसद पक्षी लुप्त् होने की कगार पर हैं। इनमें कौवे का नाम गौरेया, चील, गिद्ध वाली श्रेणी में ही है जिन पर सबसे अधिक खतरा है । गत १५-२० सालों में उनके घटने के कई कारण है । आवासीय क्षेत्रों में घटते पेड़ों की तादाद से इन्हें काफी परेशानी हो रही है । कौवे ज्यादातार अपना घोंसला ऊँचे पेड़ों पर बनाते हैं लेकिन अब ऐसे पेड़ बहुत कम बचे हैं । घरेलू कचरे और पेड़ों से झड़ने वाले कचरे को जलाने की मनुष्य की आदतें भी पक्षियों के लिए घातक सिद्ध हो रही है । इससे कौवे जैसे पक्षियों का भोजन और घोंसला बनाने में प्रयुक्त होने वाला रॉ मैटेरियल नष्ट हो जाता है । फिर कचरा जलाने से निकलने वाली जहरीली गैसें भी इनके लिए जानलेवा होती हैं । इनके घटने का एक बड़ा कारण चूहे भी है । पक्षी वैज्ञनिक रजा तहसीन बताते हैं कि लोग घरों में जहर देकर मारे गए चूहों को खुले में फेंक देते हैं जिसे खाकर कौवे अकाल मौत के शिकार हो जाते हैं ।

बुधवार, 25 जनवरी 2012

पर्यावरण परिक्रमा

आर्यो का भारत आगमन भ्रम

एक ताजा शोध में कहा गया है कि इंडो-आर्यो के भारत आगमन का व्यापक रूप से प्रचलित सिद्धांत एक भ्रम है । दक्षिण एशिया में पाई गई आनुवांशिक विविधता का स्त्रोत ३५०० साल पहले आर्यो के भारत आने के सिद्धांत से काफी पुराना है।
सेंटर फॉर सेल्यूलर एंड माइक्रोबायोलॉजी (सीसीएमबी) के वैज्ञानिकों ने यह दावा किया है । इस संबंध में शोध अमेरिकन जर्नल ऑफ ह्मूमन जेनेटिक्स में प्रकाशित हुआ है। भारत में आर्यो के आगमन का सिद्धांत १९वीं सदी के मध्य में जर्मनी के विद्वान मैक्समूलर ने रखा था । उन्होनें कहा था कि करीब ३५०० साल पहले मध्य एशिया से इंडो-योरपीयों का भारत व दक्षिण एशिया की ओर पलायन हुआ था और इस क्षेत्र में आधुनिक आबादी इन्हीं के वंशज हैं । साथ ही इन्हीं से इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार और भारत में जाति व्यवस्था विकसित हुई । इसके उलट ताजा शोध करने वाले वैज्ञानिकों के दल के मुखिया डॉ. कुमारास्वामी थांगाराज कहते हैं, ३५०० साल पहले क्षेत्र में कोई आनुवांशिक अंतरप्रवाह नहीं हुआ ।
शोधकर्ताआें के दल में टार्टु विश्वविघालय, इस्टोनिया, चित्तनंद एकेडमी ऑफ रिसर्च एंड एजुकेशन चेन्नई और बनारस विवि के वैज्ञानिक शामिल थे । सीसीएमबी के पूर्व निदेशक लालजी शाह कहते हैं, हम भारत का प्रागैतिहासिक इतिहास दोबारा लिख रहे हैं, जो वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है । ऐसा कोई आनुवांशिक साक्ष्य नहीं है कि इंडो- आर्यो का भारत पर हमला हुआ या वे भारत आए और न ही आर्यो के अस्तित्व का कोई साक्ष्य है । श्री सिंह बीएचयू के उपकुलपति और शोध के सह-लेखक है ।
शोधकर्ताआेंने करीब ६लाख आनुवांशिक सूचनाआें का अध्ययन किया । इसके लिए ११२ जनसमुदायों के १३०० लोगों के डीएनए की जाँच की गई, इनमें ३० भारतीय जाति समूह भी शामिल हैं । शोध में एकत्र ऑकड़ों से यह तथ्य उभरा कि दक्षिण एशिया के लोगों में दो प्रमुख वंश है । एक दक्षिण और पश्चिम एशिया और मध्य एशिया में फैला है जबकि दूसरा वंश दक्षिण एशिया तक सीमित रहा । शोध के अनुसार दक्षिण एशिया की ५० प्रतिशत से अधिक आबादी भारतीय वंशो की है ।

बहस में है पुल्लपेरियार बांध

बड़े बॉधों के निर्माण को लेकर हमारे देश मेंहमेशा ही विवाद रहा है । भाखड़ा नंगल बाँध परियोजना से लेकर टिहरी, सरदार सरोवर, बाण सागर, नर्मदा सागर आदि तमाम बाँध परियोजनाएँ अपनी शुरूआत से लेकर पूरा होने तक तथा उसके बाद भी विवादों से घेरे में रहीं है । इसी कड़ी में अब केरल का मुल्लपेरियार बाँध भी जुड़ गया है ।
तमिलनाडु से लगी केरल की सीमा में इडुकी जिले में पेरियार नदी पर बने इस ११६ साल पुराने बाँध में दरारें आ जाने से इसके ढहने और उससे भीषण तबाही होने की आशंका जताते हुए केरल सरकार ने इस बाँध की जगह कम ऊँचाई वाला एक नया बाँध बनाने की पेशकश की है । केरल सरकार का मानना है कि मौजूदा बाँध वाटर बम की तरह है, क्योंकि यह भूकम्प का मामूली झटका भी सहन करने की स्थिति में नहीं है । यह बाँध १८९५ में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार और त्रावणकोर के राजा के बीच हुए समझौते के तहत बना था । चूँकि इस बाँध के ९९९ वर्ष के लीज अधिकार तमिलनाडु के पास हैंऔर उसके कई जिलोंको इस बाँध से काफी मात्रा में पानी मिलता है, इसलिए तमिलनाडु सरकार इस बाँध को तोड़कर नया बाँध बनाए जाने के प्रस्ताव का विरोध कर रही है । उसे आंशका है कि नया बाँध बनने से उसे मिलने वाले पानी की मात्रा कम हो जाएगी ।
बाँध को लेकर पैदा हुए इस विवाद ने जहाँ केरल में सत्तारूढ़ कांग्रेस और विपक्षी मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी को एकजुट कर दिया है, वहीं तमिलनाडु में भी सभी राजनीतिक दल एक सूर में बोल रहे हैं । इस विवाद की आँच करेल और तमिलनाडु की सीमाआें को लाँघते हुए दिल्ली तक भी आ पहुंची है । दोनों राज्यों के सांसद और स्वयंसेवी संगठन राजधानी में दबाव बना रहे हैं । दोनों ही राज्यों की सरकारें इस मामले में प्रधानमंत्री से दखल देने का आग्रह कर रही हैं । केन्द्र सरकार इस मामले में जो भी पहल करें और समाधान सुझाए, लेकिन उसे बड़े बाँधों की उपयोगिता और खतरों पर भी एक बार फिर से विचार करना चाहिए । मुल्लपेरियार बाँध से उपजे विवाद ने यह नया अवसर उपलब्ध कराया है ।

मध्यप्रदेश में सोने का भंडार मिला

देश में सोना उत्पादन करने वाली कर्नाटक की कोलार गोल्ड माइन में सोने का भंडार खत्म होने के बाद बड़ी मात्र में इस मूल्यावन पीली धातु की खोज में मध्यप्रदेश को बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है ।
प्रदेश में खनिजों की तलाश करने वाली जियो मैसूर सर्विसेज (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड को सिंगरौली जिले के गुरहर पहाड़ में सोने का यह भंडार मिला है । सैटेलाइट सर्वे में जमीन के नीचे सोना होने के संकेत मिलने के बाद कंपनी ने प्रॉस्पेक्टिंग लायसेंस लेकर ड्रिलिंग के जरिए जमीन के नीचे इस धातु का पता लगाया । कंपनी द्वारा २१ वर्ग किमी के जिस क्षेत्र के लिए पूर्वेक्षण अनुमति ली, उसमें से तीन किलोमीटर लंबी पट्टी में सोने का भंडार मिला है । अब तक करीब दो हजार मीटर तक कंपनी खुदाई कर चुकी है, जिसमें १७ मीट्रिक टन सोना मिलने का अनुमान लगाया गया है । अगले एक साल में यहां दस हजार मीटर खुदाई की जाएगी ।
उम्मीद की जा रही है कि इस खुदाई में सोने का भंडार और बढ़ सकता है । खास बात यह है कि टीलेनुमा गुरहर पहाड़ से सोना निकालने के लिए कोलार की तरह सुरंगें नही बनानी पड़ेगी । यहां कम गहराई पर ही यह धातु होने से खुली खदान के जरिए उत्खनन होगा, जिससे सोना निकालने की लागत भी कम आएगी । जियो मैसूर ने यहां सोने की खदान के लिए राज्य सरकार के साथ एमओयू भी किया है । खनिज विभाग के सचिव एसके मिश्र के अनुसार, पूर्वेक्षण का काम पूरा होने के बाद यहां सोना उत्खनन की प्रक्रिया शुरू की जाएगी ।

खाद्य सुरक्षा एक क्रांतिकारी कदम

एक लंबे अरसे से हमारा देश जिन गंभीर चुनौतियों या समस्याआें से जुझ रहा है, उनमें कुपोषण और भुखमरी की समस्या अहम है ।
देश में लगभग ४७ फीसद बच्च्े कुपोषण के शिकार हैं और हर साल हजारों इस गंभीर समस्या के मद्देनजर अगर सरकार ने देश की लगभग ६३.५ फीसद आबादी यानी गांव और शहर के लगभग ८० करोड़ गरीब लोगों को भोजन का बुनियादी अधिकार दिलाने वाला कानून बनाने की दिशा में पहल करते हुए बहुप्रतीक्षित खाद्य सुरक्षा विधेयक को मंजूरी दी है तो उसके इस क्रांतिकारी लोक कल्याणकारी कदम का स्वागत किया जाना चाहिए ।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी का अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् द्वारा तैयार खाद्य सुरक्षा विधेयक का मसौदा लगभग डेढ़ वर्ष तक चले गंभीर विचार-विमर्श के बाद पिछले दिनों केन्द्रीय मंत्रीमण्डल की बैठक में पेश हुआ था । कांग्रेस ने पिछले चुनाव में अपने घोषणा-पत्र में खाद्य सुरक्षा कानून बनाने का वादा किया था । खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने के बाद सरकार का खाद्य सबसिडी पर खर्च मौजूदा २७,६६३ करोड़ रूपए से बढ़कर लगभग ९५,००० करोड़ रूपए हो जाएगा । इतनी बड़ी राशि खर्च होगी इसलिए कुछ विशेषज्ञ यह दलील दे रहे हैं कि जब हमारी सरकारें निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के कई औघोगिक उपक्रमों को आर्थिक संकट से उबारने के लिए अरबों रूपए के राहत पैकेज दे सकती है, उनके करोड़ों रूपए के कर्ज माफ कर सकती है, नए उद्योग लगाने के लिए करोड़ों रूपए मूल्य की जमीन औने-पौने दामों में दे सकती है तो फिर देश के गरीब और वंचित तबके के लोगों को पेटभर भोजन देने से सरकारी खजाने पर पड़ने वाले बोझ का चिंता से दुबला होने की क्या जरूरत हैं ?

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

पर्यावरण परिक्रमा

निरन्तर बढ़ रही है ग्लोबल वार्मिंग गैसें

ग्लोबल वार्मिंग के लिए उतरदायी गैसों के उत्सर्जन में रिकॉर्ड बढ़ोत्तरी हो रही है । संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएन) के जलवायु विशेषज्ञ वैज्ञानिकों ने बताया कि एंडीज, अलास्का और द. पैसेफिक में स्थित मौसम केन्द्रों (वेदर स्टेशन) से जमा डाटा से साफ है कि यह बढ़ोतरी रिकॉर्ड लेवल से हो रही है । विश्व मौसम विज्ञान केन्द्र (डब्ल्यूएमओ) के अनुसार हवा में मौजूद हीट ट्रैपिंग कार्बन डाइऑक्साइड के कण १७५० के बाद अभी सबसे ज्यादा ३९ प्रतिशत की मात्रा में मौजूद है ।
ग्लोबल वार्मिंग के दूरगामी प्रभावों को अंदाज कर यूएन (संयुक्त राष्ट्र संघ) अपने सदस्य देशों के सहयोग से यूएन फ्रेमवर्क कंवेन्शन्स ऑन क्लाइमेट चेज के तत्वाधान में वैशिवक सम्मेलनों के जरिए इसके उपाय ढूंढने की कोशिश में लगी है । हालांकि सम्मेलनों के मुद्दे राजनैतिक फायदे के कारण अमल में कम ही लाए जा रहे है और यह समस्या विश्व समुदाय के लिए अधिक भयावह होता चली जा रही है ।
कार्बन डाइऑक्साइड के बाद मिथेन गैस सबसे ज्यादा जलवायु को नुकसान पहुंचा रही है । कैदल फार्मिग और लैंडफिल साइट्स से निकलने वाली यह गैस १८ प्रतिशत बढ़ी है । लेकिन चौकाने वाली खबर है कि नाइट्रस ऑक्साइड पिछले १० वर्षो में बहुत तेजी से बढ़कर ओजोन परत के क्षरण में सहायक सिद्ध हो रहा है । १०० वर्षो के दौरान इसके प्रभाव को मापने के बाद वैज्ञानिकों ने पाया कि यह इतने ही वर्षो में कार्बन डाई ऑक्साइड के प्रभावों से २९८ गुना ज्यादा घातक है । यह उर्वरक और ट्रॉपिकल मिट्टी और सागरों के तल से निकलता है ।
ओरेजन स्टेट यूनिवर्सिटी, अमेरिका के वैज्ञानिक एंड्रीयास स्मीट्नर के अनुसार कार्बन डाईऑक्साइड की भूमिका को मौसम वैज्ञानी बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रहे है। उनके अनुसार वर्तमान में वैज्ञानिक ग्लोबल वार्मिंग का अध्ययन करने के लिए १५० वर्षो के आंकड़ों का अध्ययन करते है । लेकिन स्मीट्नर ने सबसे नजदीकी (रीसेंट) आईस एज (हिम युग) २१००० वर्ष पूर्व तक, के आंकड़ों से निष्कर्ष निकाला कि नए मॉडल के अनुसार प्री-इंडस्ट्रियल लेवल से दोगुनी वृद्धि के बावजूद जलवायु में १.७ डिग्री से २.६ डिग्री सेंटीग्रेड तक की वृद्धि ही हुई है ।
भारत ने विकसित देशों से साफ कहा है कि वह कार्बन उत्सर्जन पर किसी तरह की कानूनी बाध्यता नहीं मानेगा । डरबन में चल रहे जलवायु सम्मेलन में उसने इस आरोप का भी खंडन किया कि वह वार्ता को बिगाड़ने की कोशिश कर रहा है । वार्षिक सम्मेलन के पहले सप्तह में भारतीय पक्ष ने सभी देशों को स्पष्ट संदेश दिया । उसके मुताबिक जलवायु परिवर्तन के मसले पर भारत की नीतियां स्पष्ट, अनुकूल और सहानुभूति भरी हैं । चीन दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील के साथ भारत इस मुद्दे पर क्योटो प्रोटोकॉल को लागू करने पर जोर दे रहा है । इसके तहत कार्बन उत्सर्जन करने की जिम्मेदारी सबसे पहले विकसित और अमीर देशों को उठानी है ।
दूसरी तरफ विकसित देश इस मसले पर विकासशील देशों को अंतरराष्ट्रीय कानून के जरिए बांधने की कोशिश कर रहे हैं । इसके विरोध में भारत ने २८ नवम्बर २००९ को ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और चीन के साथ मिलकर गठजोड़ बनाया था । भारत की इस कोशिशों की वजह से अंतराष्ट्रीय समुदाय ने उसे जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर बातचीत को बिगाड़ने वाला करार दिया है ।

हर मिनट ९ हेक्टेयर जंगल हो रहे खत्म

दुनिया भर में वर्ष १९९० से २००५ के हर मिनट नौ हेक्टेयर जंगलों का सफाया किया गया है । वनों के खात्मे पर यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र ने जारी की है । दूसरे शब्दों में हर साल औसतन ४९ लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैलेवनों की कटाई की गई । पूरी धरती पर अब तीन फीसदी वन क्षेत्र ही बचा है, जो अपने आप में एक खतरे की घंटी है ।
वनों की तबाई और इसके चलते वन्य जीवों के विलुप्त् होने के यह आंकड़े बहुत भी भयानक हैं । जबकि धरती पर्यावरण के असंतुलन की मार पहले ही झेल रही है । इसके चलते वायु प्रदूषण भी अपने चरम पर है । खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) के आंकड़ों के अनुसार वनों की यह कटाई इंसानों के आमतौर पर किये जाने वाले विकास कार्यो के नाम पर की है । इसके चलते १५ सालों (१९९० से २००५) में पूरी दुनिया में ७ करोड़ २९ लाख हेक्टेयर में फैली वन संपदा पूरी तरह से खत्म हो चुकी है ।
यानी पिछले १५ सालों में शहर बसाने और विकास के नाम पर हर मिनट ९.३ हेक्टेयर वन उजाड़ दिए गए । नए तथ्यों से यह भी पता चलता है कि वर्ष १९९० से २००० के बीच वनों की कटाई का अनुपात प्रतिवर्ष ४१ लाख हेक्टेयर प्रति वर्ष था जो वर्ष २००० से २००५ के बीच बढ़कर ६४ लाख हेक्टेयर हो गया । हालांकि इस सर्वे में यह भी कहा गया है कि वर्ष १९९० से २००५ के बीच वनों की कटाई उतनी भी नहीं हुई जितनी अधिक पहले मानी जा रही थी । चूंकि वन क्षेत्रों में विस्तार भी पहले की अपेक्षा अधिक पाया गया है ।
एफएओ के वन विभाग के सह निदेशक रोजस ब्रियेल्स के अनुसार पहले वनों का क्षरण दो-तिहाई अधिक माना गया था । इसे पहले १०७.४ मिलियन हेक्टेयर बताया गया था । तब विश्व में वनों की कटाई प्रति वर्ष एक करोड़ ४५ लाख हेक्टेयर मानी गई थी । कटिबंधीय इलाकों में ही अधिक वन काटे गए है । इसमें ज्यादातर वनों को काटकर वहां खेत बना दिए गए है ।

क्या इतिहास बन जाएगा समय ?

दुनियाभर के वैज्ञानिकों का मानना है कि अब अंतरराष्ट्रीय समय के लिए १२० साल पुराने अंतरराष्ट्रीय मानक समय यानी ग्रीनविच मीन टाइम (जीएमटी) को आधार नहीं मानना चाहिए । इसकी जगह परमाणु घड़ी का प्रयोग कना चाहिए ।
पिछले महीने की शुरूआत में लंदन में दुनियाभर में करीब ५० वैज्ञानिकों ने नए समय सीमा को लेकर गहन मंथन किया । इसमें सुझाव दिया कि अब दुनियाभर में चल रहे मानक समय जीएमटी को आधार न मानकर परमाणु घड़ी को मानना चाहिए । इसके लिए जेनेवा में इंटरनेशनल कम्पयुनिकेशन यूनियन की एक मीटिंग अगले वर्ष जनवरी में होगी । इसमें वोट डालकर इस बात का समर्थन किया जाएगा कि क्या अब ब्रिटिश प्रणाली जीएमटी को इतिहास बनाकर परमाणु समय को अपनाया जाए ।
परमाणु समय परमाणु घड़ी से मापा जाता है । परमाणु घड़ी एक साधारण घड़ी की तरह होती है । यह परमाणु भौतिकी के सिद्धांतों पर काम करती है । इसका उपयोग ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) के साथ इंटरनेशनल में भी किया जाता है । रेडियो ट्रांसमीटर में भी यह फायदेमंद है, क्योंकि इसकी आवृति सटीक होती है । रेडियो खगोलविज्ञान में भी समय के निर्धारण के लिए अब इस घड़ी का प्रयोग होने लगा है ।
वैज्ञानिकों का मानना है कि दुनियाभर में सटीक समय का निर्धारण पृथ्वी के घूर्णन से करना सही नहीं है । परमाणु घड़ी की मदद से पूरी दुनिया में सही समय का निर्धारण किया जा सकता है । जीएमटी में ऐसी कई खामियां है जिन्हें अब दूर करने का समय आ गया है । वैज्ञानिकों को इस बात की जानकारी काफी पहले ही मिल गई थी कि अपनी धूरी पर घूमती पृथ्वी की चाल उतनी नियमति नहीं है, जितनी समझी जाती है । इसलिए इसके घूर्णन के आधार पर तय की गई समय की व्यवस्था में सुधार की जरूरत महसूस की गई ।


बुधवार, 9 नवंबर 2011

पर्यावरण परिक्रमा

मध्यप्रदेश मेंनादियों का पानी बना जहर
मध्यप्रदेश की नदियों में कई स्थानों पर बीओडी (बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड) की मात्रा मानक स्तर से कहीं अधिक मिली हैं । नदियों के अधिकांश हिस्सों का पानी न तो पीने लायक है ना ही नहाने योग्य । नदियों के कई हिस्सों का पानी तो जहर बन गया है ।
केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने हाल ही में जो मॉनीटरिग रिपोर्ट जारी की है उसके अनुसार लगभग सभी प्रमुख नदियों में कई स्थान ऐसे हैं जहाँ बीओडी की मात्रा ६ मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक मिली है । जबकि पीने व उपयोग में लाये जाने वाले पानी में बीओडी का मानक स्तर ३ मिलीग्राम प्रति लीटर या इससे कम होना चाहिए ।
सीपीसीबी ने नर्मदा, खान, बेतवा, मंदाकिनी, क्षिप्रा, चंबल, टोन्स, कलियासोत नदी के विभिन्न स्थानों के जल की मॉनीटरिंग की है । मॉनीटर की कुछ जगहों पर बीओडी का स्तर २०-३० मिलीग्राम प्रति लीटर तक पाया गया है । सबसे ज्यादा खराब स्थिति इंदौर में खान, नागदा में चंबल तथा उज्जैन में क्षिप्रा नदी की है । नदियों के जो सर्वाधिक प्रदूषित क्षेत्र माने गए हैं, उनमें इंदौर से बहने वाली खान नदी के शक्कर खेड़ी, सांवेर कबीट खेड़ी में बीओडी की मात्रा ५० मिलीग्राम प्रति लीटर तक मिली है । इसका मुख्य कारण इन्दौर से निकलने वाला सीवेज है । वहीं नागदा में चंबल नदी में बीओडी की मात्रा ३४ मिलीग्राम प्रति लीटर तक मिली है । इसका मुख्य कारण औद्योगिक व घरेलू दूषित जल है । हालाँकि मानक स्तर के लिहाज से देखे तो होशंगाबाद में नर्मदा नदी के सेठानीघाट में बीओडी की मात्रा ३.१ मिलीग्राम प्रतिलीटर है जबकि होशंगाबाद के ही कुछ क्षेत्रों में बीओडी की मात्रा ११.४ मिलीग्राम प्रति लीटर है ।
सीपीसीबी ने पानी की शुद्धता को मापने के लिए प्राथमिकता के अनुसार मापदण्ड तैयार किए है । इसके लिए पाँच प्राथमिकता तय की गई है । पहली प्राथमिकता के लिए तय मापदंड में ऐसे स्थानों को रखा गया है जिसमें बीओडी की मात्रा ३० मिलीग्राम प्रति लीटर तक है । दूसरी प्राथमिकता के लिए तय मापदण्ड में उन स्थानों को रखा गया गया है जहाँ बीओडी की मात्रा २०-३० मिलीग्राम प्रति लीटर के बीच पाई गई है । तीसरी प्राथमिकता में बोओडी की मात्रा १०-२० मिलीग्राम प्रति लीटर के बीच, चौथी प्राथमिकता में बीओडी की मात्रा ६-१० मिलीग्राम प्रति लीटर के बीच तथा पाँचवी प्राथमिकता में बीओडी की मात्रा ३-६ मिलीग्राम प्रति लीटर के बीच होना रखा गया है ।
जबकि तय मापदण्ड के अनुसार परम्परागत ट्रीटमेंट के बिना व कीटाणुआें को दूर कर पीने के जलस्त्रोत में बीओडी की मात्रा २ मिलीग्राम प्रति लीटर या इससे कम कम होनी चाहिए । इसके अलावा परम्परागत ट्रीटमेंट के साथ व कीटाणुआें को दूर कर पीने के जलस्त्रोत में बीओडी की मात्रा ३ मिलीग्राम प्रति लीटर या इससे कम होनी चाहिए । वहीं आउटडोर स्नान के लिए उपयोग में लाए जाने वाले पानी में बीओडी का स्तर भी ३ मिलीग्राम प्रति लीटर या कम होना चाहिए । यही नही मछलीपालन व वन्य जीवन के पनपने के लिए पानी में पीएच की मात्रा ६.५ से ८.५ तथा डिजाल्वड ऑक्सीजन की मात्रा ४ मिलीग्राम प्रति लीटर या अधिक तथा अमोनिया की मात्रा १.२ मिलीग्राम प्रति लीटर या कम निर्धारित है । विशेषज्ञों के अनुसार बीओडी पानी में कार्बनिक यौगिकों के माइक्रोबियल चयापचय के लिए जरूरी ऑक्सीजन की मात्रा है । पानी को शुद्ध रखने वाले जीवाणुआें के लिए बीओडी की मात्रा पानी में निर्धारित मानक से कम या ज्यादा नहीं होनी चाहिए ।

युवक ने बनाई हवा से बिजली
हवा से बिजली पैदा करके एक ग्रामीण युवक ने अपनी प्रतिभा का परिचय तो दे दिया है लेकिन सरकार से आज भी मदद का इंतजार है । ताकि वह अनोखे सपने को अंजाम दे सके ।
मेहनतकश गरीब परिवार ने कभी उसके प्रयोगों को पागलपन से ज्यादा नहीं समझा । लेकिन हवा से बिजली पैदा कर सुनील ने ऐसा करिश्मा किया कि एक नई दुनिया की उम्मीदें रोशन हो गई । अब ये गरीब परिवार पैसों से न सही, लेकिन हौसले से हमेशा सुनील का साथ देगा । सुनील ने हवा से बिजली उत्पन्न करने वाले प्रोजेक्टर से पंखा, रेडियो व ट्यूब जलाकर लोगों को हैरत में डाल दिया है ।
उ.प्र. में मुजफ्फरनगर के खेड़ा अफगान गांव के मोकम सिंह के पांच बेटों में से एक सुनील केवल सातवी तक ही पढ़ पाया, क्योंकि आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी । सुनील ने २००३ से ही बिजली पैदा करने वाला यंत्र बनाने का सपना अपने मन में संजो रखा था । चार साल के अथक प्रयास के बाद उसकी मेहनत रंग लाई और २००७ में उसने अपने सपने को साकार कर दिखाया । उसने हवा से बिजली उत्पन्न करने वाले ऐसे यंत्र का आविष्कार कर दिया । सुनील ने मात्र ५० रूपये की लागत से घर पर ही ऐसा यंत्र तैयार किया, जिससे चार वोल्ट डीसी का करंट उत्पन्न होता है । उसके इस कार्य की सराहना करते हुए बसपा के डॉ. मेघराज सिंह जरावरे ने २००८ में उसे सम्मानित किया । जब इस कारनामे की खबर बिजली निगम को लगी तो उन्होनें भी सुनील के आविष्कार को देखा ।
सुनील का कहना है कि उसके काम की सराहना तो सभी ने की, लेकिन सरकार या किसी ने कोई आर्थिक सहायता नहीं की । उसने कहा कि यदि सरकार उसे साधन उपलब्ध कराए तो वह हवा से बिजली उत्पन्न करने वाली एक बड़ी परियोजना तैयार कर सकता है । वो ऐसे आविष्कार कर सकता है जो दुनिया बदल दें ।

दवाआें में लगती है भारतीयों की ज्यादा तनख्वाह
भारत के लोग दवाआें में काफी खर्चा कर रहे हैं और इससे वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) काफी चिंतित है । डब्ल्यूएचओ के मुताबिक हाई मेडिकल बिलों के कारण ३.२ प्रतिशत भारतीय गरीबी रेखा के नीचे जा सकते है । करीब ७० प्रतिशत भारतीय अपनी पूरी इन्कम हेल्थकेयर और दवाआें को खरीदने में खर्च कर देते है । वहीं दूसरे एशियाई देशों जैसे श्रीलंका में ये प्रतिशत ३० से ४० प्रतिशत है ।
योजना आयोग ने भी यह माना है कि हेल्थकेयर में भारी खर्चा भारत की तेजी से बढ़ती समस्या है । बताया गया है कि हर साल ३ करोड़ ९० लाख लोग खराब सेहत की वजह से गरीबी की ओर बढ़ रहे है । साल २००४ में करीब ३० प्रतिशत ग्रामीण इलाके के लोग आर्थिक मजबूरी की वजह से कोई ट्रीटमेंट नहीं ले पाए । शहरी इलाकों में यह प्रतिशत थोड़ा कम रहा । यहां २० प्रतिशत बीमारी से पीड़ित लोग आर्थिक तंगी के कारण अपना इलाज नहीं करा पाए ।
भारत के ग्रामीण और शहरी इलाकों के अस्पतालोंमेंकरीब ४७ और ३१ प्रतिशत भर्ती लोग ऋण और संपत्ति को बेचकर अपना इलाज करा रहे हैं ।

वृक्ष गंगा अभियान में एक करोड़ पौधे लगेंगे

गायत्री परिवार द्वारा परिवार के संस्थापक आचार्य श्रीराम शर्मा की जन्म शताब्दी के दौरान १ करोड़ पौधे लगाने का वृक्ष गंगा अभियान प्रारंभ किया गया है ।
गायत्री परिवार के प्रमुख प्रणव पंड्या ने बताया कि इस अभियान के लिए हरियाणा, राजस्थान, उप्र, मप्र, गुजरात, बिहार और झारखंड जैसे उन राज्यों को चुना गया है, जहाँ वृृक्षावरण १५ फीसदी से भी कम है । उन्होनें कहा कि योजना आयोग के अनुसार भी स्वस्थ पर्यावरण के लिए प्रत्येक राज्य के कुल क्षेत्रफल में कम से कम ३३ प्रतिशत इलाके में वृक्षारोपण होना चाहिए । मगर योजना आयोग के आवश्यक मानदंडों को पूरा करने में सारे सरकारी प्रयास नाकाफी हो गए है । यही वजह है कि गायत्री परिवार ने इस महाअभियान को प्रारंभ किया है ।
पेड़ सांसों में छोड़ी गई दूषित कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित कर वातावरण को भी शुद्ध करते है । यही कारण है कि लोगों को शुद्ध वायु प्रदान करने के लिए गायत्री परिवार ने वृक्ष गंगा अभियान प्रांरभ किया है । अभियान के तहत उन पेड़ों की प्रजातियों को प्रमुखता से चुना गया है जिनकी आयु अधिक होती है ।
वृहद पैमाने पर लगाए गए पौंधों की देखभाल करने के लिए तरूमित्र और तरूपुत्र भी बनाए गए है, जो पौधों के बड़ा होने तक उनकी देखरेख करेंगे । केवल इतना ही नहीं, शांतिकुंज आश्रम में विभिन्न संस्कार संपन्न कराने पर तरू प्रसाद के रूप में पौधे दिए जा रहे हैं । अब तक ५ लाख पौधे बाँटे जा चुके है ।

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

पर्यावरण परिक्रमा

मुम्बई सबसे बड़ा शहर, रहते हैं ५ करोड़
देश की ७९ प्रतिशत आबादी अभी भी गाँव में बसती है । आजादी के बाद यह पहला मौका है, जब आबादी की बढ़त दर में खासी गिरावट हुई । भारतीय १२१ करोड़ हैं । इनमें से ८३.३ करोड़ लोग गाँव में बसे हैं । ३७.७ प्रतिशत शहरों में रह रहे हैं । साथ ही यह पहला मौका है, जब शहरों की आबादी दर गाँवों की अपेक्षा ज्यादा बढ़ी है । देश में लिंगानुपात बढ़ा है । आबादी के लिहाज से मुम्बई सबसे बड़ा शहर और उत्तरप्रदेश सबसे बड़ा राज्य है ।
आजादी के बाद से यह पहला मौका है कि जब शहरी क्षेत्रों में आबादी गाँवो की तुलना में ज्यादा बढ़ी है । जनगणना आयुक्त और भारत के रजिस्ट्रार जनरल सी. चंद्रमौली ने बताया कि ग्रामीण शहरी वितरण क्रमश: ६८.८४ और ३१.१६ प्रतिशत है । शहरीकरण का स्तर २००१ के २७.८१ प्रतिशत से बढ़कर २०११ में ३१.१६ प्रतिशत हो गया है । ग्रामीण आबादी का अनुपात ७२.१९ प्रतिशत से घटकर ६८.८४ प्रतिशत रह गया है । चूँकि ग्रामीण इलाके में आबादी की बढ़त दर घटी है, इसीलिए कुल वृद्धि दर गिरी है। फिर भी ग्रामीण इलाकों में पिछले दशक के मुकाबले ९ करोड़ ज्यादा है ।
शहरों में सबसे ज्यादा आबादी के मामलों में मुम्बई सबसे आगे है और राज्यों में उत्तरप्रदेश । आँकड़े बताते है कि मुम्बई की आबादी ५ करोड़ है । साथ ही उत्तरप्रदेश में देश की १८.६२ प्रतिशत आबादी रहती है, जबकि महाराष्ट्र में देश की १३.४८ प्रतिशत शहरी आबादी रहती है ।
शिशु लिंगानुपात में गिरावट आई है । ग्रामीण क्षेत्रों में ८९ लाख बच्च्े कम हुए, जबकि शहरी क्षेत्रों में ३९ लाख बच्च्े बड़े । आँकड़े बताते है कि देश में लिंगानुपात बढ़ा है । २००१ में यह प्रति हजार ९३३ था, २०११ में यह ९४० हो गया । ग्रामीण इलाकों में यह दस साल पहले के ९४६ से ९४७ से हो गया, जब कि शहरों में ९०० से ९२६ हो गया है।

समुद्र की दुर्गंध के कारणों पर वैज्ञानिकों की पहल

कुछ वैज्ञानिको का कहना है कि नदियो से मीठा पानी और अन्य स्त्रोतों का बहता पानी आने की वजह से समुद्र में लवणता कम हो गई है जिससे खारे पानी में पाई जाने वाली शैवाल खत्म हो गई और दुर्गन्ध निकलती है । अन्य अनुसंधानकर्ता इससे सहमत नही है । इनमे से कुछ की राय है कि भू-गर्भीय हलचल दुर्गध की वजह है ।
केरल विवि के अनुसंधानकर्ता के एक दल ने इस विचित्र घटना का कोल्लम और तिरूअंनतपुरम के तटों पर अध्ययन किया और निष्कर्ष निकाला कि शैवाल में तीव्र वृद्धि के कारण बैक्टीरिया का क्षरण हुआ जिससे यह दुर्गध निकलती है ।
वैज्ञानिकों का कहना है कि केरल के कुछ भागों में पिछले दिनों से समुद्र से आ रही दुर्गध से भयभीत होने की जरूरत नहीं है । बहरहाल इसके कारणों के बारे में वैज्ञानिक एकमत नहीं है । केरलविवि के जलीय जीव विज्ञान और मत्स्यिकी विभाग के अनुसंधानकर्ता ने ए.बीजू कुमार की अगुवाई में सिफारिश की कि सरकार शैवाल में तीव्र वृद्धि की पहचान करने के लिए तटीय जल की गहन जांच करे क्योंकि ऐसा होने पर विषैले तत्व उत्पन्न हो सकते है ।
इन अनुसंधानकर्ता ने कहा कि समुद्री पानी के रंग, लवणता, तापमान, पीएच पोषक तत्वों, प्लैकटन, सूक्षम जीवाणुआें और मछलियों के मरने की दर जैसे विभिन्न मानकों का अध्ययन करने के बाद उन्होनें यह निष्कर्ष निकाला है । प्लैकटन उन सूक्ष्म जीवों और वनस्पतियों को कहा जाता है जिनकी खारे पानी में बहुतायत होती है और जिन्हें मछलियां खाती है । कोल्लम स्थित एसएन कॉलेज में प्राणीशास्त्र विभाग में सहायक प्राध्यापक डॉ. सैनुदीन पत्ताझी कहते है कि इस दुर्गध का कारण भूगर्भीय हलचल जैसे हाल ही में केरलतथा अन्य राज्यों में आए मामूली तीव्रता के भूकंप के झटके आदि है ।

अब तंबाकू से भी बन सकेगी सेहत

तंबाकू का नाम आते ही सिगरेट, खैनी, गुटखा की चिन्ताजनक तस्वीर उभरती है, लेकिन जल्द ही इसका इस्तेमाल सुंदरता बढ़ाने, बुढ़ापे को दूर भगाने के लिए भारत में भी होने लगेगा । और तो और अगर देश में चल रहा कृषि अनुसंधान रंग लाया तो तम्बाकू के तेल को खाद्य तेल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकेगा ।
सुन्दरता के लिए तंबाकू के इस औषधीय उपयोग की तकनीक का पेटेंट तो आंध्रप्रदेश के राजामुंदी के केन्द्रीय तंबाकू अनुसंधान संस्थान ने हासिल कर लिया है । अब इसके उद्यमियों को व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए हस्तांतरित करने की प्रक्रिया बाकी है ।
तम्बाकू की मौजूदा किस्म का सिगरेट, खैनी या गुटखे के लिए इस्तेमाल होने का खतरा होता है, इसीलिए अब एक नई किस्म तैयार हो रही है जिसका उपयोग सिर्फ औषधीय या तेल के लिए हो सकेगा । भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के तहत काम करने वाले इस संस्थान के निदेशक वैज्ञानिक डॉ. वी.कृष्णमूर्ति ने बताया - इससे किसी भी रूप में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पदार्थ नहीं बनाया जा सकेगा । तंबाकू की पत्तियों से निकाले जाने वाले सोलनसेल का इस्तेमाल टीबी के उपचार, घावों के भरने के लिए लिपिड तत्वों की कमी को दूर करने और सुन्दरता बढ़ाने के लिए एंटी ऑक्सीडेंट के रूप में हो सकता है ।

सन् २०३० तक गैर-संंक्रामक रोगोंसे होगी ४० लाख मौतें

भारत जैसे देश में टीबी, मलेरिया या चिकनगुनिया जैसी बीमारियों की बजाए गैर-संक्रामक बीमारियां सबसे बड़ी चुनौती बनने जा रही है । एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार २०३० तक देश में गैर-संक्रामक रोगों (डायबिटीज, केंसर, दिल की बीमारी और ब्लड प्रेशर की बीमारी) से मरने वाले लोगों की संख्या ४० लाख होगी । २००५ में गैर-संक्रामक रोगों से मरने वाले लोगों की संख्या ५३ प्रतिशत थी, जबकि २०३० तक यह आंकड़ा ६७ फीसदी ज्यादा होगा । पब्लिक हेल्थ फाउडेंशन ऑफ इंडिया (पीएचएफआई) संस्थान द्वारा जारी किए गए इस रिपोर्ट के अनुसार गैर-संक्रामक रोगों से मरने वालों में दिमागी समस्याआ के कारण मरने वालों की तादाद भी काफी होगी।
पीएचएफआई प्रमुख डॉ. श्रीनाथ रेड्डी द्वारा हाल ही में केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को सौपी गयी इस रिपोर्ट में बताया गया है कि गैर-संक्रामक रोगों में सबसे बड़ा कारण ब्लड प्रेशर की परेशानी बनने वाली है । वर्ष २००० हाइपरटेंशन के १.१८ करोड़ मामले थे जो २०२५ तक २.१३ करोड़ हो जाएंगे । देश में मौत का दूसरा बड़ा कारण डायबिटीज को बताया गया है । रिपोर्ट बताती है कि २०२५ तक करीब ८७ मिलीयन लोग डायबिटीज के मरीज होगें । युवाआें और वयस्कों के अलावा बच्चें में बढ़ते तंबाकू का इस्तेमाल को एक बड़ी समस्या बताया गया है ।
रिपोर्ट तैयार करने वाले और पीएचएफआई संस्थान प्रमुख डॉ. श्रीनाथ रेड्डी का कहना है कि विकसित देशों के मुकाबले देश के युवाआेंऔर गरीबों में बढ़ते गैर-संक्रामक रोग चिंता का विषय है । सरकार को गैर-संक्रामक रोगों से निबटने के लिए एक सुनियोजित रणनीति तैयार करने की जरूरत है ।

बांधवगढ़ में होगी टाइगर सफारी
मध्यप्रदेश में बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के कोर एरिया में बढ़ते पर्यटकों के दबाव को कम करने के उद्देश्य से प्रबंधन ने टाइगर रिजर्व की सीमा के भीतर टाइगर सफारी कराने का निर्णय लिया है । टाइगर सफारी अर्थात् कंफर्म टाइगर रिजर्व इसके तहत बाड़े के भीतर से पर्यटकों को बाघ दर्शन कराया जाता है । प्रबंधन के मुताबिक जो भी पर्यटक महज टाइगर देखने के लिए देश-विदेश से बांधवगढ़ पहुंचते है । उनके लिए टाइगर सफारी उपयुक्त रहेगा ।
प्रबंधन के उच्च् सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार टाइगर सफारी कराने के लिए प्रधान मुख्य वन सरंक्षक द्वारा टाइगर रिजर्व के अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए गए है एवं साथ ही शासन से आवश्यक अनुमति के लिए प्रस्तावना तैयार की जा रही है ।
प्रबंधन के मुताबिक बढ़ती पर्यटकों की संख्या से टाइगर रिजर्व के कोर एरिया में पर्यटकों का दबाव दिनों दिन बढ़ रहा है । इससे कोर एरिया के रहवासी प्रबंधन से नाखुश नजर आने लगे थे । पीछे की कई घटनाआें पर नजर डाले तो प्रबंधन व ग्रामवासियों के बीच हुई तीखी झड़प व मारपीट इसी दबाव का परिणाम कही जा सकती है ।

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

पर्यावरण परिक्रमा

हरियाणा के किसान ने कचरे से बना ली बिजली

आवश्यकता आविष्कार की जननी है, इस कहावत को आपने जरूर सुना होगा । लड़कपन से ही कुछ न कुछ नया सोचने की आदत रखने वाले रायसिंह को भी इसी कहावत ने कुछ नया करने का हौंसला प्रदान किया ।
आज साधारण किसान से इंजीनियर कहलाये जा रहे है । विधिवत् रूप से कोई डिग्री न होने के बावजूद उन्होनें कचरे से चलने वाला ऐनरसोल गैसीफायर बना डाला, खास बात यह है कि इस गैसीफायर से बिजली भी पैदा की जा सकती है । हनुमानगढ़ जिले के थालड़का के रायसिंह आज इस गैसोफायर के निर्माता है जो कि खेतों में पानी सींचने से लेकर बिजली पैदा करने के कामआ रहा है ।
वर्ष १९९९ में रायसिंह ने बिना तेल व बिजली के इंजन को चलाने पर अपनी रिसर्च शुरू की तथा इस कार्य मेंअथक मेहनत के बाद २००१ में सफल हो गया । सबसे पहले रायसिंह ने पांच केवी का इंजन बिना डीजल के चलाया । इसके परीक्षण के लिए, उसने किसानों को इस तरह के इंजन तैयार करके दिए ताकि इंजन सेट में आने वाली दिक्कतों का पता चल सके । समय के साथ-साथ उसमें सुधार होता गया ।
एक बार सफलता मिलने पर रायसिंह के कदम नहीं रूके और उसने जल्द ही १५ केवी का एक ऐसा गैसोफायर बना दिया है जो कचरे से चलता है । इस गैसोफायर से जनरेटर चलाकर बिजली भी बनाई जा सकती है तथा खेतों में ट्यूबवेल भी चलाए जा सकते है । बुलंद हौसले के साथ रायसिंह ने अपने गैसोफायर को भारत के विभिन्न प्रांतों के अलावा दक्षिण अफ्रीका, जर्मनी व कीनिया में भी भेजे हैं । रायसिंह के अनुसार इस वक्त भी अमेरिका, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, कीनिया, जर्मनी, दक्षिण अफ्रीका आदि से गैसोफायर को लेकर चर्चाएं चल रही है ।
वह चाहता है कि सरकार यदि इस प्रोजेक्ट को बड़े स्तर पर शुरू करे तो न केवल हम बिजली व डीजल की बचत कर पाएंगे बल्कि गैसोफायर का निर्यात कर देश को आर्थिक लाभ भी पहुंचा सकते है । खेतों में पड़ा कचरा करें प्रयोग रायसिंह का गैसोफायर जनरेटर सरसों का तूड़ा, गोबर, पेड़-पौधों के पत्तो, मूंगफली व मक्के के छिलके, चावल व गेहूं का भूसा, नारियल का छिलके आदि से बड़ी आसानी से चल सकता है ।

न्यूक्लियर प्लांट की जगह पर बना पार्क
अकसर पार्क ऐसी जगह बनाए जाते हैं जहां पर खुला वातावरण और हरियाली हो । न कि ऐसी जगह जो खतरे से भरी हुई हो । लेकिन जर्मनी के शहर कल्कर के समीप स्थित बने इस पार्क के बारे मेंसुनकर आप आश्चर्यचकित रह जाएंगे । ऐसा नहीं है कि यह खुले वातावरण में न बना हो, लेकिन न्यूक्लियर रिएक्टर प्लांट जैसी उस खतरनाक जगह पर बना है जहां कोई नहीं जाना चाहेगा । लेकिन ऐसा नहीं है । करोड़ों रूपए से बनने वाला यह न्यूक्लियर प्लांट शुरू होने से पहले ही बंद हो गया था । ८० हेक्टेअर में बने इस पार्क में हर साल करीब पूरी दुनिया से छह लाख पर्यटक यहां आते है ।
इस न्यूक्लियर पावर प्लांट के कूलिंग टॉवर में विशाल झूला लगाया गया है । १३० फीट ऊंची इसकी दीवार पर चढ़ने के लिए सीढ़िया लगाई गई है।
यह पार्क न केवल घूमने के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहां रहने के लिए कमरों से लेकर बार, रेस्टोरेंेट, गोल्फ कोर्स, टेनिस कोर्स म्यूजियम जैसी सुविधाएं भी मौजूद हैं ।
इस प्लांट को जर्मनी ने १९७२ में बनना शुरू किया था । करीब २१.३ करोड़ रूपये की लागत के बाद इसे बंद कर दिया गया । कारण था यहां के स्थानीय लोगों का विरोध करना ।
एक डच व्यापारी ने न्यूक्लियर प्लांट सहित इस पूरी जगह को खरीद लिया । हालांकि इसे उन्होनें कितने रूपए में खरीदा इसका खुलासा नहीं किया गया ।
जापान में हुए हादसे के बाद परमाणु बिजली घरों को लेकर दुनिया में नई बहस शुरू हुई है । इसमें इस प्रकार के कदम से नई रोशनी मिलेगी ।

अंटार्कटिका से बहने वाली नदियों का नक्शा तैयार

वैज्ञानिकों ने पहली बार अंटार्कटिका महाद्वीप की बर्फ के नीचे बहने वाली उन नदियों का नक्शा तैयार करने का दावा किया है, जो समुद्र में जाकर मिलती हैं । ये नदियां अपने साथ अंटार्कटिका की बर्फ बहाकर समुद्र में ले जाती है ।
इससे जलवायु परिवर्तन के संदर्भ मेंभविष्य में समुद्र के स्तर के घटने या बढ़ने के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है । वैज्ञानिकों के अंतराष्ट्रीय दल ने यूरोप, जापान और कनाड़ा के उपग्रहों से मिली जानकारी के आधार पर ग्लेशियर बनने की प्रक्रिया का भी पता लगाया है । इनमें यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के प्रोफेसर एरिक रिगनॉट का अहम योगदान है । उन्होने समुद्र तक बर्फ के पहुंचने का मॉडल तैयार किया है, जो कि इससे पहले कभी नहीं बनाया गया ।
ब्रिटिश अखबार डेली मेल ने प्रोफेसर रिगनॉट के हवाले से लिखा है कि हमारी यह उपलब्धि ग्लेशियोलॉजी के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है । हमने यह पहचाना है कि कैसे अंटार्कटिका से नदियां बहकर समुद्र में मिलती है । धरती पर अंटार्कटिका में ही बर्फ का सबसे बड़ा भंडार है और अंटार्कटिका से पिघलने वाली बर्फ समुद्र के स्तर पर बड़ा प्रभाव डालती है ।



बुधवार, 17 अगस्त 2011

पर्यावरण परिक्रमा

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देश में बाघों की आबादी में २० फीसदी की बढ़ोतरी

एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले वर्ष बाघों की जनसंख्या में २० फीसदी बढ़ोतरी हुई है । पिछले दिनों यह रिपोर्ट वन और पर्यावरण मंत्रालय के अतिरिक्त महानिदेशक जगदीश किशवान ने जारी की, जिसमें वर्ष २०१० के दौरान बाघों की स्थिति पर रोशनी डाली गई है ।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछली बार २००६ में सर्वेक्षण किया गया था जब देश में बाघों की अनुमानित संख्या १४११ थी, जबकि पिछले वर्ष २० फीसदी बढ़ोतरी के साथ बाघों की अनुमानित संख्या १७०६ है । यह बढ़ोतरी अतिरिक्त क्षेत्रों में किए गए सर्वेक्षण और गहन-घनत्व वाली आबादी में बाघों की संख्या में हुई बढ़त पर आधारित है ।
बाघों की आबादी की जनसंख्या आँकने में १७ राज्यों को शामिल किया गया । इसमें फॉरेस्ट स्टॉफ के ४,७७,००० कार्य दिवसों को शामिल किया गया । इनक अलावा, पेशेवर जीव विज्ञानियों ने भी ७० हजार कार्य दिवसों में काम किया । इस प्रकार का सर्वेक्षण प्रत्येक चार वर्ष में किया जाता है जिसमें नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी, द वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इण्डिया, बाघों की आबादी वाले राज्य और बाहरी विशेषज्ञ शमिल होते हैं । श्री किशवान ने कहा कि उत्तराखंड, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक में बाघों का घनत्व बढ़ा है । इस गिनती में सुंदरवन, पूर्वोत्तर के कुछ इलाकों और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों को भी शामिल किया गया है जिसके चलते बढ़ोतरी संभव हुई और इनकी संख्या आँकने के लिए दोहरी सैम्पलिंग तरीके को अपनाया गया ।
रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गई है कि इस अच्छी खबर के बावजूद बाघ खतरे में है, क्योंकि उनके रिहायशी इलाके में कुल मिलाकर १२.६ फीसद की कमी हुई है । इसका अर्थ यह भी है कि छोटे क्षेत्रों में अधिक बाघों को बसाया जा रहा है । इस स्थिति के चलते इनके फैलाव में कमी हो सकती है । बाघों की जनसंख्या के बीच जीन सबंधी आदान-प्रदान का नुकसान होगा और मनुष्य तथा बाघ के टकराव के मामले बढ़ेगे ।

सन्२०३१ में होगी अन्य ग्रहों के प्राणी से मुलाकात

रूसी वैज्ञानिकों ने संभावना व्यक्त की है कि बार-बार धरती पर दस्तक देकर एक रहस्य छोड़ जाने वाले बाहरी ग्रह के प्राणियों से २०३१ तक पृथ्वी पर मनुष्य की सीधी मुठभेड़ हो जाएगी ।
रूस की सरकारी संवाद समिति इंटरफैक्सने रूसी विज्ञान अकादमी के अंतरिक्ष संस्थान के एक शीर्ष वैज्ञानिक के हवाले से खबर दी है कि पृथ्वी से इतर अन्य ग्रहों पर निश्चित रूप से जीवन है और संभावना है कि धरती के मनुष्य का अगले दो दशकों में उन प्राणियों से आमना सामना हो जाएगा । ज्ञातव्य है कि आकाशगंगा में हमारे सौरमण्डल के अतिरिक्त भी अनगिनत सौरमण्डल हैं, जिनके अपने अपने सूर्य हैं ।
अंतरिक्ष संस्थान के निदेशक एवं प्रसिद्ध अंतरिक्ष वैज्ञानिक एंडीफिकेलस्तीन ने कहा कि इन बाहरी सौरमण्डलों में अपने अपने सूर्य की परिक्रमा करने वाले ज्ञात ग्रहों में से १० प्रतिशत पृथ्वी जैसे ही है । यदि उन ग्रहों पर पानी है तो फिर वहां जीवन होने की पूरी-पूरी संभावना है । उनका कहना है कि बाहरी ग्रहों के प्राणियों के भी पृथ्वी के मनुष्य के तरह ही दो हाथ, दो पांव और एक सिर है । उन्होनें कहा कि हो सकता है कि उनकी चमड़ी का रंग अलग हो, लेकिन इस तरह की विविधता तो पृथ्वी के मनुष्यों में भी विद्यमान रहती ही है । उन्होने कहा कि उनका संस्थान अन्य ग्रहों पर जीवन की मौजूदगी का पता लगाने के काम में पूरी तरह से जुटा हुआ है और अगले २० वर्षो में यह रहस्य पूरी तरह से खुल जाने की उम्मीद है ।

नारियल की जटा से बनेंगी सड़के

मध्यप्रदेश की ग्रामीण सड़कें अब नारियल की जटाआें से बनेगी । इसके लिए मप्र ग्रामीण विकास प्राधिकरण ने पांच जिलों का चयन किया है । इससे स़़डकें मजबूत और टिकाऊ बनेगी ।
इस तकनीकी का कॉयर जियो टेक्सटाइल (सीजीट) नाम दिया गया है। इसका इस्तेमाल पॉयलट प्रोजेक्ट के तहत गुना, दमोह, जबलपुर, इन्दौर और बैतूल जिलों में किया जाएगा । इन जिलों में ५८ किलोमीटर लंबाई की १२ सड़कों का निर्माण किया जा रहा है । सेंट्रल कॉयर रिसर्च इंस्टिट्यूट इसकी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार कर रहा है। ज्ञात हो कि राष्ट्रीय ग्रामीण सड़क विकास एजेंसी (एनआरआरडीए) ने मप्र सहित आठ राज्यों को पत्र लिखकर प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत ग्रामीण सड़कों में सीजीट का इस्तेमाल करने को कहा था । इसके बाद ही मप्र ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण ने इस दिशा में कार्य शुरू किया ।
सेंट्रल कॉयर रिसर्च इंस्टिट्यूट (कलावूर, केरल) के डायरेक्टर डॉ उमाशंकर शर्मा ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्र में सड़कें ऐसी सतह पर बनाई जाती है जो खिसकती बहुत है । इससे सड़कें कमजोर हो जाती है । इसी को रोकने के लिए ग्रामीण इलाकों में इस तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है । इसमें नारियल की जटाआें से जालियां बनाई जाती है । इनको मिट्टी पर बिछाया जाता है, जो धीरे-धीरे मिट्टी की पकड़ को मजबूत कर देती है । इन जालियों के ऊपर मुरम और अन्य सामग्री बिछाई जाती है । इस तकनीकी को इंडियन रोड़ कांग्रेस ने भी मान्यता दे दी है ।
केन्द्र सरकार से मंजूरी मिलते ही इन सड़कों का कार्य प्रारंभ कर दिया जायेगा । प्राधिकरण के अधिकारियों का मानना है कि कम से कम मप्र में इतना जरूर फायदा होगा कि बाद में इसका मेंटनेंस सस्ता पड़ेगा ।

बैतूल में देश का चौथा कार्बन अनुमापन केन्द्र

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्था (इसरो) द्वारा वन विभाग के सहयोग से बैतूल जिले के तावड़ी परिक्षेत्र के सुकवान बीट क्षेत्र में परिस्थितिकीय तंत्र कार्बन अनुमापन केन्द्र की स्थापना की गई है । इस केन्द्र में बने टॉवर पर विभिन्न प्रकार के सेंसर्स का परीक्षण शुरू हो गया है ।
बैतूल में स्थापित यह केन्द्र देश का चौथा केन्द्र है । इसके पूर्व हलद्वानी, सहारनपुर और बरकोट (ऋषिकेश) में ऐसे केन्द्र स्थापित किये गये है । देश में कुल १५ केन्द्रों की स्थापना की जानी है । केन्द्र पर बनाय गये टॉवर पर अलग-अलग ऊँचाई और जमीन के नीचे विभिन्न प्रकार के सेंसर लगाये गये
हैं जो हवा की गति, तापमान एवं आर्द्रता संबंधी आँकड़े एकत्र करेंगे । यह आँकड़ें विश्लेषण के लिये हैदराबाद स्थित इसरो के राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केन्द्र भेजे जायेंगे ।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान विभाग में ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में अपने जियोस्फीअर-बायोस्फीअर कार्यक्रम के अन्तर्गत, देश के अलग-अलग पारिस्थितिकीय क्षेत्रों में स्थलीय अभिवाह मापन के लिये एक योजना आरंभ की है जिसमें चार टॉवरों की स्थापना की गई है । बारहवीं पंचवर्षीय योजना में इन अभिवाह टॉवरों का कार्यजाल अवलोकन, अन्य महत्वपूर्ण भारतीय पारिस्थितिकी तंत्रों के लिये विस्तृत और गहन करने की आवश्यकता है । इस कार्यक्रम के अन्तर्गत वन विभाग के सहयोग से बैतूल के निकट, सुखवान में की गई है ।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान द्वारा स्थापित इस केन्द्र में अत्यन्त संवेदनशील वैज्ञानिक उपकरणों एवं विधियों से वातावरण में कार्बन अथवा कार्बनडाईऑक्साइड के वातावरण से वनस्पति में परिगमन एवं मात्रा परिवर्तन को मापा जाता है । अधिक संख्या में व्यक्तियों का समूह, वाहनों का समूह एवं उनका चालन वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि करता है, जिससे यहाँ स्थापित उपकरणों में अशुद्ध आँकड़ें प्राप्त् होते हैं जो वैज्ञानिक अनुसंधान को बाधित करते हैं । अत: यहां व्यक्तियों एवं वाहनों का आवागमन नियंत्रित रहेगा ।
प्रौघोगिक क्रांति के आरंभ से, कार्बन डाई-ऑक्साइड की विश्वव्यापी औसत सांद्रता लगभग २८० पीपीएम से बढ़कर ३८० पीपीएम से भी अधिक हो गई है एवं अन्य ग्रीन हाऊस गैसों के स्तर में निरन्तर वृद्धि वैज्ञानिक और नीति-निर्धारकों के लिये गहन चिंता का विषय है । इसके फलस्वरूप पृथ्वी की सतह का तापमान बढ़ने लगता है, ध्रुव क्षेत्रों पर जमे हिम खण्ड पिघलने लगते हैं और समुद्र का स्तर बढ़ जाता है । अनेक एवं कृषि योग्य भूमि, उप-नगरीय एवं नगरीय भूखण्डों में रूपांतरित हो गई है और अनेकों उष्ण कंटिबंधीय वन, निष्क्रिय एवं क्षरित होेकर चारागाहों में परिवर्तित हो गये हैं । वन संरचना में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष कोई भी विक्षोभ, इसकी कार्बन-उपार्जन एवं जल वाष्पोत्सर्जन क्षमता को प्रभावित करता है ।

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

पर्यावरण परिक्रमा

सन् १९९० के बाद ८ साल बढ़ी भारतीयों की उम्र

भारतीयों की औसत आयु में आठ साल का इजाफा हुआ है । यह इजाफा साल २००९ में देखा गया जो कि दो दशक पहले की तुलना में अधिक है । यह आंकडा वैश्विक औसत जीवन प्रत्याशा (लाइफ एक्सपेक्टेंसी) से भी तीन वर्ष अधिक है ।
ये आकड़े विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी हेल्थ स्टेटिटिक्स २०११ में सामने आए है । आंकड़े बताते है कि साल २००९ के दौरान एक भारतीय महिला अपने पुरूष साथी से तुलना में तीन साल अधिक जीवित रही । यानी भारतीय पुरूष की जीवन प्रत्याशा उम्र ६३ साल की तुलना में ये महिलाएं ६६ वर्ष की उम्र तक रहीं । आंकड़ो के मुताबिक, लेकिन इस शताब्दी के बाद महिलाआें की यह उम्र ६२ और पुरूष की ६० वर्ष रह जाएगी । ये आंकड़े औसतन ६५ वर्ष की उम्र रहे जीवित रहे भारतीयों पर जारी हुए है ।
रिपोर्ट के मुताबिक साल २००९ में वैश्विक औसतन जीवन प्रत्याशा उम्र ६८ साल रही । तुलनात्मक रूप से देखें, तो १९९० में भारतीयों की औसतन आयु
५७, जबकि साल २००० में यह ६१ वर्ष देखी गई । डब्ल्यूएचओ के अनुसार, १९९० के बाद से महिला-पुरूषों की वैश्विक आबादी की उम्र में ४ साल की बढ़त हुई है ।
आंकड़े बताते है कि चीन और भारत की महिला-पुरूष आबादी के तुलनात्मक अध्ययन से पता चला है कि औसत आयु से चीनियों की जीवन प्रत्याशा नौ साल ज्यादा है । १९९० में चीनियों की औसत आयु जहां ६८ वर्ष थी, २००९ में यह ७४ वर्ष तक जा पहुंची । हालांकि भारतीयों से पाकिस्तानियों की औसतन आयु दो वर्ष कम है । पाकिस्तान में जीवन प्रत्याशा की औसत आयु ६३ साल है, जबकि नेपाल में यह ६७, थाईलैण्ड में ७० और बांग्लादेश में ६५ है । जीवन प्रत्याशा के ये आकड़े भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक है । रिपोर्ट बताती है कि वर्ष २०२१ तक एक भारतीय महिला ७२.३ वर्ष तक जीवित रहने की इच्छा कर सकती है जो कि २००१ में ६६.१ और वर्तमान में ६८.१ साल थी ।

पन्ना में बनेगा बॉयोस्फियर रिजर्व
मध्यप्रदेश के पन्ना वन क्षेत्र को राज्य का तीसरा बायोस्फियर रिजर्व बनाए जाने की तैयारीं की जा रही है । पन्ना की नैसर्गिक जैव विविधता को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है ।
इस परियोजना का प्रस्ताव एनवॉयरमेंटल प्लानिंग एंड कॉरडिनेशन ऑरगेनाईजेशन की ओर से बनाया गया है जिसका राज्य सरकार द्वारा गठित अंतर विभागीय समिति की ओर से अनुमोदन के बाद अब इसे केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को भेजा जाएगा । भारत में बॉयोस्फियर रिजर्व यूनेस्को के मेन एंड बॉयोस्फियर को ध्यान में रखकर बनाए जाते है ये एक अंतर्राष्ट्रीय अवधारणा है इसमें जंगलों को उनमें रहने वाले ग्रामीणों और आदिवासियों के साथ संरक्षित किया जाता है ऐसे बॉयोस्फियर रिजर्व का क्षेत्रफल विशाल होता है और कोर क्षेत्र को नियम के मुताबिक संरक्षित रखा जाता है । जबकि बफर और ट्रांजीशन क्षेत्र में अभ्यारण्य रखे जाते है । बफर और ट्रांजीशन क्षेत्र में आदिवासियों और ग्रामीणों को जस का तस रहने दिया जाता है ।
अभी तक भारत में १६ बॉयोस्फियर रिजर्व बनाए गए है जबकि दुनिया में १०९ देशों में ५६४ बॉयोस्फियर रिजर्व बने है । मध्यप्रदेश में ये दो है । इनमें से एक पचमढ़ी बॉयोस्फियर रिजर्व है जबकि दूसरा मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा पर आने वाला अचानक मार-अमरकंटक बॉयोस्फियर रिजर्व है । पन्ना बॉयोस्फियर रिजर्व मध्यप्रदेश का तीसरा बॉयोस्फियर रिजर्व होगा, जिसका कुल क्षेत्रफल लगभग ३००० वर्ग किलोमीटर रखा गया है । इसका विस्तार पन्ना तथा छतरपुर जिलों तक होगा जिसमें पन्ना राष्ट्रीय उद्यान तथा गंगऊ और केन द्यड़ियाल अभ्यारण्यों को शामिल किय जाएगा । इसमें कुछ हिस्सा खजुराहों युनेस्को की तरफ से पहले ही विश्व धरोहर घोषित किया जा चुका है ।
बॉयोस्फियर रिजर्व के लाभ समाज विज्ञानी मानते है कि जंगल से आदिवासियों को खदेड़े जाने पर वह शिकारियों के साथ मिलकर जन जीवों का शिकार करने लगते है या गलत रास्ते पर चले जाते है । बॉयोस्फियर रिजर्व की अवधारणा से आदिवासियों की इन चिन्ताआें को दूर किया जा सकेगा ।

युवा ने बनाई भूसी से बिजली

आत्म निर्भरता के साथ-साथ पर्यावरण सुधार और गरीबी के बाजवूद तरक्की के साथ कदमताल करने का करिश्मा कैसे किया जा सकता है, यह कोई बिहार के इलेक्ट्रिल इंजीनियर जानेश पांडेय से सीखे । भूसी से साफ-सुथरी बिजली बनाकर अपने राज्य के पश्चिमी चंपारण जिले के बेहद गरीब ३८० गांवों को जगमगाने का काम ने उन्हें पूरी दुनिया की निगाहों में ला दिया है ।
अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में ब्रिटेन के जानेमाने एशडेन अवार्ड की चयन समिति ने ज्ञानेश के काम को दुनिया के पांच सबसे इनोवेटिव ग्रीन प्रॉजेक्ट्स में शामिल किया है । एशडेन के मुताबिक युवा ज्ञानेश की कंपनी के ६५ मिनी पावर प्लांटों से ऐसे करीब दो लाख लोगों को बिजली मिल रही है जिनके पास इससे पहले बिजली पाने का कोई जरिया न था । इस बिजली की कीमत भी बहुत वाजिब है । सौ रूपये महीने के खर्च पर प्रत्येक घर को ५० वॉट बिजली मिल रही है, जिससे सीएफएल के दो बल्ब जलाए जा सकते है और मोबाइल फोन चार्ज किया जा सकता है । एशडेन की नजर में इस प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा फायदा पर्यावरण को होगा क्योंकि इससे कार्बनडाइऑक्साइड के उत्सर्जन में सालाना ८ हजार टन की कटौती हो रही है ।
भारत जैसे गरीब मुल्क के लिए ऐसे आविष्कार कई और मायनों में क्रांतिकारी कहे जा सकते है । देश में आज भी ऐसे हजारों गांव है जहां बिजली पहुंचाने का कोई इंतजाम तमाम दावों के बावजूद शायद अगले दस साल मेंे भी मुमकिन नहीं हो पाएगा । इसके अलावा शहरों में बिजली की खपत में बेहिसाब बढ़ोतरी के चलते वे गांव-कस्बे भी अभी अंधेरे में डूबे रहते है जहां कहने को बिजली पहुंची हुई है । आजादी के ६० साल बाद भी लालटेन की रोशनी में पढ़ते बच्चें की यह मजबूरी खत्म की जा सकती है, बशर्ते वहां धान की भूसी जैसी बेकार समझी जाने वाली चीजों से बिजली बनाने के इंतजाम हो जाएं । ज्ञानेश के हस्क पावर प्लांट इस मामले में बड़ी उम्मीद जगाते है ।
अपने देश में गांवों को आत्मनिर्भर बनाने वाले कुछ ऐसे प्रयोग पहले भी हुए है - जैसे गोबर गैस प्लांटो से घरों को बिजली और खाना पकाने की गैस एक साथ दे सकने वाला अद्धुत इंतजाम । अनुमान है कि करीब २५ लाख घरों को इससे बिजली मिल रही है । लेकिन देश में बिजली की बढ़ती जरूरतों के बावजूद अब इसकी कोई विशेष चर्चा न होना हैरानी पैदा करता है । भारत की जमीन से उठे आविष्कारों का कोेई मतलब तभी है जब गरीब जनता को उनका भरपूर फायदा दिलाया जाए ।

कान्हा और पेंच को जोड़ने की कोरीडोर योजना
मध्यप्रदेश के विभिन्न नेशनल पार्क टाइगर रिजर्व में वन्य प्राणियों की मौतीं की घटनाआें में अचानक ही वृद्धि को राज्य शासन ने गंभीरता से लिया है । इन दुर्लभ होते जो रहे वन्य प्राणियों के संरक्षण के लिये अनेक उपाय किये जा रहे हैं जिनमें कान्हा और पेंच नेशनल पार्क को जोड़ने वाली कारीडोर योजना भी शामिल है ।
वन विभाग के सूत्रों के अनुसार बांधवगढ़, पन्ना, कान्हा पेंच नेशनल पार्क एवं राजधानी भोपाल के वन विहार में बिते कुछ माहों में अचानक ही अनेक बाघों की मौत हो चुकी है । राज्य शासन ने इसे अत्यन्त गंभीरता से लिया है और बाघों के संरक्षण के लिये एक कार्य योजना को क्रियान्वित किया जा रहा है । इसी क्रम में सतपुड़ा अंचल के मंडला, बालाघाट जिले की सीमा में स्थित कान्हा नेशनल पार्क एवं सिवनी जिले की सरहद में स्थित पेंच नेशनल पार्क को जोड़ने के लिये कारीडोर बनाया जाना प्रस्तावित है ।
सूत्रों के अनुसार इस कारीडोर के बनने से वन्य प्राणियों के साथ बाघों को सुरक्षित विचरण सुनिश्चित होगा, आगामी दो साल में यह कारीडोर बन कर तैयार हो जायेगा । कारीडोर के निर्माण में सिवनी के साथ मंडला जिले के १३८ ग्राम बीच में आ रहे है, जिनमें वन गांव भी शामिल है । इन ग्रामों को वहां से हटाया जाना जरूरी होगा । अन्यथा वन्य जीवों की आवाजाही प्रभावित होगी इस स्थिति में सभी १३८ गांवों के विस्थापन की योजना बनायी जा रही है ।
बताया गया है कि प्रस्तावित कारीडोर पेंच नेशनल पार्क से लगे पेंच अभ्यारण्य दक्षिण वनमण्डल के रूखड़ अरी बरघाट एवं उगली वन परिक्षेत्र के सुदूर वनांचलों से होते हुए मंडला जिले के नैनपुर, चिरई डोगरी, वन परिेक्षेत्रों से होता हुआ कान्हा नेशनल पार्क से जुड़ेगा ।
इस कारीडोर के बन जाने से पेंच पार्क के बाघ स्वछंद विचरण करते हुये कान्हा तक पहुंच सकेगे, साथ ही वहां के अन्य वन्य प्राणी भी इसी कारीडोर से होते हुये पेंच की परिधि में प्रवेश कर सकेगेंऔर मध्य में पड़ने वाले ग्रामों के विस्थापन होने से वन्य प्राणियों समुचित सुरक्षा हो सकेगी, क्योंकि सभी ग्राम काफी आबादी वाले है ।

रविवार, 24 अप्रैल 2011

पर्यावरण परिक्रमा


कृषि भूमि को बचाना जरूरी


देश में पिछले दो दशक में करीब २८ लाख हेक्टेयर कृषि भूमि घट गई है । यदि भूमि घटती रही, तो अन्न का उत्पादन भी घटेगा ही ।
देश में बीते दो दशक में लगभग दो फीसदी खेती की जमीन कम हो गई है । और रकबा करीब २८ लाख हेक्टेयर होना चाहिए । यह बयान किसी और का नहीं, बल्कि देश के कृषि मंत्री शरद पंवार का है, जो उन्होनें संसद में दिया है । यानी, देश में खेती की जमीन का घट जाना कोई अटकलबाजी नहीं है, बल्कि एक डरावना सच है । बीस साल में २८ लाख हेक्टेयर जमीन आखिर कहां चली गई ? यह जमीन शहरों के फैलाव, कारखानों के निर्माण और उत्खनन की भेंट चढ़ गई है ।
देश के उन इलाकों मे जाकर देखा जा सकता है, जहां भूगर्भ में खनिज पाए जाते है । वहां की खेती योग्य जमीन के साथ ही साथ जंगल भी बर्बाद कर दिए गए है । कारखानों केे लिए जो जमीन आवंटित कर दी जाती है, वह भी उपजाऊ ही होती है । इधर, शहरों का फैलाव तो हो ही रहा है और वह भी अतार्किक ढंग से । यह सही है कि पिछले दो दशक में देश में शहरीकरण भी तेजी से हुआ है । यानी, ग्रामीण आबादी का एक हिस्सा गांवों से पलायन करके शहरों में आ गया है, लेकिन सच यह भी है कि शहरीकरण जिस अनुपात में हो रहा है, शहरों का फैलाव उससे कई गुना ज्यादा हो रहा है ।
इस संदर्भ में दिल्ली का उदाहरण सबसे ज्यादा मुफीद रहेगा । दो दशक पहले इसकी आबादी करीब एक करोड़ ४५ लाख थी, अब अनुमान यह है कि यह एक करोड़ ७५ लाख होनी चाहिए । यानी, दिल्ली की आबादी में दो दशक में लगभग १६ फीसदी का इजाफा हुआ, पर शहर कितने फीसदी बढ़ा ? करीब सत्तर फीसदी । इन सब स्थितियों को ध्यान में रखकर खेती की जमीन के संरक्षण की योजना बनाई जानी चाहिए । शहरों में तो बहुमंजिला इमारतें बन सकती है, पर खेती को बहुमंजिला नहीं बनाया जा सकता । कृषि भूमि घटती रही, तो बढ़ती आबादी का पेट कैसे भरेगा ? यह सरकार के लिये चिंता का विषय होना चाहिए ।


नदी और खारे पानी से पैदा होगी बिजली

वैज्ञानिकों ने एक ऐसी बैटरी का इजाद करने का दावा किया है जो मीठै और समुद्रीजल के खारेपन में विभेद कर ऊर्जा पैदा कर सकती है । शोध के नेतृत्वकर्ता ई चुई ने कहा कि जब एश्चुरी के जरिए नदी का पानी समुद में प्रवेश करता है तो इस बैटरी का इस्तेमाल करके वहां ऊर्जा संयंत्र बनाया जा सकता है ।
ताजे पानी की कम उपलब्धता का जिक्र करते हुए उन्होनें कहा कि वास्तव में हमारे पास अथाह समुद्री जल है, दुर्भाग्य से मीठे पानी की मात्रा बहुत कम है । बैटरी से ऊर्जा पैदा करने की संभावना जाहिर करते हुए शोधकर्ताआें ने हिसाब लगाया कि यदि दुनिया की सभी नदियों में उनकी बैटरी का इस्तेमाल किया जाए तो एक साल में करीब दो टैरावाट बिजली की आपूर्ति की जा सकती है जो मौटे तौर पर वर्तमान में दुनिया में इस्तेमाल होने वाली कुल ऊर्जा का १३ प्रतिशत है । बैटरी अपने आप में बहुत ही आम है ।
इसमें दो इलेक्ट्रोड है, एक पॉसीटिव और एक नेगेटिव, जो विद्युत चार्ज कणों या लोहे की छड़ों से युक्त एक द्रव में डूबे रहते है पानी में सोडियम या क्लोरीन आयरन है, जो आम साल्ट के घटक है । शुरूआत में बैटरी में मीठा पानी भरा जाता है और हल्के इलेक्ट्रिक करंट के जरिए इसे चार्ज किया जाता है । बाद में मीठा पानी निकालकर इसमें समुद्री जल भरा जाता है नैनी लीटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक समुद्री पानी में आयन मीठे जल से ६० से १०० गुना अधिक होते है इसलिए दोनों इलेक्ट्रॉड के बीच वोल्टेज बढ़ जाता है । यह इसे बैटरी को चार्ज करने से अधिक बिजली पैदा करने में मददगार साबित होता है ।

वनों और नदियों की सफाई होगी

भारत सरकार के नये बजट में वनों के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ ऊर्जा कोष से २०० करोड़ रूपए ओर पर्यावरण मंत्रालय के लिए २४९१.९७ करोड़ रूपए का आवंटन का प्रस्ताव है वर्ष २०११-१२ में २०० करोड़ रूपए के प्रभावी क्रियान्वयन का प्रस्ताव रखते हुए वित्त मंत्रीने कहा , वनों के संरक्षण का महान पारिस्थितिकीय,आर्थिक ओर सामाजिक मूल्य रहा है । हमारी सरकार ने महत्वकांक्षी १० वर्षीय हरित भारत मिशन शुरू किया है । आशा करनी होगी कि सरकारी प्रयासों को सफलता मिलें ।

मैंग्रोव वन रोकेंगे सुनामी लहरें

विज्ञान की तमाम उपलब्धियों के बावजूद भूकंप और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाआें की सटीक भविष्यवाणी नहीं की जा सकती । ऐसे उपायों में एक महत्पूर्ण भूमिका तटीय इलाकों में सुरक्षा दीवारों के रूप में काम करने वाले मैंग्रोव वनों की है ।
जापान में सुनामी के बाद पैदा हुए फुकुशिमा संकट ने दुनिया भर में जहां परमाणु संयंत्रों प्राकृतिक उपायों को मजबूत करने की मांग भी उठने लगी है । अब यह साफ तौर पर नजर आने लगा है कि ग्लोबल वॉर्मिंग, पर्यावरण के असंतुलन और जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक आपदाआें में बढ़ोतरी हो रही है और ये आपदाएं पहले की तुलना में ज्यादा विनाशकारी साबित हो रही है । देखा जाए तो विज्ञान की तमाम उपलब्धियों के बावजूद भूकंप ओर सुनामी जैसी प्राकृतिक उपायों द्वारा इनके दुष्परिणामों को कम अवश्य किया जा सकता है ।
ऐसे उपायों में एक महत्वपूर्ण भूमिका तटीय इलाकों में सुरक्षा दीवार के रूप में काम करने वाले मैंग्रोव वनों की है । यही वजह है कि हाल में प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक एम. एस. स्वामीनाथन ने सरकार से कलपक्कम और कुंडनकुलम एटॉमिक रिएक्टरों के नजदीक तटीय क्षेत्र में घने मैंग्रोव वन लगाने की सलाह दी है । मैंग्रोव वनों को समुद्र के सदाबहार वन भी कहा जाता है । इनके महत्व का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि समुद्र में पाए जाने वाले ९० फीसदी जीव-जंतु अपने जीवन का कुछ न कुछ हिस्सा मैंग्रोव तंत्र में अवश्य बिताते है ।
पूरी दुनिया में भूमध्य रेखा के एकदम नजदीक के बेहद गर्म इलाकों और फिर इसके अगल-बगल के थोड़े कम गर्म और नम तटीय क्षेत्रों में पाए जाने वाली मैंग्रोव वनस्पतियां कभी ३.२ करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र को ढके हुए थी, जो कि आज आधे से भी कम अर्थात १.५ करोड़ हेक्टेयर में सिमट गई है ।
कभी मैंग्रोव वन भारत और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के तटीय क्षेत्रों में काफी बड़े इलाके में छाए हुए थे, लेकिन उनका ८० फीसदी हिस्सा पिछले छह दशकों में नष्ट हो चुका है । समुद्री तूफान जैसी आपदा के समय तटीय क्षेत्रों के लिए सुरक्षा पंक्ति का काम करने वाले ये मैंग्रोव वन आज गहरे संकट में है । वैसे तो इन वनों के अस्तित्व को लेकर काफी समय से चिंता जताई जा रही थी, लेकिन इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर को हाल की एक रिपोर्ट ने दुनिया भर के पर्यावरण प्रेमियों को चिंता में डाल दिया है ।
रिपोर्ट के मुताबिक तटीय क्षेत्रों में चल रही विकास गतिविधियों के कारण दुनिया में हर छह मे से एक मैंग्रोव प्रजाति विलुप्त् होने की कगार पर है । संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार मैंग्रोव वन सालाना एक दो फीसदी की दर से नष्ट हो रहे है और १२० में से २६ देशों में इनके अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे है ।
आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों नजरियों से मैंग्रोव वनों का नष्ट होना काफी नुकसानदेह है । ये वन न केवल जलवायु परिवर्तन से लड़ने में सक्षम होते है, बल्कि ये तटीय क्षेत्रों के लोगों को रोजी-रोटी भी मुहैया कराते है । समुद्री जीव - जंतुआं के अलावा अनेक जंगली जीवों को भी मैंग्रोव वनों में आश्रय मिलता है । इनकी मजबूत जड़े मजबूत जड़ें समुद्री लहरों से तटों का कटाव होने से बचाती हे । घने मैंग्रोव चक्रवाती तूफान की गति धीमी करके तटीय आबादी को तबाही से बचाते है ।

शिक्षा से जुड़ा है लंबी उम्र का राज

आपकी लंबी आयु का राज आपके शिक्षा के साथ जुड़ा हुआ है । नए शोध के मुताबिक आप जितने अधिक शिक्षित होंगे आपकी आयु उतनी ही लंबी होगी । अमरीकी ब्राउन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताआें ने पाया कि उच्च विद्यालय की पढ़ाई नहीं पूरी कर पाने वाले लोगों की तुलना में कालेज और विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले व्यक्तियों का रक्त चाप कम होता है ।
डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक जिनके पास मास्टर डिग्री और डॉक्टरेट की उपाधि होती है वह ज्यादा स्वस्थ होते है और महिलाआें पर यह बात ज्यादा लागू होती है इस शोध में बताया गया है कि उच्च रक्त चाप की वजह से दिल का दौरा पड़ने की संभावना दोगुनी हो जाती है और अच्छी शिक्षा की वजह से आपकी आयु लंबी होती है ।
इस शोध के लिए शोधकर्ताआें ने तीन वर्ष तक के करीब ४००० अमेरिकी महिलाआें और पुरूषों के स्वास्थ का अध्ययन किया । इसमें पाया गया है कि १७ वर्ष या उससे अधिक उम्र की महिलाआें को ज्यादा शिक्षित थी उनका रक्त चाप उसी उम्र की उच्च् विद्यालय की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाने वाली महिलाआें की तुलना में कम था और यही बात पुरूषों में भी पाई गई ।
बीएमसी पब्लिक हेल्थ मैग्जीन में प्रकाशित इस शोध से यह जानकारी सामने आई कि ज्यादा पढ़े लिखे लोग धुम्रपान और शराब का सेवन भी अपेक्षाकृत कम करते है जबकि पढ़ी लिखी महिलाएं भी ज्यादा स्वस्थ रहती है ।
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गुरुवार, 24 मार्च 2011

पर्यावरण परिक्रमा


जानवरों पर प्रयोग नियंत्रित करने की तैयारी

पिछले दिनों दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में बंदी बनाए गए जानवरों का मामला प्रकाश में आने के बाद केन्द्र सरकार एक कानून बनाने की तैयारी मेंहै । इसके तहत जानवरोंपर संस्थान का व्यक्तिगत रूप से किए जाने वाले प्रयोगों को नियंत्रित किया जाएगा । पिछले दिनों हॉलीवुड अभिनेत्री पामेला एंडरसन ने एम्स में प्रयोग के लिए बंद जानवरों को छोड़ने के लिए पत्र लिखा था ।
प्रस्तावित एनिमल वेल्फेयर एक्ट २०११ के लिए एक कमेटी बनाई गई है । इसका उद्देश्य जानवरों पर संस्थानों और व्यक्तिगत रूप से किए जाने वाले प्रयोग पर निंयत्रण और निगाह रखना है । कमेटी को जानवरों पर प्रयोग के दौरान अनावश्यक चोट और दर्द न हो ऐसे उपाय खोजने के निर्देश दिए गए हैं । कमेटी में सेंट्रल जू प्राधिकरण भारतीय पशु चिकित्सा काउंसिल तथा पशु कल्याण संस्थान के प्रतिनिधि, अधिकारी व गैर-अधिकारी शामिल हैं । संसद में मसौदा बिल पास होने के बाद पशु क्रूरता करते पाए जाने पर सजा के रूप में जेल और भारी जुर्माना लगाया जाएगा । इसके साथ ही कमेटी ने कहा कि संस्थानों को जानवरों पर विभिन्न प्रयोगों की जानकारी और वैकल्पिक उपाय पर किए गए प्रयोगों का रिकार्ड भी रखना होगा । अगर किसी संस्थान में प्रयोग हुआ है तो उसकी जिम्मेदारी उस संस्थान के मुखिया की रहेगी । पामेला ने एम्स में मौजूद बंदर और चूहों पर होने वाले शोध कार्योंा का एक वीडियो देखने के बाद पत्र लिखा था । इसमें एम्स से आग्रह किया है कि बंदरों को अभयारण्य में छोड़ दें । उन्होंने आरोप लगाया था कि पकड़े गए जानवरों पर नई दवाआें के विकास के दौरान प्रयोग किया जाता है ।

दूसरी हरित क्रांति की चुनौतियों
दूसरी हरितक्रांति की घोषणा पर केन्द्र सरकार ने कृषि पैदावार बढ़ाने का प्रयास तो किया है, लेकिन अब उसकी रफ्तार को तेज करने की आवश्यकता उच्च विकास दर प्राप्त् करने और खाद्य सुरक्षा बनाए रखने के लिए कृषि पैदावार में वृद्धि जरूरी है । आगामी आम बजट में कृषि सुधार के कारगर उपायोंको लागू करना सरकार के लिए गंभीर चुनौती होगी । बीते सालों में कृृषि सुधार के कुछ उपाय तो किए गये, लेकिन आधू अधूरे मन से, कृषि क्षेत्र मेंसुधार की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है । कृषि विकास की दर ०.४ फीसदी से बढ़कर चालू सीजन में ५.४ फीसदी तक पहुंच गई लेकिन इस दर को बनाए रखने और किसानों की मुश्किलों को घटाने की चुनौती है । पिछले बजट में पैदावार बढ़ाने के लिए पूर्वी राज्यों में दूसरी हरितक्रांति की घोषणा की गई थी । कृषि विकास की मौजूदा दर से सरकार भले ही गदगद हो, लेकिन किसानों के लिए मुश्किलें बनी हुई हैं । इसीलिए माना जा रहा है कि वित्तमंत्री कृषि क्षेत्र में सुधार के कुछ नये व आकर्षक प्रावधान इस बार कर सकते हैं । घाटे में फंसी खेती को लाभ का कारोबार बनाने के कई प्रयास किए गये, लेकिन कृषि विपणन की माकूल व्यवस्था न होने से सारे प्रयास धराशायी हो गये । उच्च विकास दर के लिए कृषि उत्पादकता बढ़ानी ही होगी । राज्यों के कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएससी) के कानून अलग-अलग हैं। खाद्यान्न के अंतरराज्यीय कारोबार पर कई तरह की बंदिशें, फसलों की खलिहान से सीधी बिक्री पर रोक, मंडी शुल्क, चुंगी शुल्क समेत कई स्थानीय करों के चलते कृषि क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित है । संसाधनों के मंहगा होने से कृषि लागत बढ़ रही है । मार्केटिंग की व्यवस्था न होने से किसानों को अनाज सस्ता बेचना पड़ता है । वित्तमंत्री को इसके लिए कुछ करना होगा । गेहूँव चावल को छोड़ बाकी फसलों की आयात निर्भरता लगातार बढ़ रही है । जिसे घटाना वित्तमंत्री की चुनौतियों में शामिल होगा । घरेलू खपत का ५० फीसदी से अधिक खाद्य तेल आयात हो रहा है, जबकि दालों का आयात पिछले एक दशक में बढ़कर ४० से ४५ लाख टन पहुंच गया है ।

सीमांत वन क्षेत्र के डिजिटल मैप
केंद्र सरकार, प्रदेश के सीमांत और गैर वन क्षेत्रों (फ्रिंज फॉरेस्ट) का अध्ययन कर डिजिटल मैप तैयार कराएगी । योजना के प्रथम चरण में म.प्र. के २८ जिलों में यह अध्ययन किया जाएगा ।
केंद्रीय वन एवं मंत्रालय के अधीन गठित असिंचित क्षेत्र विकास प्राधिकरण यह अध्ययन करेगा । देशभर में ऐसे २७५ जिले चिह्रित किए गए हैं, जहां सीमांत वन क्षेत्र हैं । इनमें से अधिकांश क्षेत्रों में वन नहीं है, या कम हैं अथवा अविकसित वन क्षेत्र हैं । इन क्षेत्रों के वनों की दृष्टि से विकास के लिए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने विस्तृत कार्ययोजना तैयार की है ।
दो चरणों में इसका क्रियान्वयन किया जाएगा । पहले चरण में प्रदेश के २८ जिलों को लिया जा रहा है । हाल ही में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जयराम रमेश ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर पहले चरण के क्रियान्वयन के लिए राज्य सरकार से सहयोग मांगा है । राज्य के वन, कृषि उद्यानिकी विभागों के अलावा मृदा एवं जल परीक्षण एजेंसियों को अध्ययन करने आने वाली प्राधिकरण की टीम के साथ स्थानीय स्तर पर जोड़ने के लिए कहा गया है । इन क्षेत्रोंके अध्ययन के बाद इनके डिजिटल मैप तैयार किए जाएंगे ओर विस्तृत वनीकरण के कार्योंा की ऑनलाइन मॉनीटरिंग की जाएगी । इस प्रोजेक्ट की समयावधि दो वर्ष तय की गई है ।

दवाआें पर होगा बार कोड और मोबाइल नंबर
भारत में अब नकली दवाएं बेचना संभव नहीं होगा । मेडिकल स्टोर पर मिल रही दवा असली है या नकली, यह पता लगाने के लिए ग्राहक को किसी अधिकारी के पास जाने की जरूरत भी नहीं होगी । एक आम आदमी भी महज एक एसएमएस से पता लगा पाएगा कि जो दवा वह खा रहा है, वह असली ही है ।
पिछले दिनों १५ फरवरी को हुई बैठक में ड्रग कंसल्टेटिव कमेटी (डीसीसी) मंजूरी दी जा चुकी है ।अब इस अनुसंसाआें को ड्रग टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड को भेजा
जाएगा । यहां से मामला केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय जाएगा । नकली दवाआें की भारी शिकायतों को देखते हुए सरकार ने इसे मंजूरी देने का मन बना लिया है । अब तक इस तरह की व्यवस्था इटली, मलेशिया और यूरोपियन यूनियन देशों में लागू है ।
दवा के हर पत्ते पर (स्ट्रीप) पर बार कोड ओर यूनिक न्यूमरिक कोड (यूआईडी) होगा । साथ ही मोबाईल नंबर भी दिया जाएगा । क्या असली है या नकली यह जानने के लिए यह यूआईडी नंबर को इस मोबाइल पर एसएमएस करना होगा । उधर से जवाब मिलेगा और दवाई की सच्चाई सामने आ जाएगी ।
यह व्यवस्था लागू होते ही नकली दवाआें का बाजार खत्म हो जाएगा । हर मरीज पूरे विश्वास के साथ दवा ले पाएगा जो सौ फीसदी कारगर होगी ।

विकास के नाम पर पेड़ों की बलि
विकास और विनाश एक-दूसरे के पूरक हैं। ऐसा ही कुछ हो रहा है मध्यप्रदेश में सड़क, घर, पानी बिजली, उद्योग जैसी अहम जरूरतों की पूर्ति के लिए पिछले कुछ सालोंमें काफी काम हुए और इसके लिये लाखों पेड़ों की बलि चढ़ाई गई । सरकारी आंकड़ांे में बीते छह सालों में अकेलेभोपाल में साढ़े छह हजार पेड़ों की बलि विकास के लिए चढ़ चुकी है । जब प्रदेश के विभिन्न जिलों से विकास के नाम पर बलि चढ़े पेड़ोंें की जानकारी वाले आंकड़ों में भोपाल, इंदौर जैसे शहरों में सबसे ज्यादा संख्या में पेड़ों की बलि बीआरटीएस के तहत बन रहे सड़क के कारण चढ़ी है । भोपाल में सिमरोद से बैरागढ़ तक बन रहे २४ किमी लंबे बीआरटीएस कॉरिडोर के लिए २३३३ पेड़ काटे गए हैं । इंदौर में भी करीब ढाई से तीन हजार पेड़ों की बलि बड़े मार्गोंा के निर्माण में चढ़ाई गई है ।
कई मर्तबा पेड़ों की बलि का मामला न्यायालय तक पहुंचा तो कहा गया कि जितने पेड़ काटे गये हैं, उतने ही किसी ओर स्थान पर लगाओ । इन आदेशों की कागजी खानापूर्ति तो कर दी जाती है, लेकिन जहां पौधरोपण होता है, वहां कोई देखने नहीं जाता कि क्या हो रहा है । हाईकोर्ट ने एक मामले में जबलपुर नगर निगम को निर्देश दिए थे कि जितने पेड़ काटो, उसके दोगुने लगाओ, लेकिन क्रियान्वयन सिर्फ कागजों पर हुआ । वृक्ष काटने की अनुमति संबंधी अधिकार नगर निगमों के पास है, जहां बाकायदा रिकार्ड रखा जाता है, लेकिन अधिकांश मामलों में बिना अनुमति ही कुल्हाड़ी चला दी जाती है ।
भोपाल के विकास कार्य के तहत पिछले छह सालों में ६४९६ वृक्षों की बलि दी गई । सर्वाधिक २३३३ वृक्ष राजधानी में मिसरोद से बैरागढ़ तक बन रहे २४ किलो मीटर लंबे बीआरटी कॉरीडोर के लिए काटे गए । नर्मदा योजना पर भोपाल नगर निगम सीमा में ११०५ वृक्षों को काटा गया । यह आँकड़े तो वह हैं, जिनके लिए शासन से अनुमति ली गई थी । बिना अनुमति हजारों की संख्या में पेड़ कटे हैं । ऐसी ४८ संस्थाआें के खिलाफ प्रकरण भी दर्ज हुए हैं ।
विकास कार्योंा में न केवल शहरी सीमा में बल्कि आसपास के क्षेत्रोंको भी काफी हद तक प्रभावित किया है । जबलपुर एवं उसके आसपास के जंगलों का क्षेत्रफल निरंतर घटता जा रहा है । पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार नीम, पीपल, बरगद, शिवनाक, मोलसरी, पीपल ऐसे वृक्ष हैं जो प्रदूषण कम करते हैं, लेकिन वह भी अब शहरों में नहीं दिख रहे हैं ।
इन्दौर में सरकारी निर्माण कार्योंा के चलते जहां पिछले पाँच-छह सालों में डेढ़- दो हजार पेड़ों की बलि चढ़ाई गई है, वहीं भूमाफियों ने भवन एवं टाउनशिप निर्माण में हजारों पेड़ों की बलि चढ़ाई है । हैरत की बात तो यह है कि नगर निगम की सीमा से बाहर बिल्डरों ने बेखौफ होकर पेड़ काटे, क्योंकि वहां उन्हें किसी तरह की रोक-टोक नहीं थी ।
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शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

पर्यावरण परिक्रमा

आदर्श सोसायटी को गिराने का आदेश

पिछले दिनों पर्यावरण मंत्रालय ने मुंबई स्थित विवादास्पद आदर्श आवासीय सोसायटी को ३१ मंजिला इमारत को अनाधिकृत करार देते हुए उसे तीन महिने के भीतर गिरा देने की सिफारिश की है । हालांकि, इस पर सोसायटी ने कहा कि वह इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देगी । वहीं, महाराष्ट्र सरकार ने कहा कि वह मंत्रालय की सिफारिश पर जल्द ही फैसला करेगी ।
रक्षा प्रतिष्ठानों और कई अन्य अहम संगठनों की मौजूदगी के चलते संवेदनशील माने जाने वाले कोलाबा इलाके में इस इमारत के लिए मूल रूप से छह मंजिलों का निर्माण होना था और इसमें कारगिल युद्ध के शहीदों के परिजनों को आवास दिए जाने थे । लेकिन ३१मंजिलों का निर्माण होने और इसके फ्लैट नेताआें, शीर्ष रक्षा अधिकारियों और नौकरशाहों को भी आवंटित हो जाने के बाद इमारत विवादों में आ गई थी । पर्यावरण मंत्रालय ने अपने अंतिम आदेश में सख्ती से कहा कि इमारत के अनाधिकृत ढांचे को गिरा दिया जाए और उस क्षेत्र को तीन महीने के भीतर उसकी मूल स्थिति में ला दिया जाए । मंत्रालय ने सोासयटी को ही ढ़ांचा हटाने के निर्देश देते हुए कहा कि इमारत को नहीं गिराए जाने की स्थिति में वह अपने निर्देशों को कानूनन लागू कराने के लिए कदम उठाने को मजबूर हो जाएगा ।
पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के दस्तखत वाले इस आदेश में कहा गया कि पूरे ढांचे को हटा दिया जाए क्योंकि यह अनाधिकृत है और इसके निर्माण के लिए तटीय नियमन क्षेत्र (सीआरजेड) अधिसूचना १९९९ के तहत कोई मंजूरी हासिल नहीं की गई थी । मंत्रालय की रिपोर्ट कहती है कि आदर्श आवासीय सोसायटी ने सीआरजेड अधिसूचना १९९९ की मूल भावना का उल्लंघन किया है । सोसायटी ने इस अधिसूचना के तहत मंजिलों के निर्माण के लिए मंजूरी लेने की जरूरत को भी नहीं पहचाना । इस तरह की जरूरत होने के बारे में सोसायटी अवगत थी या नहीं थी, यह मायने नहीं रखता क्योंकि कानून का नजरअंदाज हो जाना उसका अनुपालन नहंी करने का कोई बहाना नहीं हो सकता । पर्यावरण मंत्रालय ने आदर्श सोसायटी को उसकी ३१ मंजिला इमारत के निर्माण के बारे में पिछले वर्ष १२ नवंबर को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए कहा था कि क्यों न उसकी अवैध मंजिलों को गिरा
दिया जाए । बहरहाल, श्री रमेश ने पर्यावरण मंत्रालय के अंतिम आदेश मेंकहा गया कि इमारत क ो गिरा देने के अलावा दो अन्य विकल्पोंपर भी विचार किया गया । एक विकल्प यह था कि अगर उपयुक्त प्राधिकार से जरूरी मंजूरी ली गई होगी तो इमारत की अतिरिक्त मंजिलों को हटाने को कहा जा सकता था । मंत्री ने कहा कि कुछ मंजिलों
को गिराने के विकल्प को इसलिए खारिज करार दिया गया । क्योंकि ऐसा करने का सुझाव देना सीआरजेड अधिसूचना १९९९ के बेहद गंभीर उल्लंघन का नियमितीकरण करने या उसे माफ कर देने जेसा होता ।

पॉस्को प्रोजेक्ट को शर्तों के साथ मंजूरी

केन्द्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय ने दक्षिण कोरियाई इस्पात कंपनी पॉस्को की उड़ीसा परियोजना को ५० शर्तोंा के साथ मंजूरी दे दी है ।
कंपनी जगतसिंहपुर जिले में करीब ६०० अरब रूपये के निवेश से सालाना १२ करोड़ टन इस्पात उत्पादन क्षमता का एक समन्वित कारखाना और उसके साथ अपने काम के लिए एक बिजलीघर और बंदरगाह विकसित करना चाहती है । केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने अपने आदश में कहा कि पोस्को की इस परियोजना के लिए भू-प्रयोग परिवर्तन पर पक्का निर्णय उड़ीसा सरकार से वन अधिकार कानून के अनुपालन के संबंध में आश्वासन मिलने के बाद किया जाएगा । पर्यावरण और वन कानूनों के चलते परियोजना अटकी हुई थी ।
पर्यावरण मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि पोस्को के इस्पात और कैप्टिव बिजलीघर की परियोजना को २८ अतिरिक्त शर्तोंा और पोस्को बंदरगाह को ३२ अतिरिक्त शर्तोंा के साथ मंजूरी दी जाती है । बयान मेंकहा गया है कि इस इस्पात कारखाने और उसके लिए कैप्टिव बिजलीघर के १९ जुलाई २००७के आदेश और पोस्को बंदरगाह के १५ मई २००७ के पहले के आदेश में शामिल शर्तोंा के अतिरिक्त नई शर्तोंा के साथ मंजूरी दी जा रही है । बेशक पॉस्को जैसेी परियोजनाआें का देश के लिए आर्थिक तकनीकी और सामरिक महत्व है । लेकिन इसी के साथ पर्यावरण का गंभीरता से पालन करना भी जरूरी है ।

वर्ष २०१० था सबसे गर्म साल

भारत और अन्य दक्षिण एशियाई देशों ने पिछले साल पारे की सबसे ज्यादा उछाल देखी । विश्व मौसम विज्ञान संगठन के मुताबिक दुनिया के लिए वर्ष २०१० रिकार्ड गर्मी वाला रहा । पिछले साल के आंकड़ों ने पृथ्वी के गर्म होने की ओर भी इशारा किया । विभाग के महासचिव माइकल जेरॉड ने बताया पिछले साल ज्यादातर अफ्र ीका, दक्षिण और पश्चिम एशिया, ग्रीनलैंड और आर्कटिक इलाकों में अब तक का सबसे अधिक तापमान दर्ज किया गया । इस वर्ष आर्कटिक पर जमने वाली बर्फ का दायरा भी सबसे कम
रहा । सिर्फ १.३५ लाख वर्ग किमी बर्फ ही जमी रही । यह दिसंबर माह में १९७९-२००० के दौरान औसत से कम है ।
सन् १९६१-९० के दौरान औसत तापमान मे पिछले साल ०.५३ डिग्री का उछाल दर्ज किया गया । यह सबसे ज्यादा गर्म रहे दो वर्षोंा १९९८ और २००५ से भी अधिक था । दुनिया में १९६१-९० के औसत तापमान के मुकाबले २००१-१० के औसत तापमान में .४६ डिग्री की वृद्धि हुई
है ।

जैविक खेती की फसलों में नहीं लगा पाला

म.प्र.में कृषि विभाग के पूर्व संचालक डॉ.जीएस कौशल का कहना है कि खेती की बढ़ती लागत और कर्ज चुकाने की हैसियत न रहने की वजह से किसान टूट गया है । यहि हाल रहा तो आत्महत्याएँ और बढ़ेंगी इसकी रोकथाम के लिए सरकार को जैविक और परंपरागत खेती को बढ़ावा देना चाहिए । मौजूदा समय में जिन किसानों ने जैविक खेती को अपनाया है उनके खेतों में पाला नहीं लगा । इसके एक नहीं कई उदाहरण हैं ।
पूर्व कृषि संचालक ने बताया कि छतरपुर के गाँधी प्रतिष्ठान के १५० एकड़ में गेहूँ, चना, तुअर और आलू की फसल लगाई है । लेकिन इनमें पाला नहीं लगा इसी तरह औबेदुल्ल्लागंज स्थित एमपी काउंसिल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (मेमकॉस्ट) के फार्म में दो एकड़ में चना, इन्दौर के आनंद सिंह ठाकुर के दस एकड़ खेत में आलू, सब्जी, गेहूँ, चना और सेमलिया चाउ के रवि ठाकुर के खेत में छ: प्रकार के परंपरागत किस्मों का गेहूँ, चना और मक्का बोया गया है ।
इनमें से किसी फसल पर पाले का कोई प्रभाव नहीं है । इसकी वजह जैविक खेती की वजह से फसल में रहने वाली नमी और भूमि को मिलने वाले सूक्ष्म जीवाणु मिलते हैं । पत्तियों और तने में नमी होने की वजह से पाला असर नहीं डाल पाता है । इसलिए सरकार को चाहिए कि एक साल से ठंडे बस्ते में पड़ी जैविक खेती नीति को शीघ्र लागू करे । इससे भूमि की सेहत तो सुधरेगी ही, किसानों की माली हालत भी बेहतर
होगी ।

भाग्यशाली साबित हुए जंगली गिद्ध

जंगलों में रहने वाले गिद्ध कम से कम एक मामले में भाग्यशाली हैं । उन्हें अपना पेट भरने के लिए पालतु पशुआेंें के शवांे पर निर्भर नहीं रहना पड़ता । यही वजह है कि जहां उनके शहरी भाई-बंधु डॉयक्लोफेनेक (दर्द निवारक दवा) के कहर की वजह से अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्षरत हैं, वहीं ये जंगली गिद्ध खूब फल-फूल रहे हैं । पिछले दिनों पन्ना टाइगर रिजर्व एवं राष्ट्रीय उद्यान में गिद्धों की गणना में इसी तथ्य की पुष्टि हुई है ।
इस गणना के नतीजों से पता चलता है कि गिद्धों की संख्या और उनके प्रजनन स्थलों में इजाफा हुआ है । उल्लेखनीय है कि डॉयक्लोफेनेक को ही गिद्धों के खत्म होने का प्रमुख कारण माना जाता है । २१ से २३ जनवरी तक पार्क प्रबंधन द्वारा वहां छात्रोंतथा वन्यजीव विशेषज्ञों की मदद से गिद्धों की गणना करवाई गई थी । इसमें पता चला कि अकेले पन्ना टाइगर रिजर्व में ही १०७९ गिद्ध हैं । यह पिछली गणना की तुलना में करीब ४५० ज्यादा है । यह इसलिए संभव हो पाया है कि जंगलों में गिद्ध मरे हुए वन्यजीव खाते हैं जो डॉयक्लोफेनेक के इंफेक्शन से मुक्त होते हैं।
पन्ना टाइगर रिजर्व में २०१० में की गई गणना में ६३० गिद्ध रिकार्ड किए गए थे । इस बार की गणना में लेकिन सिलेंडर बिल्ड वल्चर दिखाई नहीं दिया । गिद्धों की आठ में से सात प्रजाति सिनेरियस वल्चर, हिमालयन, ग्रिफोन, यूरेशियन ग्रिफोन, किंग (रेड हैडेड) वल्चर, लांग बिल्ड, वाइट बैक्ड और इजीपशियन वल्चर ही यहां देखने को मिला । इनमें से लांग बिल्ड वल्चर सबसे अधिक यानी ७७५ पाए गए, जबकि सिरेनियस वल्चर सबसे कम सिर्फ छह दिखे ।
गिद्ध को प्राकृतिक सफाईकर्मी माना जाता है । गिद्धों का एक बड़ा झुंड किसी मरी हुई भैंस को एक घंटे के अंदर खाकर खत्म कर सकता है । इससे ना सिर्फ वातावरण की सफाई होती है । बल्कि लाश से फैलने वाली बीमारियां भी नियंत्रित होती हैं । एक गिद्ध की औसत आयु ५०-६० वर्ष तक होती है जो किसी भी पक्षी के मुकाबले कहींज्यादा है ।
डॉयक्लोफेनेक दवा पालतु मवेशियों को दर्द निवारक के तौर पर दी जाती है । मृतक मवेशियोंके माध्यम से यह दवा गिद्धोंके शरीर में पहुंचकर उनकी किडनी को प्रभावित करती है और वो डिहाइड्रेशन का शिकार होकर मारे जाते हैं । इसी की वजह से गिद्धों की संख्या देश में ९७ प्रतिशत कम हो गई है । ***

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

पर्यावरण परिक्रमा

विकासशील देशों के लिए बनेगा क्लाइमेट फंड

पिछले दिनोंदों महिने की कशमकश के बाद आखिरकार कानकुन सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन पर सहमति बन गई । इसके तहत विकासशील देशोंकी मदद के लिए ग्रीन क्लाइमेट फंड बनाया जाएगा । मेक्सिको ने समझौते का मसौदा पेश किया जिसे बोलिविया की आपत्ति के बावजूद अनुमोदित कर दिया गया ।
मसौदे में कहा गया है कि कार्बन उत्सर्जन और कम करने की जरूरत है । जापान, चीन और अमेरिका ने सबसे ज्यादा विरोध जताया था लेकिन बाद में उन्होंने मसौदे को मंजूरी दे दी । वैसे सम्मेलन के आखिरी दिन प्रतिनिधियों को ज्यादा उम्मीद नहीं थी, लेकिन पर्दे के पीछे हुई कूटनीति रंग लाई जिससे एक ऐसा मसौदा तैयार हो सका जो सबको मंजूर था । रूस और जापान मसौदे मेंअपने हित से जुड़ी बात डलवाने में सफल रहे हैं । वहीं इस मसौदे में कहा गया है कि क्योटो संधि कारगार साबित होगी जो विकासशील देश चाहते थे ।
विशेष ग्रीन क्लाइमेट फंड का मकसद है कि २०२० तक १०० अरब डॉलर जुटाकर गरीब देशोंको दिए जाएं ताकि ये देश जलवायु परितर्वन के नतीजों से निपट सके और कम कार्बन उत्सर्जन की ओर बढ़ सके । पेड़ों की कटाई रोकने के लिए कदमों का प्रावधान है और जलवायु संरक्षण योजना बनाने वाले देशों की मदद एक विशेष समिति करेगी । साथ ही उत्सर्जन में कमी पर नजर भी रखी जाएगी । लेकिन विकासशील देशों में उत्सर्जन कटौती करने के कदमों की अंतराष्ट्रीय निगरानी तभी हो सकेगी जब कटौती के लिए पश्चिम देश पैसा देंगे ।
सम्मेलन के हुए समझोते पर भारत ने खुशी जाहिर की है । पर्यावरणमंत्री जयराम रमेश ने कहा कि भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और चीन २०० देशोंके जलवायु वार्ताकारोंद्वारा क्योटो प्रोटोकॉल पर और दीर्घकाल में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए तैयार दस्तावेजों से बेहद खुश है । हालांकि १९३ देशोंद्वारा वितरित किए प्रारूप को औपचारिक रूप से अभी स्वीकार किया जाना है ।

जानवरों को भी सता रहा मोटापे का डर

क्या हमारे वातावरण में ही कुछ ऐसा हो रहा है कि इन्सान और जानवर सभी मोटे हो रहे हैं ? प्रोसीडिंग्स ऑफ रॉयल सोसायटी में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार , मोटापे में बड़े ही नाटकीय ढंग से वृद्धि हो रही है ।
यह किसी से छुपा नहीं है कि इंसानों में मोटापा अब महामारी का रूप ले चुका है । शोधकर्ताआें ने शरीरिक श्रम में कमी या अत्यधिक जंक फूड खाने की आदत जैसे सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए यह निष्कर्ष निकाला है कि शायद पर्यावरण के किसी कारक को भी दोषी ठहराया जा सकता है, यूनिवर्सिटी ऑफ अलबामा बर्मिंगहम के डेविड एलियन और उनके सहकर्मियों ने उत्तरी अमेरिका की ८ अलग-अलग प्रजातियों की २४ बस्तियों के २०,००० से अधिक वयस्क जानवरों के शरीर के भार का अध्ययन किया ।
इसमें केवल उन स्तनधारियों को शामिल किया गया था जिनका पिछले ५० सालों में दो बार वजन नापा जा चुका था और साथ ही जिनके वजन में न तो शोधकार्य के दौरान जानबूझकर कोई छेड़छाड़ की गई थी और न ही वे किसी फीडिंग प्रोग्राम का हिस्सा थे इन २४ आबादियों में अनुसंधान कार्य के लिए सुरक्षित रखे गए प्राइमेट्स से लेकर बाल्टीमोर के जंगलोंमें पाए जाने वाले
जंगली चूहे तक शामिल थे इन सभी के वजन में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई ।
घरेलु जानवर भी इससे अछूते नहीं हैं, बिल्लियों के औसत वजन के प्रति दशक लगभग १० प्रतिशत की वृद्धि हुई और कुत्तों के वजन मेंहर दशक में ३ प्रतिशत की वृद्धि हुई, अध्ययन के दौरान ऐसे जीवों के शरीर के भार में भी बढ़ोतरी देखी गयी है जिनकी गतिविधि में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया था ।
एलियन कहते हैं कि इस प्रकार अगर आहार में परिवर्तन और ऊर्जा असंतुलन मोटापे के लिए जिम्मेदार नहीं है तो अवश्य ही कुछ पर्यावरणीय कारक इसके पीछे हो सकते हैं, हो सकता है कि इस शोध में शामिल जानवरों ने खाया अधिक और व्यायाम कम किया हो, जैसा कि अक्सर हम भी करते हैं, एलियन स्वीकार करते हैं कि ऐसा संभव हैं पर साथ ही वे कहते हैं कि वैज्ञानिक इस बात का पूरा रिकार्ड रखते हैं कि अनुसंधान कार्य में लगे जानवरों को आखिर क्या खिलाया गया था ।

मध्य प्रदेश की नदियों का कायाकल्प

मध्यप्रदेश में सालों से सूखी पड़ी नदियों के दिन फिर से अब बहुरने वाले हैं । कम वर्षा, पर्याप्त् रखरखाव का अभाव और अवैध रेत उत्खनन के चलते पानी धारण करने की क्षमता खो चुकी नदियों के लिए राज्य सरकार ने नदी पुनर्जीवित योजना के जरिए इन्हें फिर से आबाद करने की योजना बनाई है ।
योजना के पहले चरण में इंदौर संभाग के सात जिलों की ११ नदियों का कायाकल्प होगा । गौरतलब है कि प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में दो दशकों के दौरान कई बार पड़े सूखे के कारण प्रदेश की कई नदियां मैदान में तब्दील हो चुकी हैै । इसके अलावा रेत माफिया द्वारा किये गये अवैध उत्खनन के कारण नदियां पानी धारण करने की अपनी क्षमता खो चुकी हैं ।
योजना के तहत इंदौर की क्षिप्रा नदी को १५ करोड़ २८ लाख, धार की बागली, मान, माही और बेलवाली नदियों
के लिए ६१.५७ करोड़, झाबुआ की पद्मावती और नौगांव के लिए २४.२३ करोड़, खरगौन की रूप, कावटी, हाथिनी बरोड़ के लिए ८.३४ करोड़, बड़वानी की डेब के लिये ३४.१२ करोड़ और बुरहानपुर की मोहना और उतावली नदी के लिये ८.२२ करोड़ रूपये मंजूर किये गये हैं ।
राज्य सरकार ने अब नदियों की हालत सुधारने के लिये नदी पुनर्जीवित योजना बनाई है । इसके तहत प्रदेश की सूखी पड़ी नदियों को चिन्हित कर उनका कायाकल्प किया जायेगा । योजना के पहले चरण में इंदौर संभाग के सात जिलों की ग्यारह नदियों को संवारने का लक्ष्य रखाा गया है ।
राज्य शासन ने इसके लिए १८५ करोड़ रूपये मंजुर किये हैं । इस राशि से चुनी गई नदी को पुनर्जीवन दिया जायेगा । उनके बहने के रास्ते के साथ स्टाप डेम भी बनाये जायेंगे । इतना ही नहीं नदी में मिलने वाले नालों के बंद रास्ते खोले जायेंगे और उन्हें नया रूप दिया जायेगा ताकि नदियों में पर्याप्त् पानी आ सके । सरकार इस योजना के जरिये किसानों को सिंचाई के लिये पानी भी मुहैया करायेगी ।

गजराज दुष्चक्र में फंसकर गंवाते हैंजान

महाबली गजराज भी जब दुष्चक्र में फंसता है तो उसे भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है । हाल के वर्षोंा में देश में विभिन्न घटनाआें और शिकारियों के कारण कम से कम २५० हाथियों की मौत हो चुकी हैं ।
आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार गजराज की मौत जहर खाने, बिजली के करंट लगने, खाई में गिरने और रेल दुर्घटनाआें में होती हैं । इसके अलावा कीमती हाथी दांत को लेकर शिकारी इसका शिकार तो करते ही हैं । वर्ष २०१०-११ के आरंभ में ही कुल २१ हाथियोंकी मौत हो गई थीं । इनमें से ११ हाथी रेल हादसों का शिकार हुए थे जबकि छह की मौत बिजली के करंट लगने से हो गई थी । शिकारियों ने भी चार हाथियों पर अपना हाथ साफ
किया । इस वर्ष इसके अलावा बंगाल, असम और उत्तरांचल में रेल दुर्घटनाआें तथा अन्य हादसों में हाथयों की मौत हुई हैं ।
वर्ष २००७-०८ के दौरान कुल ७७ हाथियों की मौत हुई । इनमें से ४८ तो केवल बिजली के झटके के शिकार हुए । इसी वर्ष १२ हाथियों की मौत रेल दुर्घटनाआें में और छह की जहर खाने से हो गई । शिकारियों ने ११ हाथियों को मारा । इसके अगले वर्ष २००८-०९ के दौरान कुल ७४ हाथियोंकी मौत हुई । इस वर्ष केवल आठ हाथी रेल दुर्घटनाआें का शिकार हुए लेकिन दस हाथियों की जहर खाने से मौत हो गई । बिजली के झटके से ४३ हाथी मारे गए । जबकि १३ शिकारियोंने मार डाला ।
वर्ष २००९-१० के दौरान विभिन्न हादसोंमें सबसे अधिक ७८ हाथियों की मौत हुई । इस वर्ष सबसे अधिक १३ हाथी रेल दुर्घटनाआें में मारे गए जबकि पांच की जहर खाने से मौत हो गई । इस वर्ष ४५गजराजों की मौत बिजली के करंट लगने से हो गई हालांकि इस दौरान शिकारियों ने भी १५ हाथियों को अपना निशाना बनाया ।
प्राथमिक तौर पर हाथियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है । केन्द्र सरकार ने हाथियों की सुरक्षा का लेकर राज्य सरकारों को वित्तीय और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराती है । केन्द्र सरकार की ओर से हाथियों की सुरक्षा को लेकर १९९२ में देश में हाथी परियोजना की शुरूआत की गई । इसके बाद से ही संबंधित राज्यों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जा रही है ।

ताज को विशेष लेप से निखारा जाएगा


अंतरराष्ट्रीय धरोहर ताजमहल की दमक आने वाले कुछ दिनोंमें और उजली होगी, क्योंकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) एक विशेष प्रकार के लेप से इसमेंनिखार लाने की योजना बना रहा है ।
एएसआई की रसायन शाखा के उपाधीक्षक पुरातत्ववेत्ता एमके समाधिया ने बताया कि ताजमहल को धूल, गंदगी और उसकी खूबसूरती को धुंधला करने वाले अन्य तत्वोंसे मुक्त कराने के लिए हमने इमारत पर एक विशेष प्रकार की मिट्टी का लेप करने की योजना बनाई है । इस बारे में एक प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है ।
उन्होंने कहा कि इस कवायद के तहत इस ऐतिहासिक इमारत की दीवारों तथा अंदरूनी हिस्से पर लेप किया जाएगा । हम ताजमहल के पास स्थित ताज मस्जिद पर यह लेप कर और खूबसूरत बनाने क ा काम कुछ दिन पहले ही पूरा कर चुके हैं। मुलतानी मिट्टी में धूल, गंदगी तथा रंगत को नुकसान पहुंचाने वाले अन्य तत्वों को साफ कर खूबसूरती निखारने की खासियत होती है ।उन्होंने कहा कि लेप लगाने के कुछ देर बाद इमारत को आसवित पानी से धोया जाता है ।
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मंगलवार, 30 नवंबर 2010

६ पर्यावरण परिक्रमा

टेस्ट ट्यूब बेबी के प्रणेता को नोबल पुरस्कार

फिजियोलाजिस्ट डॉ.राबर्ट एडबर्ड्स को इस वर्ष चिकित्सा क्षेत्र के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया है । उनके अध्ययन से ही दुनिया में पहली टेस्ट ट्युब बेबी (परखनली शिशु) का जन्म संभव हुआ था ।
नोबेल पुस्कार प्रदान करने वाले स्वीडन के कैरोलिन्सका इंस्टीट्यूट ने स्टाकहोम में यह जानकारी दी । डॉ.एडवर्ड्स को एक करोड़ स्वीडिश क्रोन (१५ लाख डालर) की राशि प्रदान की जाएगी ।
संस्थान की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि डॉ.एडवर्ड्स की उपलब्धियों के कारण प्रजनन अक्षमता का इलाज संभव हुआ । दुनिया के १० फीसद से ज्यादा दंपति इस अक्षमता से पीड़ित है ।
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे पचासी वर्षीय डॉ.एडवर्ड्स १९५० के दशक में आईवीएफ तकनीक पर शोध कार्य शुरू किया था । उन्होंने अंडाणु कोशिकाआें को शरीर से बाहर निषेचित कर गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर शिशु जन्म कराने में सफलता पाई थी । इस काम में प्रसूति सर्जन पैट्रिक स्टेपटोए ने सहयोग किया था ।
दुनिया की सबसे पहली परखनली शिशु लुईस ब्राउन का जन्म ब्रिटेन में २५ जुलाई, १९७८ को हुआ था । इस समय ३२ वर्षीय ब्राउन ब्रिस्टाल में डाक विभाग में कार्यरत हैं और उन्होंने वर्ष २००७ में एक लड़के को भी जन्म दिया । दुनिया में अब तक करीब चालीस लाख परखनली शिशु का जन्म हो चुका है ।

प्रदूषण दूर करेगा सुजल चूर्ण

एमिटी विश्वविद्यालय नोएडा के प्रोफेसर आरएन दुबे ने वनस्पतियों के अर्क और रासायनिक पदार्थोंा के मिश्रण से एक ऐसा पदार्थ विकसित किया है, जो नालों एवं तालाबों में बढ़ते प्रदूषण को नियंत्रित करने में कारगर साबित होगा ।
प्रो.दुबे ने बताया कि इसका नाम सुजल तकनीक रखा है और यह पूर्णतया वैदिक चिंतन पर आधारित है । नदियों के संगम को निर्मल रखने के लिए हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों और व्यवस्थाकारों ने काशी में तालाबों व कुड़ों का विधिवत निर्माण किया था ताकि गंगा सहित अन्य नदियाँ प्रदूषित न हों । लेकिन कालांतर में स्थिति बिलकुल बदल गई है । अब तो गंगा के साथ ही साथ तालाब एवं कुंड प्रदूषित हो गए हैं उनका पानी न ही नहाने और न ही आचमन के लायक बचा है । मुख्य रूप से घरेलु मल-जल एवं औद्योगिक कचरे से नदियोंका जल प्रदूषित होता है ।
प्रो.दुबे ने बताया कि जगह-जगह बहने वाले नालों को बंदकर सुजल चूर्ण का छिड़काव कर प्रदूषण को आसानी से दूर किया जा सकता है । सुजल चूर्ण बहुत ही सस्ता है । इस विधि द्वारा शोधित जल कृषि कार्य के लिए सामान्य जल की तरह उपयोग मेंलाया जा सकता है । इसके इस्तेमाल से पानी पीने योग्य भी बनाया जा सकता है लेकिन अभी इस पर अनुसंधान चल रहा है ।

विलुिप्त् की कगार पर है गौरैया

गौरैया देश की लुप्त् होती पक्षी बनती जा रही है । फुर्तीली और चहलकदमी करने वाली गौरैया को हमेशा शरदकालीन फसलों के दौरान खेत-खलिहानों में अनेक छोटे-छोटे पक्षियों के साथ फुदकते देखा जाता रहा है, लेकिन सर्वपरिचित, सर्वव्यापी गौरेया पूरे विश्व मेंतेजी से दुर्लभ होती जा रही है । वैज्ञानिकों की मानें तो गौरैया के लुप्त् होने के विभिन्न कारण हैं, मसलन सीसारहित पेट्रोल का उपयोग जिसके जलने पर मिथाइल नाइट्रेट नामक यौगिक तैयार होता है । यह यौगिक छोटे जंतुआें के लिए काफी जहरीला है ।
इसके अलावा खर-पतवार की कमी या गौरैया को खुला आमंत्रण देने वाले ऐसे खुले वानों की कमी, जहां वे अपने घोंसले बनाया करती थी, के कारण भी वे लुप्त् हो रही हैं । आधुनिक युग के पक्के मकान, लुप्त् होते बाग-बगीचे खेतोंमें कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग तथा भोज्य-पदार्थोंा की उपलब्धता में कमी प्रमुख कारक हैं, जो इनकी घटती आबादी के लिए जिम्मेवार हैं । गौरैया फसलों को नुकसानप पहुँचाने वाले कीटों को समाप्त् करने में सहायक होती है । गौरैया एक बुद्धिमान चिड़िया है, जिसने घोंसला स्थल, भोजन तथा आश्रय परिस्थितियों में अपने को उनके अनुकूल बनाया है । इन्हीं विशेषताआें के कारण विश्व में सबसे ज्यादा पाई जाने वाली वह चहचहाती चिड़िया बन गई । बसंत के मौसम मे फूलोंकी प्रजातियाँ घरेलु गौरैया को ज्यादा आकर्षित करती हैं ।
गौरैया देश में अनेक नामों से लोकप्रिय है । गुजरात में चकली, मराठी में चिमानी, पंजाबी में चिड़ी, जम्मू तथा कश्मीर में चेर, तमिलनाडु तथा केरल में कूरूवी, तेलगु में पिच्च्ूका, कन्नड़ में गुब्बाच्ची, पश्चिम बंगाल में चराई पाखी तथा उड़िसा में घरचटिया कहते हैं जबकी उर्दू भाषा में इसे चिड़िया तथा सिन्धी भाषा में इसे झिरकी कहा जाता है ।
गौरैया का प्रमुख आहार जमीनपर बिखरे अनाज के दाने हैं । अगर अनाज उपलब्ध न हो तो कीटों को भी खा लेती है और घरों से बाहर फेंके गए, कूड़े -करकट मे भी अपना आहार ढूँढ लेती है । इनके घोंसले भवनों की सुराखों या चट्टानों, घर या नदी के किनारे, समुद्र तट या झाड़ियों या प्रवेशद्वारों जैसे विभिन्न स्थानों पर होते हैं ।
इनके घोंसले घांस के तिनकों से बने होते हैं और इनमें पंख भरे होते हैं । इनके अंडे अलग-अलग आकार और रंग के होते हैं। अंडे को मादा गौरैया सेती है । गौरैया की अंडा सेने की अवधि १०-१२ दिनों की होती है जो सभी चिड़ियों की अंडे सेने की अवधि से सबसे छोटी है ।
विलुिप्त् के कगार पर पहुँचीगौरैया आज झाड़ियों में उछलना और घर के बाहर अब उसका चहचहाना किसी को शायद ही दिखाई पड़ता हो । कहीं ऐसा न हो कि आने वाली पीढ़ियाँ गौरैया को सिर्फ चित्रों में देखें । इसके लिये इसको बचाने के प्रयास तेज करने होंगे ।

कैसे नष्ट हो सकती है गाजर घांस

देश भर में समस्या बन गई गाजरघास नष्ट करने के लिए राउंटअप नामक एक केमिकल है । इसे डालने से इसका प्रभाव नष्ट किया जा सकता है । हालाँकि इसमें कुछ खामियाँ हैं, लेकिन गाजरघास को खाने वाला एक कीड़ा भी आता है । साथ ही गाजरघास से खाद भी बनाई जा सकती है ।
यह बात कृषि वैज्ञानिक दिलीप सूर्यवंशी ने कही । उन्होंने बताया कि केमिकल डालने के लिए सिर्फ उसी जगह का उपयोग किया जाता है, जहाँ सड़क किनारे गाजरघास उगी हो । यदि इसका प्रयोग खेतों में किया गया तो यह गाजरघास के साथ फसल भी नष्ट कर देगा क्योंकि यह केमिकल फसलों के लिए भी हानिकारक है ।
श्री सूर्यवंशी ने बताया कि भारतीय खरपतवार अनुसंधान केन्द्र जबलपुर ने एक जैविक उपाय भी खोज निकाला है । इसके तहत गाजरघास को खाने वाला एक कीड़ा आता है, जिसे बड़ी संख्या में खेतों में छोड़ दिया जाए तो गाजरघास खत्म हो सकती है । यह कीड़ा केवल गाजरघास ही खाता है ।
गाजरघास का उपयोग खाद बनाने में भी किया जा सकता है । इसे सावधानी से उखाड़कर खेत से दूर एक ग े में डाला जाना चाहिए । इसमें मिट्टी व पानी आदि डालकर उसे जैविक खाद के रूप में विकसित किया जा सकता है ।
श्री सूर्यवंशी ने बताया कि गाजरघास के पौधों में फूल आने से पहले ही उन्हें नष्ट करना जरूरी हैं । यदि फूल आ गए तो इसका प्रभाव बढ़ जाएगा और यह मानव स्वास्थ्य सहित फसलों के लिए बेहद हानिकारक हो जाएगी । इसका बीज बहुत ही हल्का होता है और यह हजारों मीलों तक हवा में उड़कर पहुँच सकता है । साथ ही पानी मे बहकर भी इसके बीज दूर तक फैल सकते हैं । वर्तमान में यह समस्या पूरे विश्व में है ।

अब कचरे पर है सबकी नजर

गाँवों और शहरों की गलियों में घूमने वाले कबाड़ियों का आजकल ग्लोबल बिजनेस हो गया है और कचरे को रीसायक्लिंग करने का काम तेजी से बढ़ रहा है । इलेक्ट्रो कचरे की तो बात ही कुछ और है क्योंकि इसके मुकाबले और कोई कचरा कीमती नहींहोता ।
योरप में कचरा रीसायक्लिंग करने वाली सबसे बड़ी कंपनी रेमोडिस के प्रवक्ता मिशाएल श्नाइडर का कहना है कि हर मोबाइल फोन मेंऔसतन २३मिलीग्राम सोना होता है । उनकी इस बात से स्पष्ट होता है कि आखिर कचरे को लेकर इतना मोह क्यों उपजा ! दुनियाभर में हर साल करीब १.३ अरब मोबाइल फोन बनते हैं और इनमें से सिर्फ १० फीसद मोबाइल रिसायक्लिंग के लिए आते हैं । इसका मतलब है कि हर साल कम से कम बीस-बाईस टन सोना लोग कचरे मे फैंक देते हैं ।
सोने के बारे में तो सब जानते हैं कि यह एक मूल्यवान धातु है । लेकिन ऐसी भी कई धातुएँ हैं जो दुनिया में बहुत कम हैं और तेजी से खत्म हो रही हैं । उदाहरण के लिए इंडियम जो टच स्क्रीन बनाने के लिए सबसे अहम पदार्थ हैं । जानकार कहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा अगले दस साल में इंडियम दुनिया से खत्म हो जाएगा । अब जब टच स्क्रीन के टीवी, मोबाइल कम्प्यूटर सब कुछ बाजार में है तो सोचा जा सकता है कि इस पदार्थ की भविष्य में कितनी जरूरत होगी । दुनिया की आबादी जिस तेजी से बढ़ रही है, उतनी तेजी से कचरा और कचरे का व्यापार भी बढ़ रहा
है ।
जर्मनी के रीसायक्लिंग संगठन के योर्ग लाखर कहते हैंकि खनिज खत्म होने वाले पदार्थ हैं । ये खनिज पदार्थोंा की बढ़ती कीमत से भी समझ में आता है । कीमत बढ़ने का कारण माँग में बढ़ोतरी है । इस माँग के बढ़ने का कारण विकासशील देशों में तेजी से हो रहा विकास है । इस कारण रिसायक्लिंग से बनने वाले उत्पादों की माँग धीरे-धीरे बढ़ेगी ।
जर्मनी में भी कचरे का धंधा एक बड़ा कारोबार हो गया है । पानी, प्लास्टिक, काँच, धातुएँ सभी की रिसायक्लिंग यहाँ होती है । शुरू में जब जर्मनी ने कचरा अलग-अलग करने के लिए अलग-अलग रंग की थैलियाँ बनाई तो उसकी हँसी उड़ाई गई थी । लेकिन अब धीरे-धीरे पूरे योरप में इसका इस्तेमाल किया जा रहा है । श्नाइडर बताते हैं कि इस कचरे के तहत अलग-अलग उत्पाद हैं ।
रिमोंडिस योरप की सबसे बड़ी कंपनी है जो रीसायक्लिंग के क्षेत्र में हैं और लिपनवर्क का इसका रीसायक्लिंग कारखाना योरप का सबसे बड़ा और आधुनिक है । इससे पर्यावरण को भी फायदा है । विकासशील देशों को गैरकानूनी तरीके सेनिर्यात होने वाले इलेक्ट्रो कचरे को यही रीसायकल किया जा सकता है । जानकारोंका मानना है कि अगले बीस साल में कुछ धातुआें की माँग तिगनी हो जाएगी । लीथियम, इंडियम, जर्मेनियम की माँग बढ़ जाएगी, क्योंकि हाईटेक तकनीक के लिए इनकी जरूरत है । दूसरा कचरे की रीसायक्लिंग से पर्यावरण को भी नुकसान कम होगा ।
कंपनी के एक प्लांट मेंबायोडीजल भी बनाया जाता है । प्लास्टिक के कचरा भी यहाँरीसायकल किया जाता है । इसके अलावा एक और कारखाना है जहाँ पुरानी लकड़ियाँ जलाई जाती है । ये लकड़ियाँ इस तरह से जलाई जाती है कि कार्बन डाईऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों का उत्सर्जन नहीं होता ।
जानकारों का कहना है कि ताँबा तीस साल में खत्म हो जाएगा तो कच्चा तेल अगले ६०-७० साल में खत्म होने की आशंका है । कबाड़ और कचरे की रीसायक्लिंग विकास की दौड़ में तेजी से भाग रहे हैं, प्राकृतिक संसाधनों के जरिए उनकी और बाकी ुदुनिया की जरूरतें तो पूरी की नहीं जा सकती है, इसलिए इस तरह की रीसायक्लिंग का भविष्य उज्जवल है ।
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