बुधवार, 9 जून 2010

६ स्वास्थ्य

होम्योपैथी की दो शताब्दी
ड़ॉ.ए.के.अरूण
इस वर्ष १० अप्रैल को होम्योपैथी के भारत में२०० साल पूरे हो चुके है । इस बहाने होम्योपैथी के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओ पर चर्चा जरूरी है । शुरू से ही आधुनिक चिकित्सा पद्वति एलोपैथी का होम्योपैथी के प्रति तंग नजरिया रहा है । एक सहज एवं सस्ती चिकित्सा प्रणाली होते हुए भी होम्योपैथी का भी महत्वपूर्ण या प्रमुख चिकित्सा पद्वति नहीं माना गया । कभी जादू की झप्पी तो कभी प्लेसिबो कहकर इसे महत्वहीन बताने की कोशिश हुई, लेकिन अपनी क्षमता और वैज्ञानिकता के बल बूते होम्योपैथी विकसित होती रही । होम्योपैथी एलोपैथी के बाद दुनिया में एक दूसरी सबसे बड़़ी चिकित्सा पद्वति है । होम्योपैथी एक ऐसी चिकित्सा विधि है जो शुरू से ही चर्र्र्चित, रोचक और आशावादी पहलुओं के साथ विकसित हुई है । सन् १८१० में इसे जर्मन यात्री और मिशनरीज अपने साथ लेकर भारत आए इन छोटी मीठी गोलियों ने भारतीयों को लाभ पहुंचा कर अपना सिक्का जमाना शुरू कर दिया । सन् १८३९ में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह की गम्भीर बीमारी के इलाज के लिए फ्रांस के होम्योपैथी चिकित्सक डा. होनिंगबर्गर भारत आए थे उनके उपचार से महाराजा को बहुत लाभ मिला था । बाद में सन् १८४९ में जब पंजाब पर सन हेनरी लारेन्स का कब्जा हुआ तब डा. होनिगबंर्गर अपने देश लौट गए । सन्१८५१में एक अन्य विदेशी चिकित्सक सर जान हंटर लिट्टर ने कलकत्ता में मुफ्त होम्योपैथी चिकित्सालय की स्थापना की । सन् १८६८ में कलकत्ता से ही पहली भारतीय होम्योपैथी पत्रिका शुरू हुई तथा १८८१ में डा. पी.सी मजुमदार एवं डा.डी.सी.राय ने कलकत्ता में भारत के प्रथम होम्योपैथी कॉलेज की स्थापना की । होम्योपैथी के आविष्कार की कहानी भी बडी रोचक है । जर्मनी के एक विख्यात एलोपैथिक चिकित्सक डा.सैमुअल हैनिमैन ने चिकित्सा क्रम में यह महसूस किया कि एलोपैथिक दवा से रोगी को केवल अस्थाई लाभ ही मिलता है । अपने अध्ययन और अनुसंधान के आधार पर उन्होने दवा को शक्तिकृत कर प्रयोग किया तो उन्हेंअत्यधिक सफलता मिली और उन्होंने सन् १७९० में होम्योपैथी के सिद्वांत सिमिलिया-सिमिकलबस-क्यूरेन्टर यानि सदृश रोग की सदृश चिकित्सा का प्रतिपादन किया । हालांकि इस सिद्वांत का उल्लेख हिप्पोेके्रटस एवं उनके शिष्य पैरासेल्सस ने अपने ग्रन्थों मंे किया था लेकिन इसे व्यावहारिक रूप में सर्वप्रथम प्रस्तुत करने का श्रेय डा. हैनिमैन को जाता है । उस दौर में एलोपैथिक चिकित्सकों ने होम्योपैथिक सिद्वांत को अपनाने का बडा जोखिम उठाया,क्योंकि एलोपैथिक चिकित्सको का एक बडा व शक्तिशाली वर्ग इस क्रांतिकारी सिद्वांत का घोर विरोधी था । एक प्रसिद्व अमेरिकी एलोपैथ डा.सी. हेरिंग ने होम्योपैथी को बेकार सिद्व करने के लिये एक शोध प्रबन्ध लिखने की जिम्मेवारी ली । वे गम्भीरता से होम्योपैथी का अध्ययन करने लगे । एक दूषित शव की परीक्षा के दौरान उनकी एक ऊँगली सड़ जुकी थी । होम्योपैथिक उपचार से उनकी अंगुली कटने से बच गई । इस घटना के बाद उन्होंने होम्योपेैथी के खिलाफ अपना शोध प्रबन्ध फेंक दिया । बाद में वे होम्योपेैथी के एक बड़े स्तम्भ सिद्ध हुए । उन्होंने ही रोग मुक्ति का नियम भी प्रतिपादित किया । डॉ. हेरिंग ने अपनी जान जोखिम में डालकर सांप के घातक विष से होम्योपैथी की एक महतवपूर्ण दवा लैकेसिस तैयार की जो कई गम्भीर रोगों की चिकित्सा में महत्वपूर्ण है । होम्योपैथी ने गम्भीर रोगों के सफल उपचार के अनेक के दावे किये लेकिन अर्न्तराष्ट्रीय चिकित्सा मंच पर इन दावों के प्रमाण प्रस्तुत करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई । मसलन यह वैज्ञानिक चिकित्सा विधि महज संयोग मानी जाने लगी और समाज में ऐलोपैैथी जैसी प्रतिष्ठा हासिल नहीं कर पाई । अर्न्तराष्ट्रीय चिकित्सा पत्रिकाआें में भी होम्योपैथी को महज प्लेसिबो (खुश करने की दवा) से ज्यादा और कुछ नहीं माना गया । होम्योपैथी को एलोपैथी लाबी द्वारा कमतर आंकने के पीछे जाहिर है उनकी व्यावसायिक प्रतिद्वंदता ज्यादा है । होम्योपैथी को जन सुलभ बनाने की जिम्मेदारी तो समाज और सरकार की है । हमारे योजनाकार भी महंगी होती एलोपेथी चिकित्सा के मोहजाल से नही ेबच पाए हैं । सालाना २२,३०० करोड़ रूपये के बजट में से मात्र ६९४ करोड़ (४.४ प्रतिशत) रूपये देसी चिकित्सा पर जिसमें भी महज १०० करोड़ होम्योपेथी चिकित्सा पर खर्च कर हम सवा सौ करो़़ड की आबादी वाले देश में होम्योपैथी से क्या उम्मीद कर सकते है अपने हर दम-खम पर भारत मेंं तेजी से लोकप्रीय के मौजूदा विकास कर ज्यादा श्रेय तो होम्योपैथी के चिकित्सा और प्रशंसको को ही जाता है । लेकिन यह सच है कि सरकारी पहल के बिना होम्योपैथी को जन-जन पहुंचाने का लक्ष्य पूरा हो सकता । एलोपैथी चिकित्सा द्वारा बिगड़े एवं लाइलाज घोषित कर दिये गए रोगों में होम्योपैथी उम्मीद की अन्तिम किरण की तरह होती है । कुछ मामले में तो होम्योपैथी वरदान सिद्ध हुई है तथा अनेक मामले में होम्योपैथी ने रोगी में जीवन के उम्मीद का भरोसा जगाया है । चर्म रोग, जोड़ो के दर्द, कैंसर, ट्यूमर, पेट रोग, शिशुआें और माताआें के विभिन्न रोगों में होम्योपैथी की प्रभाविता बेजोड़ है । होम्योपैथिक दवा विरोधी लाबी होम्योपैथी को आगे नहीं आने देना चाहती । कारण स्पष्ट है कि एलोपेथिक दु:प्रभावों से उबकर काफी लोग होम्योपैथी या दूसरी देसी चिकित्सा पद्धति को अपनाने लग जायेंगे । फिर तो सरकार और मंत्रालय में इनका रूतबा बढ़ेगा एलोपैथी की प्रतिष्ठा एवं आधुनिक चिकित्सा लाबी की यह दृष्टि इस सरल चिकित्सा पद्धहृत को आम लोगों के लिये पूर्ण भरोसेमन्द नहीं बनने देती । सर्वविदित है कि दुनियां में जनस्वास्थ्य की चुनौतियां बढ़ रही है और आधुनिक चिकित्सा पद्धति इन चुनौतियों से निबटने में एक तरह से विफल सिद्ध हुई है । प्लेन हो या सार्स, मलेरिंया हो या टी.बी. एलोपैथिक दवाआें ने उपचार की बात तो दूर रोगों की जटिलता को और बढ़ा दिया है । मलेरिया और घातक हो गया है । टी.बी. की दवाएं प्रभावहीन हो गई हैं, लू के वायरस रोग के ही खिलाफ प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर चुके हैं । शरीर में और ज्यादा एन्टीबायोटिक्स को बर्दाश्त करने की क्षमता नहीं रही । कुपोषण की वजह से आम आदमी जल्दी जल्दी बीमार हो रहा है । ऐसे में होम्योपैथी एक बेहतर विकल्प हो सकती है । जन स्वास्थ्य के प्रबन्धन मेंहोम्योपैथी की महती भूमिका को आज भी नजरअन्दाज किया जा रहा है । अनेक घातक महामारियों से बचाव के लिये होम्योपैथिक दवाआें की एक पूरी रेंज उपलब्ध है । आवश्यकता है इस पद्धति को मुक्कमल तौर पर आजमाने का। होम्योपैथी की इस विशेषता के होते हुए अब सवाल यह उठता है कि वे कौन लोग या कौन से समूह है जो होम्योपैथी को विकसित होते नहीं देखना चाहते ? भारत ही नहीं होम्योपैथी के खिलाफ इन दिनों दुनिया भर में मुहिम चलाई जा रही है । ब्रिटेन की संसद में भी होम्योपैथी के मुुद्दे पर वहां के सांसद पक्ष-विपक्ष में बंटे हुए हैं । होम्योपैथी की विरोधी लाबी वहां सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा में होम्योपैथी की उपस्थिति और लगातार हो रही वृद्धि से परेशान है । लगभग यही स्थिति एशिया और अन्य विकासशील देशों में है । सवाल है कि देश में जहां ७० फीसदी से ज्यादा लोग लगभग २० रूपये रोज पर गुजारा करते हों वहां होम्योपैथी जैसी सस्ती चिकित्सा पद्धति के अलावा सस्ता चिकित्सा विकल्प भला और क्या हो सकता है ? हमारे योजनाकारों को इस मुद्दे पर गम्भीरता से सोचना होगा । ***

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