सोमवार, 11 जून 2012

पर्यावरण परिक्रमा
प्राकृतिक गैस कितनी साफ ?

    कोयले और पेट्रोलियम के समान प्राकृतिक गैस भी एक जीवाश्म ईधन है । आजकल ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की चिंता के चलते कोयले की बजाय प्राकृतिक गैस से बिजली उत्पादन की वकालत की जा रही है । मगर ताजा आकड़े बताते है कि प्राकृतिक गैस से बिजली बनाना भी उतना साफ सथुरा नहीं है जितना कि दावा किया जाता रहा है । मसलन, ब्रिटेन ने दावा किया था कि बिजली उत्पादन के लिए कोयले को छोड़कर प्राकृतिक गैस का उपयोग करके उसने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी की है ।
    आजकल कई देश प्राकृतिक देश उत्पादन के लिए चट्टानी संरचनाआें (शेल) को फोड़ने की विधि अपना रहे हैं । इसके लिए ऊंचे दबाव पर तरल पदार्थ चट्टान में इंजेक्ट किये जाते हैं । इस प्रक्रिया को फ्रेकिंग कहते हैं । पिछले वर्ष कॉर्नल विश्वविघालय के शोधकर्ताआें ने अपने अध्ययन में पाया था कि यदि प्राकृतिक गैस से बिजली उत्पादन की प्रक्रिया मेंफे्रकिंग को भी जोड़ा जाए, तो इसमें जितनी मीथेन निकलती है वह कोयले के मुकाबले ज्यादा ही होगी ।
    दूसरी ओर प्राकृतिक गैस उद्योग का दावा है कि कॉर्नेल विश्वविघालय के शोधकर्ताआें ने समस्या को थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है ।
    यूएस के राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान व वायुमण्डल प्रशासन ने डेनवर के नजदीक प्राकृतिक गैस क्षेत्र में वायुमण्डल में मीथेन की मात्रा का अध्ययन करने पर पाया था कि प्राकृतिक गैस निष्कर्षण में काफी अधिक मीथेन वायुमण्डल में पहुंचती है । यह मात्रा पहले सोची गई मात्रा से दुगनी पाई गई और धरती को गर्म करने में अपनी भूमिका निभाएगी । वैसे कहा जा रहा है कि इन आंकड़ों में काफी अनिश्चितता को कम से कम किया जाए ताकि कुछ पक्के नतीजे हासिल किए जा सकें ।
    अलबत्ता, इस बात में कोई संदेह नहीं कि ये आंकड़े एक चेतावनी स्वरूप   है । इनसे एक जरूरत और सामने आती  है । पर्यावरण वगैरह के मामले में हम सिर्फ उद्योगों द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों पर भरोसा नहीं कर सकते । किसी न किसी प्रकार के स्वतंत्र आकलन करने व निगरानी की भी जरूरत है ।
    फिलहाल कहा जा रहा है कि स्वच्छ ऊर्जा की ओर कदम बढ़ाते हुए प्राकृतिक गैस एक सेतु की तरह काम करेगी । मगर अध्ययन बता रहा है कि यह सेतु बहुत स्वच्छ नहीं है ।

३० करोड़ साल पुराना जंगल मिला
    पुराजीव वैज्ञानिकों ने ज्वालामुखी के लावे में दफन  एक पूरा का पूरा जंगल खोज निकाला है । यह जंगल उत्तरी चीन के एक हिस्से में खुदाई के दौरान उभरा है । यह इलाका करीब ३० करोड़ साल पूर्व एक ज्वालामुखी के लावे में दफन हो गया था । इस मायने में यह एक टाइम केप्सूल जैसा प्रतीत होता है ।
    पुराजीव वैज्ञानिक आम तौर पर किसी इलाके में पाए गए जीवाश्मों के आधार पर वहां अतीत में मौजूद रही इकॉलॉजी का खाका तैयार करते हैं । प्राय: ऐसे जीवाश्म बाढ़ आने पर गाद में दब गए जीवों के होते हैं । मगर बाढ़ की समस्या यह होती है कि वह अपने साथ अन्य इलाकों के जीवों को बहाकर लाती भी है और उस इलाके के जीवों को बहाकर कहीं और ले भी जाती है । अत: इस तरह के जीवाश्मों के बारे में यह कहना मुश्किल होता है कि क्या उनसे संबंधित जीव एक साथ एक ही समय पर उस इलाके में रहते होंगे ।
    मगर ज्वालामुखी के लावे की बात अलग है । यह लावा जब फैलता है तो धीरे-धीरे फैलता है और पूरे के पूरे इकोसिस्टम को ढंककर सुरक्षित कर देता है । उत्तरी चीन में उक्त जीवाश्म जंगल की खोज पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के हरमन फेफरकॉन और उनके साथियों ने की है । यह जंगल जिस चट्टान की खुदाई में मिला है उसकी उम्र लगभग ३० करोड़ साल आंकी गई है ।
    शोधकर्ताआें ने जीवाश्मों के विश्लेषण के आधार पर १००० वर्ग मीटर में फैले इस जंगल का जो खाका तैयार किया है उससे लगता है कि यहां ६ अलग-अलग समूहों के पेड़-पौधों की प्रजातियां पाई जाती थी । ऐसा नहीं है कि ये प्रजातियां पहले से ज्ञात नहीं थी मगर यह पहली बार स्पष्ट हुआ है कि ये सब साथ-साथ एक ही जगह पर पाई जाती थीं । अधिकांश पेड-पौधें वृक्ष फर्न हैं मगर उनके साथ बड़े-बड़े वृक्ष भी पाए गए हैं । लताआें के अलावा वहां के जंगल में एक विचित्र समूह के पेड़ भी होते थे जिनके बारे में वैज्ञानिकों का मत है कि वे शुरूआती फर्न के संबंधी है ।

मानसिक तनाव जांचने वाला मीटर

    अब वह दिन दूर नहीं जब यह बताना संभव होगा कि युवक कितने मानसिक तनाव में है । बडोदरा के पारूल  तकनीकी संस्थान मंे मेंटल स्ट्रेस मीटर (मानसिक तनाव मीटर) बनाने पर शोध चल रहा है । इस संस्थान से इलेक्ट्रॉनिक्स एण्ड कम्युनिकेशन (ईसी) में बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग कर रहे मनन भट्ट संस्थान की सहायक प्रोफेसर इला परमार के मार्गदर्शन में यह शोध करने में जुटे हुए है ।
    श्री भट्ट ने बताया कि वे गत सात महीनों से इस पर कार्य रहे हैं । इस शोध को दो चरणों में बांटा गया है - सैद्धांतिक प्रक्रिया और उपकरण । पहला चरण पूरा होने के बाद इलेक्ट्रानिक डिवाइस बनाने का काम चल रहा है । अभी विश्व में ऐसा कोई भी मीटर नही है, जिसके जरिए मानसिक तनाव को मापा जा सके । आज की भाग दौड़ भरी जिंदगी में मानसिक तनाव बीमारियों की प्रमुख वजह है । ऐसे में यह मीटर मानसिक तनाव के चलते होने वाली बीमारियों के उपचार में मददगार साबित होगा ।
    इसे मापने के लिए बायोमेडिकल मशीनें, जिसमें इलेक्ट्रो मस्तिष्क चित्रण मशीन (ईईजी), इलेक्ट्रो कार्डियोग्राम (ईसीजी), नियर इन्फ्रारेड स्पैक्ट्रॉरकॉपी (एनआईआरएस) को भी उपयोग में लिया जाएगा । व्यक्ति के शरीर को इन तीनों ही मशीनों से जोड़कर उस पर कलर टेस्ट, एप्टीट्यूड टेस्ट, इमोशनल स्टेबिलिटी सीकिग टेस्ट (ईएससी टेस्ट) और साउंड टू स्ट्ेस सेसिबिलिटी टेस्ट किया जाएगा, जिसके जरिए उसके मानसिक तनाव का स्तर मापने में मदद मिलेगी ।
    श्री भट्ट के इस शोधकार्य को गुजरात तकनीकी विश्वविघालय (जीटीयू) प्रशासन और शोध कार्यो को बढ़ावा देने के लिए प्रयासरत गुजरात तकनीकी विश्वविद्यालय इन्नोवेशन काउंसिल ने भी सराहा है । काउंसिल के हिरन्मय मेहता ने इसमें समुचित मदद का भरोसा दिया है । श्री भट्ट की गाइड सहायक प्रोफेसर इला परमार का कहना है कि यह एक बेहतर और उपयोगी शोधकार्य साबित हो सकता है । इसके सफलता की संभावना भी ७० प्रतिशत तक है ।

इस साल खुल जाएगा ब्रह्मांड का रहस्य 
    वैज्ञानिकों का दावा है कि वह इस साल के अंत तक ब्रह्मांड की उत्पत्ति के रहस्य से पर्दा उठा देगे । इसके सबसे जरूरी तत्व गॉड पार्टिकल के बारे में जानकारी मिलने पर सारी गुत्थी सुलझ जाएगी । वैज्ञानिकों का कहना है कि वे साल के अंत तक ब्रह्मांड की उत्पत्ति की पहेली सुलझा लेंगे । इसमें उनकी मदद करेंगे हिग्स बोसॉन नाम के गॉड पार्टिकल । जिसके अस्तित्व के बारे में जानकारी जुटाने में वैज्ञानिक लगे है । यह वही तत्व है जिसे ब्रह्मांड की उत्पत्ति के लिए जिम्मेदार माना जाता है ।
    लार्ज हेड्रोन कोलाइडर एचएचसी, मशीन के जरिये हिग्स बोसॉन का पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है । यूरोपियन ऑॅर्गनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च के निदेशक रोल्फ डिटर ह्मूयर का कहना है कि एचएचसी को अपग्रेड करने के लिए इसे साल के अंत तक दो साल के लिए बंद कर दिया जाएगा । श्री डिटर ने उम्मीद जताई कि मशीन को बंद करने से पहले गॉड पार्टिकल दुनिया के सामने होगा । उनका कहना है कि साल के अंत तक साफ हो जाएगा कि यह कण अस्तित्व में है या नहीं । अगर ऐसा होता है तो हमारी ५० साल की मेहनत सफल हो जाएगी । भौतिक विज्ञानियों का कहना है कि गॉड पार्टिकल का अस्तित्व है। हालांकि इसे कभी ढूंढा नहीं जा सका ।
    कई वैज्ञानिक दशकों से इसकी खोज में जुटे है, लेकिन अब तक सफलता हाथ नहीं लगी है । अगर गॉड पार्टिकल के अस्तित्व सिद्ध हो गया तो भविष्य में ब्रह्मांड को लेकर होने वाले शोध आसान हो जाएंगे । अभी तक वैज्ञानिकों को केवल पांच फीसदी ही ब्रह्मांड की जानकारी है । बाकी का हिस्सा डार्क एनर्जी या डार्क मैटर के नाम से जाना जाता है ।

कोई टिप्पणी नहीं: