मंगलवार, 15 जनवरी 2013

पर्यावरण परिक्रमा
पेंच का बाघ बना पन्ना टाइगर रिजर्व का सरताज

    बाघ पुर्नस्थापना योजना के तहत तीन वर्ष पूर्व पेंच टाईगर रिजर्व से लाया गया नर बाघ पन्ना टाइगर रिजर्व का सरताज  बन गया है । तीन वर्ष की अल्प अवधि में ही पन्ना टाइगर रिजर्व में १७ शावकों का जन्म हुआ, जिनमें १३ जीवित शावक जंगल में स्वछन्द रूप से विचरण कर रहे है । पुर्नस्थापित ५ बाघों को मिलाकर पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या १८ हो गई है ।
    पेंच के बाघ का आबाद हुआ यह परिवार निरन्तर विस्तार ले रहा है, जिससे पन्ना टाईगर रिजर्व की हरीभरी वादियां गुलजार हो उठी है । यह शानदार कामयाबी बेहतर प्रबन्धन व अचूक सुरक्षा उपायों के चलते मिली है, यह व्यवस्था कायम रही तो  आने वाले समय में पन्ना बेशकीमती हीरों के साथ-साथ बाघों की धरती के नाम से भी जाने जायेगा । पन्ना टाइगर रिजर्व के तीन साल के इस सफर पर प्रकाश डालते हुए क्षेत्र संचालक आर. श्रीनिवास मूर्ति ने बताया कि मार्च २००९ में पहलीबार २ बाघिन बांधवगढ़ एवं कान्हा से पन्ना लाई गई थी । परन्तु इन दोनों बाघिनों के पन्ना में प्रवेश करने से पहले यहां के स्थानीय नर बाघ पन्ना से बाहर निकल चुके थे । ऐसी स्थिति में जब तक इन बाघिनों के साथ एक नर बाघ का पन्ना टाइगर रिजर्व में प्रवेश नहीं होता तब तक बाघ पुर्नस्थापना योजना के सही परिणाम निकलना असंभव था  ।
    इस बात को ध्यान में रखकर बाघ पुर्नस्थापना योजना  की सम्पूर्ण योजना बनी जिसके तहत २ नर व ४ मादा बाघों क ो पन्ना लाना था । लेकिन प्रस्तावित ६ में से ५ बाघों एक नर व चार मादा बाघों को पन्ना टाइगर रिजर्व में पुर्नस्थापित किया जा सका है । बाघ पुर्नस्थापना योजना को पहली कामयाबी अप्रैल २०१०में मिली अब बाघिन टी-१ ने चार शावकों को जन्म दिया । इसके बाद बाघिन टी-२ ने भी अक्टूबर २०१० में चार शावकों का जन्म हो चुका है । यह परिणाम महज तीन वर्ष के अन्तराल में हासिल हुआ है ।
    इन बीते तीन सालों के दौरान अनाथ हो चुकी दो पालतू बाघिनों को जंगली बनाने का अभिनव प्रयोग भी यहां हुआ जो कामयाब हुआ । दुनिया में इस तरह का यह पहला प्रयोग था । जिसमें पालतू बाघिनों को न सिर्फ जंगली बनाया गया बल्ेकि एक बाघिन ने नवम्बर २०११ में दो शावकों को जन्म देकर इतिहास रच दिया । श्रीमूर्ति के मुताबिक यह बाघिन जब १५ दिन की थी तब अनाथ हो गई थी । किसी ने यह सपने में भी नहीं सोचा था कि एक अनाथ बाघ शावक जंगली बनकर मां बनेगी, लेकिन  यह चमत्कार पन्ना टाइगर रिजर्व में घटित हुआ है ।  

भूकंप से हिल सकता है हिमालय क्षेत्र

    भारत जैसे देशों के लिए  खतरे की घंटी बजाते हुए वैज्ञानिकों ने हिमालय क्षेत्र में आठ से लेकर ८.५ की तीव्रता तक के भूकंप के शक्तिशाली झटकों की चेतावनी दी है । वैज्ञानिकों ने ऐसे इलाकों के लिए खासकर चेताया है जहां अब तक भूकंप के शक्तिशाली झटके नहीं आए हैं ।
    नानयांग प्रौद्योगिकी विश्व-विद्यालय के नेतृत्व वाले एक अनुसंधान दल ने पाया है कि मध्य हिमालय क्षेत्रोंमें रिक्टर पैमाने पर आठ से साढ़े आठ तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप आने का खतरा    है । शोधकर्ताआें ने एक बयान में कहा सतह टूटने संबंधी खोज का हिमालय पर्वतीय क्षेत्रों से जुड़े इलाकों पर गहरा असर है ।
    अध्ययन में पता चला कि वर्ष १२५५ और १९३४ में आए भूकंप के दो जबर्दस्त झटकोंसे  हिमालय क्षेत्र में धरती की सतह टूट गई     थी । यह वैज्ञानिकों के पिछले अध्ययनों के विपरित है । हिमालय क्षेत्र में जबर्दस्त भूकंप आना कोई नई बात नहीं है । १८९७, १९०५, १९३४ और १९५० में भी ७.८ और ८.९ तीव्रता के भूकंप आए थे । इन भूकंपों से काफी नुकसान हुआ । लेकिन उन्होंने पहले सोचा था कि पृथ्वी की सतह नहीं टूटी है ।
    वैज्ञानिकोंने कहा कि उच्च् स्तर की नई तस्वीरों और अन्य तकनीकों की मदद से उन्होंने पाया कि १९३४ में आए भूकंप ने सतह को नुकसान पहुंचाया ओैर १५० से अधिक किलोमीटर लंबे मैदानी भाग में दरार आ गई । वैज्ञानिकों का मानना है कि क्षेत्र में अगली बार भूकंप के जबर्दस्त झटके आने मेंअभी समय है ।   
राष्ट्रीय जल नीति २०१२ को मंजूरी
    राष्ट्रीय जल नीति २०१२ को पिछले दिनों राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद की बैठक में मंजूरी दे दी   गई । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अध्यक्षता में हुई परिषद की छठवीं बैठक में राज्यों के प्रतिनिधियों के साथ व्यापक विचार-विमर्श के बाद नई राष्ट्रीय जल नीति को मंजूरी दी गई । इस नीति में जल प्रबंधन को लेकर एक राष्ट्रीय विधि तंत्र बनाने का प्रस्ताव किया गया है । बैठक में कई राज्यों के जल संसाधन मंत्री मौजूद थे ।
    डॉ. सिंह ने अपने उद्बोधन में लोगों को जल की बर्बादी के खिलाफ आगाह करते हुए कहा कि भविष्य में पानी की कमी देश के सामाजिक और आर्थिक विकास में बाधा खड़ी कर सकती है । उन्होनें कहा कि भारत में दुनिया की लगभग १८ प्रतिशत आबादी है, जबकि इस्तेमाल करने लायक पानी की मात्रा केवलचार प्रतिशत ही है । उन्होनें कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में पानी का सकंट और गंभीर रूप ले सकता है । उन्होनें सिंचाई प्रणाली को भी बहुआयामी बनाए जाने और भूजल के दुरूपयोग को कम करने के वास्ते इसके दोहन के लिए नियमन की जरूरत जताई । डॉ. सिंह ने कहा कि सीमित जल संसाधन को देखते हुए इसका प्रबंधन सोच-समझकर किए जाने की जरूरत है और इसके लिए सभी को राजनीतिक विचारधारा और क्षेत्रीय भिन्नता से ऊपर उठकर जल प्रबंधन के बारे में व्यापक सोच अपनानी होगी । प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय विधि तंत्र के जरिये राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण की आशंकाआें की सिरे से खारिज करते हुए कहा कि इस तंत्र को सही परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए । इसमें केन्द्र, राज्य सरकार और स्थानीय निकायों के अधिकारों का स्पष्ट तौर पर उल्लेख किया जाएगा । केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत ने कहा कि देश के सामने सबको पर्याय पेयजल उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती है । उन्होने कहा कि २०५० में विभिन्न क्षेत्रों की पानी की जरूरत पूरा करने के लिए ४५० अरब घन मीटर जल भण्डारण की जरूरत होगी । अभी देश में यह क्षमता २५३ अरब घन मीटर है ।
पौधारोपण के लिए जमीन का संकट
    जनहित के नाम पर निजी क्षेत्र के लिए तो बेरोकटोक भूमि का अधिग्रहण हो रहा है, लेकिन देश के एक तिहाई क्षेत्र को हरा-भरा बनाने के लिए केन्द्र सरकार जमीन की कमी का रोना रो रही है । पर्यावरण मंत्रालय ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि वह लाखों हेक्टेयर क्षेत्र को हरित क्षेत्र के तहत लाना चाहता है लेकिन देश के ३३ फीसद क्षेत्र को हरा-भरा बनाने के राष्ट्रीय लक्ष्य की राह में जमीन की कमी बड़ी समस्या है ।
    राष्ट्रीय वन नीति - १९८८ में सरकार ने पर्यावरण और पारिस्थितिकी संतुलन के लिए देश के एक तिहाई क्षेत्र को हरा-भरा बनाने का ऐलान किया था । लेकिन २४ साल बाद भी २३ फीसद भौगोलिक क्षेत्र ही इस दायरे मेंहै । जबकि, इस दौरान ध्वनि, जल और वायु प्रदूषण कई गुना बढ़ गया । रिपोर्ट के मुताबिक दस फीसद अतिरिक्त भौगोलिक क्षेत्र को हरा-भरा बनाने के लिए गैर वनक्षेत्र की भूमि को वनाच्छादित करना होगा । मंत्रालय ने माना है कि कृषि उत्पादन, शहरीकरण, औघोगिक विकास की बढ़ती मांग को देखते हुए दस फीसद अतिरिक्त भूमि हासिल करना मुश्किल है । लिहाजा राष्ट्रीय लक्ष्य को पाने के लिए गैर वनक्षेत्र की भूमि को बहुपयोगी बनाने और उसमें सुनियोजित तरीके से वृक्षारोपण ही समस्या का समाधान है । पर्यावरण मंत्रालय ने कृषि मंत्रालय के अधीन एग्रो-फारेस्ट्री विभाग को उसके अधिकार क्षेत्र में देने की आवाज भी उठाई । मंत्रालय का कहना है कि कृषि राज्य का विषय है लेकिन फारेस्ट्री (वानिकी) समवर्ती सूची में है । 

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