सोमवार, 17 मार्च 2014

सम्पादकीय
प्रकृति को भी चाहिये जीवन का अधिकार

    हमारा अस्तित्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से है । भारतीय चिंतन मेंजीवन के ये पांच महाभूत है । सभी प्राणी इन्हीं पर निर्भर है । संविधान ने हमें अनेक मौलिक अधिकार है, लेकिन प्रकृति को जीवन का भी मौलिक अधिकार नहीं है । नदिया जल प्रवाह हैं, यह नदियों का स्वभाव है, पर विकास के नाम पर उनका जल प्रवाह बाधिक है । वायु प्राण है । वायु में तरह-तरह के प्रदूषण है । ओजोन परत भी असुरक्षित है । प्रकृति में कई जीव है । पर्यावरण बनाए रखने में सबकी भूमिका है । पर्यावरण चक्र पर मनुष्य के अलावा दूसरा कोई जीव हमला नहीं करता है, मगर कीट पतिंगों सहित सभी जीवों के अस्तित्व पर संकट हैं ।         मनुष्य अपनी संस्कृति पर गर्व करता है मगर आधुनिकता में अपने मौलिक अधिकार के अलावा दूसरे के अस्तित्व का स्वीकार भी नहीं है । कोई मनुष्य अकेले रहकर ही सभ्य नहीं होता । विचार करे तो अधिकारवाद में केवलअपनी ही चिंता है और कर्तव्यबोध में अन्य सभी की ।
    भारतीय जीवन दर्शन में कर्तव्य पर जोर रहा है । नदी, वन, समुद्र, पर्वत, पशु, जगत व कीटपतिंगों के प्रति भी हमारे कुछ कर्तव्य है । यह और बात है कि पशुआेंसहित कई प्राणी वनस्पतियां हमारे लिए उपयोगी भी हैं । वे उपयोगी न हों, तो भी उन्हें जीवन के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता । पेड़-पौधों की संवेदनशीलता से वे मनुष्य को दूर से ही पहचान लेते है । गाय,बैल, भैंस, बकरियां भी संवेदनशील हैं, पर उन्हें काटा जाता है । पशु जगत के पास जीवन का अधिकार नहीं है । प्राणी को जीवन से वंचित करना कहां का न्याय है ?
    जीवन का अधिकार प्राकृतिक है । प्रकृति की उमंग का विस्तार जीवन है । एक निश्चित समय पर प्रकृति ही जीवन को वापस लेती है । हर पौधा, पशु, पक्षी या कोई भी जीवन और नदी, सबके सब प्रकृति की सृजन शक्ति का ही विस्तार है । विचार अभिव्यक्ति का अधिकार खूबसूरत है । हम सब इसका सदुपयोग दुरूपयोग की हद तक करते हैं। सृष्टि के हरेक जीव, वनस्पति और रूप आकार के मौलिक अधिकार का संरक्षण होना चाहिए क्योंकि प्रकृति को भी जीवन का अधिकार है ।    

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