गुरुवार, 31 मई 2007

संकट में है भूमिगत जल

सामयिक

संकट में है भूमिगत जल

सुश्री सुनीता नारायण

इसे भारत की कुछ अनजानी विडंबनाआें में से एक कह सकते हैं। पिछले कुछ सालों में सरकार ने सार्वजनिक सिंचाई एजेंसियों के माध्यम से सतही जल प्रणाली का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया है।

इसने सिंचाई प्रणालियों- बांध, तालाब, नहर आदि के निर्माण, इनके रखरखाव और पानी की आपूर्ति का काम संभाल लिया है। इसी के तहत उसने जल संसाधनों को ग्रामीण समुदायों के लेकर अपने पास रख लिया। विडंबना यह है कि सरकार ने यह अधिकार ले लिया है, फिर भी लोगों ने पानी अपने नियंत्रण में रखा है। हर व्यक्ति जमीन के नीचे का पानी निकालने के लिये स्वतंत्र है और देश में ज्यादातर सिंचाई इसी पानी से होती है। इसका अर्थ है कि सरकार का नियंत्रण एक भ्रम मात्र है।

फिलहाल अपने देश के सिंचित इलाके के तीन-चौथाई क्षेत्र में भूमिगत जल से सिंचाई होती है, सतही जल से नहीं। इस जल से सिंचाई का बुनियादी ढांचा किसी भी तरह से कर्ज के माध्यम से धन जुटाकर (धनी और गरीब) सभी किसानों ने बना लिया है। इससे यह बहस तो हो सकती है कि राज्य की ओर से संस्थागत मदद न मिलने के कारण किसान साहूकारों या कर्जदाता एजेंसियों के चंगुल में फंसे हुए हैं और उनकी गरीबी बरकरार है, लेकिन हकीकत यह भी है कि हाल में हुई तीसरी लघु सिंचाई जनगणना के आंकड़े के मुताबिक इस समय देश में एक करोड़ ९० लाख कुएं और गहरे ट्यूबवेल हैं।

पानी के शासन को समझने के लिए हमें अनिवार्य रूप से यह समझना होगा कि क्यों सिंचाई का अर्थशास्त्र मौजूदा तकनीक की सीमाआें से जुड़ा हुआ है। यह जरूरी इसलिए है क्योंकि यह इसका असर दूसरे क्षेत्रों मसलन ऊर्जा उत्पादन, बिजली आपूर्ति आदि में भी देखने को मिलता है। १० वीं योजना की मध्यावधि समीक्षा में बताया गया है कि सिंचाई की सुविधा के विस्तार का पूंजीगत खर्च प्रति हेक्टेयर ४० हजार रुपए से बढ़कर ढाई लाख रुपये हो गया है और भंडारण की सुविधा की जरूरत पिछले एक दशक में दोगुना हो गई है। इसमें विस्थापितों के पुनर्वास और जैव विविधता के क्षरण की भरपाई में खर्च होने वाली रकम को नहीं जोड़ा गया है।

जैसे-जैसे सिंचाई के बुनियादी ढांचे के निर्माण का खर्च बढ़ता गया, किसानों से इसके लागत खर्च और इसके रखरखाव के खर्च की वसूली संभव नहीं रही। ज्यादातर राज्यों में सिंचाई के काम देखने वाली एजेंसियां पिछले साल रखरखाव के खर्च का महज ३० फीसदी ही किसानों से वसूल पाइंर्। इसकी वजह से उनका क्षरण होने लगा। आज स्थिति यह है कि भूमिगत जल से संचालित नहरों की हालत खराब है और उनकी मरम्मत की बेहद सख्त जरूरत है, इसलिए आश्चर्य नहीं है कि सिंचाई के बुनियादी ढांचे की क्षमता और इसके वास्तविक इस्तेमाल के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है। दूसरी ओर सतही जल से सिंचाई के सिस्टम में पानी ढोकर काफी दूर ले जाना होता है, वह भी घाटे में है और अक्षम साबित हो चुका है।

चूंकि पूंजी और संसाधनों की कमी है इसलिए सभी तक सुविधा पहुंचाना संभव नहीं है। आज स्थिति यह है कि ४५ फीसदी खाद्यान्न का उत्पादन उन इलाकों में होता है, जहां बारिश के पानी से ही सिंचाई होती है। गरीबों का जीवन इसी उत्पादन से चलता है। दूसरे शब्दों में कहें तो सतही सिंचाई प्रणाली में किए गए निवेश ने समृद्धि के चंद टापू तैयार किए लेकिन स्थानीय स्तर पर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में बहुत कम योगदान किया।

इसी वजह से भूमिगत सिंचाई की प्रणाली शुरू हुई। यह सफल रही क्योंकि यह लोगों के हाथ में थी। वे अपनी जरूरत के समय इसका इस्तेमाल कर सकते थे। अगर उनके ट्यूबवेल चलाने के लिए बिजली नहीं है तो वे डीजल से मशीन चलाते हैं या भाड़े पर जनरेटर ले आते हैं और जमीन से पानी खींचते हैं। यह जानी हुई हकीकत है कि जो जितना सक्षम किसान है वह भूमिगत जल का उतना ही आसानी से इस्तेमाल करता है। इसका खर्च बहुत कम है क्योंकि यह आसानी से स्थानीय स्तर पर उपलब्ध है। कई मायने में भूमिगत जल के जरिये होने वाली सिंचाई सबसे बेहतर वितरण का विकेंद्रित विकल्प है लेकिन इसकी शर्त यह है कि इसका प्रबंधन समझदारी से हो।

इस संसाधन के सघन इस्तेमाल का अनिवार्य नतीजा यह हुआ है कि पूरे देश में भूमिगत जल का स्तर तेजी से गिरा है। तकनीक ने ज्यादा से ज्यादा गहराई से पानी खींचने की सुविधा दी है और सब्सिडी से मिलने वाली ऊर्जा ने उन्हें ज्यादा पानी खींचने के लिए प्रेरित किया है। अध्ययन बताते हैं कि जहां सस्ती बिजली उपलब्ध है, वहां हर फसल के लिए दोगुना पानी खींचा गया है, उन जगहों के मुकाबले जहां डीजल के इस्तेमाल से पानी खींचा जाता है।

हम कानून बनाकर इस इस्तेमाल को नियंत्रित कर सकते हैं। एक करोड़ ९० लाख उपभोक्ताआें को नियंत्रित करना मुश्किल जरूर है पर असंभव नहीं है। हमें यह समझना होगा कि भूमिगत जल एक सीमित संसाधन है और इसके लिए कुआें को रिचार्ज करने की जरूरत होती है, इसलिए इसे एक स्थायी संसाधन बनाए रखने के लिए इसका सालाना इस्तेमाल सीमित करना होगा। दूसरे शब्दों में हमें भूमिगत जल का इस्तेमाल बैंक की तरह करना होगा यानी इसका ब्याज इस्तेमाल करें और मूलधन को बचाए रखें।

लेकिन यहां विडंबना दोहरी हो जाती है। एक तरफ सिंचाई की सतही प्रणाली की जगह भूमिगत जल की प्रणाली ने ले ली है और दूसरी ओर सिंचाई के अन्य साधन जैसे कुएं, तालाब और समुदाय आधारित विकेंद्रित वॉटर-हार्वेस्टिंग सिस्टम में गिरावट आई है जबकि हकीकत यह है कि ये साधन भूमिगत जल को रिचार्ज करने में भी काफी मददगार होते हैं। इसका मतलब है कि हम जमीन के नीचे से ज्यादा से ज्यादा पानी खींच रहे हैं और उसे कम से कम रिचार्ज कर रहे हैं।

अगर अपनी पारंपरिक प्रणालियों का सम्मान नहीं करेंगे तो हमारे पानी का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। पारंपरिक प्रणालियों में वर्षा के पानी को रोकने के हजारों माध्यम होते थे और विभिन्न किस्म की संरचनाएं होती थीं, जो अब विलुप्त प्राय: हैं। स्पष्ट है कि हमें इसके अर्थशास्त्र को समझने के लिए तकनीक की राजनीति को समझना होगा।

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