शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

२ हमारा भूमण्डल

एच.आई.वी. और चेचक का अंतर्संबंध
सुश्री सुस्मिता डे

वैज्ञानिकों का एक वर्ग चेचक के वायरस में एक हद तक समानता खोज पाने में सफल हुआ है तथा वह इस खोज का एच.आई.वी. एड्स के इलाज में महत्वपूर्ण उपलब्धि मान रहा है । वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिकों का दूसरा वर्ग इसे महज कपोल कल्पना की संज्ञा दे रहा है । यह तो आने वाला समय ही बता पाएगा कि सच्चई क्या है ?
भाारत में सन् १९७५ में चेचक के खिलाफ ऑपरेशन चेचक रहित भारत का स्माल जीरो के प्रारंभ होते ही संयुक्त राष्ट्रसंघ के एक अधिकारी ने कहा कि यदि भारत से चेचक को समाप्त् कर दिया गया तो वे जीप का टायर खा लेंगे । कहते हैं चेचक की समािप्त् के पश्चात् इस कार्यक्रम के निदेशक डी.ए.हेण्डरसन ने उन्हें जीप का एक टायर भेजा था । ९ दिसम्बर १९७९ को यह प्रमाणित कर दिया गया था कि विश्वभर में चेचक का समूल नाश हो गया है । परंतु आधुनिक औषधि विज्ञान द्वारा प्रदत्त यह पहली राहत बहुत कम समय दिलासा दे पाई । टीकाकरण अभियान के विशेषज्ञों को इस बात का भान नहीं था कि अफ्रीका के जंगलों में एक अन्य वायरस चेचक के जाने का इंतजार कर रहा है । जल्दी ही इस वायरस का तेजी से संक्रमण फैलाने का लंबा इंतजार समाप्त् हुआ और १९८० के दशक में एचआईवी के रूप में सामने आया और अभी तक लोगों को अपना शिकार बना रहा
है ।
जार्ज मेसन विश्वविद्यालय के बायो सुरक्षा कार्यक्रम के रेमण्ड वेनस्टेन का सवाल है कि कल्पना कीजिए कि १९३० के दशक में पश्चिमी अफ्रीका के छोटे से क्षेत्र में पहली बार एड्स का वायरस उत्पन्न हुआ । यह भी सोचिए की १५ वर्ष की अल्प अवधि में यौन संबंधों से फैलने वाली एक बीमारी, वायु के माध्यम से फैलने वाली के मुकाबले इतनी तीव्रता से कैसे फैल सकती है ? विचारणीय है कि १९७० के दशक के बाद एकाएक ऐसा क्या हो गया ?
चेचक के नाश और इसके एड्स कीटाणुआें से मिलकर तेजी से फैलने के समयकाल पर वेनस्टेन का ध्यान अवश्य आकृष्ट हुआ । यह भी सच है कि अनेक सामाजिक-आर्थिक पहलू जैसे असुरक्षित यौन संबंध एवं नशीली दवाएं इसके लिए जिम्मेदार हैं । लेकिन वेस्टन की टीम सीसीआर नामक उस प्रोटीन की अनदेखी नहीं कर पाई जो कि दोनों वायरस में अनिवार्य रूप से पाया जाता है ।
इस विषय पर अध्ययन कर रहे दल के सदस्य एवं केलिफोर्निया विश्वविद्यालय में आनुवांशिकी विभाग के माइकल वेनस्टेन का कहना है कि सीसीआर-५ एवं सीएक्ससी
आर-४ कोशिका की सतह पर विद्यमान दो ग्राही हैं, जो कि प्रतिरोधी कोशिकाआें को संक्रमित स्थान पर ले जाने के एक भाग के रूप मेंइनका इस्तेमाल कोशिकाआें पर आक्रमण करने हेतु करता है । एक अन्य अध्ययन में साझीदार एवं अमेरिका के जार्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय के सूक्ष्म जीवविज्ञान, प्र्रतिरक्षक तंत्र शास्त्र एवं लाक्षणिक औषधि विज्ञान, विभाग के उपाध्यक्ष माइकल बकरिंसी का कहना है कि कुछ यूरोपीय व्यक्तियों ने सीसीआर-५ कोशिकाआें में परिवर्तन किया जिससे वे एचआईवी प्रतिरोधी बन गई ।
पूर्व में किए गए शोध में भी यह दर्शाया गया था कि चेचक वायरस भी संक्रमण फैलाने के लिए उसी मार्ग का इस्तेमाल करते हैं जिसका कि एचआईवी वायरस । यदि चेचक किसी व्यक्ति की असंक्राम्य कोशिकाआें को व्यस्त रख सकता है, तो वह व्यक्ति एचआईवी प्रतिरोधी भी बना रह सकता/सकती है । इस सिद्धांत के प्रतिपादन हेतु नौसेना में कार्यरत १९ से ४१ वर्ष मध्य के २० युवकों का चयन किया गया । उन २० में १० को चेचक का टीका लगाया गया था । उनकी सफेद रक्त कोशिकाआें के नमूने लिए गए और उन्हें एचआईवी से संक्रमित किया गया था । जिन कोशिकाआें में चेचक टीके को ग्रहण किया था उनमें रोगवाहक संक्रमण मे काफी आई । बीएमसी इम्युनलाजी के १८ मई के संस्करण में लिखा है कि जब इनमें अतिरिक्त सीरम डाला गया तो इसके परिणामस्वरूप केवल बिना टीकाकरण वाले जीवाणु समूह में ही एचआईवी में वृद्धि हुई ।
इस प्रश्न के जवाब में कि अध्ययन उन एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों के संबंध में क्या स्पष्टीकरण देता है, उन्हें चेचक का टीका लगाया गया था ? इस पर बकरिंसी का कहना है टीकाकरण के बाद इसमें अंशत: गिरावट आई है । हमारे मामले में टीके द्वारा स्वाभाविक रूप में दी गई प्रतिरक्षा से बचाव तो हुआ परंतु कम समय के लिए । परंतु एक वर्ष पश्चात
इससे प्राप्त् होने वाला बचाव रोमांचित कर सकता है । अमेरिका के नेशनल इंस्टिटयूट ऑफ एलर्जी एवं इन्फेक्टिशयस डिसीज की गीता बंसल का कहना है एचआईवी के प्रतिरोधक के रूप में विभिन्न रोगवाहकों का इस्तेमाल ध्यान देने योग्य है ।
वैसे विषाक्त विज्ञानी टी.जेकब जान की सोच है कि शोध ने जो संबंध स्थापित ध्यान किए है वह महज अटकलबाजी है । वहीं क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज के चिकित्सकों
का कहना है कि कल्पना कीजिए की चेचक का टीका १९८० के दशक एवं उसके बाद भी प्रयोग में आता रहता तो कुछ मामलों में इसके साइड इफेक्ट जीवन के लिए खतरनाक सिद्ध होते । हम खुशकिस्मत हैंकि एचआईवी संक्रमण चेचक के समाप्त् हो जाने के बाद प्रकाश में आया । हंडरसन इससे सहमति जताते हुए कहते हैं कि मेरे विचार से यह रोचक आंकलन है । लेकिन अभी इसमें इतना दम नहीं है कि इसे प्रयोग में लाया जा सके ।
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