सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

विज्ञान, हमारे आसपास
क्यों टूटते हैं तारे ?
डॉ. विजय कुमार उपाध्याय
    आपने कभी न कभी टूटता तारा अवश्य देखा होगा । अचानक हवा में एक जलती हुई लकीर नजर आती है और पलक झपकते ही खत्म होजाती है । वैज्ञानिक प्राचीन काल से ही टूटते तारों का अध्ययन करते आए हैं और कई सिद्धांत प्रस्तुत हुए हैं ।
    सौर मंडल में मंगल और बृहस्पति की कक्षाआें के बीच काफी बड़ा फासला हैं । सन् १८०१ में इस क्षेत्र में खगोल वैज्ञानिकों द्वारा एक छोटा पिंड खोजा गया था जो सूर्य की परिक्रमा कर रहा था । उस समय से अब तक तक इस प्रकार के डेढ़ हजार से अधिक पिंडों की खोज की जा चुकी है । इन पिण्डों को क्षुद्र ग्रह (ऐस्टेरॉयड) कहा जाता है । ये क्षुद्र ग्रह समय-समय पर एक दूसरे से टकराते हैं । टकराने के कारण ये सूक्ष्म टुकड़ों में टूटते रहते हैं ।
     ये सूक्ष्म टुकड़े उल्काणु (मीटियोराइट) कहे जाते हैं । ये उल्काणु विभिन्न दिशाआें में बिखर जाते हैं । इनमें से कुछ टुकड़े विभिन्न ग्रहों तथा अन्य ब्रह्माण्डीय पिंडों से टकरा सकते हैं । ऐसे टकराव के निशान चांद, पृथ्वी तथा मंगल की सतह पर पाए गए हैं । ये निशान विभिन्न प्रकार के गर्त (क्रेटर) के रूप में मौजूद हैं ।
    उपरोक्त सूक्ष्म टुकड़े या उल्काणु जब पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं तो वायुमंडल के अणुआें से घर्षण के कारण उनमें से अधिकांश उल्काणु तेज प्रकाश के साथ जल उठते हैं जिन्हें उल्का कहा जाता है । यह ज्वलन प्रकाश की एक लकीर के रूप में दिखाई पड़ता है । सामान्य बोलचाल में इसे टूटता तारा भी कहा जाता है । कुछ लोग इसे देखना शुभ/अशुभ मानते हैं ।
    अधिकांश उल्काआें का प्रकाश तो सिर्फ चंद सेकंड ही दिखाई पड़ता है हालांकि प्रकाश की यह लकीर अधिक से अधिक एक मिनट तक दिखाई पड़ सकती है । प्रकाश की यह रेखा उल्का द्वारा वायुमंडल के अणुआें को आयनीकृत करने के कारण दिखाई पड़ती है । अधिकांश उल्काएं भू-सतह से लगभग १०० किलोमीटर ऊपर दिखाई पड़ने लगती हैं तथा भू-सतह से ६०-६५ किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचते-पहुंचते लुप्त् हो जाती हैं। अधिकांश उल्काआें का वेग लगभग ४० किलोमीटर प्रति सेकंड होता है ।
    ऐसे अधिकांश सूक्ष्म टुकड़े तो उल्का के रूप मेंवायुमंडल में ही जलकर भस्म हो जाते हैं, परन्तु कुछ बड़े आकार के टुकड़े धरती तक पहुंचने में सफल हो जाते हैं । धरती पर गिरने वाले इन टुकड़ों को उल्का पत्थर कहा जाता है ।
    उल्काआें का अध्ययन मानव प्रागैतिहासिक काल से ही करता आ रहा है । भारत के प्राचीन वैज्ञानिक वराहमिहिर द्वारा लिखित ग्रंथ वृहत् संहिता के उल्का लक्षणाध्याय में इस विषय की चर्चा विस्तारपूर्वक की गई है । इस पुस्तक में उल्का के पांच भेद बताए गए हैं- धिष्णया, उल्का, अशनि, बिजली तथा तारा । धिष्णया पतली छोटी पूंछ वाली, प्रज्वलित अग्नि के समान तथा दो हाथ लम्बी होती  है । उल्का विशाल सिर वाली, साढ़े तीन हाथ लम्बी और नीचे की ओर गिरती हुई दिखाई देती हैं । अशनि चक्र की तरह घूमती हुई, जोर की आवाज करती हुई पृथ्वी पर गिरती  है । बिजली विशाल आकार की होती है जो तड़-तड़ आवाज करती हुई पृथ्वी पर गिरती हैं । तारा एक हाथ तम्बी तेज प्रकाश करती हुई आकाश में एक ओर से दूसरी ओर जाती दिखाई देती है ।
    उल्काआें तथा क्षुद्र ग्रहों की उत्पत्ति के सम्बंध में वैज्ञानिकों का विचार है कि अतीत में सौर मंडल का कोई ग्रह टूटकर बिखर गया था जिसके टुकड़े क्षुद्र ग्रह अथवा उल्काआें के रूप में परिवर्तित हो   गए । कुछ अन्य वैज्ञानिकोंकी धारणा है कि अतीत में सौर मंडल के कोई दो ग्रह आपस में टकरा गए जिसके कारण दोनों ग्रह नष्ट हो गए । इनके नष्ट होने से उत्पन्न टुकड़े आज हमें क्षुद्र ग्रहों तथा उल्काआें के रूप में दिखाई पड़ते हैं । परन्तु इस परिकल्पना को कुछ वैज्ञानिकोंने संतोषजनक नहीं माना है । उनके मतानुसार मंगल तथा बृहस्पति के बीच इतना बड़ा फासला है कि वहां दो ग्रहों के आपस में टकराने की संभावना नगण्य मालूम पड़ती है । कुछ वैज्ञानिकों ने एक तीसरी परिकल्पना प्रस्तुत की    है । इस परिकल्पना के अनुसार क्षुद्र ग्रहों तथा उल्काआें का निर्माण सौर मंडल के निर्माण के साथ ही हुआ । आजकल अधिकांश वैज्ञानिक इसी परिकल्पना के समर्थक हैं ।
    धरती की सतह पर पाए गए अनेक उल्का पत्थरों के विश्लेषण से पता चला है कि उनमें लोहा तथा निकल धातुएं एवं कई प्रकार के सिलिकेट खनिज पाए जाते हैं । ये सिलिकेट खनिज उसी प्रकार के है जिस प्रकार के सिलिकेट खनिज बेसाल्ट नामक ज्वालामुखीय (आग्नेय) चट्टान में पाए जाते हैं । कुछ उल्का पत्थर तो शुद्ध लोहे के बने होते हैं । ये उल्का पत्थर देखने में ऐसे मालूम पड़ते हैं मानो पिघले लोहे को उच्च् दाब पर धीरे-धीरे ठंडा किया गया हो । इस तथ्य के आधार पर कुछ वैज्ञानिक पहले मानते थे कि उल्काआें का निर्माण ऐसे ग्रह के टूटकर बिखरने से हुआ है जिसके केन्द्रीय भाग में लोहा मौजूद था ।
    परन्तु हाल में ही कुछ वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययनों से पता चला है कि इस प्रकार का लोहा कम दाब तथा कम तापमान पर भी निर्मित हो सकता है । कुछ उल्का पत्थरों में मौजूद रेडियोधर्मी खनिजों के विश्लेषण से पता चला है कि इनका निर्माण लगभग साढ़े चार अरब वर्ष पूर्व हुआ था ।
    अभी तक किए गए विभिन्न अध्ययनों से पता चला है कि पृथ्वी की ओर आने वाली अधिकांश उल्काएं तो पृथ्वी के वायुमंडल से गुजरते समय ही जलकर राख हो जाती हैं या वाष्पीभूत हो जाती हैं । हर २४ घंटे औसतन लगभग दो करोड़ उल्काएं पृथ्वी के वायुमंडल से गुजरते समय जल जाती हैं । कभी-कभी एक घंटे में लाखों की संख्या में उल्काएं पृथ्वीके वायुमंडल में जलकर भस्म होती हैं । इस घटना को उल्कापात कहा जाता हैं । ऐसी घटना हर साल लगभग एक ही समय पर घटती है ं
    उल्काएं कृत्रिम उपग्रहों के लिए काफी खतरनाक साबित हुई    हैं । संयोवश यदि उल्काएं दन उपग्रहों से टकरा जाएं तो उपग्रह नष्ट हो सकते हैं । कभी-कभी किसी उल्का का टकराना काफी प्रलयंकारी साबित होता है । ऐसी एक घटना ३० जून १९०८ को घटी थी । उस दिन रूस के साइबेरिया क्षेत्र में उल्कापात हुआ था । इस उल्कापात की आवाज उस स्थान से लगभग ६०० किलोमीटर दूर तक सुनी गई थी । साथ ही ७५ किलोमीटर के दायरे में स्थित भवनों के शीशे टूट गए थे । इसके अलावा लगभग ३० किलोमीटर के क्षेत्र में पेड़-पौधे उखड़ गए थे और असंख्य जीव-जन्तु मारे गए थे । साइबेरिया में ही सन् १९४७ में पहाड़ी क्षेत्र में दल्कापात हुआ था ।
    प्रत्येक उल्का अपने साथ बाह्य अन्तरिक्ष से पत्थरों एवं धूल कणों की कुछ न कुछ मात्रा पृथ्वी पर अवश्य लाती है । अनुमान है कि प्रतिदिन लगभग दस लाख किलोग्राम पदार्थ उल्काआें द्वारा बाह्य अन्तरिक्ष से पृथ्वी पर लाया जाता है । यह पदार्थ धूल कणों के रूप में होता है । ऐसे धूल कण ऊपरी वायुमंडल तथा ध्रूवों पर पाए गए हैं । परन्तु पृथ्वी के द्रव्यमान की तुलना में उल्काआें द्वारा लाए गए पदार्थ का द्रव्यमान नगण्य है ।

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