मंगलवार, 16 जून 2015


पर्यावरण परिक्रमा
गंगा के प्रदूषण पर डिजिटल ऐप रखेगा नजर 
गंगा को प्रदूषित करने वालों पर अब एक अत्याधुनिक डिजिटल ऐप नजर रखेगा । उच्च् पदस्थ सूत्रों ने बताया कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के सहयोग से अत्याधुनिक प्रौघोगिक पर आधारित एक ऐसा ऐप तैयार किया गया है जिसका इस्तेमाल उन लोगों के खिलाफ किया जा सकेगा जिनकी आदतों में गंगा को प्रदूषित करना शुमार हो चुका है । 
गंगा किनारे बसे शहरों के लोग गंगा में कूड़ा-कचरा बहाने वाले औघोगिक समूहों, गंगा को दूषित करने की आदत से मजबूर व्यक्तियों और प्रदूषण के अन्य स्त्रोंतों की तस्वीरें लेकर नए ऐप पर पोस्ट कर सकेंगे जिसके आधार पर उनके खिलाफ कार्यवाही की जा सकेगी । 
इस ऐप की खासियत है कि इस पर यदि कोई तस्वीर डाली जाती है, तो उपग्रह प्रणाली के जरिये उसकी वास्तविक स्थिति एवं जगह की सही जानकारी मिल जाएगी और मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी नमामि गंगे परियोजना से जुड़े अधिकारी यथाशीघ्र इस पर कार्यवाही कर सकेंगे । प्रदूषित स्थान की तस्वीर अपलोड हो जाने के बाद इसे किसी भी प्रकार से हटाया ही नहीं जा सकता है, इसकी वास्तविक जानकारी, जैसे - स्थान, तारीख और समय तक का पता भी चल जाएगा । 
इस ऐप का इस्तेमाल शुरू हो जाने पर गंगा के उद्गम स्थल से लेकर इसके बंगाल की खाड़ी में गिरने तक के पूरी नदी का प्रदूषण निगरानी कार्यक्रम कागजों के बजाय भौगोलिक सूचना प्रणाली पर आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पहुंंच जाएगा । गंगा पुनरूद्धार योजना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि यह ऐप भविष्य की कार्य योजनाएं तैयार करने के अलावा इस महत्वाकांक्षी परियोजना से जुड़े कार्यो की निगरानी में भी मदद करेगा । 
उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केन्द्रीय मंत्रीमंडल ने एक पखवाड़े पहले नमामि गंगे के लिए पांच साल के लिए २० हजार करोड़ रूपये देने का फैसला किया है । यह राशि इस परियोजना के लिए गत वर्ष जुलाई में मंजूर २३०७ करोड़ रूपये से अलग है । मंत्रिमंडल की ओर से जिस राशि को मंजूरी दी गई है, वह बहुत ही महत्वपूर्ण है । आंकड़े बताते है कि यह राशि पिछले तीन दशक से गंगा की सफाई के लिए आवंटित राशि से पंाच गुना अधिक है । 
प्लास्टिक से बने डीजल से दौड़ेगी रेल 
वह दिन दूर नहीं जब रेलवे स्टेशनों पर फेंकी गई प्लास्टिक की बोतलों, कपों तथा अन्य पैकेजिंग पदार्थोंा से डीजल बनने लगेगा और उससे डीजल इंजन चलने लगेंगे । 
वैज्ञानिक एवं औघोगिक अनुसंधान केन्द्र (सी.एसआईआर) के तहत स्थापित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम (आईआईपी), देहरादून के साथ मिलकर रेलवे प्रतिदिन एक टन से प्लास्टिक कूड़े से डीजल बनाने की क्षमता वाला प्लांट लगाने की योजना बना रही है । प्रायोगिक तौर पर लगाए जाने वाले यह प्लांट यदि आर्थिक रूप से सफल रहा तो इनकी संख्या बढ़ाई भी जा सकती है । 
आईआईपी के अनुसार, इस सिलसिले में तीन बैठकें हो चुकी हैं और आगामी दिनों एक और बैठक होने वाली है । संभवत: यह प्लांट दिल्ली, मुम्बई या जयपुर में से किसी एक जगह लगाया जा सकता है । स्थान का चयन करते समय यह देखना होगा कि वहां स्टेशन से प्रतिदिन एक टन प्लास्टिक कूड़ा निकलता हो । 
आईआईपी ने ऐसी खास तकनीक विकसित की है जिससे प्लास्टिक से यूरो-४ मानक का डीजल बनाया जा सकता है । डीजल की अच्छी गुणवत्ता के लिए आईआईपी विशेष प्रकार के उत्प्रेरक का इस्तेमाल करता है और यही उसकी खासियत है । 
प्लास्टिक से डीजल बनाने के दौरान उत्पाद के रूप मेंजो निकलती है उसका इस्तेमाल प्लांट के संचालन की ऊर्जा जरूरतोंके लिए कर लिया जाता है । नियमों के तहत इस तरह से बने डीजल की खुले बाजार मेंबिक्री नहीं की जा सकेगी । 
यूरोप-अमेरिका में अधिक कार्बन उत्सर्जन 
धरती के बढ़ते तापमान के लिए जिम्मेदार कार्बन डाईआक्साइड गैसोंके उत्सर्जन के मामले में भारत भले ही चीन और अमेरिका के बाद तीसरे स्थान पर हो लेकिन जनसंख्या के अनुपात के लिहाज से वह इस मामले मेंकई देशों से काफी पीछे    है ।
ब्रिटिश पेट्रोलियम की ओर से वर्ल्ड एनर्जी पर जारी ताजा रिपोर्ट के अनुसार एक भारतीय नागरिक की तुलना में ब्रिटेन, जर्मनी, कनाडा और अमेरिका के नागरिक पांच से १२ गुना अधिक कार्बन उत्सर्जन करते हैं जबकि दुनिया की कुल आबादी का छठवां हिस्सा समेटे भारत प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन के मामले में २०वें स्थान पर है । भारत सालाना १.९३ अरब टन कार्बन उत्सर्जन करता है जबकि जापान महज १२ करोड़ ७० लाख आबादी के साथ १.४ टन कार्बन उत्सर्जन कर रहा है । इस लिहाज से एक जापानी नागरिक भारतीय नागरिक की तुलना में सात गुना अधिक कार्बन उत्सर्जन कर रहा है । 
इसी तरह दुनिया की एक चौथाई से भी कम आबादी वाले देश चीन और अमेरिका वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में ४४ प्रतिशत का योगदान कर रहे है जबकि रूस और यूरोपीय देश इसमें २० प्रतिशत का योगदान कर रहे हैं । इसमें भारत का योगदान महज ५.५ प्रतिशत है । ये आंकड़े इस बात का प्रमाण है कि ग्रीन हाउस गैसों का सबसे ज्यादा उत्सर्जन चीन तथा कई विकसित देशों की ओर से हो रहा है।
भारत के साथ विवशता यह है कि देश की एक चौथाई आबादी के पास अभी भी बिजली की पहुंच नहीं है । ईधन और ऊर्जा के लिए कोयले पर उसकी सर्वाधिक निर्भरता है । घरेलू कामकाज के साथ ही कल कारखानोंमें भी कोयला ही मुख्य रूप से इस्तेमाल होता है । तेल और प्राकृतिक गैस की अपेक्षा कोयला सस्ता पड़ता है । यह भी इसके बढ़ते इस्तेमाल की एक मुख्य वजह है । भारत एक तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था है । ऐसे मे औघोगिक गतिविधियां लगातार बढ़ रही है जिसके लिए बिजली चाहिए । बिजली उत्पादन के लिए ईधन की दरकार   है । कोयला इसका सबसे बड़ा स्त्रोत बना हुआ है । यही वजह है कि भारत दुनिया में कोयले की खपत वाला तीसरा बड़ा देश बन चुका है । पर्यावरण विशेषज्ञ भारत में कोयले के इस कदर इस्तेमाल को लेकर चितिंत है । उनका मानना है कि कोयले पर यह निर्भरता यदि इसी तरह बनी रही तो पर्यावरण को इससे बड़ा नुकसान होगा । 
डाल्फिन का अस्तित्व संकट में 
डाल्फिन को भले ही राष्ट्रीय जलीय जीव का दर्जा मिला हो लेकिन देश में इसी संख्या निराश करने वाली है । गंगा का वाहक समझे जाने वाले इस जलचर की संख्या पूरे विश्व में अब दो हजार ही रह गई है जबकि भारत में इसकी संख्या मात्र चार सौ से कुछ ज्यादा है । सरकारी आंकड़ों के अनुसार चम्बल में ७८, यमुना में ४७, बेतवा में ५, केन में १०, सोन नदी में ९, गंगा में ३५ तथा घाघरा में २९५ है । इस तरह कुल ४७९ डाल्फिन ही भारत में बची है । 
खासकर उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश की सीमा रेखा की चीरती विश्व की सबसे स्वच्छ नदियों में शुमार की जाने वाली चम्बल नदी में डाल्फिन का अस्तित्व खतरे में है । इस जलचर को बचाने की पहल करते हुए वर्ष २००९ में तत्काली प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया   था । इसके पीछे यह मंशा थी कि डाल्फिन के अस्तित्व को बचाया जा सके, लेकिन मौजूदा हालातों को देखते हुए ऐसा नहीं लगता की डाल्फिन को संकट से बचाया जा सकेगा । नदियों के प्रदूषण ने इसके जीवन का सबसे बड़ा खतरा पैदा किया है । इसके अलावा शिकारियों ने भी इस पर गिद्ध दृष्टि जमा रखी है । यही कारण है कि इनकी संख्या में लगातार कमी होती जा रही है । 
वन विभाग के अधिकारी भी मानते है कि हर वर्ष सैकड़ों डाल्फिन विभिन्न कारणों से दम तोड़ रही है लेकिन इन्हें बचाने के कारगर उपाय नहीं किए गए है । डाल्फिन यूं तो देश की विभिन्न नदियों ब्रह्मपुत्र, मेघना समेत गंगा की सहायक नदियों के अलावा नेपाल और बंगला देश में भी पाई जाती है । इसकी संख्या में गिरावट को देखते हुए इसके संरक्षण एवं प्रजनन के लिए ९६० किलोमीटर लम्बी चम्बल नदी के ४२५ किलोमीटर क्षेत्र मध्यप्रदेश से लेकर उत्तरप्रदेश के पचनंद तक के क्षेत्र को राष्ट्रीय सेंचुरी क्षेत्र घोषित किया गया था । 
हालांकि इस सेंचुरी क्षेत्र में डाल्फिन के साथ घड़ियाल, कछुए और मगरमच्छ भी है लेकिन सेंचुरी क्षेत्र में पानी की कमी के चलते डीप पुल सिमटता जा रहा है जिससे अन्य जलीय जीवों के साथ-साथ सबसे ज्यादा डाल्फिन के अस्तित्व को खतरा बढ़ता जा रहा है । जानकारों के अनुसार चम्बल नदी में स्थापित चार बांधों ने इसकी धारा को कुन्द कर दिया है । रेत की सिल्ट डीप पुलों के लिए बाधक साबित हो रही है । उथली नदी में पानी की कमी के चलते जलीय जीवों की जान पर खतरे के बादल मंडराने लगे है ।

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