बुधवार, 15 जुलाई 2015

प्राकृतिक आपदा
भूकंप से बचाव मेंजन सहभागिता जरूरी
श्रीराम माहेश्वरी
प्राकृतिक आपदाआें में भूकम्प एक विनाशकारी आपदा माना जाता है । भूकम्प आने पर हम इसे रोक नहीं सकते परन्तु सुरक्षा के लिए उपाय अवश्य कर सकते है । 
भूकम्प आने पर एक हल्का झटका महसूस होता है फिर कुछ क्षणोंके लिए रूक जाता है इसके बाद या कुछ सेकण्ड या मिनटोंमें झटकेदार बार-बार कम्पन महसूस होता है । पहले झटके से बाद के कम्पन अधिक तीव्रता के होते है । छोटे भूकम्प आने पर पृथ्वी में कंपन कुछ सेकण्ड तक रहता है तथा बड़े भूकम्प में एक मिनट में ज्यादा समय तक झटके महसूस होते है । 
जमीन के चार-पांच कि.मी. नीचे भूगर्भ की हलचलों के फलस्वरूप भूकम्प आते है । पत्थर, मिट्टी खनिज और गैसों से निर्मित प्लेटों के हिलने या खिसकने के कारण कम्पन की तीव्रता ऊपर सतह तक आती है । भूकम्प आने पर विनाशकारी परिणाम सामने आते है । भूकम्प आने पर प्रभावी आपदा प्रबंधन का होना जरूरी है । सरकारी तथा निजी सभी एजेंसियों को संचार व्यवस्था के माध्यम से जनसामान्य को सुरक्षा और बचाव के उपायोंपर तुरन्त संदेश भेजना जरूरी होता है। इससे जनता में घबराहट नहीं होती और भगदड़ रोकी जा सकती है। रेडियो, टीवी, इन्टरनेट जैसे साधनों से हम आम जनता को जागरूक कर सकते है । 
भारत में विभिन्न राज्यों में आपदा से निपटने से राहत केन्द्र और पुर्नवास केन्द्र बनाए गए हैं, परन्तु व्यवस्था की दृष्टि से वे उपेक्षित रहते हैं । भूकम्प जैसी आपदा के समय प्रभावी क्षेत्रों में राहत सामग्री की व्यवस्था राज्यों और जिला प्रशासन की ओर से तुरन्त होना चाहिए । अन्तर्राष्ट्रीय रेडक्राससोसायटी का आकलन है कि हर साल विश्वभर में प्राकृतिक आपदाआें से करीब डेढ़ से दो लाख लोगों की जान जाती है । साथ ही करीब तेरह करोड़ लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है । देखा गया है कि आपदाआें के समय लोग अपनी जान बचाने की फिक्र तो करते हैंपरन्तु पेड़ पौधों और जानवरों तथा वन्य प्राणियों को बचाने की ओर ध्यान नहीं देते जबकि यह जरूरी है । वनस्पति, पेड़-पौधे, जानवर नहीं बचेंगे तो प्रकृतिका संतुलन बिगड़ेगा इससे पर्यावरणीय समस्या पैदा होगी । संयुक्त राष्ट्र द्वारा आपदाआें के जोखीम को कम करने की दिशा में वैश्विक स्तर पर कई प्रयास किए गए । बीसवीं सदी के अंतिम दशक को अन्तर्राष्ट्रीय आपदा घटाओ दशक के रूप मेंघोषित किया गया था । जापान के कौबे नगर में १८ से २२ जनवरी २००५ में सम्मेलन हुआ । वर्ल्ड कान्फ्रेंस डिजास्टर रिडक्शन नाम से हुए इस सम्मेलन में १६८ देशों ने हिस्सा लिया तथा ह्यूगो-फ्रेमवर्क फॉर एक्शन (२००५-२०१५) का अनुमोदन किया गया । 
भारत में १९९९ में एक हाई पावर कमेटी का गठन किया    गया । भारत सरकार द्वारा गठित इस कमेटी द्वारा केन्द्र, राज्य तथा जिला स्तर पर आपदा संबंधी योजनाएं तैयार कर अपनी सिफारिशों सरकार को सौंपी । बाद में संसद के दोनों सदनों ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन विधेयक २००५ पारित हुआ । इस विधेयक के बाद राज्यों में जिला स्तर पर आपदाआें के प्रबंधन पर कार्य हो रहा है । 

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