मंगलवार, 15 सितंबर 2015

वानिकी-जगत
अनमोल पेड़ों का मोल
डॉ.ओ.पी. जोशी
पेड़ों की उपयोगिता एवं मूल्य का आंकलन नकद मुद्रा में करना कमोवेश असंभव है। अनिवार्यता के चलते यदि पेड़ काटना भी पड़े तो उसका मूल्य उपयोगिता के अनुरूप ही होना चाहिए । कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा का कहना है कि हरा भरा वृक्ष जी डी पी में योगदान नहीं करता लेकिन कटे वृक्ष से बना फर्नीचर हमारी जी डी पी में योगदान करता है ।
केे न्द्र में एन. डी. ए. सरकार के एक वर्ष पूर्ण होने पर केन्द्रीय वन व पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने अपने मंत्रालय की उपलब्धियांे की जानकारी देते समय यह कहा कि सरकार मौजूदा वन कानून में संशोधन कर पेड़ काटने पर जुर्माना राशि बढ़ायेगी । वर्तमान में यह राशि मात्र एक हजार रुपये है । आजादी के बाद हमने कई क्षेत्रों में अंग्रेजों के बनाये कानून यथावत ही मान    लिये । 
वन कानून के संबंध में भी शायद यही हुआ । अंग्रेजांे के लिए वृक्ष का मतलब केवल लकड़ी या काष्ठ था । सम्भवत: लकड़ी का तात्कालिक बाजार भाव के अनुसार यह जुर्माना तय किया होगा । तब सस्ता जमाना था एवं नौकरियों में लोगों को सौ-दो सौ रुपये मासिक वेतन मिलता था । 
इस सस्ते जमाने में एक हजार रुपये की राशि काफी बड़ी एवं भारी लगती थी । इसीलिए पेड़ों का काटना काफी कम होता था । उस समय पर्यावरण विज्ञान एवं पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) भी अपने प्रारम्भिक चरण में थे । विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों की जानकारी उस समय भी प्राप्त थी । वनों एवं पेड़ांे के पर्यावरणीय योगदान के संदर्भ में ज्यादा शोध, सर्वेक्षण एवं अध्ययन आदि तब तक नहीं हुए थे, या कम हुए थे या उनकी जानकारी प्रचार माध्यमों से लोगों तक नहीं पहुंची   थी । 
सम्भवत: देश में पहली बार जनवरी १९८७ मेंवाराणसी में आयोजित भारतीय विज्ञान कांग्रेस के सम्मेलन में कलकत्ता वि.वि. के प्रो. टी. एम. दास ने अपने अध्ययन के आधार पर बताया था कि एक पच्चस वर्षीय पेड़ अपने जीवनकाल में १५ लाख ७० हजार रुपये की सेवा प्रदान करता है। इन सेवाओं मंे प्राणवायु देना, ताप नियंत्रण करना, भूमि कटाव रोकना व उपजाऊपन बढ़ाना, पशुओं को प्रोटीन एवं वायु प्रदूषण को कम करना आदि शामिल थे । डा. दास की यह गणना भी लगभग तीन दशक पुरानी है । वर्ष १९८७ से अब तक महंगाई कई गुना बढ़ गयी हैं एवं इस आधार पर यह सेवा एक करोड़ रुपये की है । इसका तात्पर्य यह हुआ कि अमिताभ बच्च्न के प्रसिद्ध कार्यक्रम कौन बनेगा करोड़पति की हाट सीट पर बैठे बगैर ही पुराने पेड़ करोड़पति हैं ।  
पर्यावरण पर फिल्म बनाने वाले माइक पांडे का तो स्पष्ट कहना है कि एक पेड़ यानी एक करोड़ बायोवेद शोध संस्थान इलाहाबाद के एक अध्ययन के अनुसार एक मनुष्य को वर्ष भर मंे लगभग ५५००० लीटर प्राणवायु (ऑक्सीजन) की जरुरत होती है । १५० रुपये प्रति लीटर के मूल्य से प्राणवायु की कीमत जोड़ी जाए तो यह ८२ लाख रुपये से ज्यादा होती है । इसका तात्पर्य यह है कि केवल प्राणवायु देकर ही एक पेड़ करोड़पति होने के नजदीक है । 
पेड़ों की पर्यावरण में प्रदान की जाने वाली ये सेवाएं मौसम के अनुसार थोड़ी बहुत बदलती रहती    हैं । पतझड़ी वृक्षों में पत्तियों के झड़ने के साथ ही यह सेवा न्यूनतम हो जाती है । सदाबहार पेड़ों में यह सेवा वर्ष भर लगातार समान रूप से चलती रहती है। धूल प्रदूषण भी पर्यावरणीय सेवाओं को थोड़ा प्रभावित करता है । धूल के महीन कण पत्तियों की सतह पर जमा होकर गैसों का आदान प्रदान एवं वाष्पोर्त्सजन को कम कर देते  हैं । 
पेड़ या पेड़ांे के कटते ही उनकी पर्यावरणीय सेवाएं समाप्त हो जाती  है । पर्यावरणीय सेवाओं का जितना मूल्य, कटने पर उतनी ही हानि । वर्तमान में एक पुराना पेड़ काटने पर एक करोड़ की हानि । अमेरीकी वन सेवा के न्यूयार्क स्थित शोध संस्थान के प्रोजेक्ट डायरेक्टर प्रो. डेविड नोवक के अनुसार एक बड़ा पुराना पेड़ छोटे नए पेड़ की अपेक्षा ज्यादा पर्यावरणीय सेवा प्रदान कर ७५ से ८० प्रतिशत प्रदूषण नियंत्रण की क्षमता रखता है । जून २०१५ में दिल्ली सरकार ने भी अपनी केबिनेट बैठक मंे पेड़ हटाने की राशि २८००० से बढ़ाकर ३४५०० रुपये प्रति पेड़ करने की मंजूरी दी है। यह कार्य १९९४ के पेड़ बचाओ अधिनियम के  तहत किया गया है । इसमें यह सुविधा भी दी गयी है कि हटाये गये पेड़ को दूसरी जगह रोपित करने पर १५००० रुपये की राशि वापस की जावेगी ।
पर्यावरणीय मूल्यों को जोड़कर यदि पेड़ काटने की राशि निर्धारित की जाती है तो यह काफी ज्यादा होगी एवं इसका बहुत विरोध भी होगा । लकड़ी के बाजार मूल्य के आधार पर जुर्माना राशि तय की जा सकती है । वैसे राशि इतनी तो होना ही चाहिये कि काटने वाला इस बारे में सोचे एवं उसके मन में एक बार यह विचार आये कि इससे तो अच्छा है कि पेड़ को बचा लिया जाए ।

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