बुधवार, 15 अप्रैल 2015

ज्ञान-विज्ञान
सवा लाख साल पुराने आभूषण मिले 
ऐसा लगता है कि सजने-संवरने का शौक बहुत पुराना है, कम से कम सवा लाख साल पुराना । क्रोएशिया के एक पुरातत्विक स्थल से कुछ चीजें मिली हें जो संभवत: आभूषणों के रूप में इस्तेमाल की जाती थी । 
इन आभूषणों का विवरण कैन्सास विश्वविघालय के पुरामानव वैज्ञानिक डेविड फेयर और साथियों ने पत्रिका के १२ मार्च के अंक में प्रकाशित किया है । ये बाज के पंजों की हडि्डया है मगर इन पर उकेरने के निशानों को देखकर लगता है कि इनका उपयोग सजने-संवरने के लिए होता होगा । 
दरअसल, बाज के इन १,३०,००० वर्ष पुराने पंजों की खोज एक सदी से भी पहले हुई थी । खोज एक भूगर्भ वैज्ञानिक ड्रागुटिन गोर्यानोविए ने क्रोएशिया में क्रापिना शहर के नजदीक एक शैलाश्रय में की थी । शैलाश्रय में इन पंजों के अलावा पत्थर के औजार, निएंडर्थल की हडि्डयां और दांत भी मिले थे । गौरतलब है कि निएंडर्थल मानवों के पूर्वज माने जाते हैं । गोर्यानोविए ने इन वस्तुआें को पहचान के लिए अपने एक साथी को भेज दिया और बात आई-गई हो गई । 
फ्रेयर ने ये वस्तुएं जग्रीब स्थित क्रोएशिया प्राकृतिक संग्रहालय में २०१४ में देखी । पहली नजर में ही वे समझ गए कि ये कितनी महत्वपूर्ण है । कारण यह था कि इससे पहले शिकारी पक्षियों के पंजे व पंख निएंडर्थल स्थलों से खोजे जा चुके थे और अनुमान लगाया गया था कि इनका उपयोग आभूषणों के रूप में किया जाता होगा । मगर काप्रिना की वस्तुएं उन सबसे पुरानी थीं, संभवत: निएंडर्थल स्थल से मिली सबसे पुरानी । 
इन पंजों पर जो काटने के निशान थे वे शायद उस समय बने होंगे जब इन्हें पक्षी से अलग किया होगा मगर विशेषता यह थी कि इन निशानों को घिसकर चिकना किया गया था । इसके अलावा लगता था कि कई पंजे तो चमकाए भी गए    थे । फ्रेयर के मुताबिक यह स्पष्ट प्रमाण है कि इनका उपयोग झुमकों के रूप में किया जाता होगा । कई मानव वैज्ञानिकों को मत रहा है कि ऐसे प्रतीकात्मक व्यवहार की संभावना सिर्फ आधुनिके मानव यानी होमो सेपिएन्स में ही है जो विभिन्न वस्तुआें का उपयोग किसी स्पष्ट व्यावहारिक उपयोग के अलावा भी करते हैं । मगर क्रोएशिया से प्रापत ये वस्तुएं दर्शाती है कि मानवों के पूर्वज भी चीजोंको उनकी प्रत्यक्ष उपयोगिता से आगे जाकर देखते और इस्तेमाल करते थे । 


धरती पर फिर आएगी सरस्वती 
अब तक अदृश्य रही धार्मिक  महत्व की नदी सरस्वती को धरती पर पुन: अवतरित कराने का बड़ा मिशन शुरू हो चुका है । सैटेलाइट तस्वीरों की मदद से हरियाणा सरकार ने सरस्वती को खोज निकालने का बीड़ा उठाया है । ऐसी मान्यता है कि हजारों साल पहले यह अस्तित्व में थी, लेकिन भौगोलिक परिवर्तनों के चलते यह भूमिगत हो गई है । पुराणों में भी इस पवित्र नदी का जिक्र है । सैटेलाइट तस्वीरों में नदी के मार्ग की पुष्टि हो चुकी है । 
मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा है कि राज्य सरकार आदि बद्री विरासत बोर्ड को यह सरस्वती के उदगम स्थल को उसका सही दर्जा दिलाकर रहेगी । यमुनासागर में एक आम सभा के दौरान खट्टर ने खुदाई कार्य को बड़ी परियोजना के रूप में शुरू करने का ऐलान किया । बीते साल अक्टूबर में सत्ता में आने के बाद भाजपा सरकार हिन्दू संस्कृति से जुड़े स्थलों के संरक्षण और उनके प्रचार के लिए लगातार जुटी हुई है । 
हरियाणा के वन विभाग ने सरस्वती को उसके उद्गम स्थल शिवालिक के चरणपाद आदि बद्री से धरातल पर लाने के प्रयास शुरू कर दिए । उद्गम स्थल के चारोंऔर पानी के कुछ निशान मिले है । पानी की धारा इलाहाबाद की ओर होने के आसार बताए जा रहे है । 

अब रोबोट चाय बनाएगा  
भारत का पहला ३डी ह्माूमनॉयड रोबोट-यानी इंसानी रूप वाला रोबोट तैयार है जिसका नाम है मानव । यह ६० सेंटीमीटर लंबा और २ किलोग्राम भारी है । मानव को ३डी प्रिंटर की मदद से बनाया    गया । इसके पुर्जो को फेक्ट्री में नही बल्कि कम्प्यूटर में फीड किए गए डिजाइन से बनाया है । 
मानव को  दिल्ली में रहने वाले रोबोटिक वैज्ञानिक दिवाकर वेश ने बनाया है । दिवाकर रोबोटिक्स के क्षेत्र में पिछले १० वर्षो से रिसर्च कर रहे हैं । वे मानव को अपने अविष्कारों में से सबसे बड़ा मानते हैं, ऐसा इसलिए कि मानव, मनुष्यों के सारे काम कर सकता    है । पर फिलहाल दिवाकर का ये मानव मानव सिर्फ नाच सकता है । 
मानव में दिवाकर ने गानों पर थिरकने का प्रोग्राम फीड किया हुआ है । दिवाकर का कहना है कि अगर आप एक रोबोट को नचा सकते है तो आप उस से और सभी काम करवा सकते हैं जैसे उसे चलवाना, गिर के खड़े करवाना और साथ ही आवाज को महसूस करना समझ पाए की आवाज कहां से आ रही है । मानव में हमने आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धि को डाला है जो एक बड़ी बात  है । इन्हीं सब विशेषताआें के कारण मानव को हमारे आसपास हमारे घरो में चलते-फिरते देख सकेंगे । दिवाकर इस रोबोट मानव को जल्द बाजार में उतारना चाहते है । इसकी कीमत १.५-२ लाख रूपए हो सकती है । 
विश्व के सबसे विकसित रोबोट्स जापानी कपंनी होंडा का असीमो पिछले ३० साल से बन ही रहा है । अभी भी उसमें मनुष्य की बुद्धि नहीं दी जा सकी है । फिलहाल, रोबोटिक्स में जरूरत है की इस बात पर खोज की जाये की हम कैसेहै और उसको रोबोट्स में डालें ।
आज हमारे आसपास कई तरह के रोबोट्स मौजूद है - सफाई करने वाले वैक्यूम क्लीनर, उड़ने वाले झेन - जिन्हें सुरक्षा और फोटोग्राफी के लिए इस्तेमाल किया जाता है ओर इंसान जैसे दिखने वाले - यानी ह्मूमनॉयड रोबोट । अमरीका से रोबोटिक्स की पढ़ाई करने वाले आकाश सिन्हा अब दिल्ली में रोबोटिक्स कंपनी चलाते है । आकाश मानते है की रोबोट्स को घरों में काम करते देखने में अभी वक्त लगेगा । रोबोट्स देखने में तो इंसानी लग गए है पर दिमाग अभी भी इंसानी नही है । वैज्ञानिकों के सामने अभी ये चुनौती है कि वो कैसे रोबोट्स को सोचने पर मजबूर करें ।

चीटियों को भी लगा जंक फूड का चस्का
डिब्बाबंद खाद्य पदार्थो (जंक फूड) की दीवानी केवल युवा पीढ़ी ही नहीं है । शहरी परिवेश में रहने वाली चीटियों की कुछ प्रजातियां भी इस तरह के खाद्य पदार्थो की दीवानी है । एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है । इस निष्कर्ष से उस जिज्ञासा का उत्तर मिलता है कि चीटियों की कुछ प्रजातियां केवल शहरी परिवेश में ही ज्यादातर क्यों पाई जाती है । निष्कर्ष के लिए चीटियों के शरीर में आइसोटोप स्तर का अध्ययन किया गया ।
अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना स्टेट युनिवर्सिटी के मुख्य लेखक क्लिंट पेनिक ने कहा, हम चीटियों के व्यवहार को जानना चाहते हैं । कुछ प्रजातियां मानवीय गतिविधियों  व कुछ इससे इतर दूर वाले इलाकों में रहना पंसद करती  है । शोधकर्ताआें ने २१ प्रजातियों की १०० चीटियों पर यह अध्ययन किया, जिन्हें मैनहट्टन से फुटपाथों, पार्को व अन्य जगहों से एकत्रित किया गया । शहरी प्रजाति की चीटियों के आहार वहीं होते हैं, जो वहां के मानवों के आहार है ।

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