मंगलवार, 16 जनवरी 2018

विशेष लेख
हिमालय और जलवायु परिवर्तन
टी.डी जोशी
भारत के उत्तर में स्थित हिमालय पर्वत भारत को प्रकृति का अनुपम वरदान है । देश के शीर्ष मेंदीवार की भाँति खड़ी हिमालय पर्वत श्रृंखला सजग प्रहरी की भाँति इसकी सुरक्षा तो करती ही है, साथ ही साइबेरिया से आने वाली ठण्डी हवाआें को रोक कर ठण्ड से बचाती है । 
पारिस्थितिक संतुलन की दृष्टि से भी हिमालय का विशेष महत्व है । क्योंकि यह एक ओर तो विभिन्न प्रकार के जीव जन्तुआें को संरक्षण देकर जैव विविधता को संरक्षित करता है, दूसरी ओर पर्वतीय ढलानों पर स्थित वन बाढ़ और हिम स्खलन और भुस्खलन जैसी प्रकृतिक आपदाआें से सुरक्षा भी प्रदान करता है । इतना ही नही हिमालय क्षैत्र में पाये जाने वाले वन कार्बन का अवशोषण कर ग्रीन हाउस गैसों के परिणाम स्वरुप बढ़ने वाली गरमी को नियंत्रित करते है । यह पर्वत श्रंखला अपने ढलानों पर बहुत बढ़ी आबादी को आश्रय देती है, साथ ही निचले क्षेत्रों में रहने वाली आबादी को जल आपूर्ति भी करती है ।
जब पृथ्वी की उम्र लगभग २ अरब वर्ष थी उस समय पृथ्वी के दो हिस्से थे । एक हिस्सा `पैंजिया' विशाल महाद्वीप था और दुसरा हिस्सा `पैथालासा' एक विशाल महासागर था । कलांतर में `पैंजिया' महाद्वीप पर आंतरिक और बाहरी शक्तियों का दबाव पड़ा यह महाद्वीप दो भागों में विभाजीत हो गया । इसका उत्तरीय भाग `अंगारालैण्ड' था और दक्षिणी भाग `गौंडवानालैण्ड'। अंगारालैण्ड और गौंडवानालैण्ड के बीच में एक बड़ी खाई बनी जो `टेथिज सागर' के नाम से जानी गई । 
धीरे-धीरे टेथिज सागर पर पैंजिया महाद्वीप के दोनोंभागो (अंगारालैण्ड और गौंडवानालैण्ड) ने दबाव डालना शुरु किेयाजिससे यह सागर सिकुड़ने लगा । नदियों द्वारा लाये गये अवसादों और जीव जन्तुआें के अवशेषो से इस सागर की सतह उथली होने लगी । लगभग ५ करोड़ वर्ष पूर्व जब भारतीय प्लेट यूरेशीयाइ प्लेट से टकराई तो टेथिस सागर का अधिकांश भाग उपर उठ गया और वलित हिमालय पर्वत श्रंृखला अस्तित्व मेंआई ।
भारतीय प्लेट के यूरेशियाई प्लेट से टकरानेंके समय से ही भारतीय प्लेट उत्तर की ओर खिसक रही है । जिसकी गति आरंभ में १६ से.मी./वर्ष थी, जो अब ५ सेन्टीमीटर/वर्ष रह गई है । इस प्लेट के खिसकने के कारण ही हिमालय पर्वत श्रंृखला आज भी ५ सेन्टीमीटर/वर्ष की दर से बढ़ रही है ।
हिमालय पर्वत श्रंखला पश्चिम में सिंधु घाटी से लेकर पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी घाटी तक २४०० किमी लम्बाई में फैली हुई है और अर्द्धवृत्त का निर्माण करती है। यह विश्व की सबसे ऊ ंची पर्वत श्रेणी है । इस श्रंखला की चौड़ाई कश्मीर में ४०० किमी और अरुणाचल में १५० किमी है। पर्वत श्रृंखला की ऊ ंचाई पश्चिमी भाग की अपेक्षा पूर्व में अधिक विविधता पूर्ण है। देशांतरीय विस्तार के साथ हिमालय पर्वत श्रंखला को तीन भागों में विभक्त किया गया है ।
हिमाद्रि या आंतरिक हिमालय
यह पर्वत श्रृंखला महान व विशाल हिमालय के नाम से भी जानी जाती है । यह सबसे सतत श्रंखला है । इसकी दो चौटियां माउण्ट एवरेस्ट व कंजनजंघा की ऊ ंचाई क्र मश: ८८४८ मीटर और ८५९८ मीटर है । इस श्रंखला की १०० से अधिक चौटीयां ७२०० मीटर से अधिक उंची है । महान हिमालय के वलय की प्रकृति असंयमित है और हिमायल के इस भाग का क्रोड मेंम्रेनाइट का बना है । यह श्रंखला हमेशा हिमाच्छादित रहती है और इससे अनेक हिमानिया प्रवाहित होती है ।
निम्न हिमालय या हिमाचल
हिमाद्री के दक्षिण मेंस्थित श्रंखला जो सबसे अधिक असम है, हिमाचल या निम्न हिमालय के नाम से जानी जाती है । इस श्रंखला का निर्माण अत्यधिक संपीडित एवं परिवर्तित शैलों से हुआ है । इसकी ऊ ंचाई ३७०० मीटर से ४५०० मीटर के बीच और चौड़ाई ५० किमी औसतन है । पीर पंजाल इस श्रंखला की सबसे लंबी और महत्वपूर्ण श्रंखला है साथ ही धौलाधर एवं महाभारत श्रेणियां भी महत्पूर्ण है । स्वास्थ्य और पर्यटन की दृष्टि से यह श्रंखला विशेष है । कश्मीर घाटी और हिमाचल की कांगड़ा और कुल्लु घाटीयां इसी श्रंखला में स्थित है ।
शिवालिक
शिवालिक हिमालय की सबसे बाहरी श्रंखला है । इसकी उंचाई ९०० से ११०० मीटर और चौड़ाई १० से ५० किमी है । इन श्रंखलाआें का निर्माण उत्तर में स्थित मुख्य हिमालय की श्रंखलाआें से नदियों द्वारा लायी गई असंपिडित अवसादों से हुआ है निम्न हिमालय और शिवालिक के मध्य स्थित लम्बवत घाटी `दून' कहलाती है । इनमें देहरादून, कोटलीदून और पाटलीदून प्रसिद्ध `दून' घाटियां है ।
हिमालय को पश्चिम से पूर्व तक स्थित क्षेत्रों के आधार पर भी नदी घाटीयों की सीमाआें के आधार पर वर्गीकृत किया गया है । सतलूज और सिंधु के बीच स्थित हिमालय को कश्मीर तथा हिमाचल हिमालय, सतलूज और काली नदी के बीच स्थित हिमालय को कुमाऊ ं  हिमालय, काली और तीस्ता के मध्य नेपाल हिमालय तथा तीस्ता और दिहांग नदी के मध्य का हिमालय असम हिमालय के नाम से जाना जाता है । हिमालय की पूर्वीसीमा ब्रह्मपुत्र नदी बनाती है । दिहांग गार्ज के बाद हिमालय तीखा मोड़ बनातेे हुए भारत की पूर्वी सीमा में फेल जाता है ।
भारत के पूर्वीभाग में ब्रह्मपुत्र नदी बहती है । इसका उद्गम मानसरोवर झील के पूर्व में सिंधु और सतलुज के स्त्रोतों से काफी नज़दीक  से होता है । यह पूर्व की ओर हिमालय पर्वत के समान्तर बहती हुई नामचा बारवा शिखर के पास पहुंच कर एक गार्ज के माध्यम से अरुणाचल प्रदेश में पहुंचती है । यहा पर इसे दिहांग नाम से जाना जाता है । असम में दिबांग, लोहित, केनूला एवं दुसरी सहायक नदियां मिलकर ब्रह्मपुत्र का निर्माण करती है ।
हिमालय पर्वत भारतीय क्षेत्र के लिए जलवायु विभाजक के रुप में कार्य करता है । यह जाड़ो में चलने वाली ठण्डी महाद्वीपीय हवाआें का भारत आने से रोकती है और ठण्ड से देश की सुरक्षा करती है । साथ ही बरसात में चलने वाली दक्षिणी-पश्चिमी मानसूनी हवाआें का रोककर भारत में वर्षा करनें के लिए विवश करती है । जिससे भारतीय क्षेत्र में नमी बनी रहती है । इसके अतिरिक्त हिमालय के ग्लेशियर करोड़ों लोगों को पेयजल उपलब्ध कराते है ।
वर्तमान समय में वैश्विक उषणन के कारण ग्लेशियरों के पिघलने की दर बढ़ी है जिससे ग्लेशियर निरन्तर सिकुड़ते जा रहे है जो एक चिंता का विषय है । उपग्रहों से प्राप्त् सर्वेंाक्षणोंके अनुसार हिमालय क्षेत्र के ४५ हजार ग्लेशियरोंमें से कई ग्लेशियर ऐसे है जिनका द्रव्यमान घट रहा है । ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से हिमालयी क्षेत्र की झीलों का जलस्तर बढ़ेगा, जिससे भविष्य में घाटियों में भीषण बाढ़ आ सकती है । इसके अतिरिक्त भविष्य जनसंख्या वृद्धि से पेयजल के लिये ग्लेशियरोंपर दबाव बढ़ेगा । इसलिए हिमालय के ग्लेशियरोंका महत्व बढ़ जाता है । क्योंकि यह ग्लेशियर भारत की बहुत बढ़ी आबादी को पेयजल उपलब्ध कराते है ।
वैश्विक उष्णन में वृद्धि से तथा जलवायु परिवर्तन के कारण स्थिति बिगड़ने की संभावना है । २० वीं शाताब्दी में विश्व के सभी पर्वतीय क्षेत्रों ने औसत से अधिक तापमान को सहन किया है । हिमालय में उंचाई पर तापमान में वृद्धि वैश्विक तापमान से औसत से तीन गुना अधिक है । ऐसा अनुमान है कि २१ वीं सदी में, २० वीं सदी की अपेक्षा २ या ३ गुना अधिक वृद्धि तापमान में होगी । जो एक चिंता विषय है । भारतीय हिमालय क्षेत्र अतिसंवेदनशील क्षेत्र है और इसके लिए विशेष प्रबंधन की आवश्यकता है । यदि समय पर इस दिशा में उचित कदम नही उठाए गए तो भविष्य में गंभीर परिणाम हो सकतें है ।
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